Kuldeep Sharma
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Kuldeep Sharma
@Kuldeepsharmap
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जिले में राजा का दौर,आदेशों की आंधी,सिस्टम बेहाल! (खास कॉलम:- मैने कुछ नहीं देखा) कुलदीप शर्मा, जर्नलिस्ट✍️ राजा के आगमन ने जिले को 'राज्याभिषेक' का रूप दे दिया था, लेकिन सैनिकों और सेनापतियों की हालत 'युद्धभूमि' जैसी हो गई है। भीलवाड़ा के सैनिक आत्महत्याओं के सिलसिले ने एक 'खास जंग' तो छेड़ ही दी, मगर जिले का माहौल अब 'नाजुक रस्सी पर नाच' सरीखा लटक रहा है। आइए, इन नौ 'कॉलमों' से तराशकर पेश करते हैं,ताकि सरकार और बड़े अधिकारी इस पूरे तन्हा 1700 सैनिक और सेनापति की खैर ले सके... छुट्टी का 'खेला'—कैंसिल से खुली, फिर भी शून्य! राजा महाराज के दरबार में छुट्टियाँ पहले 'कैंसिल' का फरमान हो गया था, फिर 'खोल' दिया गया—लेकिन नतीजा? अभी भी बिलकुल शून्य ही है! सैनिक और सेनापति अब 'भूखे शेर' की तरह भटक रहे हैं, मानो छुट्टी कोई 'जादू का चिराग' हो जो रगड़ते ही गायब हो जाए। परेशानी का आलम ये कि काम के बोझ तले दबे योद्धा सोच रहे हैं—क्या ये छुट्टी है या 'छलावा'? अब ऐसे कई सेनापति है जो इतने परेशान है की स्वास्थ्य भी इतना खराब कर चुके है कि अब वो मेडिकल लेने को मजबूर हैं। कहते है ना पहल सुख निरोगी काया! राजा की 'भाषा शैली'—दूरियाँ बढ़ी, परवचन कम न हुआ! राजा जी की बोलचाल ने तो कमाल कर दिया—सबकी 'बढ़ाई' (हौसला) शब्द को ही उड़ा दिया, और काम के बाद भी 'परवचन' का सिलसिला जारी है। मानो हर मीटिंग 'गीता उपदेश' हो! सैनिक सोचते हैं, 'भाषा मीठी हो तो राज चले, पर ये तो काँटों भरी है। दूरियाँ बढ़ा रही, और एकता तोड़ रही हैं। राजा का 'फटकार शो' चल रहा है, बेचारे सिपाही 'मूक दर्शक' बने ताली बजा रहे! सेनापतियों पर 'नाराजगी का तूफान'—काम के बावजूद तंग! अधिकतर सेनापतियों को राजा की 'नाराजगी' ने घेर लिया—काम करने के बावजूद 'परेशान करने' का अंदरूनी खेल जोरों पर। ये तो वैसा ही है जैसे कोई किसान फसल लहलहा ले, फिर भी मालिक कहे 'कम पैदा किया!' विरोध की चिंगारियाँ भड़क रही हैं, मगर आवाज अनुशासन के नाम पर दबा दी जा रही है। सेनापति भले ही 'वफादार' बने घूम रहे,लेकिन फिर भी काम का इनाम तो 'डाँट' ही मिल रहा है! राजा और 'वफादारों का डबल खौफ'—काँप उठे सब! राजा के साथ उनके 'वफादार' का खौफ भी ऐसा छाया कि जिले में सिहरन दौड़ गई। मानो दोहरी तलवार लटक रही हो—एक राजा की, दूसरी उसके चार पैर वाले वफादार की! सैनिक फुसफुसाते हैं, 'राजा तो जैसे है ही, पर ये वफादार तो उससे भी बड़ा खौफ पैदा करता हैं।' खौफ इतना कि 'नमस्कार' करने वाला भी डर के घेरे में! 'स्पेशल बटालियन' का बिल—वित्त मंत्री को बुलावा! राजा की 'स्पेशल सेनापति बटालियन' का बिल अगर पास हो गया, तो सरकार के वित्त मंत्री को जिले का दौरा जरूर करना पड़ेगा—खजाने की 'लूट' देखने के लिए! ये बटालियन तो 'स्वर्णिम खर्चे' का ऐसा प्रतीक बन सकती है जिसकी चर्चा शायद परदेश लेवल तक हो। राजा शायद सरकार की मोहरों को लुटाने की सोच बैठे हो। लगता है राजा के महल का खर्चा देखने वाला खुद एक दिन ऑडिट के चक्कर से बचने के लिए मना भी कर सकता है। सैनिकों को 'उलझन का जाल'—प्रजा का न्याय शिफर! राजा ने सैनिकों और जांच करने वाले सेनापतियों को इतना उलझा दिया कि प्रजा को न्याय दिलवाने का परिणाम 'शिफर' (शून्य) हो गया। मानो पहेली का जाल बिछा दिया—सब फँसे, न्याय लटका! 'राज्य सेवा' अब 'उलझन सेवा' बन गई, प्रजा चिल्ला रही—'न्याय कहाँ, भाई?' 'चेकमेट' के चेक—सेनापतियों को चारा! सेनापति और उनके अधीनस्थों को राजा ने 'शतरंज के कई चेक' (चेकमेट) थमा दिए—यानी फँसा दिया! काम का इनाम 'जाल' मिला, सब 'प्यादा' बने खेल रहे। राजा 'शतरंज का बादशाह', सेनापति 'प्यादे'—चेकमेट हो गए, अब 'गेम ओवर' का इंतजार ही चल रहा है! 'जल्दबाजी का फरमान'—न्याय शून्य, फाइलें क्लोज! राजा ने अचानक ऐसा आदेश जारी किया कि प्रजा को न्याय दिलवाने वाली फाइलें 'जल्द निस्तारण' के चक्कर में बंद हो रही है, इनकी वजह से न्याय शून्य हो गया है! इतनी जल्दबाजी कि 'खतरनाक बोझ' आ गया, मानो ट्रेन पटरी से उतरने को तैयार ही है। जल्दी इतनी कि न्याय 'फाइल क्लोज' हो गया, प्रजा रो रही—'फैसला कहाँ?'। सीधा सा मतलब है कि राजा का एक लाइन में सीधा सा आदेश है की फाइल क्लोज करो चाहे केसे भी हो! अब इसका मतलब क्या हुआ ? 'बीपी-शुगर-स्ट्रेस' का राजकीय वरदान—भीलवाड़ा 2.0! राजा के आने के बाद बीपी, शुगर और स्ट्रेस की बीमारियाँ अचानक उछल पड़ीं—हनुमानगढ़ में भी भीलवाड़ा जैसी 'अनहोनी' का अंदेशा मंडरा रहा है। सैनिक डॉक्टरों के चक्कर लगा रहे है, सोचते हैं 'राजा का आशीर्वाद तो मिला ही नहीं, ऊपर से बीमारियाँ फ्री मिल गई है!' जिला 'स्वास्थ्य शिविर' बन गया, शायद अब अगला कदम 'आत्महत्या जागरूकता सप्ताह' हो सकता है! @PoliceRajasthan


