Khangar Singh Rathore Araba
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Khangar Singh Rathore Araba
@Ks_Araba
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ऐतिहासिक धरोहरें हमारे पूर्वजों की वीरता, बलिदान और गौरवशाली परंपराओं की अमिट छाप हैं। हर एक पत्थर, हर एक स्तंभ, रणबांकुरों के त्याग और समर्पण की मौन गाथा है। ये वही धरोहरें हैं जिन पर हमें गर्व है, जिनसे जैसलमेर की पहचान है। ऐसे स्मारकों के पुनरुद्धार पर कोई आपत्ति जताना, इस भूमि की अस्मिता से विमुख होने जैसा है। किन्तु बासनपीर में घटित हुए कल के घटनाक्रम ने सिर्फ पत्थरों को नहीं छुआ, बल्कि जैसलमेर की उस आत्मा को आघात पहुंचाया है, जो सदियों से सामाजिक समरसता, अपनत्व और भाईचारे की मिसाल रही है। यह प्रयास केवल एक छतरी को क्षतिग्रस्त करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने हमारी सामाजिक एकता और ऐतिहासिक चेतना पर भी चोट की है। हमें ठहरकर सोचना होगा...क्या हम अपने स्वार्थों और मतभेदों की आड़ में आने वाली पीढ़ियों के बीच ऐसी खाई पैदा कर रहे हैं, जिसे न प्रशासन भर पाएगा, न कोई राजनीति। यदि यह प्रश्न हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है, तो उत्तर भी वहीं से निकलेगा....सम्मानपूर्वक पुनर्निर्माण। मैं मानता हूं कि जैसलमेर की सोच सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, यह वो भावना है जो जाति, धर्म और दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर हर संकट में साथ खड़ी होती है। आज उसी विरासत को संजोने का समय है। समाज के प्रबुद्धजन, बुजुर्ग, युवा और हर जागरूक नागरिक इस मुद्दे को भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखें। छतरियों का पुनर्निर्माण सिर्फ पत्थरों को जोड़ना नहीं होगा, बल्कि टूटते सामाजिक तानेबाने को भी फिर से गूंथने का कार्य होगा। सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है शांति, संवाद और साझा संकल्प। मुझे पूर्ण विश्वास है कि जैसलमेर के बाशिंदे हमेशा की तरह विवेक, समझदारी और एकता से रास्ता निकालेंगे। इस मुद्दे पर प्रशासन विधिसम्मत कार्रवाई कर समन्वय स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में सभी शांति, संयम बनाएं रखें। जय जैसाण!























