Manish Kumar Gupta

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@ManishGupta_FCA

TV Panelist & Speaker, Business Journalist, Insolvency Professional, Chartered Accountant, Law Graduate, Author. RT not view #मनीष_की_बात @Sarrata_ @Farrata_

New Delhi, India Katılım Ocak 2015
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Manish Kumar Gupta
Manish Kumar Gupta@ManishGupta_FCA·
सोना, तेल और रुपया: भारत की आर्थिक चुनौती और सरकार की रणनीति — एक विश्लेषण पृष्ठभूमि: समस्या क्या है? भारत अपनी कुल तेल ज़रूरत का लगभग 85% आयात करता है। जब वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने एक वित्तीय buffer बनाकर petrol-diesel की कीमतें नियंत्रित रखीं और आम जनता को राहत दी। लेकिन अब वह buffer लगभग समाप्त हो चुका है। इसी दबाव के बीच सरकार ने सोने पर import duty 15% तक बढ़ा दी और प्रधानमंत्री ने स्वयं लोगों से सोना कम खरीदने की अपील की। यह महज़ एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सुविचारित रणनीति का हिस्सा है। दोहरा संकट: तेल और सोना भारत का oil import bill और gold import ये दोनों मिलकर विदेशी मुद्रा पर सबसे बड़ा दबाव डालते हैं। तेल महंगा होते ही logistics costs बढ़ती हैं, जिससे हर क्षेत्र में indirect inflation फैलती है। सोने का आयात productive investment नहीं है, यह foreign exchange का सीधा outflow है। अगर भारत केवल 5% fuel consumption भी बचा ले, तो current account deficit पर इसका असर अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी तर्ज पर सरकार "Carrot and Stick Policy" अपना रही है — एक तरफ अपील और प्रोत्साहन, दूसरी तरफ duty और policy pressure। समाधान की दिशा: तीन मोर्चे 1. Gold Monetization घरों और lockers में बंद सोने को financial system में लाना। अगर नागरिक अपना सोना सरकारी योजना में deposit करें, तो उन्हें ब्याज मिलेगा, सुरक्षा की चिंता कम होगी और देश को कई टन सोना productive उपयोग के लिए मिल सकता है। 2. Foreign Exchange की बचत अनावश्यक विदेशी खर्च जैसे विदेश में पर्यटन या destination weddings आदि को हतोत्साहित करना और घरेलू विकल्पों को बढ़ावा देना। 3. Energy Diversification भारत Russia, UAE, Canada जैसे कई देशों से तेल आयात करता है। किसी एक supplier पर निर्भरता कम करना ही smart energy policy है। वैश्विक राजनीति और भारत Iran-Trump तनाव जैसे geopolitical घटनाक्रम oil market को प्रभावित करते हैं। अगर oil prices $10 प्रति barrel भी घटें, तो भारत के current account deficit में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। इसीलिए भारत वैश्विक कूटनीति में practical व्यापारिक दृष्टिकोण अपनाता है वह किसी गठबंधन में नहीं बंधता, बल्कि अपने हितों के अनुसार संबंध बनाता है। और अंत में हम क्या समझें: सोने पर duty, तेल की कीमतों पर नियंत्रण और foreign exchange बचाने की अपील... ये सब अलग-अलग नीतियाँ नहीं, बल्कि एक ही लक्ष्य की ओर उठाए गए कदम हैं। लक्ष्य स्पष्ट है विदेशी मुद्रा बचाना, महंगाई नियंत्रित रखना, trade balance मज़बूत करना और भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना। भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह व्यापार में व्यावहारिक है, लेकिन रणनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं। दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए नागरिकों की जागरूकता और सरकार की नीतिगत दृढ़ता ये दोनों ज़रूरी हैं। ___________________________________________ यह लेख एक टेलीविज़न परिचर्चा के विश्लेषण पर आधारित है। मनीष कुमार गुप्ता राजनीतिक विश्लेषक सर्वाधिकार सुरक्षित #IndiaEconomy #OilCrisis #ForeignReserve #PetrolDiesel #GoldImport #Inflation #EconomicStrategy #ModiGovernment #FuelPrices #IndianEconomy
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Manish Kumar Gupta
Manish Kumar Gupta@ManishGupta_FCA·
सुरक्षित भविष्य के लिए प्रधानमंत्री का आह्वान और हमारी समझदारी प्रधानमंत्री मोदी जी ने हाल ही में देशवासियों से अपनी जीवनशैली और खर्चों में थोड़ी सावधानी बरतने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह समय अपनी जरूरतों को सीमित करने का नहीं बल्कि उन्हें कुशलता से प्रबंधित करने का है। इस आह्वान के पीछे मुख्य उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सशक्त करना और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच भारत को एक सुरक्षित कवच प्रदान करना है। जब हम अनावश्यक विदेश यात्राओं को टालकर देश के भीतर पर्यटन करते हैं या पाम ऑयल के स्थान पर सरसों के तेल और शुद्ध घी का उपयोग करते हैं तो हम न केवल अपनी सेहत सुधारते हैं बल्कि देश के कीमती डॉलर भी बचाते हैं। मोदी जी ने तेल और सोने को लेकर जो बात कही है, वह डर की भाषा नहीं बल्कि एक समझदार परिवार के मुखिया की सलाह है। इसमें कोई बड़ा त्याग नहीं माँगा गया है। न कोई बैन है, न कोई नया टैक्स, न जीएसटी की मार। अगर ऐसा करना होता तो सरकार एक रात में नोटिफिकेशन जारी कर देती। यह तो बस वैसी ही सलाह है जैसी कोई समझदार बड़ा घर में देता है। यहां यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि देश में किसी भी प्रकार की घबराहट या संकट वाली स्थिति नहीं है। यह केवल संसाधनों को आर्थिक रूप से और विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग करने की हमारी परिपक्वता का परिचय है। वर्तमान में भारत के पास लगभग 60 से 70 दिनों का तेल भंडार सुरक्षित है। यदि हम आज से ही बेहतर प्रबंधन और थोड़ी बचत का संकल्प लें तो इस भंडार को 80 दिनों तक आसानी से बढ़ाया जा सकता है। चूंकि हमारा देश अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है और वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे मुख्य समुद्री मार्ग बाधित हैं इसलिए अन्य देशों से आने वाले नए ऑर्डर और उनके वितरण में समय लगना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में पूर्व तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव है। सोने के निवेश को लेकर भी सरकार का रुख बहुत स्पष्ट और आधुनिक है। जो लोग केवल निवेश के लिए सोना खरीदते हैं उनके लिए गोल्ड बॉन्ड या गोल्ड ईटीएफ जैसे वित्तीय साधन कहीं अधिक सुरक्षित और लाभदायक हैं। इससे देश पर सोने के आयात का बोझ कम होता है और अर्थव्यवस्था में तरलता बनी रहती है। आभूषणों के प्रति हमारे लगाव का सम्मान करते हुए सरकार केवल यह सुझाव दे रही है कि नियमित रूप से हर साल सोना खरीदने की आदत को थोड़े समय के लिए टाला जा सकता है या पुरानी ज्वेलरी को ही नया स्वरूप दिया जा सकता है। प्रधानमंत्री जी का दृष्टिकोण बिल्कुल वैसा ही है जैसा हमारे घरों में माताएं अपनाती हैं। वे सदैव थोड़ा राशन नमकीन और बचत संभालकर रखती हैं ताकि यदि कभी वेतन आने में देरी हो या कोई और समस्या आए तो घर की व्यवस्था और बच्चों की मुस्कान पर कोई आंच न आए। सरकार का यह प्रयास अर्थव्यवस्था के लिए एक शॉक एब्जॉर्बर की तरह है जो बाहरी दुनिया के आर्थिक झटकों को सोख लेगा ताकि आम जनता को अचानक किसी बड़े संकट का सामना न करना पड़े। यह पूरी कवायदआत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ते हमारे कदम हैं। जब एक नागरिक अपनी गाड़ी के ईंधन में 20 प्रतिशत की बचत करता है या कारपूलिंग जैसे विकल्पों को अपनाता है तो वह केवल अपना पैसा नहीं बचाता बल्कि राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। सरकार ने न तो कोई नया कर लगाया है और न ही किसी चीज पर प्रतिबंध। यह केवल एक परिवार के मुखिया की अपने सदस्यों को दी गई वह सलाह है जो आने वाले कल को सुरक्षित और समृद्ध बनाने के लिए अनिवार्य है। सोना घर में रखो तो बस चमकता है, गोल्ड ईटीएफ में लगाओ तो देश भी चमकता है। माँ ने दाल थोड़ी ज्यादा रखी तो वह कंजूस नहीं, समझदार है। देश भी यही कर रहा है।
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Manish Kumar Gupta
Manish Kumar Gupta@ManishGupta_FCA·
राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और प्रधानमंत्री की अपील का यथार्थ ​देखिए, प्रधानमंत्री मोदी जी की बात का सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि अगर हमारे पास चालीस दिन का पेट्रोलियम रिज़र्व है और हम थोड़ी बचत तथा बेहतर योजना के साथ चलें, तो वही रिज़र्व अड़तालीस दिन तक चल सकता है। यानी सिर्फ आठ दिन की अतिरिक्त सुरक्षा तैयार करने की एक गंभीर कोशिश है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। लेकिन कांग्रेस ने इस बात को जरूरत से ज्यादा व्यक्तिगत रूप से ले लिया। उन्हें ऐसा लगा मानो यह बात खास तौर पर राहुल गांधी को विदेश यात्राओं से रोकने के लिए कही गई हो। जबकि मोदी जी ने ऐसा कहीं नहीं कहा। उन्होंने केवल इतना कहा कि जहां संभव हो, अनावश्यक खर्च और ईंधन की खपत कम की जाए। ​अगर किसी को जरूरी काम से विदेश जाना है तो वह जरूर जाए। व्यापार, आयात निर्यात या अन्य आर्थिक गतिविधियों पर कोई रोक नहीं है। सरकार सिर्फ यह कह रही है कि जहां बचत संभव हो, वहां थोड़ी सावधानी बरती जाए। जैसे आज हम वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं या ऑनलाइन डिबेट कर रहे हैं। पहले इसी काम के लिए स्टूडियो जाना पड़ता था, पेट्रोल खर्च होता था और समय भी लगता था। अब काम भी हो रहा है और ईंधन की बचत भी हो रही है। यही बात सरकार देश को समझाने की कोशिश कर रही है। ​असल समस्या वैश्विक है। यह संकट भारत ने