मंत्र जप बहुत शीघ्र फलित होता है। संत तुकाराम जी ने कहा है कि तुम्हारी जीभ पर भगवान का नाम हो, तो मुक्ति का आनंद तुम्हारे हाथ में है। परन्तु मंत्र समर्थ सदगुरू देव के श्री मुख से प्रदत्त होना चाहिए। तभी फलदायी होगा। हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने कहा है कि गुरु की आवाज़ में अलोकिक दिव्य शक्ति होती हैं। यह मंत्र हमे हमारी उलझनों से, हमारी परिकल्पनाओ से और निरंतर बदलते हमारे मन से, परे ले जाता है। जैसे जैसे मंत्र जपते हैं वह हमारे रोम रोम में व्यापत हो जाता है। मन दिव्य बन जाता है। भगवान का नाम जो अनगिनत सच्चे गुरुओ के जप से सिद्ध होता है वह संजीवनी मंत्र कहलाता है। ऐसे मंत्र के जप से हमारी अंतर चेतना में भूकम्प सा आ जाता है। हमारे अंदर जन्म जनमातंर कर्म संस्कार और विचारों का रिकार्ड होता है। जिसको मिटाना बहुत ही कठिन होता है जो निरंतर इस मानसिक जप से मिटने लगते हैं और उसके स्थान पर भगवान का नाम अमिट हो जाता है। यदि इस तरह प्रेम और सदभाव से मंत्र जप के कारण मानव उस मंत्र में लीन हो जाता है। मंत्र में ऐसी दिव्य क्षमता है । ऐसा कहा गया है कि मंत्र वह है जो मंत्र जप करने वाले की रक्षा करता है। मंत्र की शक्ति हमारी कल्पना से बाहर है। हम मंत्र का अर्थ समझ सकते हैं किन्तु उसमें निहित शक्ति क्या है यह नहीं जान सकते। मंत्र परमात्मा के सजीव प्राण हैं। अतः इसे आदर के साथ जपो । गुरुदेव अपने प्रवचन में कहते हैं कि इस आराधना में ईश्वर का नाम ही कुंजी है। इसे जितना जपोगे, उतना ही अधिक लाभ होगा ।
जय सदगुरु देव कोटि कोटि वंदन
@dgpup@Uppolice@UMahilaayog@wpl1090@cyberabadpolice@Cyberdost@myogioffice@myogiadityanath श्री मान उत्तर प्रदेश पुलिस महोदय ये व्यक्ति हर दिन फर्जी x id बना कर झूठी खबर पोस्ट करता, जिंदा इंसान की मृत्यु की खबर पोस्ट करता है सबके नाम की id बनाकर गंदे कमेंट और पोस्ट वायरल करता है, कृपया इस
@Pakki_khabar__ पर तत्काल कानूनी कार्यवाही करने की कृपा करे इस व्यक्ति के झूठी खबर से कई परिवार को बहुत ठेस पहुंची है और परेशान हो रहे है 🙏
@dgpup@Uppolice@UMahilaayog@wpl1090@cyberabadpolice@Cyberdost@myogioffice@myogiadityanath श्री मान उत्तर प्रदेश पुलिस महोदय ये व्यक्ति हर दिन फर्जी x id बना कर झूठी खबर पोस्ट करता, जिंदा इंसान की मृत्यु की खबर पोस्ट करता है सबके नाम की id बनाकर गंदे कमेंट और पोस्ट वायरल करता है, यह आदमी बहुत ज्यादा तंग कर रहा है नाम और लोगों का मेंशन करके उल्टा सीधा गंदगी कर रहा है बहुत ज्यादा ट्विटर पर और यह बहुत आईडी बदल चुका है तो कृपया आप इसके ऊपर ध्यान दें धन्यवाद
@Pakki_khabar__ पर तत्काल कानूनी कार्यवाही करने की कृपा करे इस व्यक्ति के झूठी खबर से कई परिवार को बहुत ठेस पहुंची है और परेशान हो रहे है
“तुम्हारी नियति तुम्हारे भीतर ही है। तुम्हारे भीतर ही उसका नक्शा मौजूद है। किसी भी चीज़ के पीछे भागने से पहले सबसे मूलभूत बात यह है कि अपनी आँखें बंद करो, अपने भीतर उतर जाओ, अपनी ऊर्जा के साथ तालमेल बिठाओ और उसे सुनो — और जो भी वह कहे कि तुम्हारे लिए अच्छा है, उसे स्वीकार करो। तब तुम्हें तृप्ति महसूस होगी। धीरे-धीरे तुम अपने खिलने, अपने पूर्ण प्रस्फुटन के और करीब आते जाओगे।
लेकिन लोग स्वयं बनने से डरते हैं। लोग अपने जैसे होने से बहुत भयभीत हैं, क्योंकि यदि तुम स्वयं बनने की कोशिश करोगे तो अकेले हो जाओगे। हर व्यक्ति अद्वितीय है और अकेला है। यदि तुम अपने जैसे होने लगो, तो तुम्हें अपने अकेलेपन का एहसास होगा। इसलिए लोग दूसरों का अनुसरण करते हैं, भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं; वे भीड़ में खो जाते हैं। वहाँ उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होता… चारों ओर इतने लोग होते हैं।
