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SUNIL MARPALLI
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झारखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के बाद भी राज्य के कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बेहद दयनीय बनी हुई है। सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड के गेंगेरा गांव में सड़क नहीं होने के कारण एक बीमार महिला को परिजनों द्वारा खटिया पर उठाकर करीब दो किलोमीटर तक ले जाना पड़ा, ताकि उसे मुख्य सड़क तक पहुंचाया जा सके और अस्पताल ले जाया जा सके। बरसात के दिनों में यह गांव पूरी तरह कट जाता है, जिससे मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की जान हमेशा खतरे में बनी रहती है। यह घटना उन विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जो कागजों और भाषणों में तो दिखाई देते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में आज भी लोग सड़क, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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पारंपरिक रूढी वह ग्राम-सभा के खिलाफ प्रशासन ने नोटिस दिया। ब्लाॅक भोपालपटनम का तहसीलदार क्या संविधान से उप्पर हैं ? पेसा नियम 2022 सिर्फ कागज तक ही सीमित हैं ? यह आदिवासियों को आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा हैं ?
@DistrictBijapur
@ChhattisgarhCMO
@rashtrapatibhvn

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छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में नई कोयला खदान के लिए 4.48 लाख पेड़ काटने का प्रस्ताव सिर्फ जंगलों पर हमला नहीं, बल्कि आदिवासियों के जीवन, जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के भविष्य पर सीधा हमला है।
indianexpress.com/article/india/…
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ग्राम सभा के फैसले पर प्रशासनिक नोटिस से बढ़ा विवाद hindsat.in/133384/
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ओडिशा के कालाहांडी जिले के तलागुड़ा गांव में एक दलित युवक को मृत गाय की खाल उतारने के दौरान बेरहमी से पीटा गया। FIR दर्ज होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कानून से ऊपर कोई भी संगठन या भीड़ नहीं हो सकती। दलितों, आदिवासियों और वंचित समुदायों पर बढ़ती हिंसा लोकतंत्र और संविधान पर सीधा हमला है।
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झारखंड में 21 हज़ार से अधिक आदिवासी घर आज भी बिजली जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। ₹188 करोड़ की योजनाएं अधर में लटकी हैं और सबसे ज्यादा प्रभावित दूर-दराज़ के आदिवासी गांव हो रहे हैं। जब “विकास” के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, तब सवाल उठता है आखिर आदिवासी समुदायों तक मूलभूत अधिकार कब पहुंचेंगे? सरकार को जवाबदेही तय कर लंबित विद्युतीकरण कार्य तुरंत पूरा करना चाहिए। बिजली कोई सुविधा नहीं, हर नागरिक का अधिकार है।

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स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय … या सरकारी विचारधारा के अड्डे ?
ज़रा देखिए, कैसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों को पढ़ाई की जगह प्रोपेगेंडा का मंच बनाया जा रहा है—
“कॉलेज में RSS के लोग आए हैं…
छात्रों से रैली निकलवाई जा रही है…”
यानी शिक्षा संस्थानों में अब ज्ञान नहीं, राजनीतिक एजेंडा परोसा जा रहा है!
लेकिन इस बार सच छुप नहीं पाया—
छात्रों ने ही कैमरे पर खोल दी भाजपा-RSS की पूरी पोल!
“पढ़ाई के नाम पर प्रोपेगेंडा?”
“कॉलेज में RSS की एंट्री, छात्रों का खुलासा!”
“BJP-RSS की राजनीति का छात्रों ने किया भंडाफोड़!”
अब किताबों की जगह नारे सिखाए जाएंगे?
क्या स्कूल-कॉलेज भी BJP-RSS के प्रचार केंद्र बनेंगे?
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लखनऊ में 69 हजार शिक्षक भर्ती घोटाले को लेकर अभ्यर्थी सड़कों पर हैं, लेकिन योगी सरकार के पास जवाब नहीं सिर्फ दमन है। दलित-पिछड़े युवाओं का हक छीना गया, आरक्षण से खिलवाड़ हुआ, और जब वे न्याय मांगने निकले तो उन्हें बसों में भरकर शहर से बाहर भेज दिया गया। यह सरकार सवालों से भाग रही है और युवाओं की आवाज़ दबा रही है।
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