MahaRana ( Kavita)

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@Ra8657

self Realization and Visualization Awakening of Kundalini through Shaktipat Initiation by Gurudev Siyag SIDDHA YOGA For Spiritual Enlightenment .

Amsterdam, The Netherlands Katılım Şubat 2022
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MahaRana ( Kavita)@Ra8657·
मंत्र जप बहुत शीघ्र फलित होता है। संत तुकाराम जी ने कहा है कि तुम्हारी जीभ पर भगवान का नाम हो, तो मुक्ति का आनंद तुम्हारे हाथ में है। परन्तु मंत्र समर्थ सदगुरू देव के श्री मुख से प्रदत्त होना चाहिए। तभी फलदायी होगा। हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने कहा है कि गुरु की आवाज़ में अलोकिक दिव्य शक्ति होती हैं। यह मंत्र हमे हमारी उलझनों से, हमारी परिकल्पनाओ से और निरंतर बदलते हमारे मन से, परे ले जाता है। जैसे जैसे मंत्र जपते हैं वह हमारे रोम रोम में व्यापत हो जाता है। मन दिव्य बन जाता है। भगवान का नाम जो अनगिनत सच्चे गुरुओ के जप से सिद्ध होता है वह संजीवनी मंत्र कहलाता है। ऐसे मंत्र के जप से हमारी अंतर चेतना में भूकम्प सा आ जाता है। हमारे अंदर जन्म जनमातंर कर्म संस्कार और विचारों का रिकार्ड होता है। जिसको मिटाना बहुत ही कठिन होता है जो निरंतर इस मानसिक जप से मिटने लगते हैं और उसके स्थान पर भगवान का नाम अमिट हो जाता है। यदि इस तरह प्रेम और सदभाव से मंत्र जप के कारण मानव उस मंत्र में लीन हो जाता है। मंत्र में ऐसी दिव्य क्षमता है । ऐसा कहा गया है कि मंत्र वह है जो मंत्र जप करने वाले की रक्षा करता है। मंत्र की शक्ति हमारी कल्पना से बाहर है। हम मंत्र का अर्थ समझ सकते हैं किन्तु उसमें निहित शक्ति क्या है यह नहीं जान सकते। मंत्र परमात्मा के सजीव प्राण हैं। अतः इसे आदर के साथ जपो । गुरुदेव अपने प्रवचन में कहते हैं कि इस आराधना में ईश्वर का नाम ही कुंजी है। इसे जितना जपोगे, उतना ही अधिक लाभ होगा । जय सदगुरु देव कोटि कोटि वंदन
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जैसे-जैसे *गुरुदेव* के प्रति आपकी *निष्ठा और प्रीति* बढ़ेगी, *सुमिरन-ध्यान* में आनंद आने लगेगा ; प्रीति का रस प्रगट होता जायेगा ; चित्त की चंचलता मिटेगी, मनोराज मिटते जायेंगे।‌ मन्त्र जाप से अध्यात्मिक तरंगे उत्त्पन्न होती हैं। इससे चित्त में आनंद और शांति व्याप्त हो जाती है। परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त होने लगेगी। गुरुदेव ध्यान में सपने में आकर दर्शन देंगे या और किसी माध्यम से आप को मार्गदर्शन मिलेगा। बुध्दि विवेकवती हो जायेगी, मन में अंतर्यामी परमात्मा की प्रेरणा मिलती है, तो व्यावहारिक ज्ञान में सही गलत का निर्णय करने में सूझ-बूझ आती है। नाम का, धन - पद का अहंकार गलने लगता है। मन और बुध्दि निर्मल होती है। बुध्दि में शुद्ध प्रकाश और प्रेरणा प्राप्त होगी कि क्या करना है, कब और कैसे करना है? गुरु मन्त्र का जप करने से नीरसता दूर होगी और आस्था बढ़ेगी। बुध्दि शुद्ध हो जायेगी। रोग व बीमारिया आयेंगी औऱ समूल नष्ट हो जायेंगी। रोग प्रतिकार की शक्ति बढ़ती जायेगी। आप सुख-दुःख, लाभ- हानि, यश-अपयश का भी उपयोग कर के सुख-दुःख को स्टेप बना लेते है।आपको दोनों का भोगी नहीं, योगी बनना है। ईश्वर के रास्ते उन्नत होते होते समभाव में स्थापित हो जाना है। गुरु मन्त्र के जप से सभी जन्मो के पाप नाश होंगे..ज प = ‘ज’ का मतलब जन्म मरण का नाश और ‘प’ का मतलब पाप का नाश : इसी का नाम जप है। घटाकाश में प्रकाश के प्रगट होने से व्यापक परमात्मा के एकत्व का दैवी ज्ञान प्रगट होता है …दिव्य प्रेरणा प्रगट होने लगती है। आत्मा ब्रह्म है , जैसे घड़े का आकाश महा आकाश से जुड़ा है ,एक ही है ,भिन्न नहीं है …ऐसे ही आप का आत्मा उस परमात्मा से जुड़ा हुआ है,यह ज्ञान होगा..आत्मा ब्रह्म है। कलियुग मे हरि का नाम ही फल प्रदान करनेवाला है..मन्त्र जाप से भय – निर्भयता में , घृणा – प्रेम में और काम राम में बदलने लगता है..जैसे दुर्भाव से द्वेष , घृणा और अशांति पैदा होती है , वैसे ही मन्त्र से आनंद, माधुर्य , उत्साह और शांति प्रगट होती है.. तो शोक नाश होता है..धारणा शक्ति बढती है, क्षमा शक्ति बढती है, शौर्य शक्ति बढती है….मन्त्र जप से वीर्य और तेज बढ़ता है।‌मन्त्र जाप से इतनी शक्तियां विकसित होती है‌ किआगे घटित होने वाली घटनाओं की आहट पहले ही पता चल जाती है.। आपके पास आनेवाले लोगो को भी शांति का अनुभव होगा।
