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S.P
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Critical of the system. Kind to the person.😊 🌟 Happiness Ambassador spreading light through dialogue. 💬 Change begins with a conversation. Let's talk.
United Kingdom Katılım Ocak 2013
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22 साल के बेटे ने NEET पेपर लीक और टूटते भरोसे के तनाव में अपनी जान दे दी…💔
ये सिर्फ एक छात्र की मौत नहीं,
ये उस सिस्टम की नाकामी है जिसने मेहनत करने वाले युवाओं का भविष्य “पेपर लीक माफिया” के हवाले कर दिया।
जब परीक्षाएं बिकने लगें,
जब छात्रों का विश्वास टूटने लगे,
जब मेहनत से ज्यादा जुगाड़ जीतने लगे,
तो जिम्मेदार सिर्फ सिस्टम नहीं, सत्ता भी होती है।
Dharmendra Pradhan जवाब दें —
आखिर कितनी और मौतों के बाद शिक्षा व्यवस्था सुधरेगी?
नरेंद्र मोदी सरकार हर मुद्दे पर PR कर सकती है,
लेकिन छात्रों के भविष्य और मानसिक तनाव पर उसकी चुप्पी बेहद डरावनी है।
देश का युवा डिग्री नहीं, भरोसा हार रहा है।
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सही में ये तो मोदीजी को लेने के देने पड़ गए 😀
जो लोग सालों तक सत्ता पाने के लिए
हर मंच से नेहरूजी को कोसते रहे,
आज वही लोग राजनीतिक मजबूरियों में अपने ही शब्द निगलते दिखाई दे रहे हैं।
समय की लाठी जब पड़ती है,
तो भाषणों की आग भी ठंडी पड़ जाती है।
नरेन्द्र मोदीजी ने वर्षों तक इतिहास, नीतियों और हर समस्या का ठीकरा नेहरू जी पर फोड़ा,
लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि कथनी और करनी का फर्क साफ दिखाई दे रहा है।
सत्ता की भूख में बोए गए शब्द
कभी न कभी लौटकर सवाल बनकर खड़े होते ही हैं।
राजनीति सिर्फ आरोपों से नहीं चलती,
ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।
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क्या से क्या हो गया देखते देखते
मोदीजी की आज्ञा का पालन करते देश के नागरिक
कभी “मोदी है तो मुमकिन है” के नारों पर आंख बंद करके भरोसा करने वाली जनता, आज उसी सत्ता पर सवाल पूछ रही है।
जिन्होंने करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर के
मनमोहनसिंह जी और राहुल गांधी जी की छवि खराब करने की राजनीति की,
आज सोशल मीडिया पर उन्हीं के खिलाफ बिना किसी प्रचार मशीन के चुटकुले, गाने और मीम्स बन रहे हैं।
समय का सबसे बड़ा सच यही है —
डर और प्रचार से कुछ समय तक माहौल बनाया जा सकता है,
लेकिन जनता जब सच समझ जाती है तो फिर इमेज मैनेजमेंट नहीं चलता।
कल तक जो हर आलोचना को “देश विरोध” बताते थे,
आज वही लोग जनता के सवालों से घिरे हुए हैं।
सत्ता का घमंड हमेशा अस्थायी होता है,
लेकिन जनता की याददाश्त और तकलीफ़ बहुत लंबी चलती है।
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22 लाख छात्रों की मेहनत, सपने और भविष्य दांव पर लगा है…
लेकिन सत्ता में बैठे लोग अब भी चुप हैं।
NEET जैसी परीक्षा में अगर बार-बार पेपर लीक, गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की खबरें आएंगी, तो देश का युवा किस पर भरोसा करेगा?