यदि तुम ध्यान करोगे, तो अकेले हो जाओगे। और यदि तुम धन के पीछे पागल हो जाओ, तो कभी अकेले नहीं रहोगे — पूरी दुनिया उसी दिशा में भाग रही है। यदि तुम ईश्वर की खोज करोगे, तो अकेले हो जाओगे; लेकिन यदि तुम राजनीति, सत्ता और शक्ति की तलाश करोगे, तो पूरी दुनिया तुम्हारे साथ होगी, तुम कभी अकेले नहीं छोड़े जाओगे।
लोग अकेले होने से डरते हैं। और जब तक लोग अकेले होने से डरते रहेंगे, वे स्वयं को कभी जान नहीं पाएँगे।”
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"आप ब्रह्म ही हो, बस स्वीकार करने का साहस चाहिए" 🌌
सत्य यह नहीं है कि आपको 'ब्रह्म' बनना है; सत्य यह है कि आप ब्रह्म 'हो' ही। आप वही अनंत, अविनाशी और निराकार सत्ता हो, जिसे आप युगों से बाहर ढूँढ रहे थे।
फिर प्रश्न उठता है—अगर मैं ब्रह्म ही हूँ, तो फिर मुझे इसका अहसास क्यों नहीं है? आपने 'भ्रम' को अपना 'स्व' मान लिया है। आपने नाम को, शरीर को, और उन हजारों विचारों को अपना 'होना' मान लिया है। यही वो पर्दा है जिसने आपकी दृष्टि को धुंधला कर रखा है। आप एक ऐसे सम्राट हो, जो भूल गया है कि वह सम्राट है, और इसलिए वह एक भिखारी की तरह जीवन जी रहा है। सतगुरु कोई 'जादूगर' नहीं हैं जो आपको कुछ नया दे देंगे। वे तो बस एक 'आईना' हैं। वे आपके उस भ्रम पर प्रहार करते हैं, जो आपको यह यकीन दिलाता है कि आप 'सीमित' हो। जिस क्षण सतगुरु के शब्द आपके उस भ्रम की जड़ पर लगते हैं, उस क्षण आपकी 'अज्ञान' की नींद टूट जाती है। ब्रह्म को 'जानना' आसान है, लेकिन उसे 'स्वीकार' करना सबसे कठिन है। क्योंकि 'स्वयं को ब्रह्म स्वीकार करने' का अर्थ है—अपने 'अहंकार' का पूर्ण विनाश। आपको अपने उस 'मैं' को छोड़ना होगा, जिसे आपने बड़ी मेहनत से सजाया है।
जिस दिन आपने यह साहस कर लिया—कि "मैं यह शरीर नहीं, मैं यह विचार नहीं, मैं वह अनंत चेतना हूँ"—उसी दिन वह 'भ्रम' राख हो जाता है। अब न कोई खोज है, न कोई पाने की तड़प। अब केवल वह 'आनंद' है जो आपके अपने अस्तित्व से छलक रहा है।
आप ब्रह्म को ढूँढ नहीं रहे हैं; आप तो बस अपनी उस 'विस्मृति' (भूलने) को मिटा रहे हैं। भ्रम के हटते ही, आप वह हो जाते हैं जो आप हमेशा से थे—अखंड, अद्वैत और पूर्ण ब्रह्म। आज, इस सत्य को बस 'स्वीकार' कर लीजिए। आपका होना ही ब्रह्म का होना है। 🌿🙏
एक दिन एक महान ऋषि ने एक छोटी-सी चींटी से पूछा —
“हे लघु प्राणी, तू इतने छोटे शरीर में कैसे जीवन जीती है? क्या तुझे कष्ट नहीं होता?” 🐜✨
लेकिन उस चींटी ने जो उत्तर दिया…
उसे सुनकर स्वयं महर्षि भी कुछ पल के लिए मौन हो गए। 😶
बहुत समय पहले की बात है। एक घने और शांत वन में महर्षि प्रबोधन नाम के एक तपस्वी ऋषि रहते थे। वे वर्षों से कठिन साधना में लीन थे। उनका मन संसार से विरक्त था, लेकिन सभी जीवों के प्रति उनके हृदय में अपार करुणा थी। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि पशु-पक्षी, कीट-पतंग तक उनके पास बिना भय के विचरते थे।
एक दिन ऋषि गहरी ध्यानावस्था में बैठे थे। उनके शरीर से दिव्य तेज निकल रहा था। तभी एक छोटी-सी लाल चींटी उनके पैरों पर चढ़ गई। ऋषि ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और मुस्कराए। अपने योगबल से उन्होंने उस चींटी को वाणी का वरदान दिया, ताकि वह उनकी बात समझ सके और उत्तर भी दे सके।
ऋषि ने पूछा —
“हे लघु प्राणी, तू इस सूक्ष्म शरीर में कैसे जीवन जीती है? क्या तू दुखी नहीं होती?”