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श्री अरबिंदो ने राष्ट्र के लिए अपने पांच स्वप्नों की बात की - एक अखंड भारत, एशिया का पुनरुत्थान, विश्व का एकीकरण, विश्व को भारत का आध्यात्मिक उपहार, तथा मानव चेतना के उत्थान के माध्यम से विकास । अरविंद ने योग का क्या अर्थ बताया है? श्री अरविन्द के अनुसार योग का उद्देश्य आत्मा का उत्थान करना नहीं वरन् जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिव्यता का संचार करना है, ताकि व्यक्ति अपने आंतरिक और बाह्य संसार में संतुलन और शांति का अनुभव कर सके । वर्तमान समय में जब मानसिक तनाव और आंतरिक अशांति एक गंभीर समस्या बन गई है, उनका योग बहुत ही प्रासंगिक है। ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः तो वो सत्ता descend कर गई, इस physics में आ गई, तो यह क्रियात्मक योग है, आप में परिवर्तन आ गया। महर्षि अरविन्द ने कहा है आगामी मानव जाति दिव्य शरीर धारण करेगी, मनुष्य की व्याख्या करते हुए अरविन्द कहते हैं, "Man is a transitional being, #kundaliniawakening @grok सिद्ध मंत्र ही जपों कलयुग केवल नाम अधारा सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा...! यह राधा और कृष्ण का बीज मंत्र हैं राधा पृथ्वी तत्व और कृष्ण आकाश तत्व हैं। दोनों सिद्धियां मुझे हो गई, सगुण और निर्गुण की, इसके कारण मेरी तस्वीर से योग हो रहा है, पश्चिम बहुत हैरान है तो वो सत्ता descend कर गई, इस physics में आ गई, तो यह क्रियात्मक योग है, आप में परिवर्तन आयेगा महर्षि अरविन्द ने कहा है आगामी मानव जाति दिव्य शरीर धारण करेगी मैं तो मरुंगा, मरोगे तुम भी मगर मेरी तस्वीर मरेगी नहीं कभी। दो सिद्धियां मुझे हो गई, सगुण और निर्गुण की, इसके कारण से मेरे में जो परिवर्तन आ गया, उससे मेरी तस्वीर से योग हो रहा है, पश्चिम बहुत हैरान है मैं तो मरुंगा, मरोगे तुम भी मगर मेरी तस्वीर मरेगी नहीं कभी। तो ये एक कश्मीरी शैव सिद्धांत है, मैं उसको मूर्त रुप दे रहा हूं, एक मात्र गुरु ही है जो शिष्य को उसके पूर्व जन्मों के कर्म बन्धनों को काटकर उसे, जीवन के सही उद्देश्य, आत्मसाक्षात्कार द्वारा बीमारियों तथा दुःखों से छुटकारा दिलाने में उसकी सहायता कर सकता है। ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः गुरु सियाग सिद्धयोग संजीवनी मंत्र से कुंडलिनी जागरण निःशुल्क दिव्य संजीवनी मंत्र के लियेः "क्लीं कृष्ण क्लीं" “Kling Krishna Kling” राधा के बिना कृष्ण आधा कोई भी मंत्र बिना शक्ति के काम नहीं करता,,, जयश्रीगुरुदेव
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श्री अरविंद और अतिमानस चेतना का अद्भुत अनुभव श्री अरविंद ने अपनी साधना से अतिमानस (Supramental) चेतना की खोज की और उसे धरती पर लाने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने एक ऐसे नए योग की शुरुआत की जिसका लक्ष्य सिर्फ़ मोक्ष पाना नहीं, बल्कि मानव चेतना और प्रकृति को पूरी तरह से बदलना था। 1. अतिमानस चेतना की खोज और एक नया योग * अतिमानस दुनिया स्थायी है: श्री अरविंद ने यह खोजा कि अतिमानस दुनिया हमेशा से मौजूद है। यह एक ऐसी दुनिया है जो हमारे भौतिक संसार से ऊपर है। इसका पदार्थ चमकीले नारंगी (सोने और लाल का मिश्रण) रंग का है, जहाँ सब कुछ आनंद और शांति से भरा है। * मध्यवर्ती क्षेत्र का निर्माण: श्री अरविंद ने बताया कि भौतिक और अतिमानस दुनिया को जोड़ने के लिए एक मध्यवर्ती क्षेत्र की ज़रूरत है, और यह क्षेत्र अभी भी बन रहा है। इसी क्षेत्र के निर्माण के लिए अतिमानस शक्ति लगातार हमारी दुनिया में प्रवेश कर रही है। * पुराने योग से अलग: श्री अरविंद का योग पुराने योगों से अलग है क्योंकि इसका उद्देश्य चेतना और प्रकृति का समग्र परिवर्तन है। यह एक आध्यात्मिक साहसिक यात्रा है, जिसके लिए उन्होंने 30 साल की साधना से नया रास्ता बनाया। * समर्पण की शक्ति: अतिमानस चेतना को प्राप्त करने के लिए समग्र समर्पण ज़रूरी है। जब साधक अपना पूरा मन, प्राण, और शरीर समर्पित कर देता है, तभी दिव्य कृपा मिलती है और बदलाव संभव होता है। 2. श्री अरविंद का दर्शन और कर्म का नियम * कर्म का असली मतलब: श्री अरविंद ने समझाया कि कर्म का नियम सज़ा देने के लिए नहीं, बल्कि हमें दिव्य अवस्था की ओर विकसित करने के लिए है। यह हमें अज्ञानता से सीखने का अवसर देता है। * भगवत्कृपा से बदलाव: अगर हम सच्चे दिल से समर्पण करें, तो भगवत्कृपा हमारे कर्म को बदल सकती है और उसका असर ख़त्म कर सकती है। * नए मूल्यांकन का दृष्टिकोण: अतिमानस दृष्टिकोण में चीज़ों का मूल्यांकन उनके अच्छे या बुरे होने से नहीं, बल्कि उनकी अतिमानस चेतना को व्यक्त करने की क्षमता से होता है। 3. गुरुदेव सियाग का योगदान: श्री अरविंद के सपने को हक़ीक़त बनाना * शक्तिपात दीक्षा: श्री अरविंद ने जिस अतिमानस चेतना का बीज बोया था, उसे आम लोगों तक पहुँचाने का काम गुरुदेव रामलाल सियाग ने किया। उनकी शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से साधक सीधे अतिमानस शक्ति का अनुभव कर सकते हैं। * कुंडलिनी जागरण: गुरु सियाग की तस्वीर और मंत्र से साधकों में कुंडलिनी जागरण शुरू होता है, जिससे वे चेतन समाधि और अतिमानस चेतना का अनुभव करते हैं। यह श्री अरविंद के योग को प्रैक्टिकल बनाता है। * कल्कि अवतार के रूप में: गुरु सियाग ने खुद को कल्कि अवतार कहा, जिनका मिशन श्री अरविंद के मिशन को पूरा करते हुए अतिमानस चेतना को धरती पर स्थापित करना है ताकि एक नया, सत्य पर आधारित युग शुरू हो सके। * अब कोई अवतार नहीं: गुरु सियाग ने कहा कि उनके बाद कोई और अवतार नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि अतिमानस चेतना के अवतरण से हर इंसान खुद इतना विकसित हो जाएगा कि उसे किसी अवतार की ज़रूरत नहीं रहेगी।