पैदा नहीं किया है। ईरान अमेरिका तनाव, मिडिल ईस्ट की वर्तमान स्थिति और वैश्विक तेल बाज़ार की अनिश्चितता का सीधा असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। ऐसे समय में अगर सरकार अपनी जनता से कह रही है कि थोड़ा संतुलित तरीके से चलें, तो इसमें गलत क्या है? ​दुर्भाग्य से कांग्रेस को हर बात में राजनीति दिखाई देती है। जबकि सरकार का उद्देश्य बिल्कुल सीधा है कि देश का आयात बिल नियंत्रित किया जाए और कीमती डॉलर की बचत की जाए। सरकार का लक्ष्य खासकर पेट्रोल डीजल, सोना चांदी और अन्य आयातित वस्तुओं पर दबाव कम करना है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मोदी सरकार ने कभी व्यापारिक आयात रोकने की बात नहीं की। सिर्फ गैर जरूरी खर्चों में संयम बरतने की अपील की है। जैसे विदेश में शादी या छुट्टियां मनाने के बजाय भारत में पर्यटन को बढ़ावा देना। अगर आपको घूमने जाना ही है तो लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार, भीमबेटका, राजस्थान या उत्तराखंड जैसी खूबसूरत जगहों पर जाइए। इससे देश का पैसा भी देश में रहेगा और हमारी स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बहुत लाभ होगा। ​नीतियों के स्तर पर भी काफी काम किया जा सकता है। सरकार अगर चाहे तो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स पर जीएसटी और कम कर सकती है या कुछ अतिरिक्त राहत दे सकती है, ताकि लोग पेट्रोल डीजल पर अपनी निर्भरता कम करें। इसी तरह गोल्ड बॉन्ड स्कीम को और बढ़ावा दिया जा सकता है। जिन्हें निवेश करना है वे फिजिकल गोल्ड खरीदने के बजाय गोल्ड बॉन्ड में निवेश करें। इससे सरकार को भी पूंजी मिलेगी और लोगों को निवेश का बेहतरीन लाभ भी मिलता रहेगा। ​दरअसल मोदी जी सिर्फ यही कह रहे हैं कि थोड़े समय के लिए किफायत से चल लिया जाए। इसे एक उदाहरण से समझिए, जैसे कोई डॉक्टर कहता है कि स्वास्थ्य ठीक रखना है तो कार्बोहाइड्रेट कम और प्रोटीन ज्यादा लो। अब अगर कोई मरीज कहे कि नहीं, हम तो वही खाएंगे जो हमारा मन करेगा, तो उसमें डॉक्टर की क्या गलती? उसी तरह सरकार भी कह रही है कि जहां संभव हो, वहां थोड़ी बचत कर लीजिए। ​सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया के कई देशों में पेट्रोल डीजल के दाम १५ से २० प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। अमेरिका, यूरोप, पाकिस्तान, नेपाल, अफगानिस्तान हर जगह इस वैश्विक संकट का असर दिखाई दे रहा है। लेकिन भारत में सरकार ने लंबे समय तक कीमतों को नियंत्रित रखा है। इस बात की सराहना बहुत कम हुई, लेकिन एक सामान्य और राष्ट्रहित की अपील पर राजनीतिक विवाद ज्यादा खड़ा हो गया। ​अगर मान लीजिए देश के सिर्फ ३० प्रतिशत लोग भी थोड़ी बचत करना शुरू कर दें और वे अपने ईंधन उपयोग में १० से १५ प्रतिशत की कमी कर दें, तो इससे देश को कई दिनों का अतिरिक्त रणनीतिक लाभ मिल सकता है। यही पूरा गणित है और यही डॉलर बचाने की वास्तविक प्रक्रिया है। ​मोदी जी की राजनीति भी बिल्कुल अलग तरह की होती है। वे एक मुद्दा जनता के सामने छोड़ते हैं और विपक्ष उसी में उलझा रहता है, जबकि सरकार दूसरी रणनीतिक तैयारियों में लग जाती है। फर्क यही है कि मोदी जी लगातार काम करने वाले नेता की एक मजबूत छवि रखते हैं, जबकि विपक्ष के कई नेताओं पर गंभीरता की कमी के आरोप अक्सर लगते रहते हैं। ​जहां तक तेल भंडारण की बात है, यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि सरकार ने कुछ नहीं किया। मनमोहन सिंह सरकार के समय की तुलना में भारत की रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता में लगभग ७० प्रतिशत तक वृद्धि की गई है और इस पर अभी भी लगातार काम चल रहा है। नई रिफाइनरियां, नए स्टोरेज प्रोजेक्ट और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े कई बड़े ढांचे विकसित किए जा रहे हैं। जैसे मेडिकल कॉलेज, आईआईटी और इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने का काम हुआ है, उसी तरह ऊर्जा सुरक्षा पर भी लगातार भारी निवेश हो रहा है। ​अंततः सरकार की कोशिश यही है कि इस वैश्विक संकट का असर भारत पर कम से कम पड़े। इसलिए अगर थोड़ी सावधानी, थोड़ी बचत और थोड़ी समझदारी की अपील की जा रही है, तो उसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय एक व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। #CrudeOil #PetrolPrice #DieselPrice
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Manish Kumar Gupta
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आज एक बहुत बड़ा फैसला हुआ।...नीट 2026 का पूरा एग्जाम कैंसल कर दिया गया। सीबीआई जांच बैठा दी गई, पेपर सेट करने से लेकर पेपर बांटने तक, जिस किसी ने भी गड़बड़ी की होगी, उसे छोड़ा नहीं जाएगा। कई संदिग्ध गिरफ्तार भी हो चुके हैं, अब इस पूरे मामले को दो तरीके से देखा जा सकता है: एक तरीका यह है कि लोग कहें....“देखो, सिस्टम फेल हो गया...“सरकार नाकाम हो गई...”“इतनी बड़ी परीक्षा तक सुरक्षित नहीं रही।” लेकिन मैं इसे दूसरे तरीके से भी देखता हूं: मैं इसे इस रूप में देखता हूं कि अगर गड़बड़ी हुई है तो उसे दबाया नहीं गया। उसे छुपाने की कोशिश नहीं हुई। पूरा एग्जाम तक कैंसल कर दिया गया, क्योंकि लाखों बच्चों के भविष्य से बड़ा कुछ नहीं हो सकता। यही फर्क होता है जीरो टॉलरेंस नीति और समझौता वाली राजनीति में… सोचिए, अगर सरकार चाहती तो क्या नहीं कर सकती थी? कुछ अधिकारियों को सस्पेंड करके मामला ठंडा कर देती। कह देती “जांच चल रही है।” लेकिन यहां पूरा एग्जाम ही रद्द कर दिया गया। इसका मतलब साफ है कि सिस्टम को एक संदेश दिया जा रहा है। संदेश यह कि… अगर भ्रष्टाचार करोगे, अगर बच्चों के भविष्य से खेलोगे, अगर पैसे लेकर सिस्टम बेचोगे, तो तुम्हें बचाया नहीं जाएगा…और सबसे बड़ी बात सरकार इस डर में नहीं दिख रही कि “इससे हमारी बदनामी होगी। असल में भ्रष्टाचार की सबसे खतरनाक जड़ यही है। हम भ्रष्टाचार से नफरत नहीं करते, हम सिर्फ चाहते हैं कि हमारा काम हो जाए। भ्रष्ट लोग आसमान से नहीं उतरते, वो हमारे आसपास ही होते हैं, कई बार रिश्तेदार होते हैं…कई बार दोस्त होते हैं। कई बार वही लोग होते हैं जिनके लिए हम कहते हैं…अरे छोड़ो, अपना आदमी है।यहीं से भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकृति मिलती है। जब कोई पैसे देकर नौकरी लेता है, जब कोई सिफारिश से एडमिशन लेता है, जब कोई गलत तरीके से पेपर हासिल करता है, तो सिर्फ एक सीट नहीं चोरी होती, किसी मेहनती गरीब बच्चे का सपना चोरी होता है। और सच कहूं तो भारत में भ्रष्टाचार सिर्फ व्यवस्था की समस्या नहीं है, यह मानसिकता की भी समस्या बन चुका है। हम सब अपने हिस्से की ईमानदारी चाहते हैं, लेकिन अपने हिस्से की बेईमानी को अक्सर “जुगाड़” कहकर सामान्य बना देते हैं। इसलिए आज का यह फैसला सिर्फ नीट एग्जाम का फैसला नहीं है। यह पूरे सिस्टम को चेतावनी है। पेपर लीक करने वाले, पैसे लेकर सीट बेचने वाले, और सिस्टम में बैठे भ्रष्ट लोग, अब यह समझ लें कि मामला दबेगा नहीं... गलती होगी तो जांच होगी…जांच होगी तो गिरफ्तारी होगी… और चाहे कोई कितना बड़ा क्यों न हो, बचाया नहीं जाएगा। क्योंकि देश तब मजबूत नहीं बनता जब भ्रष्टाचार छुपाया जाए -देश तब मजबूत बनता है जब भ्रष्टाचार पकड़कर सजा दी जाए। और शायद यही कारण है कि आज पहली बार सिस्टम के भीतर बैठे लोगों को भी डर लग रहा है कि अब मैनेज कर लेना आसान नहीं रहेगा। लाखों मेहनती छात्रों के लिए यह जरूरी भी है। क्योंकि परीक्षा सिर्फ एक टेस्ट नहीं होती, वह कई परिवारों के वर्षों के संघर्ष का परिणाम होती है। किसी किसान का बेटा, किसी मजदूर की बेटी,किसी मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा, दिन रात मेहनत करके परीक्षा देता है। अगर उसका भविष्य पैसे वालों के हाथ बिकने लगे, तो फिर मेहनत पर भरोसा खत्म हो जाएगा और किसी भी देश के लिए इससे बड़ा खतरा कुछ नहीं हो सकता। इसलिए मेरा मानना है कि नीट कैंसल होना दुखद जरूर है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है सिस्टम को साफ करना… क्योंकि कभी कभी बीमारी छुपाने से बेहतर होता है ऑपरेशन करना। लेखक: मनीष कुमार गुप्ता राजनीतिक विश्लेषण 9810 7714 77 © सर्वाधिकार सुरक्षित #NEET #leak #neetcancel #BJP #student #doctor
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Manish Kumar Gupta
Manish Kumar Gupta@ManishGupta_FCA·