चींटी ने शांत स्वर में कहा —
“हे महर्षि, मेरा जीवन छोटा अवश्य है, लेकिन मेरी यात्रा बहुत लंबी रही है। मैं इस अवस्था तक ऐसे ही नहीं पहुँची हूँ।”
ऋषि ने आश्चर्य से पूछा —
“ऐसा क्या किया तूने जो तुझे यह जीवन मिला? और आगे तू क्या चाहती है?”
कुछ क्षण मौन रहने के बाद चींटी बोली —
“मैं आपको अपने पूर्व जन्मों की कथा सुनाती हूँ… तभी आप समझ पाएंगे कि जीव की सच्ची उन्नति कैसे होती है।”
फिर उसने अपनी कथा प्रारंभ की।
“कई जन्म पहले मैं एक गर्वित राजा थी। मेरे पास अपार वैभव, शक्ति और सत्ता थी। लेकिन मेरे भीतर विनम्रता नहीं थी। मैं प्रजा को तुच्छ समझती थी और अपने अहंकार में दूसरों का अपमान करती थी।
एक दिन एक संत मेरे द्वार पर आए। उन्होंने मुझे विनम्रता और धर्म का उपदेश देना चाहा, लेकिन मैंने उनका अपमान कर दिया। संत क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने केवल इतना कहा —
‘तू जीवन के चक्र में भटककर विनम्रता का अर्थ सीखेगी।’”
“उसके बाद अगले जन्म में मैं एक व्यापारी बनी। धन और बुद्धि तो थी, लेकिन दया नहीं थी। मैं दूसरों की मेहनत से अपना लाभ कमाती रही। फिर मेरे कर्मों ने मुझे और नीचे गिराया।
इसके बाद मैं एक पक्षी बनी — स्वतंत्र थी, लेकिन हर समय शिकारी का भय सताता था। फिर मैं एक मछली बनी — जल में रहती थी, लेकिन हर पल किसी जाल या कांटे में फँसने का डर रहता था।”
“हर जन्म मुझे कुछ न कुछ सिखाता गया। धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि जो जीव अहंकार करता है और दूसरों का सम्मान नहीं करता, उसे कभी स्थायी सुख नहीं मिलता।”
“अब इस जन्म में मैं एक चींटी हूँ। शरीर छोटा है, लेकिन आत्मा बहुत पुरानी है। मैं परिश्रम करती हूँ, अपने समूह के लिए जीती हूँ, किसी को हानि नहीं पहुँचाती। और सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि अब मैं सीखना चाहती हूँ… अभिमान नहीं करना चाहती।”
चींटी की बातें सुनकर महर्षि प्रबोधन गंभीर हो गए। उन्होंने कहा —
“हे लघु प्राणी, तेरा ज्ञान अद्भुत है। तूने जीवन का वास्तविक सत्य समझ लिया है। अहंकार का त्याग, दूसरों की सेवा और निरंतर आत्ममंथन ही जीव की सच्ची उन्नति का मार्ग है।”
फिर ऋषि ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा —
“अगले जन्म में तू एक मनुष्य के रूप में जन्म लेगी — ज्ञानी, दयालु और समाजसेवी बनकर।”
चींटी ने विनम्रता से सिर झुकाया और कहा —
“हे ऋषिवर, यदि मुझे अगला जन्म मिले, तो मैं अपनी उन्नति केवल अपने लिए नहीं… बल्कि दूसरों को प्रेरित करने के लिए भी उपयोग करना चाहती हूँ।”
ऋषि मुस्कराए और बोले —
“तथास्तु!” ✨
समय बीत गया…
वर्षों बाद उसी वन में एक बालिका ने जन्म लिया। उसका नाम अनया रखा गया। वह बचपन से ही अत्यंत करुणामयी और विनम्र थी। उसे पशु-पक्षियों से प्रेम था, वह वृद्धों की सेवा करती और गरीबों की सहायता करने में आनंद अनुभव करती थी।
जब वह बड़ी हुई, तो उसने समाज सेवा को ही अपना धर्म बना लिया। उसने कभी किसी को अपने से छोटा नहीं समझा। उसे यह ज्ञात नहीं था कि उसके भीतर एक चींटी के हजारों जन्मों का अनुभव और चेतना छिपी हुई है — जिसने अहंकार से विनम्रता, स्वार्थ से परोपकार और हिंसा से सेवा तक की लंबी यात्रा तय की थी।
यह कथा हमें सिखाती है कि जीव की उन्नति शरीर के आकार या शक्ति से नहीं होती…