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महर्षि अरविन्द अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को `अति मानस' (supermind) तथा स्वयं को `अति मानव' (Superman) में परिवर्तित कर सकता है। शिक्षा द्वारा यह संभव है। आज की परिस्थितियों में जब हम अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं परम्परा को भूल कर भौतिकवादी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं, अरविन्द का शिक्षा दर्शन हमें सही दिशा का निर्देश करता हैं। आज धार्मिक एवं अध्यात्मिक जागृति की नितान्त आवश्यकता है। वी आर तनेजा के शब्दों में- "अरविन्द का शिक्षा-दर्शन लक्ष्य की दृष्टि से आदर्शवादी, उपागम की दृष्टि से यथार्थवादी, क्रिया की दृष्टि से प्रयोजनवादी तथा महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से मानवतावादी है। हमें इस दृष्टिकोण को शिक्षा में अपनाना चाहिए।" शैक्षिक प्रयोग योग एवं दर्शन की अभिरुचि अरविन्द का शैक्षिक दर्शन अरविन्द के दर्शन का लक्ष्य "उदात्त सत्य का ज्ञान" (Realization of the sublime Truth) है जो "समग्र जीवन-दृष्टि" (Integral view of life) द्वारा प्राप्त होता है। समग्र जीवन-दृष्टि मानव के ब्रह्म में लीन या एकाकार होने पर विकसित होती है। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण द्वारा मानव ` विशेष (special) बन जाता है अर्थात् वह सत, रज व तम की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर ज्ञानी बन जाता है। अतिमानव की स्थिति में व्यक्ति सभी प्राणियों को अपना ही रूप समझता है। जब व्यक्ति शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक दृष्टि से एकाकार हो जाता है तो उसमें दैवी शक्ति (Devine Power) का प्रादुर्भाव होता है। समग्र जीवन-दृष्टि हेतु अरविन्द ने योगाभ्यास पर अधिक बल दिया है। योग द्वारा मानसिक शांति एवं संतोष प्राप्त होता है। अरविन्द की दृष्टि में योग का अर्थ जीवन को त्यागना नहीं है बल्कि दैवी शक्ति पर विश्वास रखते हुए जीवन की समस्याओं एवं चुनौतियों का साहस से सामना करना है। अरविन्द की दृष्टि में योग कठिन आसन व प्राणायाम का अभ्यास करना भी नहीं है बल्कि ईश्वर के प्रति निष्काम भाव से आत्म समर्पण करना तथा मानसिक शिक्षा द्वारा स्वयं को दैवी स्वरूप में परिणित करना है। अरविन्द ने मस्तिष्क की धारणा स्पष्ट करते हुए कहा है कि मस्तिष्क के विचार-स्तर चित्त, मनस, बुद्धि तथा अर्न्तज्ञान होते हैं जिनका क्रमश: विकास होता है। अर्न्तज्ञान में व्यक्ति को अज्ञान से संदेश प्राप्त होते हैं जो ब्रह्म ज्ञान के आरम्भ की परिचायक है। अरविन्द ने अर्न्तज्ञान को विशेष महत्त्व दिया है। अर्न्तज्ञान द्वारा ही मानवता प्रगति की वर्तमान दशा को पहुँची है। अत: अरविन्द का आग्रह है कि शिक्षक को अपने शिष्य की प्रतिभा का नैत्यिक-कार्य (routine work) द्वारा दमन नहीं करना चाहिए। वर्तमान शिक्षा पद्धति से अरविन्द का असंतोष इसी कारण था कि उनमें विद्यार्थियों की प्रतिभा के विकास का अवसर नहीं दिया जाता। शिक्षक को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विद्यार्थियों की प्रतिभा के विकास हेतु उनके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अरविन्द की मस्तिष्क की धारणा की परिणति `अतिमानस' (supermind) की कल्पना व उसके अस्तित्व में है। अतिमानस चेतना का उच्च स्तर है तथा दैवी आत्म शक्ति का रूप है। अतिमानस की स्थिति तक शनै: शनै: पहुँचना ही शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए। अरविन्द के अनुसार भारतीय प्रतिभा की तीन विशेषताएँ हैं- आत्मज्ञान, सर्जनात्मकता तथा बुद्धिमत्ता (spirituality, creativity and intellectuality)। अरविन्द ने देशवासियों में इन्हीं प्राचीन आध्यात्मिक शक्तियों के विकास करने का संदेश देकर भारतीय पुनर्जागरण करना चाहा है। अरविन्द के शब्दों में- " भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान जैसी उत्कृष्ट उपलब्धि बगैर उच्च कोटि के अनुशासन के अभाव में संभव नहीं हो सकती जिसमें कि आत्मा व मस्तिष्क की पूर्ण शिक्षा निहित है।" इस प्रकार अरविन्द के दर्शन की चरम परिणति उनके शैक्षिक दर्शन में होती है। यह अपितु गागर में सागर भरने जैसा है |
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Vikas Sharma
Vikas Sharma@AvskVikas·
ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः इस सम्बन्ध में नानक देव जी ने कहा है, " भांग धतूरा नानका उतर जाए परभात।" दिन भर पियो खूब भांग धतूरा, रात को सौओ सुबह साफ। "भांग धतूरा नानका उतर जाए परभात। नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।।“ यही बात कबीर दास जी कहते हैं, " नाम अमल उतरे न भाई। और अमल छिन छिन चढ़ी उतरे नाम अमल दिन बढ़े सवाया।" तो इस प्रकार मैं जो नाम बताऊंगा, उसको जपोगे तो आप को एक आनंद आने लगेगा, डॉक्टरों की भाषा में intoxication without drug, हैरान हैं बेचारे । कल्कि अवतार सद्गुरु श्री रामलाल जी सियाग द कॉमफॉर्टर अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र, होटल लेरिया के पास, चौपासनी जोधपुर, राजस्थान (342001), भारत फोन +91- 291- 2753699 +91- 9784742595 the-comforter.org #patanjali #sanjeevanimantra #yoga #gurusiyag #radhakrishna
