परीक्षाएं खेल ही तो हैं
कभी हार भी होगी !
पढ़ना
फिर से मैदान में उतरने की तैयारी रखना।
जीत भी होगी एक दिन
ज़श्न भी होगा
तुम मेहनत और "नामजप"
जारी रखना
~ प्रह्लाद पाठक
यह किसान से सीखना होगा तुम्हें ,
कि...
जीवन के खेत से क्या समेटना है
और क्या छोड़ देना है!
कब रुख से चलना है हवा के
कब उसे , अपनी ओर मोड़ लेना है!
किसान से सीखना होगा तुम्हे
पानी के बहाव को - २
कब तपना है जीवन के धूप में ,
और कब , छोड़ देना है घर की छांव को ।
~ प्रह्लाद पाठक
जो घट रहा है मैं उस पर हर्ष करूं या विषाद
उससे रत्तीभर फर्क नहीं पड़ता
वह नियति है
और नियति सर्वथा अप्रभावित है
उसे स्वीकार करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है
याचना और रुदन तो पूर्ण अक्षम हैं
प्रार्थना भी उसे पूरी तरह नहीं बदलती
पर डटे रहने की शक्ति देती है
और डटे रहना ही जीवन है।
इतनी मेहनत करो,
इतना नाम पैदा करो
कि ये जो परिचित हैं तुम्हारे
जो आज अपरिचितों जैसा व्यवहार करते हैं ;
तुम्हारे ही "परिचय" से जाने जाएं एक दिन ।
~ प्रह्लाद पाठक
कविताएं न सोती हैं
हमें जगाती रहती हैं
मैंने जो सहा, न आप सहें
यही गाती रहती हैं।
गाती रहती हैं
श्रोता को भाती रहती हैं
जाने किस गठरी से जहन में
आती रहती हैं!
जो कथनीय है कहती हैं
कवि को पहचान दिलाती हैं
राष्ट्र की सीमा लांघ
मातृभाषा का मान बढ़ाती हैं।
~ प्रह्लाद पाठक
हमसब अपने मां की सबसे सुन्दर कविताएं हैं
कवयित्री है मां शिशुता की मां से तो जग मे आए हैं
जब गिरे पड़े घुटने टूटे मां सबसे पहले दौड़ी है
आने वाली हर बुरी बला की बाहें थाम मरोड़ी हैं
मां मै तो तुझ पर वारा हूं जग कहता है आवारा हूं
तू आसमान तू भोर मेरी माँ मैं तेरा ध्रुव तारा हूं
हम कहीं और के संघनित
कहीं और बरसते हैं
हम चाहते हैं किसी और को
किसी और को तरसते हैं
तुम न मिले फिर भी जिए
सब कुछ ही फिर बेमन किए
हथियार थामे कलम थामी
जो हुआ मन सो किए
कविताएं की ह त्या एं की
रुतबा रहा, न ज़फाएं की
कहीं शाप अपनो से लिए
कहीं शत्रु ने भी दुआएं लीं
~प्रह्लाद पाठक
मैं प्रेम लिखूँ या प्रेरणा
जग को दीवाना होना है।
उसको भी गीत, मेरे सुनकर
पतिदेव से छिपकर रोना है।
सोना दूभर है थपकी पर
मैं ही दिखता हर झपकी पर।
उससे न छिपाया जाता है
पति से न बताया जाता है।
कि कवि से मेरा प्यार था
इक दौर था वो संसार था ! 😅
+
चीजें,
जिनमें प्रवाह है
सातत्यता है
खुद को पवित्र बनाए रखती हैं।
जैसे प्राकृतिक रूप से बहती
नदियाँ
दशों दिशाओं से बहती
पवन
सूर्य की निरन्तर अभ्यंतर
ज्वलन
प्रेमी युगलों के मध्य अधरों का
चुम्बन
सब विशुध्द हैं।
~ प्रह्लाद पाठक 🌻
माँ, मुस्कुराती रहे घर सजाती रहे
गलतियों पे वो आँखें दिखाती रहे
वो डाटे तो ईश्वर की डाट लगे
कर दुआ हर विपत्ति मिटाती रहे!
करके सब कुछ, न कुछ भी जताती रहे
पाके सबकुछ, वो 'कुछ में' बिताती रहे
वो हँसदे तो घर भी इक मन्दिर लगे
वो गंगा सी, कुल-काशी बनाती रहे !!
~ प्रह्लाद पाठक
भगत सिंह ने पहली बार
पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फाँसी दी गई
उसकी कोठरी में
लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मोड़ा गया था
पंजाब की जवानी को
उसके आखिरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे
चलना है आगे।
~ पाश
#bhagatsinghjayanti