Ravindra

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@RAVINDRAOJHA73

nada

Europa Katılım Aralık 2012
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Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
@Tere_do_nainaaa विनोद कुमार शुक्ल हमारी पहुंच से काफी दूर हैं.उन तक पहुंचने में शायद अभी उम्र लगे
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वाक़िफ़ हैं निगाहें 👀
@RAVINDRAOJHA73 सब की उतनी गहरी रूहानियत हो ज़रूरी नहीं है पर अनुभव के साथ कह रहा हूं, बस पढ़ते रहिए जो आपकी रूह में उतर जाए! पर इस स्टेटमेंट screenshot ले लीजिए और सेव कर लीजिए, कुछ सालों बाद आपको इसकी जरुरत पड़ेंगी! कि ऐसा भी सोचा था मैंने कभी। ✨
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Kailash Satyarthi
Kailash Satyarthi@k_satyarthi·
आज विश्व पुस्तक दिवस पर आप सबको शुभकामनाएँ। 1975 में मैंने अपनी पहली पुस्तक लिखी और प्रकाशित की थी। तब मैं 21 साल का था और विदिशा में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। पुस्तक का शीर्षक "वर्तमान संदर्भों में आर्य समाज" था। वह साल आर्य समाज आंदोलन का शताब्दी वर्ष भी था। पुस्तक में पांडित्य नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन के विचारों की व्याख्या थी। इसलिए मैं सोचता था कि वह पुस्तक ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचे। उसी साल दिल्ली में आर्य समाज का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होने वाला था। मेरे पास तो 10 पुस्तकें छापने के पैसे भी नहीं थे, लेकिन भरोसा था कि मेरी पुस्तक हजारों की संख्या में बिकेगी। मैंने किसी तरह हाथ-पैर जोड़कर अपने एक परिचित छापाखाने वाले को, उधारी में  5000 पुस्तकें छापने को राजी कर लिया। मैं तो 10000 छपवाना चाहता था। मेरे मित्रों ने और मैंने उन्हें समझाया कि दिल्ली के महासम्मेलन में पुस्तक बिकने के बाद तत्काल सारा पैसा लौटा दिया जाएगा। अब समस्या आ गई कि यह किताबें दिल्ली कैसे पहुंचाई जाएं और वहां उन्हें कहां और कैसे बेचा जाएगा, क्योंकि हमारे पास कोई दुकान तो थी नहीं। मैंने अपने एक मित्र प्रकाश सोनी और भतीजे दिनेश को पुस्तकों के बंडल लाद कर ट्रेन से भिजवा दिया। उनके किराये भाड़े का खर्च एक मित्र महिपाल सिंह ने उठाया। सम्मेलन में वैदिक और आर्य समाज साहित्य की ढेरों दुकानें लगी थीं, लेकिन कोई भी हमारी वह पतली सी किताब अपने यहां रखकर बेचने के लिए राजी नहीं हुआ। उन्हीं में पंडित भारतेंदु नाथ जी के प्रकाशन की दुकान भी थी। अंत में मेरे साथी टाट पट्टियां बिछाकर मेले के कोने-कोने में चिल्ला-चिल्ला कर पुस्तक बेचने लगे। उन्होंने वहीं खुले मैदान में किताबों के बंडल पर सोते-जागते रात गुजारी। पहले दिन तो थोड़ी ही पुस्तकें बिकीं, लेकिन अगले कुछ दिनों में लगभग पूरी की पूरी बिक गईं। तब तो प्रकाश और दिनेश के मजे आ गए। वे पास के एक छोटे से होटल में जाकर रुके और उम्दा भोजन करने लगे। हमने तुरंत प्रिंटिंग प्रेस वाले की उधारी चुका दी और बाद में उसी से और भी पुस्तकें छपवाते रहे।
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𝐒ɦυ𐓣𝗒𝗍α
𝐒ɦυ𐓣𝗒𝗍α@Shunyta_007·
Don’t fear monsters drag them back to the hell they belong to 🔥
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
दुनिया की सारी लड़ाई इंसान के भीतर चलती रहती है.बाहर से शांत व्यक्ति कभी कभी भीतर तूफान लिए बैठा होता है.दुनिया में कोई ऐसा नहीं जो इस युद्ध से जूझ नहीं रहा
𝐒ɦυ𐓣𝗒𝗍α@Shunyta_007