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Vikas Sharma
Vikas Sharma@AvskVikas·
ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः इस सम्बन्ध में नानक देव जी ने कहा है, " भांग धतूरा नानका उतर जाए परभात।" दिन भर पियो खूब भांग धतूरा, रात को सौओ सुबह साफ। "भांग धतूरा नानका उतर जाए परभात। नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।।“ यही बात कबीर दास जी कहते हैं, " नाम अमल उतरे न भाई। और अमल छिन छिन चढ़ी उतरे नाम अमल दिन बढ़े सवाया।" तो इस प्रकार मैं जो नाम बताऊंगा, उसको जपोगे तो आप को एक आनंद आने लगेगा, डॉक्टरों की भाषा में intoxication without drug, हैरान हैं बेचारे । कल्कि अवतार सद्गुरु श्री रामलाल जी सियाग द कॉमफॉर्टर अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र, होटल लेरिया के पास, चौपासनी जोधपुर, राजस्थान (342001), भारत फोन +91- 291- 2753699 +91- 9784742595 the-comforter.org #patanjali #sanjeevanimantra #yoga #gurusiyag #radhakrishna
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प्रायः हमारे गुरुदेव कहा करते थे "यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे" अर्थार्थ हमें समझाता है कि जो-जो इस ब्रह्माण्ड में है वही सब हमारे शरीर में भी है। त्रिवेणी संगम का अर्थ क्या होता है? 'त्रिवेणी संगम' शब्द संस्कृत से आया है, जहाँ 'त्रि' का अर्थ है तीन, 'वेणी' का अर्थ है संगम, और 'संगम' का अर्थ है मिलन, जो इन तीन नदियों के मिलन बिंदु का प्रतीक है। यह स्थान अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है और हिंदू तीर्थयात्राओं के लिए एक प्रमुख स्थल है। आज्ञा चक्र पर ध्यान करना जरूरी क्यों? आज्ञा चक्र हमारे मस्तक पर दोनों भृकुटियों के मध्य में स्थित है। यह हमारी प्राणिक प्रणाली का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह चक्र बुद्धि और स्पष्टता का केंद्र है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत और विशुद्ध चक्र के बाद आज्ञा चक्र छठा चक्र है। आज्ञा चक्र दो पंखुड़ियों वाला कमल पुष्प है जो दर्शाता है कि इस स्तर पर आध्यात्मिक विकास होने पर साधक के लिए केवल दो "आत्मा" और "परमात्मा" ही रह जाते हैं। ऐसा साधक बौद्धिक रुप से संपन्न, तीक्ष्ण बुद्धि और संवेदनशील होते हुए शांत और मौन रहता है और इसलिए उसको बौद्धिक सिद्ध कहा जाता है। संसार की विविध परिस्थितियों से साधक विचलित नहीं होता। आज्ञा चक्र के जागृत होने पर नाड़ी तंत्र पूर्णरूप से जाग्रत, स्वस्थ एवं सशक्त हो जाता है और साधक को सर्वोच्च चेतना और समाधि का अनुभव होता है। हमारे नाड़ी तंत्र की 3 प्रमुख नाड़ियां- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना, मूलाधार से अलग-अलग ऊर्ध्व में प्रवाहित होकर इस स्थान पर संगम को प्राप्त करती हैं। इन विशिष्ट नाड़ियों के विषय में योग ग्रंथों में कहा गया है:- "इड़ा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी। तर्योमध्यगत नाड़ी सुषुम्नाख्या सरस्वती।।" अर्थ:- इड़ा नाड़ी गंगा, पिंगला यमुना और सुषुम्ना सरस्वती नदी के समान है और इनके संगम स्थान को "त्रिवेणी" कहते हैं। जो साधक इस त्रिवेणी में स्नान कर लेता है, मतलब आज्ञा चक्र में अवस्थित हो जाता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस अवस्था में मन और बुद्धि का मिलन हो जाता है। योगाभ्यास और गुरू कृपा से सुषुम्ना मार्ग से होती हुई कुण्डलिनी शक्ति जब साधक के आज्ञा चक्र में प्रवेश करती है तब उसको अंतरज्योति प्रत्यक्ष होती है और अंतरनाद सुनने लगता है। इस स्तिथि को पाने के बाद साधक को ब्रह्माण्ड में प्रवेश की योग्यता या प्रभु की आज्ञा प्राप्त होती है और इसलिए उसे आज्ञा चक्र कहा गया है। तत्पश्चात नित्य साधना से जब साधक की कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार चक्र में विलीन हो जाती है तब साधक परमात्म ज्ञान को पा कर मोक्ष प्राप्त करता है। ** आज्ञाचक्र पर ध्यान करने के विशेष लाभ:- आज्ञा चक्र के जाग्रत होने से साधक के भीतर की अनंत सुप्त शक्तियां और सिद्धियां जाग्रत हो जाती हैं। साधक के भीतर विशेष चुंबकीय ऊर्जा का निर्माण होता है जिसके प्रभाव से उसके सभी कर्म या संस्कार नष्ट होते हैं। साधक को अपार एकाग्रता प्राप्त होती है। विचारों में दृढ़ता और दृष्टि में चमक आ जाती है। साधक का ज्ञान नेत्र या दिव्य दृष्टि जागृत होती है जिससे उसको दूर दृष्टि(पूर्ण ज्ञान) के साथ त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान और भविष्य काल का ज्ञान) भी प्राप्त होती है।