वह होती है कर्म, विवेक और आत्मचिंतन से। ❤️
जो जीव विनम्रता, सेवा और सीखने की इच्छा को अपना लेता है,
वही अंततः परम शांति की ओर बढ़ता है। ✨
सतगुरु जब ब्रह्म का बोध कराते हैं, तो वे उन 'भ्रमों' को एक-एक करके काटते हैं जो हमें हमारी असली पहचान से दूर रखे हुए थे। ये भ्रम कोई बाहरी चीज़ें नहीं, बल्कि हमारी अपनी ही मान्यताएँ हैं। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि "यह शरीर ही मैं हूँ।" हम इसी शरीर की सुरक्षा, सजावट और सुख में पूरी ऊर्जा लगा देते हैं। : वे सिखाते हैं कि शरीर तो केवल एक वस्त्र (आवरण) है। जैसे गहना सोना नहीं है, वैसे ही शरीर भी आत्मा (ब्रह्म) नहीं है। शरीर आता है और जाता है, लेकिन 'जानने वाला' (साक्षी) हमेशा स्थिर रहता है। हमें लगता है कि हमें बाहर से कुछ 'प्राप्त' करना होगा—चाहे वह पैसा हो, सफलता हो या शांति—तभी हम पूरे होंगे। वे इस भ्रम को तोड़ते हैं कि आप अधूरे हैं। वे बताते हैं कि आप 'पूर्ण' (पूर्णमदः पूर्णमिदं) हैं। आप कुछ भी बाहर से जोड़कर पूरे नहीं होंगे, बल्कि अपनी पूर्णता को 'पहचानकर' पूरे होंगे। हमें लगता है कि "मैं कर रहा हूँ, मैं कमा रहा हूँ, मैं सफल हो रहा हूँ।" यह 'कर्तापन' का अहंकार ही हमें दुखी करता है। वे दिखाते हैं कि आप केवल एक माध्यम हैं। ब्रह्मांड की शक्ति ही हर क्रिया को संचालित कर रही है। जब यह भ्रम हटता है, तो आप 'कर्ता' के बोझ से मुक्त होकर 'साक्षी' बन जाते हैं।हम सोचते हैं कि ब्रह्म हिमालय की गुफाओं में या सातवें आसमान पर कहीं है।वे इस दूरी को मिटाते हैं। वे बताते हैं कि ब्रह्म कहीं दूर नहीं, बल्कि जहाँ तुम खड़े हो, जिस पल में तुम जी रहे हो, वही ब्रह्म है। जो ढूँढ रहा है, वही 'लक्ष्य' है।
पदार्थ, पशु, मनुष्य और बुद्ध--चेतना के विकास क्रम
पदार्थ को अपने होने का कोई बोध नहीं होता।
तुमने कभी रास्ते के किनारे पड़े पत्थर को देखा? वह है — निश्चित ही है — लेकिन उसे यह पता नहीं कि वह है। उसे यह भी पता नहीं कि तुम उसके पास से गुज़र रहे हो। उसके भीतर कोई ज्योति नहीं जल रही, कोई साक्षी नहीं बैठा।
लेकिन तुम पत्थर को भी जानते हो और स्वयं को भी जान सकते हो।
यहीं से चेतना का जन्म होता है।
पदार्थ केवल अस्तित्व है; चेतना अस्तित्व का बोध है।
एक दर्पण को देखो। दर्पण के सामने जो आएगा, उसका प्रतिबिंब बन जाएगा, लेकिन दर्पण को कुछ पता नहीं कि उसमें कौन दिखाई दे रहा है।
मनुष्य भी यदि केवल यांत्रिक ढंग से जी रहा है — सुबह उठा, काम किया, खाया, सो गया — तो वह भी एक प्रकार का चलता-फिरता दर्पण है। उसमें जीवन तो है, लेकिन जागरण नहीं।
चेतना का अर्थ है — “मैं हूँ” का अनुभव।
और उससे भी गहरी चेतना है — “मैं कौन हूँ?” का प्रश्न।
गीता इसी को क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ कहती है।
शरीर क्षेत्र है — खेत की तरह। उसमें विचार उगते हैं, इच्छाएँ उगती हैं, स्मृतियाँ उगती हैं। लेकिन जो इन सबको देख रहा है, वह क्षेत्रज्ञ है — साक्षी।
पशु संसार को जानता है, लेकिन स्वयं को नहीं जानता। गाय घास खोज लेती है, पक्षी अपना घोंसला बना लेता है, कुत्ता अपने मालिक को पहचान लेता है — उन्हें जगत का उपयोग करना आता है, लेकिन वे यह नहीं पूछते — “मैं कौन हूँ?”
