Prof Rakesh Upadhyay

2K posts

Prof Rakesh Upadhyay banner
Prof Rakesh Upadhyay

Prof Rakesh Upadhyay

@Prof_RKU

Journalism @Zeenews, Past Chair Professor @BHUPRO RT not Endorsement Views & Videos Personal

New Delhi, India Katılım Haziran 2012
477 Takip Edilen3.9K Takipçiler
Prof Rakesh Upadhyay
एक और राज्य सभा देश की 7 लाख ग्राम सभाओं के साथ बगैर किसी बैठक कर फिर से खाली हाथ अपने शहरों में बने नए घरों में रहने चली गई। ग्राम सभा फिर से छली गई कि मेरे गांव के बेटे गांव छोड़कर शहरी हो गए, गांव में फिर कोई आएगा, राज्य सभा और लोकसभा तो जाएगा, लेकिन लौटकर रहने के लिए फिर गांव नहीं आएगा? क्या कहें इस राज सभा को कि जिस ग्राम सभा से शक्ति और वोट लेकर यह अस्तित्व में आती है, उस गांव सभा की तस्वीर बदले बिना खुद की तस्वीर चमकाती है। जिस गांव सभा से सबका अस्तित्व है, उस गांव को संवारिए, माननीय जी एक दिन तो अपने गोद लिए गांव में भी गुजारिए। #राज्यसभा #ग्रामसभा
Prof Rakesh Upadhyay tweet media
हिन्दी
2
8
25
348
Prof Rakesh Upadhyay
संसदीय व्यवस्था को जवाब तो देना होगा कि ग्राम स्वराज की हत्या स्वतंत्र भारत में क्यों की गई, किसने की और इसका प्रायश्चित क्या है? #ग्रामस्वराज @PMOIndia
Prof Rakesh Upadhyay tweet media
हिन्दी
1
8
29
372
Prof Rakesh Upadhyay
कब आएगा #ग्रामस्वराज? कब केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्रिमंडल रात्रि विश्राम सहित किसी दूरदराज के गांव में कैबिनेट बैठक कर पाएंगे? जिसमें ग्राम सभा भी सम्मिलित की जाए। सभी राजनीतिक दलों के सामने यह प्रश्न है कि जिन भारतीय ग्रामों में कभी 7 दिन तक बड़ी बड़ी बारात रुकती थी, वहां सरकार की कैबिनेट मीटिंग के आयोजनों में क्या कठिनाई है? साल में दो चार ही सही, सबसे पिछड़े ग्राम में पूरी सरकार गांव के सभी पिछड़ेपन के शिकार घरों में अफसरों के साथ रात गुजारने, नीति क्रियान्वयन की समीक्षा बैठक करने का उपक्रम करें तो वास्तविक फीडबैक सरकार को मिलने लगे। प्रत्येक मंत्री भी हर महीने अपने विभाग के वरिष्ठ अफसरों के साथ गांव में कम से कम दो रात व्यतीत करें। वैसे बहुत से सांसद, विधायक और अनेक मंत्री तो प्रवास करते हैं। किंतु कैबिनेट मीटिंग यदि गांव में होने लगे तो विचार बहुत ही अच्छा है। यह सवाल गांधी जी की पुस्तक हिंद स्वराज से निकलता है कि सरकार! एक रात तो गुजार लीजिए किसी गांव में? क्योंकि ग्राम को आपका इंतजार आज भी है! ग्राम के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा कि लोकतंत्र में तंत्र बड़ा या लोक बड़ा? प्रश्न खड़ा। #पंचायत #पंचायतीराज
Prof Rakesh Upadhyay tweet mediaProf Rakesh Upadhyay tweet media
हिन्दी
2
8
22
446
Prof Rakesh Upadhyay