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गुरु बिना साधना अधूरी है साधना केवल तकनीक नहीं — ऊर्जा का स्थानांतरण है जब गुरु दीक्षा देता है, वह केवल मंत्र नहीं देता — वह अपनी आत्मिक ऊर्जा भी शिष्य में डालता है। यही कारण है कि गुरु की दी हुई साधना अक्सर 10 गुना तेजी से फल देती है। ज़ब आप गुरु को ही ब्रह्म समझते हैं — तो आपकी चेतना भी उसी ब्रह्म-तरंग से जुड़ जाती है। गुरु और शिष्य के बीच की यह तरंग ही साधना का इंजन है।” और जब आप साधना करते हो तो कोई भी शक्ति आप पर हावी होने से पहले आपके गुरु से टकराती है जब आप साधना करते हो तो आपके घर पर या अन्य जगह पर तो कोई आशुरी शक्ति आपके कार्य में विध्न डालती है जैसे आपका बीमार होना या फिर ऐसा कोई कार्य आना जिस वजह से आप पूजा नहीं कर पाओ या घर में लड़ाई होना मन का उच्चाटन होना इस लिए बिना गुरु के कोई कार्य ना करे “जो गुरु से , जिज्ञासा न्हीं रखता वह अज्ञानी रह जाता है। जो गुरु पर प्रश्न करता है, वह मार्ग से गिर जाता है। जो गुरु के वचनों को आत्मा में बसाता है, वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है।” जय श्री गुरुदेव 🙏
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यह तन एक माटी का कुंभ आज नही तो कल गलना केवल ईश्वर का नाम जपो यदि दुबारा इसे नही बनना भावार्थ :- गुरुदेव श्री कई बार अपने प्रवचनो मे कहते थे कि "यह जो शरीर रूपी घड़ा लिए बैठे हो यह आज नही तो कल इसको गलना ही गलना है हाँ दूबारा इसे नही बनाना नही चाहते तो केवल नाम जपो" । यह शरीर माटी पंच तत्व से बना है एक दिन इसे इसीमे मिलना है समय रहते मनुष्य जीवन सार्थक करलो ईश्वर का नाम जपकर ताकि जन्म मरण से जीवात्मा को देह बन्धन से मुक्ति मिले । जय गुरूदेव
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मंत्र जप बहुत शीघ्र फलित होता है। संत तुकाराम जी ने कहा है कि तुम्हारी जीभ पर भगवान का नाम हो, तो मुक्ति का आनंद तुम्हारे हाथ में है। परन्तु मंत्र समर्थ सदगुरू देव के श्री मुख से प्रदत्त होना चाहिए। तभी फलदायी होगा। हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने कहा है कि गुरु की आवाज़ में अलोकिक दिव्य शक्ति होती हैं। यह मंत्र हमे हमारी उलझनों से, हमारी परिकल्पनाओ से और निरंतर बदलते हमारे मन से, परे ले जाता है। जैसे जैसे मंत्र जपते हैं वह हमारे रोम रोम में व्यापत हो जाता है। मन दिव्य बन जाता है। भगवान का नाम जो अनगिनत सच्चे गुरुओ के जप से सिद्ध होता है वह संजीवनी मंत्र कहलाता है। ऐसे मंत्र के जप से हमारी अंतर चेतना में भूकम्प सा आ जाता है। हमारे अंदर जन्म जनमातंर कर्म संस्कार और विचारों का रिकार्ड होता है। जिसको मिटाना बहुत ही कठिन होता है जो निरंतर इस मानसिक जप से मिटने लगते हैं और उसके स्थान पर भगवान का नाम अमिट हो जाता है। यदि इस तरह प्रेम और सदभाव से मंत्र जप के कारण मानव उस मंत्र में लीन हो जाता है। मंत्र में ऐसी दिव्य क्षमता है । ऐसा कहा गया है कि मंत्र वह है जो मंत्र जप करने वाले की रक्षा करता है। मंत्र की शक्ति हमारी कल्पना से बाहर है। हम मंत्र का अर्थ समझ सकते हैं किन्तु उसमें निहित शक्ति क्या है यह नहीं जान सकते। मंत्र परमात्मा के सजीव प्राण हैं। अतः इसे आदर के साथ जपो । गुरुदेव अपने प्रवचन में कहते हैं कि इस आराधना में ईश्वर का नाम ही कुंजी है। इसे जितना जपोगे, उतना ही अधिक लाभ होगा । जय सदगुरु देव कोटि कोटि वंदन

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Part 27 Gurudevg siyag sidha yog मनुष्य योनि ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। सभी का मत है कि मानव का सृजन उसके सृजनहार की प्रतिमूर्ति के रूप में हुआ है। अतः मनुष्य अपना क्रमिक विकास करते हुए अपने सुजनहार के 'तदूप' बन सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने मनुष्य की व्याख्या करते हुए गीता के १३ वें अध्याय के २३ वें श्लोक में स्पष्ट शब्दों में कहा है- उपद्रष्ट्वऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ।। १३:२३ (पुरुष इस देह में स्थित हुआ भी पर (त्रिगुणातीत) है। (केवल) साक्षी होने से उपद्रष्छ और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीव रूप से भोक्ता तथा ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से 'परमात्मा' ऐसा कहा गया है।) इस इन्द्रियातीत आनन्द को संतों ने 'हरि नाम की खुमारी' की संज्ञा दी है। संत सद्‌गुरु श्री नानकदेव जी ने कहा है- भांग धतुरा नानका, उतर जाय प्रभात। 'नामखुमारी' नानका चढ़ी रहे दिन रात।। संत कबीर दास जी ने कहा है- नाम-अमल उतरै न भाई। और अमल छिन्न-छिन्न चढ़ि उतरै। नाम-अमल दिन बढ़े सवायो ।। बाइबिल भी स्पष्ट कहती है- "यह एक आन्तरिक आनन्द है, जो सभी सच्चे विश्वासियों के हृदय में आता है। यह आनन्द हृदय में बना रहता है, सांसारिक आनन्द के समान आता- जाता नहीं है। प्रभु का आनन्द पूर्ण है। वह हमारे हृदय के कटोरों को तब तक भरता है, जब तक उमड़ न जाय। प्रभु का आनन्द जो हमारे हृदयों में बहता है, हमारे हृदयों से उमड़ कर दूसरों तक बह सकता है।" यह आनन्द ही शान्ति स्थापित करेगा। अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र, जोधपुर Radhe Radhe ❤️🙏🏻