भाजपा का बढ़ता सामाजिक आधार और समावेशी राजनीति का नया अध्याय भाजपा की हालिया रणनीतियों और मंत्रिमंडल विस्तार के निर्णयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी सामाजिक समीकरणों को साधने में कितनी निपुण है। पांडेय जी को मंत्रिमंडल में स्थान देकर भाजपा ने न केवल ब्राह्मण समाज को एक सशक्त संदेश दिया है, बल्कि विपक्षी दलों के दावों की जमीनी हकीकत भी उजागर कर दी है। विपक्ष विशेषकर समाजवादी पार्टी अक्सर ब्राह्मणों के हितों की बात तो करती है, लेकिन जब वास्तविक सम्मान और पद देने की बारी आती है, तो वहां केवल उपेक्षा ही हाथ लगती है। पांडेय जी का समाजवादी पार्टी से भाजपा में आना और तुरंत महत्वपूर्ण पद पाना इस बात का प्रमाण है कि भाजपा में योग्यता और सामाजिक प्रभाव का वास्तविक सम्मान होता है। यह घटनाक्रम उन सभी नेताओं के लिए एक बड़ा संकेत है जो दूसरी पार्टियों में उपक्षित महसूस कर रहे हैं। पहले दूसरी पार्टियों से आने वाले नेताओं के लिए भाजपा के द्वार इतनी आसानी से नहीं खुलते थे, लेकिन अब पार्टी उन्हें न केवल स्थान दे रही है बल्कि पद और प्रतिष्ठा भी प्रदान कर रही है। भाजपा का यह 'ओपन डोर' संदेश राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है कि जो भी सक्षम नेता विकास की इस यात्रा में जुड़ना चाहते हैं, उनका स्वागत है। पार्टी की वर्तमान रणनीति अब एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की ओर केंद्रित है। विश्वकर्मा जी और अन्य पिछड़े वर्ग के नेताओं को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि भाजपा गैर यादव पिछड़ों और दलितों के सशक्तिकरण को लेकर कितनी गंभीर है। राजनीतिक धरातल पर यह धारणा बलवती हो रही है कि यादव और मुस्लिम वोट बैंक की स्थिति अब एक ऐसी धुरी बन गई है जहाँ भाजपा के प्रयासों के बावजूद समर्थन की संभावनाएं सीमित हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा ने अपनी पूरी ऊर्जा उन वर्गों पर केंद्रित की है जो विकास की मुख्यधारा से जुड़कर अपना भविष्य संवारना चाहते हैं। यह सीधा संदेश अखिलेश यादव के लिए भी है कि यदि उनकी राजनीति केवल विशिष्ट समीकरणों तक सीमित रही, तो सत्ता की राह अत्यंत कठिन होगी। पूजा पाल जैसे नेताओं को लेकर भी पार्टी का दृष्टिकोण अत्यंत परिपक्व है। उन्हें इस विस्तार में जगह न मिलना किसी उपेक्षा का संकेत नहीं है, बल्कि यह पार्टी के सांगठनिक संतुलन और भविष्य की बड़ी रणनीतियों का हिस्सा हो सकता है। भाजपा अपने आधार को मजबूत करने के लिए हर वर्ग के प्रभावी नेताओं को उचित समय पर सही भूमिका देने में विश्वास रखती है। प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर भाजपा का तर्क अत्यंत व्यवहारिक और तार्किक है। यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण है, तो उसकी सामाजिक पहचान और प्रतिनिधित्व करने की क्षमता पार्टी बदलने से समाप्त नहीं हो जाती। जो नेता विपक्ष में रहते हुए अपने समाज की आवाज थे, वे भाजपा के साथ जुड़कर और भी प्रभावी ढंग से वही कार्य कर रहे हैं। भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह सवर्णों, दलितों और पिछड़ों के समन्वय से एक ऐसा सुदृढ़ राजनीतिक ढांचा तैयार कर रही है जो विकास, विश्वास और सम्मान के त्रिकोण पर आधारित है। #UPPolitics #YogiAdityanath #BJPvsSP
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ANUPAM MISHRA
ANUPAM MISHRA@scribe9104·
बांग्लादेश में पब्लिक टॉयलेट ये वो विकास का मॉडल है जिसे रघुराम राजन से लेकर ध्रुव राठी तक एशिया में सबसे बेहतर बता रहे थे 😎
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Manish Kumar Gupta
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आज कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक ऐसा भावुक दृश्य उपस्थित हुआ जिसने हर भारतीय के हृदय को छू लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 98 वर्षीय वयोवृद्ध भाजपा कार्यकर्ता मखनलाल सरकार जी के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया। यह कोई पहली बार नहीं है जब मोदी जी ने इस तरह अपने संस्कारों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया हो। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के बाद उन्होंने वहाँ काम करने वाले श्रमिकों के चरण धोकर उनका सम्मान किया था। उन्होंने यह नहीं देखा कि कौन किस जाति या वर्ग से है, उन्होंने केवल श्रम और समर्पण को नमन किया। यही संघ और भाजपा की वह संस्कृति है जो यह मानती है कि सेवा करने वाला हर व्यक्ति वंदनीय है, चाहे वह कार्यकर्ता हो, श्रमिक हो या वयोवृद्ध साथी। मखनलाल सरकार जी का जीवन स्वयं में एक गाथा है। सन् 1952 में वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के साथ कश्मीर में तिरंगा फहराने के आंदोलन में गए और गिरफ्तार हुए। वे उस अंतिम यात्रा के साक्षी थे जिसमें मुखर्जी जी रहस्यमय परिस्थितियों में जेल में शहीद हो गए। 1980 में भाजपा के गठन के बाद उन्होंने उत्तर बंगाल में संगठन खड़ा किया, एक ही वर्ष में लगभग दस हजार सदस्य बनाए और सात वर्षों तक जिलाध्यक्ष के रूप में निरंतर सेवा दी। संघ परिवार की यही विशेषता है कि यहाँ पद और प्रतिष्ठा नहीं, त्याग और तपस्या का सम्मान होता है। बड़े से बड़ा नेता जमीनी कार्यकर्ता के साथ बैठकर खाना खाता है, उसका हाल पूछता है, उसके परिश्रम को प्रणाम करता है। मोदी जी ने आज मखनलाल जी के चरण छूकर स्वयं को सम्मानित किया है। जिस बंगाल की धरती पर आज भाजपा की सरकार बन रही है, उसकी नींव में इन्हीं अनाम कार्यकर्ताओं का बलिदान है। यह क्षण पूरे भाजपा परिवार के लिए गर्व और आत्मविभोर कर देने वाला है। #bengal #ShyamaPrasadMukherjee #BJPGovernment
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Manish Kumar Gupta
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वारंगल का शिव मंदिर: जब 800 साल पुरानी धरोहर टूटी, तो कांग्रेस की राजनीति का असली चेहरा भी सामने आया तेलंगाना के वारंगल में एक 800 साल पुराने काकतीय कालीन शिव मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। यह खबर सुनकर मन में पहला सवाल यही आता है कि आखिर किसने और क्यों? जो मंदिर सदियों से खड़ा था, जिसे पुरातत्व विभाग ने संरक्षित घोषित किया हुआ था, वह अचानक एक दिन मलबे में तब्दील हो गया। और जवाब में सरकार की तरफ से आया एक मामूली सा बयान। यही वह क्षण है जब समझ आता है कि यह केवल एक मंदिर तोड़ने की घटना नहीं है। यह उस सोच का नतीजा है जो दशकों से हिंदू समाज को हल्के में लेती आई है। काकतीय वंश और इस मंदिर का तेलंगाना में विशेष महत्व है, काकात्य वंश की राजधानी वारंगल कभी सत्ता का केंद्र थी। राजा गणपतिदेव ने लगभग साठ साल तक यहाँ शासन किया और इस दौरान जो मंदिर, किले और स्थापत्य बने, वे आज भी भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। यह शिव मंदिर उसी काल का था। काकातिया वंश ने लगभग ढाई सौ वर्ष राज किया था। आज से करीब 800 से 850 साल पुराना यह मंदिर काकतीय किले के परिसर में स्थित है ASI यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है। इसके बावजूद इसको तोड़ दिया गया। अगर इसकी तुलना बाबरी मस्जिद से करेंगे तो हमारी आँखें खुल जाएँगी... अब इस मंदिर की तुलना बाबरी मस्जिद से करते हैं। बाबरी मस्जिद 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाई थी यानी आज से करीब 500 साल पहले। वहीं यह शिव मंदिर उससे भी करीब 300 से 350 साल पुराना था। सीधे शब्दों में कहें तो जब बाबर का जन्म भी नहीं हुआ था, उससे पहले से यह मंदिर वारंगल की धरती पर खड़ा था। 1992 में जब बाबरी मस्जिद टूटी तो पूरे देश में आग लग गई। बड़े-बड़े नेता संसद में रोए। मीडिया में हफ्तों तक बहस चली। आयोग बने। मुकदमे चले। तीन दशक तक यह देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना रहा। और अब... कांग्रेस की कारगुजारी से यह 800 साल पुराना शिव मंदिर टूट गया। ASI संरक्षित धरोहर मलबे में मिल गई। कांग्रेस सरकार की तरफ से कोई ठोस जवाब नहीं। राष्ट्रीय मीडिया ने भी बस इसे एक छोटी सी खबर बनाकर अगले दिन भुला दिया यही दोहरा मापदंड है। कांग्रेस की राजनीति का असली चेहरा : कांग्रेस पार्टी दशकों से एक खास तरह की राजनीति करती आई है जिसे आम भाषा में तुष्टीकरण कहते हैं। इसका मतलब सीधा है, एक वर्ग को खुश रखो, चाहे उसके लिए दूसरे वर्ग की अनदेखी ही क्यों न करनी पड़े। इस नीति के तहत जो हुआ वो यह है कि हिंदू धर्म, हिंदू परंपरा और हिंदू आस्था को बार-बार निशाना बनाया गया। मंदिरों की जमीन पर सरकारी कब्जा, मंदिर की आय पर सरकारी नियंत्रण, धार्मिक आयोजनों पर अड़ंगे, और जब भी हिंदू समाज अपनी धरोहर की रक्षा की बात करे तो उसे सांप्रदायिक करार दे दो। वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों से जुड़े हर मुद्दे पर तत्काल संवेदनशीलता दिखाई जाती है। यह संतुलन नहीं, यह चयनात्मक राजनीति है। वारंगल का मंदिर इसी नीति का ताज़ा नतीजा है। कांग्रेस शासित तेलंगाना में एक संरक्षित हिंदू धरोहर टूटी और सरकार ने जो रवैया दिखाया, वह बताता है कि इस पार्टी के लिए हिंदुओं की आस्था और उनकी विरासत कितनी अहमियत रखती है। EVM और वोट चोरी का बहाना बनाकर जनता की नाराजगी को छुपाने की कोशिश भले ही की जाती हो लेकिन अंततः कांग्रेस चुनाव हार जाती है, और उसके बाद एक ही राग अलापती है। EVM हैक हो गया। वोट चोरी हुई। साजिश हुई... लेकिन सच्चाई यह है कि देश की जनता, खासकर हिंदू समाज, इस पार्टी की नीतियों से थक चुका है। लोग समझ चुके हैं कि यह पार्टी उनकी परवाह नहीं करती। जब एक 800 साल पुरानी धरोहर टूटती है और सरकार चुप रहती है, जब मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण होता है लेकिन दूसरे धार्मिक स्थलों पर नहीं, जब हिंदू त्योहारों पर सवाल उठाए जाते हैं लेकिन दूसरे समुदायों के त्योहारों पर पूरी संवेदनशीलता दिखाई जाती है, तो जनता सब देखती है। जनता मूर्ख नहीं है, वह समझती है कि कौन उसके साथ है और कौन केवल वोट के वक्त उसके दरवाजे पर आता है। इस पूरे प्रकरण में जनता की मांग है कि सभी धर्मों की धरोहरों के साथ एक जैसा व्यवहार हो, सबसे अहम बात यह कि देश की राजनीति में हिंदू समाज को भी उतना ही सम्मान मिले जितना किसी और को मिलता है। यह कोई बड़ी माँग नहीं है। यह तो संविधान का भी तकाजा है। वारंगल का यह शिव मंदिर केवल एक इमारत नहीं था। यह 800 साल के इतिहास का एक जीवंत प्रमाण था। काकतीय राजाओं की विरासत था। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र था। इसका टूटना एक हादसा नहीं, एक नीति का नतीजा है। और जब तक वह नीति नहीं बदलती, तब तक हिंदू समाज का गुस्सा भी नहीं थमेगा। कांग्रेस को यह समझना होगा कि देश की जनता अब EVM पर नहीं, असली मुद्दों पर वोट करती है। और जब तक वह अपनी इस खोखली, दोहरी और तुष्टीकरण वाली राजनीति से बाहर नहीं निकलती, चुनाव के नतीजे वही रहेंगे जो पिछले कई सालों से आ रहे हैं। #Congress #santandharma #telanganarashtrasena