आज श्री जगजीवन राम जी (बाबूजी) के लिए कोई भी भारत रत्न क्यों नहीं मांगता? क्या इसीलिए कि वह पक्के सनातनी थे? राम और रैदास के भक्त थे, इसलिए? क्या गंगा किनारे पूर्वांचल की मिट्टी में जन्म लेकर कोई चूक की? और संभव है कि अपनी जाति को सनातन धर्म, रैदास को छोड़कर किसी मराठी-महार के चर्च प्रेरित, बीजिंग केंद्रित लेफ्ट बुद्धा के फंदे में फंसने से मना कर दिया,क्या इसीलिए? क्या महामना मालवीय और गांधीजी के विचारों पर चलकर अपने समाज को मुख्य धारा में रखने की पैरोकारी कर अंग्रेज और अंग्रेजीराज को चुनौती देने की भूल की? संसदीय इतिहास में 50 साल जमकर अलगाव और नफरती बोली का जमकर विरोध किया? उनकी संसदीय यात्रा विश्व रिकॉर्ड है। वे भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले कैबिनेट मंत्रियों में से एक थे।  1971 में उनके रक्षा मंत्री रहते हुए भारत ने 1971 के युद्ध में ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिसके परिणामस्वरूप एक नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ। क्या ऐसा कोई और हुआ है? उन्होंने सशस्त्र बलों की सेवा शर्तों, वेतन और सुविधाओं में महत्वपूर्ण सुधार किए। उनके कार्यकाल में ही वायु सेना में 'जगुआर' जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई। उन्होंने युद्ध में घायल सैनिकों और बलिदानी सैनिकों के परिवारों के लिए उदार वित्तीय सहायता, सरकारी तेल पंप, साधन और रोजगार के अवसर देना सुनिश्चित किया।  जब वह कृषि मंत्री बने तो हरित क्रांति हुई। जिससे भारत अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बना। 1974 के गंभीर सूखे और खाद्य संकट के दौरान उन्होंने स्थिति को कुशलता से संभाला।  वह अपने समय के महानतम थे जिनकी उपलब्धियों पर दूसरे महान बताए जाने लगे। काँग्रेस ने उनके लिए भारत रत्न क्यों नहीं मांगा? क्या इसलिए कि उन्होंने आपातकाल का समर्थन करने से इन्कार कर दिया, जनता पार्टी में गए, और मोरारजी देसाई की सरकार में भारत के पहले दलित उप-प्रधानमंत्री बने। वह संविधान निर्माता भी थे। कोई नहीं आज बोलता है कि संविधान सभा के सदस्य के रूप में असल में उन्होंने दलितों व पिछड़ों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई, संविधान में कई महत्वपूर्ण प्रावधान उनके समन्वय और सबको सहमत करने के प्रयास के कारण भी शामिल हो सके। भारत के पहले श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने कई ऐतिहासिक कानून बनाए, जिनमें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948), कोयला खान श्रमिक कल्याण कोष और औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) शामिल हैं। इससे श्रमिक और श्रम को देश में प्रतिष्ठा मिली। उन्होंने ही कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) और भविष्य निधि (Provident Fund) जैसे सामाजिक सुरक्षा तंत्र की नींव रखी।  संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने हवाई परिवहन का राष्ट्रीयकरण किया और डाक सुविधाओं को दूर-दराज के गांवों तक पहुँचाया।  बाबूजी ने अपना पूरा जीवन समानता और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित किया, जिसके कारण उन्हें दलितों का असल 'मसीहा' कहा गया है।  देश के राजनीतिक नेताओं ने उन्हें भूला क्यों दिया, क्योंकि वह असली देशभक्त और सनातन धर्म के ध्वजवाहक थे, क्या इसीलिए? कभी हिंद और हिंदुस्तान की किसी जाति और परंपरा को गाली नहीं दी, क्या इसीलिए? खालिस रविदास भक्त थे वे, पूर्वांचल की झोपड़ी में जन्म लेने वाले चमार जाति के थे, गांव-गांव सनातन और संत रविदास की वाणी के प्रसारक, और चर्च के मतांतरण गिरोह के फैलाव के विरोधी भी, क्या इसीलिए? #जगजीवनराम #भारतरत्न @AmitShah @narendramodi @meira_kumar