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ISHWAR SE KAISE PAYEN - अनुभव और ईश्वर का सत्य: शब्दों से परे आप सभी ने ईश्वर के वचनों को इतनी अहमियत दी है, और अनुभव को इतनी कम, कि जब ईश्वर का अनुभव आपके सुने हुए वचनों से भिन्न होता है, तो आप अनुभव को तुरंत नकार देते हैं और शब्दों को अपनाते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि आपको अनुभव पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यही वह माध्यम है जिससे आप ईश्वर को वास्तव में समझ सकते हैं। हमारी भावनाएं और अनुभव वे चीजें हैं जो हमें सही मायने में एक वस्तु या व्यक्ति के बारे में जानकारी देती हैं। जबकि शब्द केवल उस ज्ञान को प्रतीक रूप में प्रस्तुत करते हैं, और कभी-कभी भ्रम भी पैदा कर सकते हैं। यही कारण है कि ईश्वर हमारे साथ संवाद करने के लिए केवल शब्दों का उपयोग नहीं करते, बल्कि वे हमें भावनाओं और अनुभवों के माध्यम से भी संदेश देते हैं। अनुभव की शक्ति ईश्वर का सबसे सशक्त संदेशवाहक अनुभव है, परंतु इसे ही हम सबसे ज्यादा नज़रअंदाज़ करते हैं। अगर हम अपने अनुभवों को ध्यान से सुनते, तो हमारी दुनिया आज जिस स्थिति में है, वैसी न होती। जब हम अपने अनुभवों को नकारते हैं, तो हम उन्हें बार-बार दोहराते हैं, क्योंकि ईश्वर का उद्देश्य कभी नकारा नहीं जा सकता। ईश्वर हमें वही संदेश बार-बार भेजते रहेंगे, चाहे हम जिस भी समय में या ब्रह्मांड के जिस भी कोने में हों। यह संदेश विभिन्न रूपों में, समय-समय पर, लाखों वर्षों में आते रहेंगे। इन संदेशों को सुनने की क्षमता हममें तभी उत्पन्न होगी जब हम सच्चे मन से सुनना चाहेंगे। अनुभव और कल्पना में अंतर जब आप यह सोचते हैं कि ईश्वर का संदेश आपके भीतर की केवल कल्पना हो सकता है, तो यह समझना ज़रूरी है कि ईश्वर किसी भी माध्यम का उपयोग कर सकते हैं, चाहे वह आपकी कल्पना ही क्यों न हो। ईश्वर आपको वही सही विचार, शब्द और भावनाएं देंगे, जो उस समय के लिए उपयुक्त हों। ईश्वर के संदेश हमेशा आपके उच्चतम विचार, सबसे स्पष्ट शब्द, और सबसे महान भावना के रूप में आते हैं। जहां आनंद, सत्य और प्रेम हो, वहीं ईश्वर का संदेश होता है। ईश्वर के साथ दो-तरफा संवाद हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि ईश्वर केवल विशेष लोगों से ही संवाद करते हैं। यह सोचना हमें ईश्वर के संदेश से दूर कर देता है। हमें दूसरों की व्याख्या पर भरोसा करने की आदत हो जाती है, जबकि ईश्वर का संदेश व्यक्तिगत होता है। ईश्वर के साथ एक नई प्रकार की संचार की प्रक्रिया को अपनाने का निमंत्रण दिया जा रहा है। यह संवाद दो-तरफा हो सकता है, जहां हम ईश्वर से बात करते हैं, और वे हमें उत्तर देते हैं। जब हम स्वयं से यह प्रश्न पूछते हैं कि "क्या यह ईश्वर का संदेश है?" तब हमें अपने भीतर की सच्ची भावनाओं को सुनने की आवश्यकता है। अंतर्निहित अनुभव और बाहरी प्रमाण बहुत से लोग यह पूछते हैं कि अगर ईश्वर हैं, तो वे स्पष्ट रूप से हमारे सामने क्यों नहीं आते? ईश्वर कहते हैं कि वे हर जगह हैं, परंतु हमारी अपेक्षा उनके रूप को सीमित कर देती है। ईश्वर किसी विशेष रूप में नहीं हैं, बल्कि वे अनंत रूपों में हैं। जब वे किसी एक रूप में प्रकट होते हैं, तो लोग उसे ईश्वर का स्थायी रूप मान लेते हैं। परंतु ईश्वर वह नहीं हैं जो हम देखते हैं, बल्कि वह हैं जो हम नहीं देखते। वे अदृश्य हैं, और जब हमें उनका आंतरिक अनुभव होता है, तब बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती। सच्चा प्रार्थना और आभार ईश्वर से कुछ मांगना वास्तविकता में उस चीज़ की कमी को प्रकट करता है। सही प्रार्थना वह होती है, जिसमें हम पहले से ही ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं। जब हम ईश्वर को पहले से धन्यवाद देते हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि हमें यह विश्वास है कि हमें वह चीज़ प्राप्त हो चुकी है। इसलिए, हमेशा मांगने की बजाय, आभार व्यक्त करें। यही सच्ची प्रार्थना है।
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उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ।। गीता १५/१० इस विषय में महाभारत शान्तिपर्व २५३/१-१५में वर्णित विचार भी देखे जा सकते हैं। ऐसे वचनों से यह स्पष्ट होता है कि योगी अपने योगबल से और तपःसिद्ध ज्ञानी ऋषि-मुनि अपने दिव्य ज्ञानचक्षुओं से जीवात्मा की गतिविधियों को जानते हैं। मनु ने भी कहा है कि इस शरीरान्तर्गत आत्मा की गति को ध्यान-योग से देखना चाहिए- ध्यानायोगेन संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः । । मनु ६ । ७३ प्राचीन भारतीय मनीषियों में सनत्कुमार को भी मृतात्माओं के परलोक में आवागमन तथा उनको श्राद्ध से तृप्ति प्राप्त होने आदि विषयक ज्ञान था सनत्कुमारः प्रोवाच पश्यन् दिव्येन चक्षुषा। गतागतिज्ञः प्रेतानां प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि।। ब्रह्माण्ड २।२८।६२; वायु पूर्वाद्ध ५६।८३; मत्स्य १४१।