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𝐌𝐚𝐧𝐢𝐬𝐡 𝐊𝐮𝐦𝐚𝐫
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𝐌𝐚𝐧𝐢𝐬𝐡 𝐊𝐮𝐦𝐚𝐫
@ManishkuIND
Social Activist | Mandalists | Karpoorists | Phule thinkers ✍🏻
India Katılım Ocak 2023
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भाजपा @DrMohanYadav51 जी के शासन में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है,
लाँजी-किरनापुर विधानसभा में विधायक निवास से मात्र 3 किमी दूर, ग्राम सोनेसराड़ पीपलगांव खुर्द में रेत माफियाओं द्वारा,
कृषक नंदकिशोर पांचे पर जातिगत गालियाँ देकर जानलेवा हमला किया और नदी में फेंकने की कोशिश की गई। क्या यही बीजेपी का “सुरक्षित शासन” है?
@SP_Balaghat कृपया माफियाओं की पहचान कर कड़ी कार्यवाही करें।🙏🏻
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भाजपा @DrMohanYadav51 जी के शासन में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है,
लाँजी-किरनापुर विधानसभा में विधायक निवास से मात्र 3 किमी दूर, ग्राम सोनेसराड़ पीपलगांव खुर्द में रेत माफियाओं द्वारा कृषक नंदकिशोर पांचे पर जातिगत गालियाँ देकर जानलेवा हमला किया गया और नदी में फेंकने की कोशिश की गई।
क्या यही बीजेपी का “सुरक्षित शासन” है? @SP_Balaghat कृपया माफियाओं की पहचान कर कड़ी कार्यवाही करें।🙏🏻
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यदि सवर्ण वर्ग को EWS के तहत 10% अतिरिक्त आरक्षण देने के लिए 50% की सीमा तोड़ी जा सकती है, तो फिर ओबीसी को उनकी आबादी के अनुपात में 52% आरक्षण देने से कैसे रोका जा सकता है?
#OBC_Reservation

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ब्राह्मण तो हमेशा से OBC, SC, ST की नौकरियों को देखकर आग बबूला हो जाते हैं|
उन्हें तो सारी सरकारी नौकरियाँ, सारी पोस्टें, सारा कुछ सिर्फ़ अपने नाम चाहिए। जब मंडल आयोग आया था तब इनके दिल में आग लग गई – तब से ये लगातार चीख-चीख कर विरोध कर रहे हैं, जैसे इनकी सारी रोटी छिन गई हो|
आरक्षण देखकर इनका जीया जलता है, किंतु EWS पर एक लब्ज़ नहीं निकलता|😡
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@amityadavbharat देखकर तो लग रहा है, फिर से ये देश क्षत्रिय विहीन होगा 😂
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‘निजीकरण’ दरअसल सामाजिक न्याय की जड़ों को कमजोर करने वाली प्रक्रिया है|
आदरणीय @yadavakhilesh जी ने कहा
जब शिक्षा, नौकरियां और जरूरी संसाधन निजी हाथों में चले जाते हैं, तो अवसर समान नहीं रहते—वे पैसे और पहुंच के आधार पर तय होने लगते हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब, दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों को उठाना पड़ता है, जिनकी भागीदारी धीरे-धीरे कम होती जाती है|
आज जिस तरह की नीतियां लागू की जा रही हैं, उनसे यह साफ नजर आता है कि समान अवसर की जगह आर्थिक ताकत को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे एक बार फिर असमानता बढ़ने और पुराने वर्चस्व को मजबूत करने का खतरा पैदा हो रहा है|
परिणामस्वरूप, संविधान में निहित सामाजिक न्याय की भावना कमजोर होती दिखाई देती है|
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केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने आरटीआई के जवाब में जो आंकड़े दिए, वे चौंकाने वाले हैं|
३३ केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में अन्य पिछड़ा वर्ग OBC कर्मचारियों का हिस्सा मात्र १४ प्रतिशत है|
यह १ जनवरी २०१६ का आधिकारिक डेटा है|
कुल २ लाख ४४ हजार ४२८ कर्मचारियों में ओबीसी केवल १४ फीसदी|
पिछले वर्षों की तुलना में संख्या और प्रतिशत दोनों घटी है|
मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने के २५ वर्ष बाद भी ओबीसी का प्रतिनिधित्व इतना कम होना गंभीर मुद्दा है|