Prof Rakesh Upadhyay tweet media
हिन्दी
4
21
48
2K
Prof Rakesh Upadhyay
@byaahnahihua जो एक पीढ़ा खाली है, उस पर भैया हैं। अब भौजी का आशीर्वाद मुझे बचपन से मिल रहा है, उनके अंतिम स्पर्श से ही प्रक्रिया पूरी होगी। नारायण। बाकी खांसी की खोज करिए कि केजरीवाल को क्यों हुई, भौजी को तो नहीं हुई आज तक। नारायण
हिन्दी
1
0
1
100
Aman Yadav
Aman Yadav@byaahnahihua·
सब बाटी चोखा बना रहे होते और सब ज़मीन पर बैठे होते तो तस्वीर अच्छी लगती। गांव की महिलाओं से कोई यह नहीं पूछेगा कि उसको खाना चूल्हे पर बनाना है यह रसोई गैस पर। बस उस पर थोप दो अपना विचार। कुछ लोगों को इस देश में खांसती हुई महिलाओं को देखना अच्छा लगता है।
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU

परंपरागत रसोई और आकाश के आंगन में बाटी चोखा। #वाराणसी मेरी जन्मभूमि और गंगा किनारे मेरा गांव। विदेशी रसोई गैस पर निर्भरता जितनी जल्दी समाप्त हो उतना ही अच्छा। स्वदेश प्रेम का तात्पर्य है कि ईंधन को लेकर हम अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोत को प्रौद्योगिकी से जोड़ कर उसका आधुनिकीकरण करें, लेकिन आजादी के बाद से ही कुछ नेतृत्व वर्ग ने अपने व्यापार के लिए हर भारतीय परंपरा पर आघात किया। विदेशी हर चीज़ सराही जाने लगी, परिणाम? आज भी गैस तो गांव में बहुत है किन्तु उसे सिलेंडर में भरने की तकनीकी हम गांव को मुहैया नहीं करा सके। जबकि 2006 से @iitdelhi ने बायोगैस को सिलेंडर में भरने के टिकाऊ, सस्ती और सर्वजन के लिए सुलभ प्लांट की प्रौद्योगिकी विकसित कर रखी है। सवाल है कि खुदरा बाजार में 50 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश FDI के लिए रात दिन एक करने वाली राजनीति (2012) ने हमारे गांव को क्या क्या दिया और क्या क्या गांव से अँग्रेजी राज के समय से ही छीना गया? कभी गांव को लेकर कोई श्वेत पत्र जारी हो तो तस्वीर साफ होगी। #LPGCrisis #ग्रामस्वराज #ऊर्जा #ग्रामऊर्जास्वराज @AmitShah @narendramodi #ग्रामप्रवास

हिन्दी
1
0
2
318
Prof Rakesh Upadhyay
@mrmanojrai जो एक पीढ़ा खाली है, उस पर भैया हैं। अब भौजी का आशीर्वाद मुझे बचपन से मिल रहा है, उनके अंतिम स्पर्श से ही प्रक्रिया पूरी होगी। नारायण
हिन्दी
0
0
1
39
Manoj (Ram Bhakt)🇮🇳
@Prof_RKU बाटी चोखा तो अपने गांव में भी लगता है लेकिन उस दिन बनाने की जिम्मेवारी पुरुष वर्ग की होती है। माफ कीजिए लेकिन इस फोटो को देख कर लग रहा है कि ४ - ५ हट्टे कट्टे लोग कुर्सी तोड़ रहे हैं और ___
हिन्दी
2
0
1
71
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
परंपरागत रसोई और आकाश के आंगन में बाटी चोखा। #वाराणसी मेरी जन्मभूमि और गंगा किनारे मेरा गांव। विदेशी रसोई गैस पर निर्भरता जितनी जल्दी समाप्त हो उतना ही अच्छा। स्वदेश प्रेम का तात्पर्य है कि ईंधन को लेकर हम अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोत को प्रौद्योगिकी से जोड़ कर उसका आधुनिकीकरण करें, लेकिन आजादी के बाद से ही कुछ नेतृत्व वर्ग ने अपने व्यापार के लिए हर भारतीय परंपरा पर आघात किया। विदेशी हर चीज़ सराही जाने लगी, परिणाम? आज