बच्चे रात-रात भर जागकर पढ़ते हैं, परिवार कर्ज लेकर कोचिंग कराते हैं… और बदले में मिलता है टूटा हुआ सिस्टम और सरकारी चुप्पी।
अगर शिक्षा व्यवस्था नहीं संभल रही तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
सिर्फ बयान नहीं, जवाबदेही चाहिए।
धर्मेंद्र प्रधान जी को हटाइए या फिर देश को बताइए कि 22 लाख छात्रों के भविष्य के साथ हुए इस खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन है।
युवाओं का भविष्य PR और भाषणों से नहीं, ईमानदार व्यवस्था से बनता है।
Rahul Gandhi@RahulGandhi
NEET के 22 लाख बच्चों के साथ धोखा हुआ है। पर मोदी जी एक शब्द भी नहीं बोल रहे। धर्मेंद्र प्रधान जी को अभी हटाइए, या जवाबदेही ख़ुद लीजिए। Modi ji, SACK Dharmendra Pradhan ji NOW.
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NEET के लाखों छात्रों की मेहनत, सपने और भविष्य आज सवालों के घेरे में हैं।
पेपर लीक, एग्जाम कैंसिलेशन और लगातार बढ़ते मानसिक तनाव ने युवाओं को अंदर तक तोड़ दिया है।
कथावाचक स्वामी अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने भी सरकार पर तीखा तंज कसते हुए कहा —
अब मोदी सरकार स्वामी जी के पीछे ED CBI लगा देंगे क्या??
“सरकार चाहती है कि युवा पढ़-लिखकर सवाल न पूछें, बस ₹1000-₹5000 लेकर चुप रहें… क्योंकि अगर युवा शिक्षित हो गए तो रोजगार और जवाबदेही मांगेंगे।”
आज देश का छात्र पूछ रहा है —
आखिर उसकी मेहनत की कीमत कौन देगा?
हर साल पेपर लीक, परीक्षा रद्द, मानसिक तनाव और आत्महत्या की खबरें… क्या यही “नया भारत” है?
22 लाख से ज्यादा NEET अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कोई छोटी गलती नहीं, ये पूरे सिस्टम की नाकामी है।
युवाओं को भाषण नहीं, सुरक्षित परीक्षा व्यवस्था और रोजगार चाहिए।
“जब छात्र टूटता है, तो सिर्फ एक बच्चा नहीं हारता… पूरा देश अपना भविष्य हारता है।”
#MetroMonday
#NEETFakeNarrativeExposed
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फरीदाबाद की ये तस्वीर सिर्फ एक घटना नहीं,
बल्कि उस सिस्टम की पोल है जो “विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं” के बड़े-बड़े दावे करता है।
एक गर्भवती महिला दर्द से तड़पती रही…
परिवार अस्पताल के बंद दरवाज़े पीटता रहा…
लेकिन सत्ता के संवेदनहीन सिस्टम का दरवाज़ा नहीं खुला।
आख़िरकार महिला को सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा।
क्या यही है “नया भारत”?
जहाँ विज्ञापनों में करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन अस्पतालों में इंसानियत तक नहीं बची।
मोदी सरकार और स्वास्थ्य विभाग बताएं —
जब एक माँ को अस्पताल के बाहर सड़क पर बच्चे को जन्म देना पड़े,
तो फिर आपकी स्वास्थ्य योजनाओं और भाषणों का क्या मतलब रह जाता है?
देश पूछ रहा है —
क्या सरकारी अस्पताल अब सिर्फ फोटो और उद्घाटन तक सीमित हैं?
गरीब की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं?
ये सिर्फ लापरवाही नहीं,
ये सिस्टम की नाकामी और जनता के
भरोसे के साथ धोखा है।
#NEETFakeNarrativeExposed
#MetroMonday
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प्रियंका गुप्ता जी ने चित्रा का तबीयत से चित्रहार
चित्रा बाई ने Tv स्टूडियो को भाजपा का कार्यालय बना डाला..ऐसा घटियापन सिर्फ़ चित्रा बाई कर सकती है😀
श्रीमती प्रियंका गुप्ता जी गाड़ी में बैठ कर डिबेट में हिस्सा ले रहीं थी
चित्रा बाई कहने लगी कि गाड़ी में बैठना देश को चिढाना है🤣
@priyanka81_INC जी ने चित्रा बाई को पलट कर पूछा कि
चित्रा, तुम गाड़ी घर पर छोड़ आई हो?