७६-७। अतः पुराणों में प्राचीनकाल के सनत्कुमार जैसे अतीन्द्रिय ज्ञानसम्पन्न मनीषियों तथा योगियों के द्वारा प्रत्यक्ष देखकर बतलाये गये तथ्यों के आधार पर ही जीवात्मा के विषय में यथार्थ निरूपण किया गया है। मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा एक सूक्ष्म शरीर धारण करता है। इस तथ्य की पुष्टि पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा की गयी शोध से भी हो चुकी है। यथा- अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक खोखले पारदर्शी सिलण्डर की हवा निकाल कर उसको मन्द प्रकाश वाले एवं कोहरे की तरह व्याप्त हो जाने वाले एक रासायनिक घोल से पूरित करके जब उसमें रखे गये चूहे और मेंढक को विद्युत के स्पर्शाघात से निष्प्राण किया तो उसकी तद्वत् आकृति कुहरे में तैरने लगी थी। ऐसे वैज्ञानिक प्रयोग से मृत्यु के उपरान्त जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर धारण की पुष्टि होती है। पुनश्च, जो मनुष्य मृत्यु के कुछ ही क्षणों के पश्चात् उसी शरीर में पुनर्जीवित हुए हैं, उनके अनुभवों के आधार पर तथा प्लेञ्चेट आदि के माध्यम से आहूत प्रेतात्माओं से परलोक के विषय में पूछे गये प्रश्नों के कुछ उत्तरों से भी यह विदित होता है कि मृत्यु के पश्चात् मनुष्य का जीवात्मा अनेकत्र विचरण करता है तथा अपने मृत पूर्वजों सहित नाना दृश्यों का अवलोकन करता है। स्मृतियों और पुराणों में भी यह बतलाया गया है कि नित्य वेदाध्ययन करने, शौचाचार परायण एवं तपश्चर्या निरत रहने तथा प्राणियों के प्रति द्रोह (हिंसा, द्वेष) नहीं करने वाले मनुष्य को अपने पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है- वेदाभ्यासेन सततं शौचेन तपसैव च। अदोहेण च भूतानां जातिं स्मरति पौर्विकीम् ।।
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ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः महर्षि अरविन्द ने उसको supramental force कहा है, supramental force, महर्षि अरविन्द ने कहा है कि कोई गुरु अपने शिष्य को दीक्षा देता है, उपनिषद् की देता है, वेदों की देता है, ईश्वर के नाम की देता है, तो उसके आवाज में वो परिवर्तन हो जाता है। आवाज में वो परिवर्तन, आवाज में वो शक्ति होती है, समझे। क्योंकि पहले, पहली सिद्धि हो गई गायत्री की और दूसरे में सिद्धि हो गई कृष्ण की, यह दोनों सिद्धियां एक ही जीवन में आजतक नहीं हुई, गायत्री की हुई है, कृष्ण मन्दिर में जाते हैं, तुलसी चरणामृत लेते हैं। गुरु से दीक्षा लेके मंत्र का जप करते हैं, दोनों ही मोक्ष पाते हैं, मतलब मोक्ष के लिए यहां पहुंचना पड़ता है, सहस्त्रार में, वो मालिक यहीं बैठा है, समझे नहीं समझे। कल्कि अवतार सद्गुरु श्री रामलाल जी सियाग द कॉमफॉर्टर the-comforter.org
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सुनिता विलियम्स का चौंकाने वाला खुलासा सनातन धर्म कितना मजबूत है जानिए अंतरिक्ष यात्री सुनिता विलियम्स का नौ महीने अंतरिक्ष में बिताने के बाद पत्रकारों से दिया गया बयान अब पूरे विश्व में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा— "मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर की इच्छा से मैं अंतरिक्ष में फँसी रही। जब मैं अंतरिक्ष में 20 दिन की हुई, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं मृत्यु का सामना कर रही हूँ। जब मैंने सोचा कि अब भोजन और पानी की कमी के बीच मैं कैसे जीवित रहूँगी, तभी मुझे सनातन धर्म के चैत्र नवरात्रि के उपवास की याद आई। उस दिन से मैंने शाम को थोड़ा भोजन और पानी तथा सुबह थोड़ा पानी लेना शुरू किया। एक महीने बाद मैं स्वस्थ और प्रसन्न महसूस करने लगी। मुझे समझ आया कि मैं कुछ और समय तक टिक सकती हूँ। "अंतरिक्ष से देखने पर सूर्य ऐसा लगता है मानो कीचड़ के तालाब में बैठा हो। कभी-कभी ऊपर से कुछ आवाज़ें सुनाई देती थीं, जैसे मंत्रोच्चारण हो रहा हो। मुझे लगा कि यह संस्कृत-हिंदी के मंत्र हैं। मेरे साथी बैरी विलमोर ने कहा कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि मैं प्रतिदिन रामायण और गीता पढ़ती हूँ। इसके बाद मैंने गहराई से रामायण और गीता पढ़ने का निश्चय किया। यह अद्भुत अनुभव था। मैंने तुरंत एलन मस्क को फोन कर यह बात बताई। "अब आप चौंक जाएँगे। कुछ दिन तो ऐसे रहे जब हम बड़े-बड़े उल्कापिंडों को अपनी अंतरिक्ष स्टेशन की ओर आते देख डर गए। जब कोई उपाय नहीं था, तो हमने ईश्वर से प्रार्थना की और चमत्कारिक ढंग से कुछ छोटे-छोटे गोलाकार प्रकाशपुंज (जो तारे जैसे दिखते थे) नीचे उतरकर उन सबको नष्ट कर गए। हमें ऐसा लगा जैसे तारे ही उन्हें मार रहे हों। यह हमें बहुत अचंभित कर गया। नासा ने वादा किया है कि इस विषय पर और गहन शोध किया जाएगा।"आठ महीने में मैंने संपूर्ण रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ ली। मेरे भीतर लौटने का आत्मविश्वास जग गया। मुझे लगा कि अब मैं पृथ्वी पर वापस आ सकती हूँ। "अप्रैल माह में जब सूर्य अस्त हो रहा था, तब पृथ्वी के ऊपर से शेर जैसी आकृति दिखाई दी, जिसके साथ माता जी और त्रिशूल भी था। जैसे ही वह पृथ्वी के वातावरण में पहुँची, वह अदृश्य हो गई। मैं समझ नहीं पाई कि यह कहाँ से आई थी। मेरे साथी बैरी विलमोर और मैंने देखा कि यह किसी विशेष परत से आ रही थी। तब मैंने समझा कि आकाश की भी कई परतें हैं। हमने बहुत सोचा कि ये उड़ते हुए घोड़े क्यों नहीं दिखे। फिर मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट देखी, जिसमें हडसन नदी के ऊपर चाँद के दिखने और 2 मार्च से सनातनी उपवास शुरू होने की खबर थी। तभी से नंगल में इस घटना का अवलोकन हो रहा था। बाद में हमने समझा कि यह धरती पर व्रत खोलने का समय था। मुझे लगता है कि वे ईश्वर के आशीर्वाद लेकर आने वाले देवदूत थे। "अब मुझे लगता है कि सनातन धर्म की श्रीमद्भगवद्गीता सत्य है। अब मेरा शोध वेदों के विज्ञान पर होगा—गर्भ विज्ञान, समुद्र और अंतरिक्ष विज्ञान पर। मैं खगोल विज्ञान की हर बात जानना चाहती हूँ। नासा में वेदों की अद्भुत शक्तियों पर शोध करने के लिए एक नया विभाग शुरू करने का प्रस्ताव भी दिया गया है।" ये सनातन की शक्ति है