और दुख की बात यह है कि अधिकांश मनुष्य भी वहीं अटके हैं।
वे बाजार को जानते हैं, बैंक बैलेंस को जानते हैं, राजनीति को जानते हैं, दूसरों की गलतियों को जानते हैं — लेकिन स्वयं को नहीं जानते।
वे बाहर-बाहर जीते हैं। उनकी सारी इंद्रियाँ बाहर दौड़ रही हैं। आँखें वस्तुओं को देखती हैं, कान शब्दों को सुनते हैं, मन इच्छाओं के पीछे भागता है। लेकिन जिसने इन सबको देखना है, उस भीतर बैठे साक्षी की ओर कभी ध्यान नहीं जाता।
मनुष्य और बुद्ध में केवल इतना ही अंतर है — मनुष्य में आत्मज्ञान बीज की तरह छिपा है; बुद्ध में वही बीज फूल बन गया है।
बुद्ध कोई अलग प्राणी नहीं हैं। वे तुम्हारी ही संभावना हैं, तुम्हारा ही भविष्य हैं। हर मनुष्य के भीतर एक सोया हुआ बुद्ध बैठा है। लेकिन जागरण साधना माँगता है।
एक कहानी सुनो—
एक राजा ने अपने महल में हजारों दीपक जलवा रखे थे। रात को पूरा महल प्रकाश से भर जाता।
एक दिन उसने एक अंधे फकीर से पूछा, “क्या तुम्हें यह प्रकाश दिखाई देता है?”
फकीर हँसा और बोला, “प्रकाश बाहर बहुत है, लेकिन मेरी आँखें बंद हैं। जब तक आँख न खुले, तब तक हजार सूरज भी व्यर्थ हैं। आध्यात्मिक आयाम में यही मनुष्य की दशा है। परमात्मा हर तरफ है, चेतना हर क्षण बरस रही है, लेकिन भीतर की आँख बंद है।"
‘पुरुष’ शब्द बड़ा अद्भुत है।
पुर का अर्थ है — नगर, शरीर, यह संसार।
और जो इस नगर में रहते हुए भी जागा हुआ है, वही पुरुष है।
वह केवल बाहर को नहीं देखता; वह देखने वाले को भी देखता है।
क्रोध आया — वह उसे देखता है।
विचार उठे — वह उन्हें देखता है।
शरीर बूढ़ा हो रहा है — वह उसे भी देखता है।
धीरे-धीरे उसे अनुभव होता है —
“मैं शरीर नहीं हूँ, क्योंकि मैं शरीर को देख सकता हूँ।”
“मैं मन नहीं हूँ, क्योंकि मैं विचारों को आते-जाते देख सकता हूँ।”
जो देखा जा सकता है, वह तुम नहीं हो।
तुम तो देखने वाले हो।
यही साक्षीभाव पुरुष है।
यही शुद्ध चेतना है।
यही कृष्ण का “हिरण्यमय पुरुष” है — स्वर्णिम चेतना, जो शरीर और मन के पार है।
और जिस दिन तुमने इस भीतर के साक्षी को पहचान लिया, उसी दिन संसार बदल जाता है।
तब पत्थर भी वही है, वृक्ष भी वही हैं, आकाश भी वही है — लेकिन देखने वाला बदल गया।
और जब देखने वाला बदल जाता है, तब पूरा अस्तित्व दिव्य हो उठता है।
Part 2
मृग से सीखा कि मृग अपनी मौज मस्ती, उछल कूद में इतना ज्यादा खो जाता है कि उसे अपने आसपास अन्य किसी हिंसक जानवर के होने का आभास ही नहीं होता है और वह मारा जाता है। इससे जीवन में यह सीखा जा सकता है कि हमें कभी भी लापरवाह नहीं होना चाहिए।
मछली से सीखा कि जिस प्रकार मछली किसी कांटे में फंसे मांस के टुकड़े को खाने के लिए चली जाती है और अपने प्राण गंवा देती है, वैसे ही हमें स्वाद को इतना अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। हमें ऐसा ही भोजन करना चाहिए, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा हो।
पिंगला वेश्या से दत्तात्रेयजी ने यह सबक लिया कि हमें केवल पैसों के लिए नहीं जीना चाहिए। जब वह वेश्या धन की कामना में सो नहीं पाती थी, तब एक दिन उसके मन में वैराग्य जागा और उसे समझ में आया कि असली सुख पैसों में नहीं बल्कि परमात्मा के ध्यान में है, तब कहीं उसे सुख की नींद आई।