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Manish Kumar Gupta
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बंगाल की राजनीति... एक अनकही कहानी Author : Manish Kumar Gupta | Political Analyst _____________________________________________________ राजनीति में संकेत बहुत कुछ कहते हैं... और कभी-कभी वो बातें भी कह जाते हैं जो शब्दों में कहना मुश्किल होता है। पश्चिम बंगाल में इन दिनों जो हो रहा है, उसे समझने के लिए किसी राजनीतिक विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है। बस थोड़ी सी समझ और एक खुली आँख चाहिए। सत्ता अभी बदली नहीं है... लेकिन उसकी आहट सुनाई देने लगी है। और इसी आहट ने ममता बनर्जी को एक खास किस्म की बेचैनी में डाल दिया है। वो बेचैनी जो सत्ता खोने के डर से नहीं... बल्कि उस ज़मीन को खिसकते महसूस करने से पैदा होती है, जिसे वो दशकों से अपनी मुट्ठी में समझती रही हैं। ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक जीवन एक संघर्ष की कहानी है... इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन संघर्ष और हठधर्मिता में फर्क होता है। आज जो संदेश देने की कोशिश हो रही है... वो यह है कि बंगाल को उत्तर प्रदेश या बिहार मत समझो। यानी यह स्वीकारोक्ति भी है कि कहीं न कहीं दबाव है... कहीं न कहीं ज़मीन खिसक रही है। सीमा का सियासी खेल : एक बात जो बहुत गंभीरता से सोचने वाली है... वो है India-Bangladesh सीमा क्षेत्र की राजनीति। लगभग ढाई हजार किलोमीटर लंबी यह सीमा सिर्फ एक भौगोलिक रेखा नहीं है... यह एक राजनीतिक प्रयोगशाला भी बन चुकी है। जिन सीटों पर कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार जीते हैं, उनमें से अधिकांश इसी सीमावर्ती पट्टी में हैं। और इन इलाकों में तृणमूल कांग्रेस की पकड़ का मजबूत बने रहना... महज एक चुनावी आंकड़ा नहीं है। यह राजनीतिक प्रभाव कैसे बना... किसके दम पर टिका है... और इसके पीछे की असली ताकत क्या है... ये सवाल अब सिर्फ चुनावी विश्लेषकों के नहीं, बल्कि सुरक्षा विशेषज्ञों के भी हैं। सत्ता परिवर्तन की दहलीज़ पर खड़ा बंगाल : अभी जो प्रशासनिक व्यवस्था चल रही है... वो एक अजीब दुविधा में फँसी है। न पूरी तरह जाने की स्थिति है... न पूरी तरह टिकने की। और यही अनिर्णय की घड़ी सबसे खतरनाक होती है। इतिहास गवाह है कि सत्ता परिवर्तन के इस संधिकाल में... जब एक सरकार विदाई की दहलीज पर हो और दूसरी अभी पूरी तरह सत्ता न संभाली हो... तब असामाजिक तत्व, उपद्रवी ताकतें और राजनीतिक अवसरवादी सबसे ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। बंगाल में जो हिंसा हुई... जो अशांति दिखी... जो अराजकता के दृश्य सामने आए... उन्हें महज कानून-व्यवस्था की विफलता कहकर टाला नहीं जा सकता। सवाल यह है कि इस माहौल का फायदा कौन उठा रहा है... और किसके इशारे पर यह सब हो रहा है। यह सवाल बहुत ज़रूरी है... क्योंकि जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता। और जो सच होता है... वो हमेशा दिखता नहीं। जब प्रशासन अनिर्णय की स्थिति में हो, तो यही वो खिड़की होती है जिससे अंधेरे तत्व घर में घुस आते हैं। फिर बाद में उन्हें निकालना आसान नहीं रहता। जवाबदेही किसकी : तृणमूल कांग्रेस दशकों से बंगाल की सत्ता में है। इसलिए यह सवाल पूछना स्वाभाविक है कि जो अव्यवस्था दिख रही है... उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है। विपक्ष में रहते हुए आरोप लगाना आसान है... लेकिन इतने वर्षों के शासन के बाद भी अगर सीमावर्ती इलाकों में राजनीतिक घुसपैठ बनी रही, अगर हिंसा का वातावरण बनता रहा, और अगर प्रशासनिक तंत्र चुनावी हितों के हिसाब से झुकता रहा... तो यह किसी एक घटना का नतीजा नहीं है। यह एक लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक संस्कृति का परिणाम है। ममता बनर्जी अपनी लड़ाकू छवि पर गर्व करती हैं... और उन्हें करना भी चाहिए। लेकिन लड़ाई तब सार्थक होती है जब वो जनता के लिए हो... सत्ता बचाने के लिए नहीं। आगे क्या ? जो सरकार औपचारिक रूप से सत्ता संभालेगी... उसके सामने बड़ी जिम्मेदारी होगी। कड़े निर्णय लेने होंगे... और उन निर्णयों की गूँज दूर तक सुनाई देगी। लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी यह है कि राजनीतिक बदला नहीं... संवैधानिक न्याय हो। फर्क समझना ज़रूरी है। बंगाल की जनता समझदार है। उसने इतिहास में बड़े-बड़े उलटफेर देखे हैं। वो जानती है कि राजनीति में नारे बदलते हैं... चेहरे बदलते हैं... लेकिन आम आदमी की तकलीफ नहीं बदलती... जब तक नीयत न बदले। फिलहाल इंतजार है... उस फैसले का जो शायद इतिहास में दर्ज हो। #TMCWestBengal #MamtaBanerjee #Congress #biharcabinet
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Salah Uddin Shoaib Choudhury
🚨 Connections Between JMB & Abhishek Banerjee! According to a source, Salauddin Salehin, using various aliases such as Sunni, Hafizur Rahman Sheikh and Mahin - the Amir of notorious militancy outfit Jamaatul Mujahidin Bangladesh (JMB) has been sheltered by Trinamool Congress leader Abhishek Banerjee since 2014 after he fled Bangladesh prison. This terror outfit has several sleeper cells in a number of areas including 24 Parganas.
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Manish Kumar Gupta
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TVK और Congress गठबंधन: विजय की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और भविष्य की चुनौतियाँ तमिलनाडु की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की संभावनाएँ और जोखिमों पर चर्चा गरम है । वर्तमान में तमिलनाडु की राजनीति में एक नई उथल पुथल मची हुई है । अभिनेता से नेता बने थलपति विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) ने राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है । अब राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ गठबंधन की चर्चाओं ने इस राजनीतिक परिदृश्य को और अधिक गर्मा दिया है । असल सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन विजय के लिए वरदान साबित होगा या एक रणनीतिक भूल । १. गठबंधन का उद्देश्य: राष्ट्रीय पहचान की तलाश इस रणनीतिक कदम का सबसे बड़ा उद्देश्य TVK को एक राष्ट्रीय पहचान दिलाना प्रतीत होता है । किसी बड़ी और स्थापित पार्टी के साथ साझेदारी करने से एक नई पार्टी की राजनीतिक छवि में व्यापक बदलाव आता है । यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई छोटा व्यवसायी मुकेश अंबानी जैसी बड़ी हस्ती के साथ जुड़कर अपनी साख बढ़ा लेता है । यह स्थिति फिल्म पुष्पा: द राइज के उस प्रसिद्ध संवाद की याद दिलाती है कि चार टके का पार्टनर हूं लेकिन बड़ी फर्म का पार्टनर हूं । यहाँ अपनी सीमित ताकत को बड़े नाम की आड़ में कई गुना बड़ा दिखाने की कोशिश की जा रही है । २. कांग्रेस को क्या मिलेगा: एक असमान सौदा इस गठबंधन के साथ कई पेचीदगियाँ भी जुड़ी हुई हैं । मुख्य प्रश्न यह है कि इस सौदे में कांग्रेस को क्या हासिल होगा । कांग्रेस के लिए यह एक तरह का राजनीतिक पुनर्जीवन हो सकता है जिसके माध्यम से बिना किसी जमीनी संघर्ष के सत्ता में हिस्सेदारी मिल सकती है । कांग्रेस के लिए यह सचमुच बल्ले बल्ले वाली स्थिति है । लेकिन कांग्रेस का यह विस्तार संभवतः विजय और TVK की ही कीमत पर होगा । एक नई पार्टी के पास अभी प्रशासनिक और संगठनात्मक अनुभव की कमी है । ऐसे में गठबंधन के भीतर अलग अलग नेता अपनी मनमानी शुरू कर सकते हैं जैसा अरविंद केजरीवाल के दौर में देखने को मिला था । सत्ता के साथ लालच भी बढ़ता है जहाँ जनकल्याण की आड़ में व्यक्तिगत लाभ उठाने की प्रवृत्ति हर जगह दिखती है । इसके अलावा डीएमके पर जो सनातन विरोध के आरोप लगते रहे हैं उनका राजनीतिक नुकसान अब अकेले DMK को उठाना पड़ेगा । कांग्रेस उस प्रत्यक्ष आलोचना से बच जाएगी और राहुल गांधी को एक नैतिक बढ़त भी मिलेगी । ३. BJP की चुनौती: वैचारिक टकराव और प्रशासनिक बाधाएँ विजय के लिए सबसे बड़ी चुनौती BJP की ओर से खड़ी होने वाली प्रशासनिक और राजनीतिक बाधाएँ होंगी । केंद्र सरकार की ओर से इतनी अड़चनें डाली जा सकती हैं कि विजय को समझ ही न आए कि आखिर क्या करें । विजय ने खुद BJP को अपनी वैचारिक शत्रु घोषित किया है जो सीधे तौर पर एक बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत है । BJP की दीर्घकालिक रणनीति यह रही है कि कांग्रेस को पूरी तरह खत्म न किया जाए क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े प्रतिद्वंद्वी की जरूरत हमेशा बनी रहती है । लेकिन क्षेत्रीय दलों को धीरे धीरे कमजोर करने की रणनीति भी साथ साथ चलती रहती है । आने वाले कुछ वर्षों में BJP का मुख्य ध्यान पंजाब पर हो सकता है जहाँ शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी दोनों को कमजोर करने की कोशिश होगी । लेकिन इसके बाद दक्षिण भारत में उसकी आक्रामक रणनीति देखने को मिल सकती है चाहे वह तमिलनाडु हो या केरल । ४. धार्मिक और सामाजिक संतुलन की परीक्षा केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में धार्मिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखना विजय के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी । इन क्षेत्रों में ईसाई और मुस्लिम समुदायों के बीच