

Prof Rakesh Upadhyay
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@Prof_RKU
Journalism @Zeenews, Past Chair Professor @BHUPRO RT not Endorsement Views & Videos Personal











परंपरागत रसोई और आकाश के आंगन में बाटी चोखा। #वाराणसी मेरी जन्मभूमि और गंगा किनारे मेरा गांव। विदेशी रसोई गैस पर निर्भरता जितनी जल्दी समाप्त हो उतना ही अच्छा। स्वदेश प्रेम का तात्पर्य है कि ईंधन को लेकर हम अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोत को प्रौद्योगिकी से जोड़ कर उसका आधुनिकीकरण करें, लेकिन आजादी के बाद से ही कुछ नेतृत्व वर्ग ने अपने व्यापार के लिए हर भारतीय परंपरा पर आघात किया। विदेशी हर चीज़ सराही जाने लगी, परिणाम? आज भी गैस तो गांव में बहुत है किन्तु उसे सिलेंडर में भरने की तकनीकी हम गांव को मुहैया नहीं करा सके। जबकि 2006 से @iitdelhi ने बायोगैस को सिलेंडर में भरने के टिकाऊ, सस्ती और सर्वजन के लिए सुलभ प्लांट की प्रौद्योगिकी विकसित कर रखी है। सवाल है कि खुदरा बाजार में 50 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश FDI के लिए रात दिन एक करने वाली राजनीति (2012) ने हमारे गांव को क्या क्या दिया और क्या क्या गांव से अँग्रेजी राज के समय से ही छीना गया? कभी गांव को लेकर कोई श्वेत पत्र जारी हो तो तस्वीर साफ होगी। #LPGCrisis #ग्रामस्वराज #ऊर्जा #ग्रामऊर्जास्वराज @AmitShah @narendramodi #ग्रामप्रवास












सब एक जैसे नहीं थे। तभी तो काशी के ब्राह्मणों से अंग्रेज शायद डर रहे थे, इसलिए उनको विलियम जोंस की अगुवाई में मनुस्मृति की संपादन समिति में जगह नहीं दी। उन्हें मालूम था कि शिवाजी का राजतिलक करने के समय बादशाही खतरा देखकर जब सब पीछे हट गए, तब काशी के ब्राह्मणों ने मोर्चा संभाल लिया था।

@Prof_RKU सादर नमनजी !मनुस्मृति कब लिखी गईसे ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? इस ग्रंथको ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया?" गहन अध्ययन ...समस्या या घटना के बारे में व्यवस्थित, गहन और साक्ष्य-आधारित जांच करके नया ज्ञान, तथ्य, या समाधान खोज़ना है।

मनुस्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? इस ग्रंथ को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया? सबसे बड़ा सवाल है कि #मनुस्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कौटिल्य, कामंदक आदि और बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर कटाक्ष नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? @Profdilipmandal सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया। इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। इस समिति में दरबारी और सरकारी धन पर आश्रित अनेक बंगाली सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने एक समग्र मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की। इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकती है जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक संदिग्ध और जीर्ण शीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गई। इस प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था। पहला प्रकाशन जल्दबाजी में 1776 में हुआ,किंतु बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका तो पुनः 1786 में, 1794 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया। अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, अफसरों को जारी कर दिया। यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं। इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है। ऐसे अनेक अकादमिक प्रश्न अनुत्तरित हैं कि 1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है। 2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? मनु की जिन कथित पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि सुरक्षित हैं तो कहां हैं, उन्हें क्योें विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? 3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर सोसायटी जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि उपलब्ध नहीं कराई गई। 4-संस्कृति मंत्रालय @gssjodhpur को तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए। जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला प्रकाशन किया, उनका पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। शोधपूर्वक देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु की हैं भी या नहीं है? @AmitShah @PMOIndia