कुरर पक्षी से सीखा कि जिस प्रकार कुरर पक्षी मांस के टुकड़े को चोंच में दबाए रहता है और जब दूसरे बलवान पक्षी उस मांस के टुकड़े को उससे छीन लेते हैं, तब मांस का टुकड़ा छोड़ने के बाद ही कुरर को शांति मिलती है। उसी तरह हमें कुरर पक्षी से यह सीखना चाहिए कि ज्यादा चीजों को पास में रखने की सोच छोड़ देना चाहिए।
बालक से सीखा कि जैसे छोटे बच्चे हमेशा चिंतामुक्त और प्रसन्न दिखाई देते हैं, वैसे ही हमें भी हमेशा चिंतामुक्त और प्रसन्न रहना चाहिए।
कुमारी कन्या से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि एक बार एक कुमारी कन्या धान कूट रही थी। धान कूटते समय उस कन्या की चूड़ियां आवाज कर रही थीं। बाहर मेहमान बैठे थे जिन्हें चूड़ियों की आवाज से परेशानी हो रही थी। तब उस कन्या ने चूड़ियों की आवाज बंद करने के लिए चूड़ियां ही तोड़ दीं। दोनों हाथों में बस एक एक चूड़ी रहने दी। उसके बाद उस कन्या ने बिना शोर किए धान कूट लिया अतः हमें भी एक चूड़ी की भांति अकेले ही रहना चाहिए और निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
सर्प से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि किसी भी संन्यासी को अकेले ही जीवन व्यतीत करना चाहिए। कभी भी एक ही स्थान पर न रुकते हुए जगह जगह जाकर ज्ञान बांटते रहना चाहिए।
तीर बनाने वाले से दत्तात्रेय ने सीखा कि एक ऐसा तीर बनाने वाला था, जो तीर बनाने में इतना मग्न था कि उसके पास से राजा की सवारी निकल गई, पर उसका ध्यान भंग नहीं हुआ। अतः हमें अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करना चाहिए।
मकड़ी से दत्तात्रेय ने सीखा कि भगवान भी मायाजाल रचते हैं और उसे मिटा देते हैं। ठीक वैसे ही जैसे एक मकड़ी स्वयं जाल बनाती है, उसमें विचरण करती है और अंत में पूरे जाल को खुद ही निगल लेती है। ठीक इसी तरह भगवान भी माया से सृष्टि की रचना करते हैं और अंत में उसे समेट लेते हैं।
भृंगी कीड़े से दत्तात्रेय ने सीखा कि अच्छी हो या बुरी, हम जहां जैसी सोच में अपना मन लगाएंगे, मन वैसा ही हो जाता है।
भौंरे से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि जहां भी सार्थक बात सीखने को मिले, उसे तत्काल ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस प्रकार भौंरा अलग अलग फूलों से पराग ले लेता है।
कबूतर से दत्त भगवान ने यह भी जाना कि जब कबूतर का जोड़ा जाल में फंसे अपने बच्चों को देखकर खुद भी जाल में जा फंसता है, तो इससे यह सबक लिया जा सकता है कि किसी से बहुत ज्यादा मोह दुःख की वजह बनता है।
इस प्रकार दत्तात्रेय जी ने संसार को यह संदेश दे दिया, कि अगर पूर्वजन्म के पुण्यों में कमी के कारण अगर सद्गुरु नहीं भी मिले हैं, तो अपनी आत्मा को ही अपना गुरु मानकर, अपने उद्धार कार्य में लगे रहना चाहिए।
Part 1
श्रीस्वामी दत्तात्रेयजी वासना से रहित होकर और जीवन्मुक्त होकर संसार में जहां तहां विचरते थे और अपने काल को व्यतीत करते थे। एक दिन दत्तात्रेयजी अपने आप में मदमस्त हाथी की तरह चले जा रहे थे, इनको मस्त देखकर एक राजा ने इनसे पूछा आपको ऐसा आनंद किस गुरु से मिला है जो आप संपूर्ण चिंता से रहित होकर मस्त हस्ती की तरह होकर विचरते फिरते हैं।
राजा के इस वाक्य को सुनकर श्रीस्वामी दत्तात्रेयजी ने कहा, आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः। यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यां योऽसावनुविंदते।