मतांतरण को लेकर अक्सर शिकायतें सामने आती रही हैं । शायद यही कारण है कि विजय कांग्रेस जैसे बड़े दल को साथ लाने पर विचार कर रहे हैं ताकि सामाजिक वैधता मिल सके । लेकिन इसके साथ समस्या यह है कि कांग्रेस के जितने राजनीतिक विरोधी हैं वे स्वतः ही TVK के विरोधी भी बन जाएंगे । यह एक ऐसा जाल है जिसमें फंसने के बाद निकलना आसान नहीं होता । ५. क्या गठबंधन जरूरी था: एक वैकल्पिक दृष्टिकोण विजय के पास शुरुआत में अकेले चलने के पर्याप्त विकल्प मौजूद थे । तमिलनाडु की विभाजित राजनीति में वे अटल बिहारी वाजपेयी की तरह संतुलन बनाकर भी सरकार चला सकते थे । DMK शायद उनका खुलकर समर्थन न करती लेकिन तीखा विरोध भी न करती । AIADMK या कांग्रेस का समर्थन जरूरत पड़ने पर परिस्थिति बदल सकता था । लेकिन ऐसा लगता है कि उनके सलाहकारों ने या कांग्रेस के मजबूत PR ने उन्हें इस गठबंधन की ओर धकेल दिया है । असल में संकट की स्थिति में कांग्रेस को याद करना समझ में आता है पर शुरुआत में ही बड़े साझेदार की जरूरत नहीं थी । ६. सिनेमा और दक्षिण भारत की राजनीतिक संस्कृति दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा का प्रभाव हमेशा से गहरा रहा है । एम जी रामचंद्रन से लेकर जे जयललिता तक जनता ने हमेशा असाधारण व्यक्तित्वों को अपना नेता माना है । पर्दे पर नायक गोली रोक देता है और अकेले पूरी व्यवस्था बदल देता है जिससे जनता को लगता है कि वास्तविक जीवन में भी यही व्यक्ति उनका उद्धार करेगा । उत्तर भारत में भी इसी सोच की झलक नायक फिल्म में दिखी थी । रजनीकांत ने शायद संगठन की कमी को भाँपते हुए राजनीति से दूरी बना ली थी । विजय ने वह अवसर भुनाया और सफल शुरुआत की जो उनकी हिम्मत और समझदारी का प्रमाण है । ७. रणनीतिक गलतियाँ और मुफ्त योजनाओं की राजनीति वर्तमान परिदृश्य में ऐसा प्रतीत होता है कि विजय जल्दबाजी में कुछ रणनीतिक गलतियाँ कर रहे हैं । BJP जैसी ताकतवर पार्टी को शुरुआत में ही वैचारिक शत्रु घोषित करना जोखिम भरा है क्योंकि इससे विरोधी को सतर्क होने का मौका मिल गया । यह न विजय के लिए अच्छा है और न ही तमिलनाडु की जनता के लिए । आज देश की राजनीति में मुफ्त योजनाओं का ऐसा माहौल बन चुका है कि हर राज्य में इसकी होड़ लगी है । जब तक उच्चतम न्यायालय कोई स्पष्ट संवैधानिक सीमा तय नहीं करता यह प्रवृत्ति रुकती नहीं दिखती । एक लाख करोड़ की योजनाएँ कागज पर अच्छी लगती हैं लेकिन वास्तविकता में लागत और बढ़ जाती है । यदि वादे पूरे नहीं हुए तो जनता उन्हें भी बाकी नेताओं जैसा ही समझेगी ठीक वैसे ही जैसे अरविंद केजरीवाल पर यमुना सफाई जैसे वादों को लेकर सवाल उठते रहे हैं । निष्कर्ष: लंबी राजनीति या क्षणिक लोकप्रियता? विजय के सामने असली सवाल यह है कि क्या वे लंबी राजनीति खेलना चाहते हैं या छोटी अवधि की लोकप्रियता । एक नई पार्टी इतनी लोकप्रियता लेकर आई है तो जनता को अच्छे प्रशासन की भारी उम्मीद है । यदि विजय धैर्य के साथ संतुलित राजनीति अपनाएं और केंद्र के साथ अनावश्यक टकराव से बचें तो तमिलनाडु में एक नए राजनीतिक युग की नींव रखी जा सकती है । अन्यथा जल्दबाजी में लिए गए फैसले उनके राजनीतिक करियर को नुकसान पहुँचा सकते हैं । तमिलनाडु की जनता बदलाव चाहती है और विजय के पास वह मौका है । इसके लिए सही रणनीति और दीर्घकालिक सोच की आवश्यकता है । #ThalapathyVijay #TVK #tamilnadupolitics
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Manish Kumar Gupta
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मज़दूर दिवस पर असली सवाल: कब तक लुटते रहोगे? औद्योगिक क्रांति के बाद से दुनिया भर में मज़दूरों के हितों की बात होती रही है। हर साल 1 मई आती है, भाषण होते हैं, रैलियां निकलती हैं, नारे लगते हैं, फूलमालाएं चढ़ती हैं और फिर 2 मई को सब कुछ वैसे का वैसा। वही टूटी चारपाई, वही खाली जेब, वही बेरहम ठेकेदार। सवाल यह नहीं है कि मज़दूरों के लिए कानून बने या नहीं। सवाल यह है कि उन कानूनों का ज़मीन पर कितना असर पड़ा? हमारे देश में एक धारणा बन गई है कि जिसे सरकारी नौकरी मिल गई, उसका भविष्य सुरक्षित हो गया। लेकिन असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मज़दूरों का क्या? इस सवाल का जवाब देने से आज तक हर सरकार, हर नेता, हर यूनियन नेता बचता रहा है। यूनियनें मज़दूर की नहीं, मंच की रखवाली आज देश में मज़दूर संगठनों की भूमिका सिकुड़कर सिर्फ एक मांग तक रह गई है कि वेतन बढ़ाओ। जैसे मज़दूर का पूरा जीवन, उसकी पूरी पीड़ा, उसका पूरा भविष्य सब कुछ सिर्फ इसी एक संख्या पर टिका हो। लेकिन क्या किसी यूनियन नेता ने कभी गंभीरता से पूछा कि उस मज़दूर के बुढ़ापे का क्या होगा? बीमारी की स्थिति में उसे कौन देखेगा? जब 40 या 45 साल की उम्र में वह काम करने लायक नहीं रहेगा तो जिएगा कैसे? ये सवाल किसी रैली के मंच से नहीं उठते क्योंकि इन सवालों के जवाब ढूंढना मुश्किल है और मुश्किल काम से बचना ही असली राजनीति है। यूनियन नेता चाहते हैं भीड़, वोट और अपनी कुर्सी। मज़दूर का असली दर्द उनके एजेंडे में है ही नहीं। क़ानून बना लेकिन किसके लिए? इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए 1970 में Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1970 बनाया गया था। बड़े बड़े दावे हुए थे कि ठेका मज़दूरी की प्रथा सीमित होगी, मज़दूरों के लिए PF और ESI जैसी सुविधाएं सुनिश्चित होंगी, और ठेकेदार ज़िम्मेदार होगा। पचपन साल बाद ज़मीन पर क्या दिखता है? सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों की बड़ी बड़ी कंपनियां अपने स्थायी कर्मचारियों की संख्या जानबूझकर कम रखती हैं और अधिकतर काम ठेके पर कराती हैं। ठेकेदार मज़दूरों को 10 या 11 हज़ार रुपये देते हैं, जबकि कंपनियों या सोसायटी से 15 हज़ार रुपये तक वसूलते हैं। बाकी के 4 या 5 हज़ार कहाँ जाते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। यह कानूनी जामा पहनी हुई एक व्यवस्थित लूट है। सबसे ज़्यादा तकलीफदेह बात यह है कि इस लूट में सरकार भी शामिल है क्योंकि सरकारी विभागों में भी यही ठेका प्रथा धड़ल्ले से चलती है। असंगठित क्षेत्र: करोड़ों की भीड़ और शून्य सुरक्षा दूसरी बड़ी समस्या असंगठित क्षेत्र की है। छोटी दुकानों में काम करने वाले लाखों लोग न तो PF के दायरे में आते हैं, न ESI, न ग्रेच्युटी और न ही पेंशन जैसी किसी सुविधा में। घरेलू कामगार जैसे ड्राइवर, नौकर, या घरों में झाड़ू पोंछा करने वाली महिलाएं पूरी तरह से असुरक्षित हैं। इनके लिए क़ानून की किताब में एक पन्ना भी ठीक से नहीं लिखा गया। निर्माण क्षेत्र (construction) में लाखों मज़दूर जिनके हाथों से यह देश बना, जिनके पसीने से दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु खड़े हुए वो आज भी ठेके पर हैं। कोई स्थायित्व नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। मीडिया में gig workers की चर्चा ज़रूर होती है, Swiggy और Zomato वालों की बात होती है, लेकिन उस घरेलू कामगार की, उस छोटी दुकान के कर्मचारी की चिंता बहुत कम दिखाई देती है। जबकि देश की GDP में इन्हीं के पसीने का सबसे बड़ा हिस्सा है। 10 कर्मचारियों की सीमा एक सुनियोजित धोखा हमारे देश के कई श्रम कानून जैसे Payment of Bonus Act, 1965 और Payment of Gratuity Act, 1972 अक्सर 10 कर्मचारियों की न्यूनतम सीमा (threshold) पर टिके हैं। 10 से कम कर्मचारी हों तो कोई कानून लागू नहीं होता। सवाल यह है कि यह सीमा 10 ही क्यों है? इसका नतीजा यह है कि बहुत से नियोक्ता जानबूझकर कर्मचारियों की संख्या 8 या 9 पर रोके रखते हैं ताकि वे इन कानूनों के दायरे से बाहर रह सकें। 10वें आदमी को रखेंगे नहीं क्योंकि 10वाँ आया तो कानून आएगा। सिस्टम चलता रहता है, मुनाफ़ा होता रहता है लेकिन मज़दूर को उसका हक़ नहीं मिलता। यह क़ानून की नहीं, नीयत की खामी है। जो बनाने वाले चाहते तो यह सीमा 4 भी हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उद्योगपतियों का दबाव था, चंदे का हिसाब था, और मज़दूर तो वोट देकर भूल जाता है। चुप्पी इत्तेफ़ाक नहीं यह राजनीति है I सच्चाई यह है कि आज तक किसी भी सरकार चाहे वह किसी भी दल की रही हो ने इस मुद्दे पर ठोस और व्यापक समाधान लागू नहीं किया। कारण साफ है। यदि मज़दूरों के लिए मज़बूत नियम बनाए जाते हैं, तो उद्योगों की लागत बढ़ने का खतरा होता है। उद्योगपति नाराज़ होंगे, चंदा बंद होगा और अगला चुनाव मुश्किल होगा। मज़दूर वोट देता है लेकिन चंदा नहीं देता। यह चुप्पी इत्तेफ़ाक नहीं है। यह एक सोची समझी, पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही राजनीतिक बेईमानी है। समाधान और आगे का रास्ता ज़रूरत है एक सरल और व्यावहारिक व्यवस्था की। सबसे पहले threshold 10 से घटाकर 4 किया जाना चाहिए। इससे एक ही निर्णय से लाखों छोटे संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा मिल सकेगी। इसके साथ ही एक ऐसी व्यवस्था हो कि यदि कोई व्यक्ति किसी कर्मचारी को 20,000 रुपये मासिक वेतन देता है, तो वह उसका एक छोटा हिस्सा मान लीजिए 5 प्रतिशत हर महीने एक निर्धारित फंड में जमा करे। यह राशि सीधे कर्मचारी के खाते में जाए और उसका रिकॉर्ड पारदर्शी तथा डिजिटल तरीके से रखा जाए। इससे न तो नियोक्ता पर अत्यधिक आर्थिक बोझ पड़ेगा और न ही कानूनी जटिलताएं होंगी। सरकार को इन जमीनी हकीकतों से सीख लेकर विशेषकर असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए कुछ ऐसा नया और सरलीकृत (simplified) मॉडल लाना चाहिए, जिससे कंप्लायंस करने में लोगों को कोई तकलीफ ना हो। बस इच्छाशक्ति चाहिए जो इस देश की राजनीति में सबसे दुर्लभ चीज़ है। जब तक इस तरह की सरल और लागू करने योग्य व्यवस्थाएं नहीं बनाई जातीं, तब तक मज़दूर दिवस सिर्फ एक सरकारी छुट्टी है और कुछ नहीं। CA. मनीष कुमार गुप्ता अर्थशास्त्री #labour #ContractLabour #Gratuity #ESI