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एक दौर था जब महर्षि रमण ❤️🙏🏿का आगमन इस लोक में और जब वो समस्त भ्रम रूपी पड़ाव को पार कर ब्रह्म से एकाकार हुए तो हर प्राणी में उन्हें ब्रह्म का ही साक्षात्कार दिखने लगे और सारी सृष्टि ब्रह्म स्वरूप हो गयी उस नूतन दृष्टि में किसी के लिए कोई द्वेष, भिन्नता, विषमता शेष नही बची रही सभी के लिए आदर प्रेम और भक्ति प्रकट हो गयी उनके हृदय ब्रह्मांड सा विराट होगया , अपितु वो सृष्टि को ही ब्रह्म और सृष्टि में सभी जीवों को उसी ब्रह्म के रूप में देखते थे इसीलिए हर प्राणी उनके लिए ईश्वर स्वरूप ही थे और अपना सारा जीवन जीव सेवा अर्थात ईश्वर सेवा में ही काट दिया ये होती हैं ब्रह्म साक्षात्कार । जिसमें दृष्टि ब्रह्म स्वरूप हो जाती हैं इसी घटना से जुड़ी कुछ प्रसंग हैं जो मैं बताता हुँ। उनके दौर में धर्म परिवर्तन की होड़ सी लग गयी थी बहुत सारे ईसाईयों और अन्य धर्मों एवं पंथो के कयी व्यक्ति महर्षि के ज्ञान एवं व्यक्तित्व से काफ़ी प्रभावित थे क्यूँकि वो स्वयं धर्म स्वरूप थे उनकी मुख से धर्म और ज्ञान की वास्तविक स्वरूप और शब्द प्रकट होते थे जो अलख निरंजन स्वरूप हैं जिन्हें सुनकर भटके राही और तृष्णा में जलते भक्त स्वत उस आकर्षण में बँधे चले जाते थे पर ये उन धर्म के ठेकेदारों को धर्म परिवर्तन स्वरूप लगने लगा । उस दौर में क्रिस्चीऐनिटी ज़ोर शोर से सारे विश्व में फैली थी भारत में भी और इस धर्म अथवा पंथ से जुड़े बहुत सारे लोग महर्षि के शरण में चले गए थे और निरंतर चले ही जा रहे थे तब उस धर्म के कुछ संरक्षकों ने कुछ पादरियों और धर्म गुरुओं ने आपस में वार्ता कर एक निष्कर्ष पे निकले की ये व्यक्ति शायद हमारे धर्म के लोगों को बहला फुसला कर सनातन धर्म में परिवर्तित कर रहा हैं और वो सभी को ये बोलता हैं की मैं ईश्वर को जानता ही नहीं अपितु हर रोज़ उससे मिलता हुँ और सभी को भी ईश्वर का साक्षात्कार करवाने का दावा करता हैं या तो ये कोई धर्म परिवर्तन करवाने वाले सदस्य कि हिस्सा हैं या बहुरूपिया हैं इसलिए उससे जाकर मिला जाए और जो लोगों को ईश्वर साक्षात्कार करवाने का दावा करता हैं उसे परखा जाए जाना जाए और लोगों के सामने उसकी पोल खोली जाए 😆😆😂 एक दिन सभी पादरी और धर्म गुरु मिल कर महर्षि के कुटी पे पहुँचे तो वो भक्तों और शिष्यों के भीड़ से भरी हुई थी और महर्षि सिर्फ़ एक धोती पहने नंगे शरीर एक कुर्सी पे बैठे थे तभी ऊनमे से एक पादरी महोदय ने उनसे सवाल किया सवाल:- आप ईश्वर को देखे हैं उनका साक्षात्कार किए हैं जैसा कि आप दावा करते हैं महर्षि का जवाब :- हाँ बिलकुल देखा हुँ हर रोज़ देखता हुँ ईश्वर को और उनसे मिलता भी हुँ उनकी सेवा भी करता हुँ और तुम्हें भी मिला सकता हूँ सवाल:- ईश्वर देखने में कैसे लगते हैं उनका क्या रूप हैं क्या रंग है ज़रा खुल कर बताए और हमें भी दिखाए ईश्वर को हम भी अपनी आँखो से देखना चाहता हँ जवाब :- कल आना मैं तुम्हें भी ईश्वर का साक्षात्कार करवा दूँगा । अगले दिन सभी तय समय पे ये सोच कर महर्षि के कुटी पे पहुँच गए की आज इस ढोंगी का पर्दाफ़ाश करूँगा और उन्हें मालूम हुआ की महर्षि किसी कार्य से बाहर गए हैं उन्हें थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा उनसे मिलने हेतु सभी बहुत समय तक वहीं उनका इंतज़ार करते रहे परंतु बहुत समय बीत जाने के उपरांत भी जब वो नहीं आए तो सभी को लगा महर्षि का भांडा और पाखंड ख़त्म होने वाला हैं इसीलिए महर्षि सामने आने से क़तरा रहे हैं मूर्ख अज्ञानी और बेचारे भी । तभी उन्हें सामने से महर्षि रमन आते दिखे और फिर वो उनके सामने आ गए फिर से वही सवाल ईश्वर कहाँ हैं और आपने आज उनसे मिलाने का वादा किया हैं तभी महर्षि मुस्कुराये और उन्हें अपने पीछे आने को बोले और कुछ आगे जाकर उन्हें एक झोपड़ी की ओर इशारा कर बताए की ईश्वर इस झोंपड़ी के अंदर हैं और मैं उन्ही की सेवा में पिछले कयी घंटे से लगा हुआ था इसलिए माफ़ी चाहता हुँ की मुझे विलम्ब हो गयी थी सभी कौतुहल से उस झोपड़ी की ओर देखने लगे और कुछ पादरी और धर्म गुरु उस झोंपड़ी के अंदर प्रवेश किए और ये क्या ? उन्होंने देखा एक वृध व्यक्ति जिसे कुषट् रोग था और उसकी सारी शरीर से सड़ने की बू आ रही थी और उनके सारे शरीर पे मलहम पट्टी लगी थी जो महर्षि रमन थोड़े देर पहले कर के गए थे बस ये देखना था की सभी की आँखें नमः हो गयी सभी का हृदय रूपांतरण हो गयी थी और वो सभी पादरी एवं अन्य और धर्मगुरु के हृदय में महर्षि रमन के लिए अनंत श्रद्धा उमड़ पड़ी और वो द्रवित होकर उनसे माफ़ी माँगी और सभी ने एक ही शब्द बोला “आपका ईश्वर ही सत्य हैं” और उस दिन से वो सभी ने उनके सिद्धांत, ज्ञान और रास्ते को धारण कर उनके अनुआयी और शिष्य बन गए नमन गुरु देव❤️❤️❤️🙏🙏🙏🔱🔱
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