पुरुष का विशेषकर के गुरु अपना आत्मा ही है क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान से अपने आत्मा के ज्ञान से ही पुरुष कल्याण को प्राप्त होता है।
दत्तात्रेयजी ने राजा से कहा, हे राजन, मैंने किसी एक मनुष्य को गुरु नहीं बनाया है और न मैंने किसी से कानों में फूंक मरवाकर मंत्र ही लिया है किंतु जिससे जितना गुण हमको मिला है उतने गुण का प्रदाता मानकर मैंने उसको गुरु बनाया है इसीसे मैंने 24 को अपना गुरु माना है क्योंकि उनमें से हरेक से हमको एक एक गुण मिला है इस वास्ते में उन सबको गुरु करके मानता हूं।
राजा की इच्छा हुई यह जानने की भला इस योगी के 24 गुरु कौन हैं, जो यह मुझसे भी अधिक आनंदित है।
दत्तात्रेयजी ने राजा को जिज्ञासु जानकर कहा कि, हे राजन, तुम एकाग्र चित्त होकर श्रवण करो। प्रथम हम आपको उन चौबीस गुरुओं के नाम को सुनाते हैं और फिर उनके गुणों को श्रवण कराएंगे।
उनके 24 गुरुओं में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, समुद्र, अजगर, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, मृग, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, सर्प, तीर बनाने वाला, मकड़ी, भृंगी कीड़ा, भौंरा और कबूतर हैं।
पृथ्वी से हम सहनशीलता व परोपकार की भावना सीख सकते हैं। कई लोग पृथ्वी पर अनेक प्रकार के आघात करते हैं, उत्पात एवं खनन के कार्य करते हैं, लेकिन पृथ्वी माता हर आघात को परोपकार की भावना से सहन करती है।
जल से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि हमें सदैव पवित्र रहना चाहिए। जैसे जल सबको शुद्ध करता है, वैसे ही हमारा जीवन भी पवित्र होना चाहिए।
वायु से दत्तात्रेय ने सीखा कि जिस प्रकार कहीं भी अच्छी या बुरी जगह पर जाने के बाद भी वायु का मूल रूप स्वच्छता ही है, उसी प्रकार हमें अच्छे या बुरे लोगों के साथ रहने पर भी अपनी अच्छाइयों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
आकाश से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि हर देश, परिस्थिति तथा काल में लगाव से दूर रहना चाहिए। आकाश किसी से बंधा नहीं है, सर्वव्यापी और निर्लिप्त है।
अग्नि से दत्तात्रेयजी ने सीखा कि जीवन में कैसे भी हालात हो, हमारा उन हालातों में ढल जाना ही उचित है। अग्नि हर वस्तु को अपने रूप में बदल लेती है।
सूर्य से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि जिस तरह एक होने पर भी अलग अलग माध्यमों से सूर्य अलग अलग दिखाई देता है, वैसे ही आत्मा भी एक ही है, लेकिन वह कई रूपों में हमें दिखाई देती है।
चंद्रमा से सीखा कि हमारी आत्मा लाभ हानि से परे है। वैसे ही जैसे चंद्रमा के घटने या बढ़ने से उसकी चमक और शीतलता नहीं बदलती, हमेशा एक जैसी रहती है, वैसे आत्मा भी किसी प्रकार के लाभ हानि से बदलती नहीं है।
समुद्र से सीखा कि जैसे समुद्र के पानी की लहर निरंतर गतिशील रहती है, वैसे ही जीवन के उतार चढ़ाव में हमें भी स्थिर और गतिशील रहना चाहिए।
अजगर से भगवान दत्तात्रेय ने सीखा कि हमें जीवन में संतोषी बनना चाहिए और जो मिल जाए, उसे खुशी खुशी स्वीकार कर लेना ही हमारा धर्म होना चाहिए।
पतंगे से सीखा कि जैसे पतंगा आग की ओर आकर्षित होकर जल जाता है, उसी प्रकार रंग रूप के आकर्षण और झूठे मोहजाल में हमें उलझना नहीं चाहिए।