कभी कभी मुझे लगता है हम सबकी जिंदगी में एक ही चीज़ common है हम बाहर जितने normal दिखते हैं अंदर उतने ही उलझे हुए होते हैं हर किसी के दिमाग में रात को सोने से पहले कुछ बातें ज़रूर घूमती हैं जो वो किसी को बता नहीं पाता दिन में हम सब अपने अपने काम में लगे रहते हैं जैसे सब ठीक चल रहा है लेकिन रात को जब फोन साइड में रख देते हैं और कमरे में शांति होती है तब अचानक दिमाग सौ बातें एक साथ याद दिलाने लगता है पुरानी गलती, अधूरे काम, कुछ लोग कुछ फैसले जो शायद अलग लेने चाहिए थे और फिर हम सोचते सोचते सो जाते हैं शायद यही वो moment है जहाँ हर इंसान एक जैसा हो जाता है क्योंकि रात की खामोशी में हर कोई थोड़ा सा खुद से लड़ रहा होता है।

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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
प्रेम को प्रकट करने के सबके अपने तरीके हैं.कोई शेरो शायरी से अपनी बात कहता है.कोई खामोशी से कहता है.कोई सीधे गहरे शब्दों में कहता है.वैसे एक जैसे दिल भले ही एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो,लेकिन सबका अपना तरीका है इजहार करने का.
varsha pandey@vashi1999

अक्सर हम उन लोगों के प्रेम में पड़ते हैं जिनमें हमारे जितनी गहराई होती है। लेकिन कभी कभी हम कुछ बेवकूफ से लड़कों के गहरे इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाते हैं। जिन्हें शायरी सुनाओ तो फिर उसका मतलब समझाना पड़ता है। क्या कहें किसी से कि, ‘यूँ उठे आह उस गली से हम, जैसे कोई जहाँ से उठता है…तुम्हारी गली देखनी थी, तुम्हारा घर, तुम्हारे घर के पर्दे…उसे कैसे समझायें कि मुझे तुम्हारे घर की खामोशी से मिलना था। तुम्हारी खिड़की से आसमान को देखना था। इस जरा सी मुहब्बत का ठिकाना दुनिया में कहीं नहीं होता। कि बेवकूफ लड़के, जब हम कहते हैं कि, ‘इश्क़ एक मीर भारी पत्थर है, कब ये तुझ नातवाँ से उठता है’, (मीर तकी मीर) तो इसका मतलब यह नहीं है कि बॉडी-बिल्डिंग शुरू कर दो। इसका मतलब हम तुम्हारे हक़ में दुआयें पढ़ रहे हैं कि इश्क़ का भारी पत्थर उठाने के लिए तुम्हारा दिल मज़बूत हो सके…फिर हमारे जैसी तो दुआ क्या ही कोई माँगता होगा, कि तुम्हें इश्क़ हो...भले हमसे न हो, किसी से हो...लेकिन तुम्हारा दिल जरा ना नाज़ुक रहे। आँख थोड़ी सी नम। ~ सुबह सवेरे 😌😜

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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
लेखन ऐसा ही होना चाहिए जो थक हार कर लिखा जाए.आय के लिए लिखना तो व्यापार है.हां उसके बदले कुछ मिल जाए तो ठीक है.लेकिन पैसे को ध्यान में रखकर अगर आप लिख रहे हैं तो आप लेखक नहीं हैं,और जो कुछ भी हों पता नहीं.
Prabhat Ranjan@prabhatranjann

किसी ने लिखा है कि 'हिंदी का लेखक हफ़्ते में पांच और छह दिन रोज़ी रोटी के जुगाड़ में लगा रहता है और सातवें दिन लेखन की सोचता है।' इससे मुझे एक बड़े लेखक की बात याद आ गई। उन्होंने लिखा था कि तीसरी दुनिया का अधिकतर साहित्य 'बोरडम का साहित्य' है। अर्थात् हिन्दी जैसी भाषाओं में अधिकतर लेखक वैसे होते हैं जो आजीविका के लिए दिन में कोई काम करते हैं और वे उस समय लिख रहे होते हैं जब वे बहुत थके हुए होते हैं, जो उनके सोने का समय होता है उससे समय निकालकर वे लेखन करते हैं। केवल लेखन की बदौलत अपनी ज़िंदगी अच्छे से बसर कर पाने की लक्ज़री उनके पास नहीं होती। उस लेखन में उनकी नींद का बोझ होता है, थकान की पीड़ा होती है, पसीने की गंध होती है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि ऐसे ही लेखकों ने ऐसा साहित्य भी लिखा जिसने दुनिया को बदलकर रख दिया। मसलन गाब्रियल गार्सिया मार्केज का उदाहरण लें। कोलंबिया नामक जिस छोटे से देश में उन्होंने लेखक बनने का सपना देखा था वहाँ लिखकर कमाने का कोई रिवाज नहीं था। कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि लेखन के बदले में धन भी मिल सकता है। यह अलग बात है कि मार्केज को अपने लेखन से बाद में बहुत आय हुई लेकिन लगभग चालीस साल की उम्र तक अपने साहित्य से उनको कुछ ख़ास आय नहीं हुई थी। बहरहाल, हिन्दी भाषा के अधिकांश लेखकों के लिए केवल लेखक के रूप में स्वतंत्र होकर लिख पाना आज भी लक्ज़री ही है! अपने गुरु से सुनी वही बात याद आ रही है- 'लेखक तो ठीक है करते क्या हो!'