भी गैस तो गांव में बहुत है किन्तु उसे सिलेंडर में भरने की तकनीकी हम गांव को मुहैया नहीं करा सके। जबकि 2006 से @iitdelhi ने बायोगैस को सिलेंडर में भरने के टिकाऊ, सस्ती और सर्वजन के लिए सुलभ प्लांट की प्रौद्योगिकी विकसित कर रखी है। सवाल है कि खुदरा बाजार में 50 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश FDI के लिए रात दिन एक करने वाली राजनीति (2012) ने हमारे गांव को क्या क्या दिया और क्या क्या गांव से अँग्रेजी राज के समय से ही छीना गया? कभी गांव को लेकर कोई श्वेत पत्र जारी हो तो तस्वीर साफ होगी। #LPGCrisis #ग्रामस्वराज #ऊर्जा #ग्रामऊर्जास्वराज @AmitShah @narendramodi #ग्रामप्रवास
Prof Rakesh Upadhyay tweet media
हिन्दी
2
8
36
1.1K
Prof Rakesh Upadhyay
@Kanishk_76 सही हैं आप। सभी मनु के साथ कथा जुड़ जाती है
हिन्दी
0
0
2
136
Kaniṣkaḥ
Kaniṣkaḥ@Kanishk_76·
@Prof_RKU इक्ष्वाकु सातवे वैवस्वत मनु के पुत्र थे न कि प्रथम स्वायंभुव मनु के, और वैवस्वत नाम से ही इन सातवे मनु का मूल स्पष्ट है, जो कि विवस्वत् माने आदित्य है ।
हिन्दी
1
0
2
156
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
भगवान #बुद्ध #मनु के ही वंश में जन्में थे, किंतु आश्चर्य है कि प्रमुख बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित इस अकाट्य सत्य को बोला जाए तो सोशल मीडिया पर कई नए बुद्धधर्मी अनाप-शनाप बोलने लगते हैं। इन्हें बुद्ध के भारतीय होने पर भी संदेह हो गया लगता है, इनके नवज्ञान के अनुसार, मानो तथागत #बीजिंग से ही आए थे? और यह भी कि बुद्ध की पहली जन्म कुंडली बनाकर उनके पिता महाराज शुद्धोधन को सुनाने वाले ब्राह्मण आदि तो विदेश यानी ( यूनान में सिकंदर के गांव) से आए थे? यही अल्ल बल्ल फर्जी अकाउंट बनाकर बका जा रहा है। इधर के वर्षों में यह प्रलाप ज्यादा बढ़ा है। @narendramodi @AmitShah @Profdilipmandal अब इन सबका क्या इलाज है? इन्हें #सत्य #नारायण की कथा से मार्ग पर लाया जा सकता है, और कोई मार्ग भी नहीं दिखता है बार बारसत्य बोलनेकेसिवाय। तो सुनों कथा भगवान की। बौद्ध कथा साहित्य में भगवान बुद्ध को प्रथम स्वयंभू मनु के कुल में 'आदित्य-बंधु' और 'ओक्काक' (राजा इक्ष्वाकु का पालि नाम) वंशज बताया गया है। ​सुत्त निपात (Sutta Nipata) सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में से एक है। इसके 'पब्बज्जा सुत्त' में एक प्रसंग है जहाँ मगध के राजा बिम्बिसार सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) से उनके वंश के बारे में पूछते हैं। तब बुद्ध उत्तर देते हैं: ​"आदिच्चा नाम गोत्तेन, साकिया नाम जातिया।" (अर्थात: मेरा गोत्र 'आदित्य' (सूर्य) है और मेरी #जाति 'शाक्य' है।) ​इसी ग्रंथ में बुद्ध स्वयं को 'ओक्काक' (इक्ष्वाकु) के वंश की शाक्य जाति का वंशज बताते हैं। बुद्ध को अपनी जाति मालूम है, और उनको मनु पुत्र होने का गौरव है। आगे कथा सुनो, #नारायण हरि जपो, जपते रहो, इससे मन शुद्ध और शांत रहता है। बहुत-बहुत समय पहले की बात है तब भगवान बुद्ध शिष्य मंडली में बैठे थे। उनके वचन से एक महाग्रंथ निकला ​दीघ्घ निकाय (Digha Nikaya)। ​दीघ निकाय के 'अम्बट्ठ सुत्त' में शाक्य वंश की उत्पत्ति की पूरी