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Man Mohan Yadav (Advocate)
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Man Mohan Yadav (Advocate)
@Manmoha75185688
कवि------- चिट्ठी चली गयी परदेश, ऊ चिट्ठी जवन चली गयी परदेश........... जिलाध्यक्ष---ऑल इन्वेस्टर सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन
Pratap Garh,U.P.,INDIA. Katılım Mart 2018
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मुलायम सिंह यादव का उत्तराधिकारी कैसा हो?
अखिलेश भइया जैसा हो।
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@DrLaxman_Yadav @CHANDRADEOYad12 सत्ता में पहुँच रखने वालों का अत्याचार।
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फतेहपुर की घटना ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
एक युवती अपने मंगेतर के साथ बुआ के घर जा रही थी। रास्ते में दबंगों ने दोनों को रोक लिया, बंधक बना लिया और मंगेतर को बेबस बनाकर उसके सामने युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
इस घिनौनी वारदात का मुख्य आरोपी भाजपा नेता बताया जा रहा है, जो घटना के बाद से फरार है।
जब अपराधियों को सत्ता का संरक्षण मिल जाए, तो कानून भी कमजोर दिखने लगता है। फतेहपुर की बेटी इंसाफ मांग रही है, और प्रदेश की कानून-व्यवस्था कटघरे में खड़ी है। क्या यही है ‘बेटी बचाओ’ का सच?
क्या यही है महिलाओं की सुरक्षा का दावा?
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@DrLaxman_Yadav @SirShyamYadav मोदी है तो मुमकिन है प्रोफेसर साहब।
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यूपी में शिक्षा नहीं, खुली लूट चल रही है!
एसपी तिराहा स्थित प्रतिष्ठित सनबीम स्कूल में एक मां का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने स्कूल के दबाव में आकर महंगी किताबें स्कूल से नहीं खरीदीं। आरोप है कि चिन्हित बुक डीलर से किताब खरीदने के बाद भी स्कूल ने अपनी दुकान से किताबें लेने का दबाव बनाया। विरोध करने पर प्रिंसिपल ममता मिश्रा ने न सिर्फ बदतमीजी की, बल्कि बच्चों का नाम काटने तक की धमकी दे डाली।
ये सिर्फ एक स्कूल की गुंडागर्दी नहीं, बल्कि सरकार की उस शिक्षा नीति का नतीजा है जिसने शिक्षा को व्यापारियों और माफियाओं के हवाले कर दिया। निजी स्कूल फीस, किताब, ड्रेस और कॉपी के नाम पर खुली लूट मचा रहे हैं और सरकार आंख मूंदे बैठी है। क्या शिक्षा विभाग सिर्फ नोटिस चिपकाने के लिए है? क्या अभिभावकों का अपमान अब सामान्य बात हो गई है?
सरकार तुरंत कार्रवाई करे, प्रिंसिपल पर सख्त कदम उठाए, स्कूल की मान्यता की जांच हो और किताबों की इस जबरन बिक्री पर रोक लगे। बच्चों के भविष्य के नाम पर लूट और अभिभावकों का अपमान अब बर्दाश्त नहीं होगा!
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@INCUttarakhand @manjeet_s_d ये सब मोदी स्टाइल के आधुनिक वादे हैं।
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शर्म कीजिए योगी जी, पिछड़ों से इतनी नफ़रत क्यों?
लखनऊ की सड़कों पर एक बार फिर 69 हजार शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों का आक्रोश फूट पड़ा। यह गुस्सा लंबे समय से चले आ रहे अन्याय, देरी और अस्पष्ट नीतियों का परिणाम है। युवाओं का कहना है कि उनकी मेहनत और योग्यता को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
लोकतांत्रिक अधिकार मांगने पर हो रही प्रताड़ना गंभीर सवाल खड़े करती है। अभ्यर्थियों के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था उनका भविष्य फिर से ‘मटका और झाड़ू’ तक सीमित करने की ओर धकेल रही है, जो सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांतों के खिलाफ है।
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