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Prabhat Ranjan
Prabhat Ranjan@prabhatranjann·
काशीनाथ सिंह ने कहा है कि नामवर सिंह रोजाना सोलह सत्रह घंटे पढ़ते थे। एक बार काशीनाथ सिंह ने नामवर सिंह से पूछा कि कोई ऐसा है जो आपसे भी ज़्यादा पढ़ता हो। जवाब में नामवर सिंह ने दो नाम लिए- राहुल सांकृत्यायन और अज्ञेय। उन्होंने कहा कि ये दोनों मुझसे भी ज़्यादा पढ़ते हैं।
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
@priyaso07143042 प्रेम नाम है दुख का,पीड़ा का संत्रास का.इसमें दुख के अलावा कुछ नहीं मिलता.
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सर्व प्रिय
सर्व प्रिय@priyaso07143042·
हम प्रेम को कभी नहीं चुन सकते, प्रेम हमें चुनता है. प्रेम उसी को चुनता है जिस पर ईश्वर की असीम कृपा होती है, जिसका हृदय पवित्र होता है,जो प्रेम के हर पड़ाव को पार करने में सक्षम होता है.++
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Nitish Kumar
Nitish Kumar@NitishKumar·
मैं आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को बिहार दिवस के अवसर पर राज्य के प्रति स्नेहपूर्ण संदेश के लिए समस्त बिहारवासियों की ओर से हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रकट करता हूँ। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि आपने बिहार की समृद्ध विरासत, संस्कृति और प्रगति के प्रयासों की सराहना की है। ​हम राज्य के सर्वांगीण विकास, सामाजिक न्याय, सुशासन और आधारभूत संरचना के सुदृढ़ीकरण के लिए निरंतर प्रतिबद्ध हैं। केन्द्र सरकार का पूरा सहयोग प्राप्त हो रहा है। अब बिहार और अधिक विकसित होगा तथा देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो जाएगा और देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देगा। ​आपके मार्गदर्शन एवं सहयोग से बिहार के कर्मठ एवं प्रतिभाशाली लोग निश्चित रूप से राज्य और देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाएंगे। @narendramodi
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Sunil The Cricketer
Sunil The Cricketer@1sInto2s·
- Writter 🥶 - Director 🔥 - Philosopher 🙏
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
@rutu609 मेरे 55% थे😄
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RUTU
RUTU@rutu609·
My 10th marksheet 📄 Do you remember your percentage in 10th?
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
आपसे निवेदन है कि शिक्षा,रोजगार के लिए आप बिहार को चुने.आप जैसे उद्योगपति अगर समाज सुधार में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे तो अवश्य बदलाव आएगा. शिक्षा के लिए आप निवेश कर सकते हैं,शिक्षा के ही द्वारा बिहार अपनी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सकता है.
Anil Agarwal@AnilAgarwal_Ved