कथा बुद्ध भगवान खुद बताकर गए हैं। विस्तार से इसमें बताया गया है कि शाक्य जाति राजा 'ओक्काक' (राजा इक्ष्वाकु) की वंशज हैं। इस सुत्त में भगवान बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि राजा इक्ष्वाकु ने ही शाक्य कुल की नींव रखी थी। नवयान पर सवार लोगों ध्यान से कथा सुनो कि प्राचीन समय में महावंश (Mahavamsa) नाम से ​श्रीलंका देश में प्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक जुटान कर बहुत से मुनियों ने एक ग्रंथ लिखा है। इसके दूसरे अध्याय ('सीहला-वंस') में बुद्ध की वंशावली दी गई है, जो महासंमत से शुरू होकर राजा ओक्काक (इक्ष्वाकु) तक आती है और फिर शुद्धोधन और सिद्धार्थ (बुद्ध) तक पहुँचती है। प्राचीन समय में ​#ललितविस्तर (Lalitavistara) नामक ​संस्कृत भाषा में बौद्ध ग्रंथ ब्राह्मण मुनियों ने सबको एकत्रित कर भंतों यानी भक्तों के साथ लिखा है जो बुद्ध की बहुत प्राचीन जीवनी है। इसमें भी भगवान बुद्ध को 'इक्ष्वाकु-कुल-संभूत' (इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न) कहा गया है। ​बुद्धचरित (Buddhacharita) तो ​महाकवि अश्वघोष ने आदि समय में रचा। इस महाकाव्य के पहले ही सर्ग में राजा शुद्धोधन और उनके वंश का वर्णन करते हुए उन्हें भगवान राम के क्षत्रिय इक्ष्वाकु वंश का बताया गया है। ​ तो बोलो सत्य नारायण भगवान की जय। सत्य ही नारायण हैं, जहां सत्य नहीं तो वहां नारायण भी नहीं रहेंगे, बुद्ध और बुद्धि भी सत्य का मान न रखने पर आपको नष्ट कर देगी। तो समझ कर चलो कि ​बौद्ध परंपरा के सभी मतों और मान्य ग्रंथों के अनुसार, राजा इक्ष्वाकु (ओक्काक) के पुत्रों ने ही ब्राह्मणों सहित सभी वर्णों को साथ लेकर कपिलवस्तु नगर की स्थापना की थी, यहीं से 'शाक्य' जाति का वंश आगे चला। इसी में मुरा शाक्य से मौर्य जाति आई। अब आज की कथा यहीं तक। आगे विश्राम के बाद फिर से कथा आगे बढ़कर रहेगी। प्रेम से बोलिए श्री सत्य नारायण भगवान की जय। आज का मूल कथासार है कि आध्यात्मिक और वंशानुगत रूप से बुद्ध और मनु (वैवस्वत मनु, जो सूर्य के पुत्र थे) का संबंध अटूट था, है और रहेगा। अब मत बोलना कि बुद्ध बीजिंग से आए, और ब्राह्मण सिकंदर के गांव से। प्रसाद वितरण के बाद पंडित जी उवाच... वैसे, जब तुम लोग किसी इस्लामी #आतंकवादी की मौत पर रोते हो तो मैं इतना समझ जाता हूं कि तुम कौन हो जो बुद्ध और #अंबेडकर की फोटो लगाकर ब्राह्मण परंपरा को गाली बकते हो? तुम भारतीय नहीं हो और #भगवान #बुद्ध के तो बिल्कुल भी नहीं हो। हरि ओम तत्सत
हिन्दी
10
52
130
4.2K
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
मौजूदा तेल-गैस संकट और प्रो. अशोक गुप्ता का वह अचूक महामंत्र जिसने देश को ऊर्जा स्वराज का संकल्प दिया था। आज उस गुमनाम सी कहानी को फिर से सुना रहा हूं। प्रो. अशोक कुमार गुप्ता से बीते एक वर्ष से गहरा आत्मीय लगाव हो गया था। यद्यपि की विगत 15 वर्षों में अनेक अवसरों पर मैं उनसे बाजार, मदर डेयरी आते-जाते मिलता था। बहुत छोटी सी कद-काठी में विनम्रता की परम मूर्ति बनकर वह सादे लिबास में ही सभी को सदा दिखते रहे, किन्तु कभी आभाष नहीं हुआ कि वह एक महान वैज्ञानिक, गहन तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाले ऐसे महापुरुष हैं, जिनका जाना दिल्ली आईआईटी जैसे महानतम संस्थान के लिए ही नहीं, पूरी भारतीय परंपरा के लिए अपूरणीय छति है। विगत दिनों जब मैं अपनी स्वर्गीय मां के क्रिया-कर्म के बाद वाराणसी से दिल्ली लौटा तो सबसे पहले प्रो. अशोक गुप्ता मां को श्रद्धांजलि देने घर पर आए। बीते एक साल से रिश्ता इसलिए आत्मीय हो गया था क्योंकि जिस सोसायटी में वह रहते हैं तो वहीं मैं भी शिफ्ट हो गया, इसलिए सुबह-शाम आते-जाते, टहलने और मिलने का सहज क्रम हो गया। मेरे दोनों बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते हैं, उसी स्कूल में प्रो. गु्प्ता के पौत्र-पौत्री पढ़ते हैं, इसलिए भी मिलना होता ही था। उनके पैरों में उम्र के इस पड़ाव पर घुटनों के कारण तकलीफ थी। उनके लिए तेजी से सड़क पार करना कई बार मुश्किल होता था, तो मैं उनके साथ हो लेता था ताकि वह आसानी से रफ्तार भरे वाहनों के बीच सुरक्षित सड़क पार कर लें। उनके कोमल हाथों की स्मृति मुझे सदा झंकृत करती है जिसे पकड़कर मैं उनके साथ कुछ चहलकदमी करता था। मैंने उनके अकादमिक अवदान पर ज्यादा गंभीर चर्चा नहीं की। क्योंकि वह मुझे काशी का जानकर अक्सर वाराणसी और वहां के परिदृश्य की ही चर्चा करते, किंतु जब वह चले गए और मैं 11 मार्च को उनके अंत्येष्टि कर्म में सम्मिलित होने एक वरिष्ठ प्रोफेसर धर को लेकर घाट पर पहुंचा तो उसी अंतराल में जो मैंने सुना तो मेरी आंखें खुली रह गईं। प्रो धर दिल्ली आईआईटी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के वरिष्ठतम प्रोफेसर हैं। वह भी मेरे पड़ोसी हैं। मैं उन्हें अपनी गाड़ी में लेकर लोदी रोड श्मशान घाट की ओर चल पड़ा। रास्ते में ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध को लेकर चर्चा शुरु हुई। एलपीजी की किल्लत का मामला भी आया। तभी मैंने दिल्ली आईआईटी से मुझे 2006 में मिली एक स्टोरी की ओर प्रो. धर का ध्यान आकृष्ट किया। दिल्ली आईआईटी के सेंटर फॉर रुरल डेवलेपमेंट एंड टेक्नॉलॉजी (सीआरडीटी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. वीरेंद्र कुमार विजय के एक बायो गैस ऊर्जा संयंत्र से जुड़ी यह असल कहानी थी जिसमें मैं प्रो. अशोक गुप्ता के योगदान से मेरा परिचय प्रो. धर ने अब कराया। दरअसल 1995-96 के बाद केंद्र सरकार ने बायो गैस ऊर्जा को लेकर बड़ा प्रोजेक्ट दिल्ली आईआईटी में शुरु किया। इसे ग्राम ऊर्जा स्वराज नाम दिया गया। प्रो. वीरेंद्र कुमार विजय और प्रो. पीएमवी सुब्बाराव ने एक अनूठा प्रोजेक्ट हाथ में लिया। गांव-गांव में गोबर से बनने वाली गैस को सिलेंडर में भरकर उसे कमर्शियल बनाकर घर-घर तक रसोई गैस पहुंचाने का प्रोजेक्ट। प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के समय का यह ड्रीम प्रोजेक्ट था। तब के शिक्षा मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी स्वयं इस प्रोजेक्ट की निगरानी भी कर रहे थे। वहीं से मुझे यह स्टोरी मिली थी और मैं रिपोर्ट जुटाने दिल्ली आईआईटी पहुंच गया। प्रो. वीरेंद्र विजय ने मुझे काफी जानकारी दी, जिसे मैंने अपने समाचार पत्र में प्रकाशित किया। साल 2006 में इस टेक्नॉलॉजी को पेटेंट भी हासिल हो गया। इस प्रौद्योगिकी के कारण बायोगैस से उत्पन्न सीएनजी गैस को सिलेंडर