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Manish Kumar Gupta
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पश्चिम बंगाल चुनाव: विकास, पहचान और मौन मतदाता की लड़ाई टेलीविज़न की बहसों में अक्सर शोर होता है और बात कम। लेकिन जब उस शोर को बैठकर सुना जाए, तो उसमें से एक साफ सुर निकलता है। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव उसी सुर की कहानी है… विकास बनाम पहचान, और दोनों के बीच एक गहरी चुप्पी जो सबसे ज़्यादा कुछ कह रही है। जब "विकास" शब्द ही एक राजनीतिक संकेत बन जाए एक साधारण-सा सवाल सोचिए… अगर किसी मतदाता से पूछा जाए कि क्या वह "विकास" के नाम पर वोट देगा, तो आज के माहौल में इसका एक ही अर्थ निकाला जाता है: वह भाजपा की तरफ झुक रहा है। जब यह व्याख्या सिर्फ आम बातचीत तक सीमित न रहकर राजनीतिक विश्लेषकों और दलों के प्रवक्ताओं तक पहुँच जाए, तो यह खुद ब खुद बता देती है कि चुनाव का नैरेटिव किस दिशा में मुड़ चुका है। भाजपा ने अपनी रणनीति स्पष्ट रखी है… विकास, सुरक्षा और भ्रष्टाचार। तृणमूल कांग्रेस ने एक अलग मैदान चुना है — बंगाली बनाम बाहरी, और खासतौर पर "गुजराती" का फ्रेम। "कट मनी" और संगठित भ्रष्टाचार के आरोप नए नहीं हैं, लेकिन इस बार उन्हें जिस तरह चुनावी बहस के केंद्र में रखा गया है, वह यह दिखाता है कि ज़मीन पर असंतोष कितना गहरा है। कानून-व्यवस्था और बूथ की राजनीति क्या चुनाव के जरुरी फैक्टर हैं I कानून और व्यवस्था को लेकर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे कोई नई बात नहीं हैं लेकिन उनकी प्रकृति ज़रूर चौंकाने वाली है। दावा किया जाता है कि तृणमूल कांग्रेस से जुड़े स्थानीय क्लब चाहे दुर्गा पूजा समिति हो या कैरम क्लब — मतदाताओं को बूथ तक पहुँचने से रोकते हैं। हाल ही में एक ऐसी खबर आई जिसमें एक बूथ पर कमल के निशान पर टेप लगा दी गई ताकि वोट डाला ही न जा सके। ये घटनाएँ अगर सच हैं, तो यह सिर्फ चुनावी हिंसा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा प्रहार है। मतदान का भारी प्रतिशत क्या बदलाव का संकेत? इस पूरे परिदृश्य में एक आँकड़ा ध्यान खींचता है। चुनाव आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में कई चरणों में मतदान लगभग अस्सी प्रतिशत तक दर्ज किया गया — जो अपने आप में एक बड़ी बात है। इतिहास यह बताता है कि असाधारण रूप से ऊँचा मतदान अक्सर बदलाव की इच्छा को दर्शाता है। लेकिन बंगाल में तस्वीर उतनी सीधी नहीं है, क्योंकि ध्रुवीकरण उतना ही तीखा है जितना उत्साह। हिंदू मतदाता और मुस्लिम मतदाता ये दो अलग गणित और अलग विचारधारा यहाँ एक बहस छिड़ती है जो असुविधाजनक ज़रूर है, लेकिन जिसे नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक विश्लेषण को अधूरा बना देता है। एक तरफ हिंदू मतदाता की पसंद कई कारकों से तय होती है विकास, जाति, उम्मीदवार की छवि, रोज़गार, आरक्षण। ब्राह्मण, ठाकुर, जाटव, कुशवाह, लोधी हर वर्ग की अपनी प्राथमिकताएँ हैं, अपने हिसाब हैं। दूसरी तरफ एक धारणा मज़बूती से व्यक्त की जाती है और बहस में यह तर्क बार-बार उठा कि मुस्लिम मतदाता के लिए विकास, जाति या आरक्षण गौण है। उसकी रणनीति रहती है: जहाँ भाजपा को हराने की सबसे ज़्यादा संभावना हो, वहाँ एकजुट होकर वोट दो। युसूफ पठान का उदाहरण सामने रखा गया जो गुजरात से आए, गुजराती नहीं थे, लेकिन मुस्लिम समुदाय का एकजुट समर्थन मिला। और इसी की कीमत चुकाई कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी ने, जिन्हें इसी चुनावी समीकरण में हार का सामना करना पड़ा। यह तर्क है — और इस पर मतभेद भी है। मंच पर मौजूद दूसरे विश्लेषकों ने इसे एकांगी विश्लेषण बताया। उनका कहना था कि हर समाज अपने प्रतिनिधित्व को देखता है, और जाति का वही खेल हिंदू राजनीति में भी उतना ही गहरा है। फर्क सिर्फ इतना है कि एक जगह इसे रणनीतिक एकता कहते हैं और दूसरी जगह जातिवाद। लेकिन असली सवाल यह है: जब देश की पच्चीस से तीस प्रतिशत जनसंख्या और बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग इतनी ही है सिर्फ एक लक्ष्य लेकर मतदान करती है, तो क्या विकास जैसे बुनियादी मुद्दे उस चुनावी गणित में कहीं पीछे नहीं छूट जाते? मुफ्त की राजनीति और विकास की लड़ाई एक और सवाल जो बहस में उठा, वह था मुफ्त योजनाओं यानी "फ्रीबी" की राजनीति का। दिल्ली मॉडल के बाद यह चलन देशभर में फैल गया है। दो हज़ार, तीन हज़ार रुपये की तत्काल राहत उस परिवार के लिए बड़ी बात लग सकती है जिसके घर में रोज़गार नहीं है। लेकिन जिसे यह समझ आ गई कि अगर उसे एक स्थायी नौकरी मिली होती, तो वही तीन हज़ार नहीं, अट्ठाईस हज़ार रुपये महीने घर आते वह अपना वोट विकास और रोज़गार को ही देगा। तात्कालिक राहत बनाम दीर्घकालिक विकास यही असली बहस है। और यही वह जगह है जहाँ राजनीतिक दलों की असली परीक्षा होती है। विश्लेषकों की सीमाएँ और ज़मीनी सच बहस में एक बात और उभरी और यह थोड़ी असुविधाजनक थी। कई बार ऐसा लगा कि जो लोग टेलीविज़न पर बंगाल की राजनीति पर टिप्पणी कर रहे थे, उन्हें या तो ज़मीनी हकीकत की पूरी समझ नहीं थी, या वे खुलकर कहने से कतरा रहे थे। बंगाल का नाम लेने की जगह उत्तर प्रदेश की बातें होती रहीं। घुसपैठ जैसे गंभीर मुद्दे पर सीधी बात न हो सकी। इससे चर्चा का स्तर प्रभावित होता है और दर्शकों तक आधी-अधूरी तस्वीर पहुँचती है। मौन या फिर डरा हुआ मतदाता सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल और अंत में वह बात जो सबसे ज़्यादा मायने रखती है। कई चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार बंगाल में लोग अपनी पसंद बताना ही नहीं चाह रहे। न हिंदू मतदाता खुलकर बोल रहा है, न मुस्लिम। कोई नहीं बता रहा कि उसने ओबीसी को वोट दिया, या ममता के साथ खड़ा है, या बदलाव चाहता है। यह चुप्पी महज़ संकोच नहीं है। यह उस माहौल का नतीजा है जहाँ अपनी बात कहना कभी-कभी जोखिम भरा लगता है। और जहाँ मौन सबसे तेज़ आवाज़ होती है, वहाँ नतीजों का अंदाज़ा लगाना किसी के लिए भी आसान नहीं। पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में जो कुछ दिख रहा है, वह सिर्फ दो दलों की लड़ाई नहीं है। यह एक बड़े सवाल की लड़ाई है क्या लोकतंत्र में विकास की बात अब भी उतनी ही ताकतवर है, जितनी पहचान की राजनीति? 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Manish Kumar Gupta
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कंकाल, कागज़ और करुणा — एक घटना के पांच पहलू ___________________________ लेखक: मनीष कुमार गुप्ता, अर्थशास्त्री ओडिशा की एक घटना जो सिर्फ सनसनी नहीं, गहरे सवाल उठाती है... ओडिशा के क्योंझर जिले के दिआनाली गांव के जीतू मुंडा नाम के एक आदिवासी व्यक्ति ने 27 अप्रैल 2026 को कुछ ऐसा किया, जिसे देखकर पूरा देश चौंक गया। उसने अपनी मृत बहन कालरा मुंडा की कब्र खोदी, उसका कंकाल एक थैले में रखा और तीन किलोमीटर पैदल चलकर ओडिशा ग्रामीण बैंक की मालीपोसी शाखा तक पहुंचा। बस इसलिए, क्योंकि बैंक उसे बहन के खाते में जमा ₹19,300 देने से मना कर रहा था और बार-बार मृत्यु प्रमाण पत्र व कानूनी वारिस के दस्तावेज़ मांग रहा था। जैसे ही यह खबर मीडिया में आई, हर तरफ से प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। किसी ने बैंक को निर्मम कहा, किसी ने सिस्टम को कोसा, किसी ने इसे गरीबी और बेबसी की मार्मिक दास्तान बताया। लेकिन क्या सच में यह घटना उतनी सरल है जितनी दिखती है? क्या सिर्फ बैंक को दोष देकर हम इस पूरे मामले से न्याय कर पाएंगे? आइए इस घटना को थोड़ा ठहरकर, कई कोणों से देखने की कोशिश करते हैं। पहला पहलू: बैंक ने क्या गलत किया? यह सवाल सीधा और तीखा लगता है लेकिन इसका जवाब उतना सीधा नहीं है। बैंक ने मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी वारिस प्रमाण पत्र मांगा। यह कोई मनमानी नहीं थी। यह देश का कानून है, बैंकिंग की नियमावली है। जब किसी खाताधारक की मृत्यु हो जाती है और उसके नामांकित व्यक्ति (नॉमिनी) भी नहीं रहते, तो उस खाते से पैसे निकालने के लिए कानूनी वारिस प्रमाण पत्र आवश्यक होता है। यह नियम इसलिए नहीं बना कि लोगों को परेशान किया जाए, बल्कि इसलिए बना कि किसी के साथ धोखा न हो। सोचिए अगर बैंक किसी के भी कहने पर कि "मेरी बहन मर गई है, उसके पैसे मुझे दे दो" और अगर पैसे दे दिए, तो क्या होगा? आदिवासी क्षेत्रों में जमीन हड़पने, खाते लूटने और फर्जी मौत दिखाकर पैसे ऐंठने के अनगिनत मामले पहले से मौजूद हैं। बैंक अगर बिना दस्तावेज़ के पैसे दे, तो वह कानून का नहीं, बल्कि लापरवाही का रास्ता अपनाएगा.... और उससे कहीं ज़्यादा लोग पीड़ित होंगे। इसलिए, बैंक की मांग गलत नहीं थी। लेकिन एक बात जरूर थी जो बैंक और बेहतर कर सकता था। बैंक कर्मचारी सरल भाषा में यह बता सकते थे कि "भाई, तुम्हें यह मृत्यु प्रमाण पत्र पंचायत कार्यालय से मिलेगा, वहां जाओ, अपने सरपंच से मिलो। वहां से यह दस्तावेज़ बनवाओ और फिर आओ, हम जरूर मदद करेंगे।" जीतू मुंडा अनपढ़ है, ग्रामीण है, आदिवासी है, यह सच है कि उसे बैंकिंग की पेचीदगियां नहीं पता। उसे सिर्फ नियम बताना काफी नहीं था, रास्ता भी बताना ज़रूरी था। यहीं बैंक से थोड़ी चूक हुई, बैंक अधिकारियों मांग सही थी, लेकिन मार्गदर्शन नहीं दिया गया। दूसरा पहलू: जीतू की मानसिक स्थिति और असली सवाल... अब दूसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जीतू की बहन 26 जनवरी 