मैं कहीं भी रहूँ, मेरे अंदर एक बिहार हमेशा मेरे साथ चलता है। जो 15-20 साल मैंने बिहार में बिताए वह हमेशा से मेरे दिल में बसे हैं। लिट्टी-चोखा की सोंधी महक हो, छठ पूजा का उल्लास भरा माहौल हो, या रोज़मर्रा की कठिनाइयों से लड़ने का हुनर, बिहार हर मोड़ पर याद दिलाता है: मेहनत करो, ईमानदारी से करो और कभी हार मत मानो। आज भी बिहार के कोने-कोने से जब लोगों के संदेश आते हैं, कोई नौकरी के लिए सलाह मांगता है, कोई पढ़ाई के लिए मदद, कोई अपने ideas share करता है, तब महसूस होता है यह सिर्फ संदेश नहीं हैं, यह अपनेपन का वह रिश्ता है, जो मेरा बिहार के साथ अब तक कायम है। नालंदा की ज्ञान परंपरा से लेकर आर्यभट्ट की प्रतिभा तक, बिहार ने हमेशा भारत को दिशा दी है। और आज देश ही नहीं, दुनिया के हर कोने में बिहार के युवा अपनी पहचान बना रहे हैं। मैं बिहार के युवतियों और युवाओं से बस तीन बातें कहना चाहता हूँ: - बड़े सपने देखिए, लेकिन अपनी जड़ों को मत भूलिए। - बिहारियों ने शिक्षा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया है। इसे क़ायम रखना है। - और जहाँ भी जाएँ, गर्व से कहिए कि हम बिहारी हैं। मैं कुछ समय से एक मौका ढूंढ रहा हूँ बिहार में कोई investment करने का, पर भावनाओं के साथ साथ feasibility भी ज़रूरी है। आशा है जल्द कुछ हो पाएगा। मेरी ये भी इच्छा है जैसा हमने राजस्थान में दस हज़ार से भी अधिक नंद घर बना के लाखों बच्चों और महिलाओं को सशक्त बनाया है, ठीक वैसे ही बिहार में ऐसा कुछ करें। नंद घर वो centres हैं जहां 6 साल तक के बच्चों को पौष्टिक आहार और शिक्षा मिलती है, और महिलाओं को कौशल विकास के ज़रिए financial independence। बिहार का एक भी बच्चा भूखे पेट न सोए, और प्रतिभाशील महिलाएं financially independent हों, ये एक सपना नहीं है, बल्कि बहुत जल्द हक़ीक़त होने वाला है। मुझे पूरा विश्वास है आने वाले वर्षों में बिहार भारत की अगली बड़ी कहानी लिखेगा। आप सभी को बिहार दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। “हम बिहारी, सब पे भारी।”

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Sophia Liam
Sophia Liam@SophiaLiam25212·
If you’re a writer, an Author , or someone who loves books, feel free to say hi! 📚
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
मैने कोहबर की शर्त और आषाढ़ का एक दिन पढ़कर रोया था
Prabhat Ranjan@prabhatranjann

क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ कि कुछ पढ़ते हुए, कुछ सुनते हुए अचानक फूट फूट कर रोने लगे हों या ऐसी हँसी आई हो कि आसपास के लोगों को लगे जैसे आपने भांग खा लिया हो। मेरे साथ कई बार हुआ है। किसी कथा, उपन्यास या कविता में किसी की पीड़ा अपनी लगने लगती है, किसी की असफलता अपनी असफलता। कई बार किसी की हँसी भी अपनी लगने लगती है। लेकिन मुझे लगता है कि किसी रचना, किसी किरदार की पीड़ा हमें अधिक जोड़ती है। नब्बे के दशक में नीलाक्षी सिंह की कहानी ‘परिंदे का इंतज़ार सा कुछ’ पढ़ते हुए मैं बहुत रोया था, फूट फूट कर रोया था। या मार्केज का उपन्यास लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा जब पढ़ रहा था तो लगता था जैसे मन पर कोई भारी बोझ आ गया हो। फ़्लोरेंटिना एरिजा का दुख अपना लगने लगा था। कसप पढ़ते हुए भी लगा था जैसे यह जीवन निस्सार है। वह उपन्यास मैंने बीए थर्ड ईयर की परीक्षा के दौरान दो पेपर के गैप में पढ़ा था। उसका ऐसा असर हुआ कि पहली बार मैं परीक्षा में सर्वोच्च पायदान से नीचे खिसक गया था। कोई किताबी सहपाठी था जिसने मेरी जगह ले ली। लेकिन मुझे इस बात का कभी दुख नहीं हुआ। सुख हुआ। इस बात का सुख कि जीवन की निस्सारता को मैंने एक उपन्यास को पढ़ते हुए महसूस किया। प्रेम के अभाव में जिया जीवन। आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह अनुभव परीक्षा के अंकों से अधिक मायने रखते थे। जिन अनुभवों ने मुझे लेखन की अनजान लेकिन सम्मोहक पगडण्डी दिखाई जिसे मैंने अपनी मेहनत से रास्ता बनाया। आप अपने अनुभव बतायें!

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Ashwini Upadhyay
Ashwini Upadhyay@AshwiniUpadhyay·
प्रिय साथियों, प्रत्येक माह कम से कम एक बार परिवार और मित्रों के साथ बीआर चोपड़ा द्वारा बनाए गए महाभारत का एपिसोड 72-73 अवश्य देखिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए नई दिशा मिलेगी
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Ravindra
Ravindra@RAVINDRAOJHA73·
@24Shambhavi Like nahi bhi karta tab bhi madam hi bolta hai
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