में भर पाना संभव हुआ। बायोगैस एनरिचमेंट एंड बॉटलिंग प्लांट के लिए उद्योग जगत को लाइसेंस मिला। महिंद्रा, इंडियन कंप्रेसर्स आदि अनेक बड़ी कंपनियों ने इसके जरिए सीएनजी के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दिया। हालांकि जो परिकल्पना थी कि देश के सभी बड़े गांवों में यह प्लांट लगाया जाएगा ताकि गांव-गांव, घर-घर के पशुधन, गाय-बैल आदि के गोबर से रसोई गैस के, सीएनजी सिलेंडर के उत्पादन हों, और रसोई गैस में देश आत्मनिर्भर हो सके। दुर्भाग्य है कि टेक्नॉलॉजी आज तक जिस रूप में तेजी से भारत के गांव-गांव में पहुंच जानी चाहिए थी, लालफीताशाही, अंतर्राष्ट्रीय तेल-गैस लॉबी के षड्यंत्रों के कारण भारत आज भी इस टेक्नॉलॉजी के व्यापक लाभ से वंचित है। खैर, बात प्रो. अशोक गुप्ता की। प्रो. धर ने बताया कि जब इस टेक्नॉलॉजी पर काम हो रहा था, तब गोबर गैस में से निकलने वाली 30 प्रतिशत कॉर्बन डाइ ऑक्साइड को हटाकर 65 प्रतिशत मीथेन गैस को अलग करना, उसे कंप्रेस्ड कर सिलिंडर में भरने के काम में तकनीकी बाधा खड़ी हो गई। अनेक विशेषज्ञ हार मान चुके थे कि कॉर्बन और मीथेन को अलग करने की देसी सस्ती प्रौद्योगिकी विकसित करना कठिन है, विदेशी एक्सपर्ट से मदद लेनी होगी। दिल्ली आईआईटी के विशेषज्ञ हार मान चुके थे। प्रो. धर के मुताबिक, तब मैं मैकेनिकल विभाग देख रहा था, मेरे ही पास यह मुद्दा आया कि क्या किया जाए। तब मैंने कहा कि क्या प्रो. अशोक गुप्ता से आपने इस समस्या का जिक्र किया। उसके बात सभी लोग प्रो. अशोक गुप्ता से मिले। उन्होंने टेक्नॉलॉजी की पूरी डिजायन को देखा-समझा और सभी शोध विशेषज्ञों को बुलाकर डिजायन में बदलाव की रूपरेखा बताई। यह प्रो. अशोक गुप्ता थे जिन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के आचार्य के रूप में कॉर्बन और मीथेन को अलग करने की देसी सस्ती प्रौद्योगिकी विकसित करने में सीडीआरटी के शोधकर्ताओं का अतुलनीय मार्गदर्शन किया, और वह प्रौद्योगिकी देश को मिली जो ईरान आदि के कारण उत्पन्न ऊर्जा संकट का अचूक देशी समाधान है। देश को आगे बढ़कर इस प्रौद्योगिकी को कुछ औद्योगिक कंपनियों के हाथों से निकालकर कम से कम 2 लाख ग्रामों तक पहुंचा देना चाहिए, ताकि गाय बचे, गौशक्ति का पूर्ण इस्तेमाल हो, गोबर, गोमू्त्र की उचित कीमत किसानों को मिले। देश के खेत देसी ऑर्गनिक फर्टिलाइजर से भरपूर हों। गाय के गोबर गैस से वाहनों के लिए ईंधन, बिजली उत्पादन, कुकिंग गैस और इसकी सलरी और गोमूत्र के प्रयोग से बायो फर्टिलाइजर, सलरी मैन्योर, ऑर्गेनिक खाद आदि का बंदोबस्त भारत के भविष्य के ऊर्जा स्वराज का महामंत्र है। इस मंत्र को साक्षात प्रकट करने में जिनकी मेधा का देश ने इस्तेमाल किया, उन्हीं प्रो. अशोक गुप्ता को आज श्रद्धांजलि दे रहा हूं। उस समय रिपोर्ट अधूरी रह गई थी, आज पूरी हो गई। @PMOIndia @narendramodi @AmitShah @nitin_gadkari @MIB_India @iitdelhi #IITDELHI
Prof Rakesh Upadhyay tweet media
हिन्दी
3
7
18
572
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
@1496sukiti मुद्दा है कि भगवान बुद्ध ने मनु स्मृति सुनी या नहीं? पढ़ी या नहीं? उनके पिताजी भी मनु को अपना पूर्वज कहते थे तो क्या इसीलिए भगवान चुप रह गए?
