Ravindra
8.4K posts




“इस क़िताब को ज़रूर खोजकर पढ़ना चाहिए।”


कभी कभी मुझे लगता है हम सबकी जिंदगी में एक ही चीज़ common है हम बाहर जितने normal दिखते हैं अंदर उतने ही उलझे हुए होते हैं हर किसी के दिमाग में रात को सोने से पहले कुछ बातें ज़रूर घूमती हैं जो वो किसी को बता नहीं पाता दिन में हम सब अपने अपने काम में लगे रहते हैं जैसे सब ठीक चल रहा है लेकिन रात को जब फोन साइड में रख देते हैं और कमरे में शांति होती है तब अचानक दिमाग सौ बातें एक साथ याद दिलाने लगता है पुरानी गलती, अधूरे काम, कुछ लोग कुछ फैसले जो शायद अलग लेने चाहिए थे और फिर हम सोचते सोचते सो जाते हैं शायद यही वो moment है जहाँ हर इंसान एक जैसा हो जाता है क्योंकि रात की खामोशी में हर कोई थोड़ा सा खुद से लड़ रहा होता है।

अक्सर हम उन लोगों के प्रेम में पड़ते हैं जिनमें हमारे जितनी गहराई होती है। लेकिन कभी कभी हम कुछ बेवकूफ से लड़कों के गहरे इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाते हैं। जिन्हें शायरी सुनाओ तो फिर उसका मतलब समझाना पड़ता है। क्या कहें किसी से कि, ‘यूँ उठे आह उस गली से हम, जैसे कोई जहाँ से उठता है…तुम्हारी गली देखनी थी, तुम्हारा घर, तुम्हारे घर के पर्दे…उसे कैसे समझायें कि मुझे तुम्हारे घर की खामोशी से मिलना था। तुम्हारी खिड़की से आसमान को देखना था। इस जरा सी मुहब्बत का ठिकाना दुनिया में कहीं नहीं होता। कि बेवकूफ लड़के, जब हम कहते हैं कि, ‘इश्क़ एक मीर भारी पत्थर है, कब ये तुझ नातवाँ से उठता है’, (मीर तकी मीर) तो इसका मतलब यह नहीं है कि बॉडी-बिल्डिंग शुरू कर दो। इसका मतलब हम तुम्हारे हक़ में दुआयें पढ़ रहे हैं कि इश्क़ का भारी पत्थर उठाने के लिए तुम्हारा दिल मज़बूत हो सके…फिर हमारे जैसी तो दुआ क्या ही कोई माँगता होगा, कि तुम्हें इश्क़ हो...भले हमसे न हो, किसी से हो...लेकिन तुम्हारा दिल जरा ना नाज़ुक रहे। आँख थोड़ी सी नम। ~ सुबह सवेरे 😌😜

किसी ने लिखा है कि 'हिंदी का लेखक हफ़्ते में पांच और छह दिन रोज़ी रोटी के जुगाड़ में लगा रहता है और सातवें दिन लेखन की सोचता है।' इससे मुझे एक बड़े लेखक की बात याद आ गई। उन्होंने लिखा था कि तीसरी दुनिया का अधिकतर साहित्य 'बोरडम का साहित्य' है। अर्थात् हिन्दी जैसी भाषाओं में अधिकतर लेखक वैसे होते हैं जो आजीविका के लिए दिन में कोई काम करते हैं और वे उस समय लिख रहे होते हैं जब वे बहुत थके हुए होते हैं, जो उनके सोने का समय होता है उससे समय निकालकर वे लेखन करते हैं। केवल लेखन की बदौलत अपनी ज़िंदगी अच्छे से बसर कर पाने की लक्ज़री उनके पास नहीं होती। उस लेखन में उनकी नींद का बोझ होता है, थकान की पीड़ा होती है, पसीने की गंध होती है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि ऐसे ही लेखकों ने ऐसा साहित्य भी लिखा जिसने दुनिया को बदलकर रख दिया। मसलन गाब्रियल गार्सिया मार्केज का उदाहरण लें। कोलंबिया नामक जिस छोटे से देश में उन्होंने लेखक बनने का सपना देखा था वहाँ लिखकर कमाने का कोई रिवाज नहीं था। कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि लेखन के बदले में धन भी मिल सकता है। यह अलग बात है कि मार्केज को अपने लेखन से बाद में बहुत आय हुई लेकिन लगभग चालीस साल की उम्र तक अपने साहित्य से उनको कुछ ख़ास आय नहीं हुई थी। बहरहाल, हिन्दी भाषा के अधिकांश लेखकों के लिए केवल लेखक के रूप में स्वतंत्र होकर लिख पाना आज भी लक्ज़री ही है! अपने गुरु से सुनी वही बात याद आ रही है- 'लेखक तो ठीक है करते क्या हो!'







मैं कहीं भी रहूँ, मेरे अंदर एक बिहार हमेशा मेरे साथ चलता है। जो 15-20 साल मैंने बिहार में बिताए वह हमेशा से मेरे दिल में बसे हैं। लिट्टी-चोखा की सोंधी महक हो, छठ पूजा का उल्लास भरा माहौल हो, या रोज़मर्रा की कठिनाइयों से लड़ने का हुनर, बिहार हर मोड़ पर याद दिलाता है: मेहनत करो, ईमानदारी से करो और कभी हार मत मानो। आज भी बिहार के कोने-कोने से जब लोगों के संदेश आते हैं, कोई नौकरी के लिए सलाह मांगता है, कोई पढ़ाई के लिए मदद, कोई अपने ideas share करता है, तब महसूस होता है यह सिर्फ संदेश नहीं हैं, यह अपनेपन का वह रिश्ता है, जो मेरा बिहार के साथ अब तक कायम है। नालंदा की ज्ञान परंपरा से लेकर आर्यभट्ट की प्रतिभा तक, बिहार ने हमेशा भारत को दिशा दी है। और आज देश ही नहीं, दुनिया के हर कोने में बिहार के युवा अपनी पहचान बना रहे हैं। मैं बिहार के युवतियों और युवाओं से बस तीन बातें कहना चाहता हूँ: - बड़े सपने देखिए, लेकिन अपनी जड़ों को मत भूलिए। - बिहारियों ने शिक्षा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया है। इसे क़ायम रखना है। - और जहाँ भी जाएँ, गर्व से कहिए कि हम बिहारी हैं। मैं कुछ समय से एक मौका ढूंढ रहा हूँ बिहार में कोई investment करने का, पर भावनाओं के साथ साथ feasibility भी ज़रूरी है। आशा है जल्द कुछ हो पाएगा। मेरी ये भी इच्छा है जैसा हमने राजस्थान में दस हज़ार से भी अधिक नंद घर बना के लाखों बच्चों और महिलाओं को सशक्त बनाया है, ठीक वैसे ही बिहार में ऐसा कुछ करें। नंद घर वो centres हैं जहां 6 साल तक के बच्चों को पौष्टिक आहार और शिक्षा मिलती है, और महिलाओं को कौशल विकास के ज़रिए financial independence। बिहार का एक भी बच्चा भूखे पेट न सोए, और प्रतिभाशील महिलाएं financially independent हों, ये एक सपना नहीं है, बल्कि बहुत जल्द हक़ीक़त होने वाला है। मुझे पूरा विश्वास है आने वाले वर्षों में बिहार भारत की अगली बड़ी कहानी लिखेगा। आप सभी को बिहार दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। “हम बिहारी, सब पे भारी।”