2026 को मरी थी। दो महीने बीत गए। आखिर दो महीने में मृत्यु प्रमाण पत्र क्यों नहीं बना? यह सवाल बैंक से ज़्यादा बड़ा है। जब कोई व्यक्ति अपने गांव में, अपने मोहल्ले में रहता है और उसकी बहन की मौत होती है तो पूरा गांव जानता है, सभी पड़ोसी जानते हैं, सरपंच जानता है, पंचायत जानती है। मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना कोई पहाड़ चढ़ने जैसा काम नहीं है। यह पंचायत कार्यालय, नगर पालिका या ग्राम पंचायत से बनता है। सरपंच से एक बार मिलना, बीएलओ (BLO) से बात करना, एक यही रास्ता था तो फिर दो महीने में यह प्रमाण पत्र क्यों नहीं बना? इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि जीतू ने कोशिश ही नहीं की, या कोशिश अधूरी रही। वह इतने गहरे अवसाद और मानसिक संकट में था कि उसे यह नहीं सूझा कि पड़ोसी से, दोस्त से, सरपंच से मदद मांगी जाए। यह उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी बेबसी और अकेलेपन की कहानी है। हम सब जब किसी परेशानी में होते हैं तो किसी न किसी से कहते हैं, अपने दोस्त को, पड़ोसी को, परिचित को। लेकिन जीतू के पास शायद वह भरोसेमंद इंसान भी नहीं था जो उसे राह दिखाता। शायद वो अंदर से कमजोर हो चुका था, हिम्मत हार चुका था। यह हो सकता है कि उसने कोशिश की हो, लेकिन पंचायत स्तर पर या संबंधित विभाग में उसे टाला गया हो, रिश्वत मांगी गई हो, या उसकी बात सुनी ही न गई हो। अगर ऐसा है, तो दोष बैंक का नहीं बल्कि उन स्थानीय व्यवस्थाओं का है जो सबसे कमज़ोर व्यक्ति की सुनवाई नहीं करतीं। लेकिन इस मामले में रिश्वत कोई बात नजर नहीं आ रही। दोनों में से जो भी कारण हो पर असली सवाल वहीं है कि मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं बन पाया, यह चूक कहां हुई? इसकी जांच होनी चाहिए। तीसरा पहलू: पुलिस ने क्या संदेश दिया? जब पुलिस आई, तो उसने क्या किया? उसने जीतू को सम्मान से समझाया। बहन के कंकाल को इज़्ज़त के साथ दोबारा दफनाया। और उसे आश्वासन दिया कि मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में और बैंक से पैसे दिलाने में पूरी मदद की जाएगी। पुलिस ने बैंक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। क्यों? क्योंकि पुलिस जानती थी कि बैंक ने कुछ गलत नहीं किया। पुलिस ने जो किया वह असल में वही था जो पहले किसी को करना चाहिए था अर्थात मार्गदर्शन, सहानुभूति और व्यवस्था से जोड़ना। प्रशासन ने बाद में घोषणा की कि जीतू को रेड क्रॉस की ओर से ₹20,000 की सहायता दी जाएगी और मृत्यु प्रमाण पत्र व कानूनी वारिस प्रमाण पत्र की प्रक्रिया तेज़ी से पूरी की जाएगी। यह एक सकारात्मक कदम है। चौथा पहलू: मीडिया और सनसनी जैसे ही यह खबर सामने आई, विपक्ष के लोग, समाजसेवा के नाम पर राजनीति करने वाले लोग और सोशल मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसे "सिस्टम फेल" और "बैंक की निर्ममता" के रूप में पेश करने लगा। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि घटना मार्मिक है, दर्दनाक है। लेकिन सनसनी बनाने से समस्या हल नहीं होती। अगर हम सिर्फ बैंक को दोष देकर चुप हो जाएं, तो हम उन असली सवालों से मुंह मोड़ लेते हैं जो इस घटना की जड़ में हैं, साक्षरता की कमी, ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक संवेदनहीनता, मृत्यु प्रमाण पत्र जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुंच न होना, और सबसे बड़ी बात... एक अकेले, अनपढ़, गरीब आदिवासी के इर्द-गिर्द कोई ऐसा इंसान या संस्था न होना जो उसे सही दिशा दिखा सके। मीडिया की भूमिका होनी चाहिए इन गहरे सवालों को उठाना... न कि सिर्फ एक भावनात्मक दृश्य को बार-बार दिखाकर दर्शकों की संवेदनाओं को उभाड़ना। पांचवां पहलू: नॉमिनेशन — एक ज़रूरी सबक..... इस पूरी घटना से एक बड़ा व्यावहारिक सबक भी निकलता है। कालरा मुंडा के खाते में जो नॉमिनी थे यानी उसके पति और बेटे लेकिन वे भी पहले मर चुके थे। यानी नॉमिनी था, लेकिन वह भी जीवित नहीं था। ऐसे में खाते से पैसे निकालने की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है। यह बताता है कि बैंक खाते में नॉमिनेशन केवल एक बार करके भूल जाना काफी नहीं है। जब परिवार में बड़े बदलाव हों, किसी की मृत्यु हो, परिवार बदले तो नॉमिनी भी अपडेट करना ज़रूरी है। बैंकों को भी यह ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए कि वे अपने हर खाताधारक से, खासकर ग्रामीण और कमज़ोर वर्ग से, नॉमिनेशन की जानकारी लें और उसे नियमित रूप से अपडेट कराएं। यह एक छोटा कदम है, लेकिन भविष्य में इस तरह की स्थितियों को काफी हद तक रोक सकता है। जनधन जैसी योजनाओं के तहत खाते तो लाखों खुले, लेकिन नॉमिनेशन और उत्तराधिकार की जानकारी उतनी गहराई से नहीं दी गई, इस घटना से सबक लेते हुए, इस नीतिगत खामी को दूर करने की आवश्यकता है। अंत में: करुणा और व्यावहारिकता दोनों ज़रूरी हैं। जीतू मुंडा की पीड़ा असली है। उसका दर्द असली है। एक भाई जो अपनी बहन की मृत्यु के बाद उसकी अंतिम निशानी वे पैसे जो उसने मवेशी बेचकर जमा किए थे, उन तक पहुंचने के लिए इतना टूट जाता है कि कब्र खोद लेता है... यह तस्वीर दिल को हिला देती है, आंखों में आंसू ला देती है लेकिन इस दर्द को सम्मान देने का मतलब यह नहीं कि हम तर्क छोड़ दें। करुणा और व्यावहारिकता साथ चल सकती हैं। बैंक के नियम सही थे लेकिन उसकी संवेदनशीलता बढ़नी चाहिए। पंचायत और स्थानीय प्रशासन को जवाबदेह होना चाहिए कि आखिर दो महीने में मृत्यु प्रमाण पत्र क्यों नहीं बना? साक्षरता और जागरूकता का अभाव... यही समस्या की जड़ है जिसे दूर करना ज़रूरी है। और बैंकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर ग्रामीण खाताधारक को उसकी भाषा में, उसके स्तर पर यह बताया जाए कि मृत्यु के बाद पैसे पाने की प्रक्रिया क्या है। जीतू मुंडा की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं है... यह एक दर्पण है जो हमें हमारी व्यवस्था की कमज़ोरियां दिखाता है। सवाल यह नहीं कि बैंक गलत था या सही। सवाल यह है कि एक गरीब, अनपढ़, अकेले आदिवासी के पास अपनी समस्या सुलझाने के लिए कोई रास्ता, कोई जानकार, कोई साथी क्यों नहीं था? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी — और हम हर बार सिर्फ टीवी पर बहस करके आगे बढ़ जाएंगे। "ज़रूरत है कि हम हर जीतू तक पहुंचें, उससे पहले कि वह कब्र तक पहुंचे।" ***** ***** ***** ***** यह लेख ओडिशा के क्योंझर जिले में 27 अप्रैल 2026 को घटित घटना पर आधारित है।
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आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के लिए जिन लोगों को चुना, वे यूँ ही नहीं चुने गए थे। या तो उनके पास कोई विशेष प्रतिभा, ज्ञान या अनुभव था, या फिर वे आर्थिक रूप से बेहद सक्षम थे। उदाहरण के तौर पर, सुशील गुप्ता जैसे लोग, जो एक कॉलेज के किंग माने जाते थे, या एन.डी. गुप्ता जैसे प्रतिष्ठित चार्टर्ड अकाउंटेंट, जिन्हें बाद में पार्टी में महत्वपूर्ण पद भी मिला। इसके अलावा, अशोक मित्तल (LPU के संस्थापक), विक्रमजीत सिंह (Trident Group के चेयरमैन) जैसे बड़े उद्योगपतियों को भी राज्यसभा भेजा गया। ये लोग हजारों लोगों को रोजगार देने वाले हैं, पंजाब में इनका बड़ा प्रभाव है। ऐसे में यह कहना कि “कोई इन्हें नहीं जानता”, वास्तविकता से दूर है। इनमें से दो नेता पद्मश्री से पुरस्कृत हैं। पत्रकारिता के गलियारों में अक्सर यह चर्चा होती रही है कि राज्यसभा सीटों के लिए पैसे का खेल होता है, सौ से डेढ़ सौ करोड़ तक के खेले का आरोप लगता है, यह आरोप नया नहीं है, पहले भी अलग-अलग दलों पर ऐसे सवाल उठते रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि आम आदमी पार्टी ने ऐसे बड़े बड़े उद्योगपतियों, धन्ना सीटों को राज्यसभा का टिकट देकर भेजा, हां, स्वाति मालीवाल जरूर अरविंद केजरीवाल की भरोसेमंद पुरानी साथियों और कार्यकर्ता रही थी इसलिए उन्हें वह मिला जिसके लिए उन्होंने मेहनत की थी। उनका चयन स्वाभाविक था। Raghav Chadha पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं, इसलिए उनका चयन भी सामान्य है। वहीं Harbhajan Singh जैसे बड़े नाम को पार्टी को भी फायदा होता है... उनकी लोकप्रियता चुनावों में काम आती है। हरभजन सिंह को किसी भी पार्टी से राज्यसभा मिल सकती थी, उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं थी। हरभजन सिंह को इसलिए चुना गया था, और ठीक इसी तरह संदीप पाठक, जो IIT के प्रोफेसर रहे हैं, उच्च स्तर का ज्ञान और अनुभव रखते हैं... एसी में आम आदमी पार्टी का यह कहना कि इन राज्यसभा सांसदों को कौन जानता है, यह उचित नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि उद्योगपति, खिलाड़ी, शिक्षाविद और प्रोफेशनल लोग पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? ये लोग पारंपरिक राजनेता नहीं थे, बल्कि पार्टी के बुलावे पर आए थे, काम करने के उद्देश्य से आई थी और अगर अब उन्हें लग रहा है कि पार्टी अपने मूल उद्देश्यों से भटक रही है, तो यह चिंता का विषय है। हो सकता है कि कुछ लोग अंदर की बातों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते, इसलिए चुपचाप बाहर निकल रहे हैं। इसलिए अगर ये मुंह नहीं खोल रहे हैं या जो बता रहे हैं उसमें थोड़ा कहा बहुत समझना चाहिए। व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखें तो “Operation Lotus” जैसे आरोपों के जरिए यह कहा जा रहा है कि भाजपा अन्य दलों के सांसदों को तोड़कर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। अगर ऐसा होता है, तो विपक्षी दलों को सतर्क रहने की जरूरत है और अपने नेताओं के साथ बेहतर समन्वय बनाए रखना होगा। जहाँ तक उत्तर प्रदेश और Akhilesh Yadav की बात है, तो फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि उनकी पार्टी में टूट-फूट आसान होगी। वहीं भाजपा का ध्यान खासतौर पर सीमा वाले राज्यों—पंजाब और पश्चिम बंगाल—पर अधिक है, क्योंकि ये राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। अंत में, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की राजनीति में भविष्य में बड़े बदलाव हो सकते हैं और नए समीकरण बन सकते हैं, जिनमें विभिन्न दलों के नेता एक साथ आ सकते हैं। अब ये वक्त ही बताएगा कि क्या रोचक खबरें सामने आने वाली हैं। #RaghavChadha #aapaamdiparty #BJPGovernment #modiji