हिन्दी
1
2
19
736
Sukiti_Arya
Sukiti_Arya@1496sukiti·
@Prof_RKU Kab likhi gai, sabse bada sawal yahi hai! Gadhe log kahte hain hazaron varsh purva likhi gai!😆😆😆
हिन्दी
1
0
2
882
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
मनुस्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? इस ग्रंथ को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया? सबसे बड़ा सवाल है कि #मनुस्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कौटिल्य, कामंदक आदि और बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर कटाक्ष नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? @Profdilipmandal सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया। इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। इस समिति में दरबारी और सरकारी धन पर आश्रित अनेक बंगाली सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने एक समग्र मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की। इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकती है जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक संदिग्ध और जीर्ण शीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गई। इस प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था। पहला प्रकाशन जल्दबाजी में 1776 में हुआ,किंतु बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका तो पुनः 1786 में, 1794 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया। अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, अफसरों को जारी कर दिया। यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं। इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है। ऐसे अनेक अकादमिक प्रश्न अनुत्तरित हैं कि 1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है। 2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? मनु की जिन कथित पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि सुरक्षित हैं तो कहां हैं, उन्हें क्योें विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? 3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर सोसायटी जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि उपलब्ध नहीं कराई गई। 4-संस्कृति मंत्रालय @gssjodhpur को तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए। जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला प्रकाशन किया, उनका पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। शोधपूर्वक देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु की हैं भी या नहीं है? @AmitShah @PMOIndia
हिन्दी
64
800
1.6K
67.3K
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
@kamal67490661 चलो इतना तो मान लिया कि राजतिलक हुआ। शेष, शिवाजी राजे के किसी लिखित साहित्य में इसका उल्लेख नहीं जो आप बता रहे हैं, फर्जी बातें ज्यादा दिन नहीं टिकती
हिन्दी
0
0
7
119
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
मेरे पूज्य गुरुदेव स्व. प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, उन्हीं का आशीर्वाद है।
Ram Lal Upadhyay@updramlal

@Prof_RKU सादर नमनजी !मनुस्मृति कब लिखी गईसे ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? इस ग्रंथको ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया?" गहन अध्ययन ...समस्या या घटना के बारे में व्यवस्थित, गहन और साक्ष्य-आधारित जांच करके नया ज्ञान, तथ्य, या समाधान खोज़ना है।

हिन्दी
0
5
26
821
Prof Rakesh Upadhyay
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU·
सब एक जैसे नहीं थे। तभी तो काशी के ब्राह्मणों से अंग्रेज शायद डर रहे थे, इसलिए उनको विलियम जोंस की अगुवाई में मनुस्मृति की संपादन समिति में जगह नहीं दी। उन्हें मालूम था कि शिवाजी का राजतिलक करने के समय बादशाही खतरा देखकर जब सब पीछे हट गए, तब काशी के ब्राह्मणों ने मोर्चा संभाल लिया था।
हिन्दी
0
5
16
411
ALOKA
ALOKA@kamal67490661·
ब्राह्मणों के पापों को अंग्रेजों के मत्थे मढ़ने का प्रयास हो रहा है। यह प्रयास अंग्रेजों के शासन काल मे करना चाहिए था। कैसे करते? दुम हिलाना भी तो था। कथित ग्रन्थ की पांडुलिपि न तो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर मिलने वाला। ये अंग्रेजों के समय गापोड़ा गया था। ये कोई पुरानी ग्रंथ नहीं।
Prof Rakesh Upadhyay@Prof_RKU

मनुस्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? इस ग्रंथ को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया? सबसे बड़ा सवाल है कि #मनुस्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कौटिल्य, कामंदक आदि और बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर कटाक्ष नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? @Profdilipmandal सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया। इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। इस समिति में दरबारी और सरकारी धन पर आश्रित अनेक बंगाली सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने एक समग्र मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की। इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकती है जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक संदिग्ध और जीर्ण शीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गई। इस प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था। पहला प्रकाशन जल्दबाजी में 1776 में हुआ,किंतु बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका तो पुनः 1786 में, 1794 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया। अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, अफसरों को जारी कर दिया। यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं। इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है। ऐसे अनेक अकादमिक प्रश्न अनुत्तरित हैं कि 1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है। 2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? मनु की जिन कथित पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि सुरक्षित हैं तो कहां हैं, उन्हें क्योें विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? 3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर सोसायटी जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि उपलब्ध नहीं कराई गई। 4-संस्कृति मंत्रालय @gssjodhpur को तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए। जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला प्रकाशन किया, उनका पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। शोधपूर्वक देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु की हैं भी या नहीं है? @AmitShah @PMOIndia

हिन्दी
1
0
2
266