क्या तुम साईकल से दफ़्तर आई हो?
बस चित्रा का " चरित्र" एक्सपोज़ हो गया..चित्रा बौखला कर प्रियंका गुप्ताजी पर बकवास करने लगी
@chitraaum मालिक के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकती भले 10 न्यूज चैनल क्यु ना बदलने पड़े
चित्रा का अगला न्यूज चैनल @indiatvnews टीवी होगा जहा खुलकर मोदी भक्ति होती है
#NEETFakeNarrativeExposed
#MetroMonday
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“पत्रकारिता” का मतलब सत्ता से सवाल पूछना होता है,
लेकिन आज कुछ चैनलों ने सवाल पूछना छोड़कर “दरबारी नृत्य” शुरू कर दिया है।
स्टूडियो में बहस कम, सत्ता की भक्ति ज़्यादा दिखाई देती है।
जब @Aloksharmaaicc जी ने तथ्यों के साथ जवाब दिया तो @anjanaomkashyap मोदी बौखला गईं और मुद्दे से भटककर हमेशा की तरह राहुल गांधी जी पर हमला शुरू कर दिया।
डॉलर, गोल्ड, क्रूड ऑयल की बातें ऐसे हो रही थीं जैसे देश की अर्थव्यवस्था नहीं, बीजेपी का प्रचार अभियान चल रहा हो। 😄
और @SudhanshuTrived मन ही मन अंजना से कह रहे थे बीजेपी का प्रवक्ता में हू तुम नहीं 😀
जिस “मुजरे” की बात कभी मोदी जी करते थे,
आज वही टीवी स्क्रीन पर खुलकर दिखाई दे रहा है —
जहाँ पत्रकारिता नहीं, सत्ता के सामने समर्पण हो रहा है।
देश समझ चुका है —
गोदी मीडिया का शोर सच को ज़्यादा देर तक दबा नहीं सकता।
जनता अब स्क्रिप्टेड बहस नहीं, असली सवालों के जवाब चाहती है। ✊
जो कभी मिलता नहीं
#NEETFakeNarrativeExposed
#MetroMonday
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कहते हैं ना तस्वीरे सब कुछ बोल देती है
और कार्टून सारे सवालों के जवाब दे देती है
डॉ. मनमोहन सिंह जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए आर्थिक चुनौतियों के दौर में कहा था :-
“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है?”
यह किसी व्यक्ति, दल या संप्रदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि संकटों से लड़ने के आत्मविश्वास और राष्ट्रहित में दृढ़ संकल्प का संदेश था।
नेतृत्व की पहचान कठिन समय में साहस, गंभीरता और संयम से होती है न कि निराशा या पलायन की भाषा से। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि “ हमारा क्या हम तो झोला उठाकर निकल पड़ेंगे जी “, रणछोड़दास की तरह।
यही अंतर दूरदर्शी नेतृत्व और वर्तमान राजनीति के बीच दिखाई देता है।
मनमोहनसिंह जी ने गोदी मीडिया पाल कर नहीं रखी थी झूठे प्रचार प्रसार में देश के करोड़ों रुपये उड़ाये नहीं यही फर्क़ है
वो लोग कैसे सांस ले रहे हैं जो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी को कमजोर प्रधानमंत्री बताया करते थे
#NEETFakeNarrativeExposed
#MetroMonday

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𝗜𝗧'𝗦 𝗠𝗔𝗧𝗖𝗛𝗗𝗔𝗬!!!
🏆 Premier League
🏟️ Vitality Stadium
🆚 @afcbournemouth
⏰ 19:30 KO UK
📺 Sky Sports

English

@City_Xtra @afcbournemouth Away days under the lights.
🌌 The lads are ready for a
battle at the Vitality. 🦾
Drop a 🩵 if you'll be tuning
in live tonight!
#𝖬𝖺𝗇𝖢𝗂𝗍𝗒 #𝖠𝖥𝖢𝖡𝖬𝖢𝖨
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