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Trinamool Congress के एक नेता पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने देश के Amit Shah को यह कहते हुए चुनौती दी थी कि “3 मई के बाद रात में रुक कर दिखाएं।” सिंगूर का मुद्दा भी अक्सर चर्चा में रहता है, जहां कृषि भूमि को बचाने के नाम पर उस परियोजना का विरोध किया गया, जिसमें Tata Motors का प्लांट लगना था। यह माना जाता है कि यदि यह परियोजना आगे बढ़ती, तो क्षेत्र में रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होता, लेकिन अंततः यह योजना सफल नहीं हो पाई। आलोचना यह भी की जाती है कि Mamata Banerjee के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास, रोजगार के अवसर और जीएसटी कलेक्शन में गिरावट आई है, जिससे आम जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोगों की यह धारणा भी है कि वोटिंग पैटर्न और बाहरी तत्वों के प्रभाव, विशेषकर बांग्लादेशी मतदाताओं के मुद्दे, चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। वहीं, Trinamool Congress के नेताओं पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि वे विकास के मुद्दों पर वोट मांगने के बजाय अक्सर यह कहते हैं कि बाहरी नेताओं के प्रभाव के कारण वोट नहीं दिया जाना चाहिए। #WestBengalElection2026 #ElectionCampaign #WestBengalPolitics #WestBengalLegislativeAssemblyelection2026
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बंगाल के चुनाव में एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह रहा है कि पिछले चुनाव में जिन लोगों ने बीजेपी को वोट दिया, उनके बाद राज्य में संगठित हिंसा की घटनाएं सामने आईं। आरोप लगाया जाता है कि तृणमूल कांग्रेस से जुड़े कुछ तत्वों ने इन मतदाताओं को निशाना बनाया, जबकि केंद्र की बीजेपी सरकार की ओर से इस पर कोई ठोस और कड़ा कदम नहीं उठाया गया। इसका असर यह हुआ कि इस बार कई मतदाता, खासकर हिंदू वोटर, कहीं न कहीं शांत या कम सक्रिय नजर आते हैं। वहीं यह सवाल भी उठता है कि मुस्लिम वोटर बीजेपी को वोट देने से क्यों बचते हैं। इस संदर्भ में यह धारणा व्यक्त की जाती है कि उनके लिए प्राथमिक मुद्दा बीजेपी को सत्ता में आने से रोकना है, जबकि विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर या “कट मनी” जैसे मुद्दे उनके निर्णय में उतने प्रभावी नहीं दिखते। हालांकि, यह एक दृष्टिकोण है और विभिन्न समुदायों के भीतर अलग-अलग राय भी हो सकती है। इस स्थिति से यह संकेत मिलता है कि राज्य में एक ऐसा राजनीतिक माहौल या इकोसिस्टम विकसित हो गया है, जो देश की वर्तमान राजनीतिक विचारधारा से पूरी तरह मेल नहीं खाता। आलोचना यह भी है कि इस तरह की परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए बीजेपी की ओर से अपेक्षित स्तर पर कड़े प्रयास नहीं किए गए। पार्टी स्तर पर प्रयास जरूर बताए जाते हैं, लेकिन सरकार के स्तर पर कार्रवाई उतनी स्पष्ट नहीं दिखी, खासकर हिंसा की घटनाओं के संदर्भ में। परिणामस्वरूप, कई मतदाताओं को यह भरोसा नहीं बन पाया कि वे खुलकर समर्थन कर सकें और किसी भी प्रकार की हिंसा या प्रताड़ना की स्थिति में उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी। यह एक ऐसी कमी रही, जिस पर काम किया जाना चाहिए था। इसके बावजूद, यह भी देखा जा रहा है कि कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार नकली या अवैध वोटों पर नियंत्रण के प्रयासों और केंद्र सरकार की योजनाओं के कारण लोगों का विश्वास बीजेपी में बढ़ा है। Narendra Modi की सरकार को लेकर यह धारणा बनी है कि जो वादे किए जाते हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश होती है, जिससे कुछ वर्गों में भरोसा मजबूत हुआ है। दूसरी ओर, मुस्लिम वोट बैंक के भीतर विभिन्न दलों के बीच विभाजन की स्थिति भी देखने को मिल रही है, जहां कुछ मतदाता Mamata Banerjee, कुछ अन्य क्षेत्रीय नेताओं या पार्टियों जैसे All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen की ओर झुकाव दिखा रहे हैं। कुल मिलाकर, यह विश्लेषण संकेत देता है कि जहां एक ओर बीजेपी के लिए कुछ सकारात्मक संकेत हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि चुनावी परिदृश्य में सरकार और जनता—दोनों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है। #WestBengalElection2026 #ElectionCampaign #WestBengalPolitics #WestBengalLegislativeAssemblyelection2026
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Manish Kumar Gupta
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बंगाल चुनाव 2026: सत्ता परिवर्तन की छटपटाहट और विकास की नई उम्मीद ​भारत की राजनीति में आज सबकी निगाहें पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं और इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। यदि हम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो तमिलनाडु जैसे राज्यों में पिछले तीन से पांच दशकों से एक तय पैटर्न रहा है जहाँ सत्ता डीएमके और अन्ना डीएमके के बीच घूमती रहती है। वहां भारतीय जनता पार्टी की उपस्थिति अभी भी सीमित है और माना जा रहा है कि उसे दो से पांच सीटें ही मिल पाएंगी। वहां सत्ता चाहे किसी भी क्षेत्रीय दल के पास रहे, राष्ट्रीय स्तर पर कोई बहुत बड़ा उथल पुथल देखने को नहीं मिलता है। वर्तमान में वहां डीएमके की स्थिति बेहतर नजर आ रही है, लेकिन बंगाल की कहानी इससे बिल्कुल अलग और कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल वह रणक्षेत्र है जहाँ भारतीय जनता पार्टी ने पिछले चुनाव से लेकर अब तक अपनी पूरी ताकत झोंक दी है राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार इस बात पर एकमत हैं कि बीजेपी के लिए यह चुनाव अभी नहीं तो कभी नहीं वाली स्थिति है। यह केवल एक राज्य का चुनाव नहीं बल्कि बीजेपी के लिए अपने वैचारिक और सांगठनिक विस्तार की सबसे बड़ी परीक्षा है। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद जिस प्रकार की भीषण हिंसा बंगाल में देखने को मिली, उसने लोकतंत्र की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। बीजेपी समर्थकों पर जिस तरह हथियार चलाए गए और उन्हें प्रताड़ित किया गया, उसका डर आज भी जनमानस में व्याप्त है। मतदाताओं के मन में यह संशय आज भी है कि क्या वे सुरक्षित माहौल में अपना वोट डाल पाएंगे या नहीं। इस चुनाव का सबसे बड़ा और स्पष्ट नैरेटिव विकास का है। आज बंगाल की जनता यह समझ चुकी है कि विकास का सीधा अर्थ ममता विरोधी होना है। यदि कोई विकास की बात कर रहा है तो इसका स्पष्ट संकेत है कि वह वर्तमान तृणमूल कांग्रेस सरकार की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है। बंगाल का इतिहास देखें तो यह वही भूमि है जहाँ 1911 तक देश की राजधानी कोलकाता हुआ करती थी। जो राज्य कभी पूरे देश का नेतृत्व करता था, आज वह विकास की दौड़ में सबसे पीछे खड़ा है। ममता दीदी जब सत्ता में आई थीं तो उन्होंने औद्योगिक विकास और बदलाव का वादा किया था, लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट रही है। सिंगूर आंदोलन के बाद से बंगाल में उद्योगों का जो सत्यानाश शुरू हुआ, वह आज तक नहीं रुका है। फैक्ट्रियों में तालाबंदी और औद्योगिक पतन के कारण बंगाल की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है। रोजगार की तलाश में यहाँ के प्रतिभाशाली युवाओं को मजबूरन पलायन करना पड़ रहा है। यह कितनी विडंबना की बात है कि बंगाल के लोग आज रोजगार के लिए बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और दक्षिण गुजरात जैसे क्षेत्रों में जाने को विवश हैं। जिस राज्य को उद्योगों का हब होना चाहिए था, वहां आज विकास के नाम पर शून्य दिखाई देता है। ​विकास और रोजगार के अभाव के साथ साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी इस चुनाव में अत्यंत गंभीर है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण बंगाल में घुसपैठ की समस्या अपने चरम पर है। यह घुसपैठ न केवल राज्य की जनसांख्यिकी को बदल रही है बल्कि सीमा पार से आने वाले आतंकवाद की चुनौती को भी बढ़ा रही है। ममता सरकार पर बार बार इन तत्वों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं।अंततः, पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा, बल्कि यह तय करेगा कि क्या बंगाल अपनी खोई हुई गरिमा और औद्योगिक पहचान वापस पा सकेगा। क्या वह हिंसा और तुष्टीकरण के दौर से बाहर निकलकर विकास के मुख्यधारा में शामिल होगा? बीजेपी के लिए यह अपनी पूरी शक्ति के प्रदर्शन का समय है और बंगाल की जनता के लिए यह अपने अस्तित्व की रक्षा का चुनाव है। बंगाल का भविष्य अब विकास, सुरक्षा और सुशासन के इसी त्रिकोण पर टिका है। #MamtaBanerjee #TMC #tamilnadupolitics
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