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संविधान परत काम करना ,डरना नहीं आप मध्यप्रदेश में पिछड़ो का आरक्षण 27 फ़ीसदी लागू कर देना, मध्यप्रदेश पिछड़ों के साथ बहुत दिनों से अन्याय हो रहा है आप आरक्षण लागू कर देना ।
माननीय @yadavakhilesh ज़िंदाबाद
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सालों तक Indra Sawhney v. Union of India का हवाला देकर 50% आरक्षण सीमा को “अंतिम सत्य” बताया गया।
लेकिन Janhit Abhiyan v. Union of India में 10% EWS जोड़कर उसी सीमा को पार कर दिया गया।
तो सवाल सीधा है —
जब EWS के लिए रास्ता बनाया जा सकता है, तो OBC के हक में बाधा क्यों? यह मुद्दा अब “कानूनी बाधा” का नहीं, बल्कि “राजनीतिक इच्छाशक्ति” का है।
अगर सरकार चाह ले, तो 27% OBC आरक्षण पूरी तरह लागू करना बिल्कुल संभव है।इसलिए @DrMohanYadav51 जी से सीधी मांग — OBC का 27% आरक्षण तुरंत और पूर्ण रूप से लागू किया जाए।
सामाजिक न्याय कोई विकल्प नहीं, यह संवैधानिक अधिकार है।

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‼️आरक्षण का असली लाभ सवर्णों को है, दूसरे बस बदनाम हैं‼️
इस तालिका से यही स्पष्ट होता है कि EWS आरक्षण मुख्य रूप से सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के लिए है। इसमें कट-ऑफ १३६ अंक है, जो UR १६० अंक से कम है। इससे सवर्ण वर्ग को आरक्षण का प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है|
वहीं BC और EBC के कट-ऑफ भी UR के बहुत निकट १५२ और १४४ हैं, अर्थात् ये वर्ग भी उच्च मेरिट पर चयनित हो रहे हैं|
दूसरी ओर, अनुसूचित जाति SC का कट-ऑफ मात्र ७६ अंक है और रैंक ५२१ तक चला गया है। इस प्रकार पारंपरिक आरक्षण को अक्सर “दूसरे वर्गों” के नाम पर बदनाम किया जाता है, जबकि वास्तविक लाभ EWS और उच्च मेरिट वाले BC/EBC के माध्यम से सुवर्ण वर्ग को ही पहुँच रहा है|

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ओडिशा में लगभग 50% आबादी वाले ओबीसी वर्ग को मात्र 11% आरक्षण देकर इसे बड़ा उपकार बताया जा रहा है। यह वास्तविक सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि केवल दिखावटी संतुष्टि है।
जब देश के अन्य राज्यों में ओबीसी को 27% आरक्षण देने का प्रावधान है, तो ओडिशा में इससे कम क्यों?
ओबीसी वर्ग को उसकी जनसंख्या और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप पूरा आरक्षण मिलना चाहिए, न कि प्रतीकात्मक ।

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मुट्ठीभर 9.5% आबादी वाले मेरिटधारी अनारक्षित वर्ग को 50.50% अनारक्षित कोटे का आरक्षण और 10% EWS कोटे का आरक्षण मिलता है। यानी कुल 60.50% आरक्षण का पूरा लाभ उन्हें ही जाता है।
दूसरी ओर, 85-90% की विशाल आबादी वाले OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक समाज को मुश्किल से 39.50% आरक्षण का लाभ भी नहीं दिया जाता।
यह सरासर बेईमानी है।

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दिल्ली में 12–14 जून 1979 को एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई,
जिसका उद्देश्य सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ मापदंड तय करना था। इस हेतु अध्ययन और अनुसंधान की रूपरेखा बनाई गई, जिन्हें स्वयं पिछड़े वर्गों द्वारा संचालित या प्रायोजित किया जाना था।
सदस्य—
प्रो. एल.के. सहगल,
प्रो. एल.एस. रेड्डी,
प्रो. लीला दूबे, डॉ. ए.के. डांडा,
श्री ए.के. बनर्जी,
श्री एस.एस. गिल,
प्रो. बी.के. राय वर्मन
अध्ययन दल ने संविधान के प्रावधानों की समीक्षा के बाद निष्कर्ष निकाला कि पिछड़ापन किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति वाले स्थायी समूहों से जुड़ा है।
👉 सामाजिक पिछड़ापन “थोपी गई स्थिति” ascribed status से संबंधित है
👉 शैक्षणिक पिछड़ापन “प्राप्त स्थिति” achieved status से जुड़ा है
इसलिए सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के संबंध को समझना बेहद जरूरी माना ।

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देश में आखिर चल क्या रहा है?
सिर्फ़ सवर्णों के लिए EWS लागू किया जाता है, और फिर उसे “योग्यता” का नाम दे दिया जाता है। यह कैसी योग्यता है, जो आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग को भी विशेष अवसर देती है, लेकिन सदियों से वंचित बहुजन समाज के हिस्से को लगातार कम करती जाती है?
सच तो यह है कि यह योग्यता नहीं, बल्कि बहुजन के अधिकारों पर सीधा प्रहार है। उनके हिस्से के अवसर काटकर उन्हें ही पीछे धकेला जा रहा है, और ऊपर से इसे न्याय और मेरिट का नाम दिया जा रहा है।

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