मधुमक्खी से सीखा कि जब मधुमक्खियां शहद इकट्ठा करती हैं और एक दिन छत्ते से शहद निकालने वाला आकर सारा शहद ले जाता है, तो हमें इस बात से यह सीखना चाहिए कि आवश्यकता से अधिक चीजों को एकत्र करके नहीं रखना चाहिए।
हाथी से सीखा कि जैसे कोई हाथी हथिनी के संपर्क में आते ही उसके प्रति आसक्त हो जाता है, अतः हाथी से सीखा जा सकता है कि तपस्वी पुरुष और संन्यासी को विषय वासना से बहुत दूर रहना चाहिए।
बहुत समय पहले की बात है।
घने जंगलों के बीच एक शांत आश्रम था, जहाँ ऋषि उद्दालक रहते थे।
उनका जीवन बहुत सरल था — न कोई दिखावा, न कोई शोर।
बस मौन, ध्यान और सत्य की खोज।
उनका एक पुत्र था — श्वेतकेतु।
श्वेतकेतु बचपन से ही बहुत तेज बुद्धि वाला था।
जो भी सुनता, तुरंत याद कर लेता।
आश्रम में आने वाले लोग भी उसकी प्रशंसा करते थे।
एक दिन उद्दालक ऋषि ने सोचा —
“बेटे को गुरुकुल भेजना चाहिए, ताकि वह वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर सके।”
श्वेतकेतु खुशी-खुशी गुरुकुल चला गया।
वहाँ उसने वर्षों तक अध्ययन किया।
वेद, उपनिषद, व्याकरण, तर्कशास्त्र — उसने सब सीख लिया।
गुरु भी उसकी बुद्धि से प्रसन्न थे।
समय बीतता गया।
लगभग बारह वर्षों बाद श्वेतकेतु अपने घर लौटा।
लेकिन अब वह पहले जैसा सरल बालक नहीं रहा था।
उसकी चाल में अहंकार आ गया था।
बातों में कठोरता आ गई थी।
उसे लगता था —
“अब मुझे सब पता है।”
जब वह आश्रम पहुँचा, तो उसने पिता को प्रणाम तो किया…
लेकिन उसके भीतर विनम्रता नहीं थी।
उद्दालक ऋषि बेटे को देखकर शांत रहे।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
वे समझ गए कि बेटे के पास जानकारी तो बहुत है…
लेकिन अभी असली ज्ञान नहीं आया।
उस रात ऋषि देर तक बैठे सोचते रहे।
उन्होंने देखा कि संसार में अधिकतर लोग भी ऐसे ही हैं।
बहुत पढ़े-लिखे…
बहुत जानकारी रखने वाले…
लेकिन भीतर से बेचैन।
आज भी यही स्थिति है।
लोगों के पास मोबाइल है, इंटरनेट है, डिग्रियाँ हैं…
लेकिन मन शांत नहीं है।
क्योंकि जानकारी और आत्मज्ञान अलग चीजें हैं।
अगली सुबह उद्दालक ऋषि ने श्वेतकेतु को अपने पास बुलाया।
उन्होंने शांत स्वर में पूछा —
“बेटा, क्या तुमने वह जाना…
जिसे जान लेने के बाद सब कुछ जान लिया जाता है?”
यह सुनकर श्वेतकेतु चौंक गया।
उसने इतने वर्षों तक शास्त्र पढ़े थे,
लेकिन यह प्रश्न उसने पहली बार सुना था।
वह कुछ देर चुप रहा।
फिर धीरे से बोला —
“नहीं पिता जी…
मुझे यह ज्ञान नहीं मिला।”
यहीं से उसकी असली यात्रा शुरू हुई।
पहली बार उसका अहंकार थोड़ा टूटने लगा।
उद्दालक ऋषि मुस्कुराए।
उन्होंने कहा —
“जब इंसान यह स्वीकार कर लेता है कि ‘मैं अभी नहीं जानता’…
तभी सत्य का द्वार खुलता है।”
फिर उन्होंने पास रखा एक छोटा सा बीज उठाया।
उन्होंने कहा —
“इसे तोड़ो।”
श्वेतकेतु ने बीज तोड़ा।
अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दिया।
वह बोला —
“इसके भीतर तो कुछ नहीं है।”
उद्दालक ऋषि बोले —
“जिसे तुम देख नहीं पा रहे…
उसी अदृश्य तत्व से इतना विशाल वृक्ष बना है।”
श्वेतकेतु ध्यान से सुनने लगा।
ऋषि ने आगे कहा —
“ठीक वैसे ही इस पूरे संसार के पीछे भी एक अदृश्य चेतना है।
वही सबमें है…
और वही तुम्हारे भीतर भी है।”
श्वेतकेतु के मन में पहली बार गहराई उतरने लगी।
कुछ देर बाद उद्दालक ऋषि उसे नदी किनारे ले गए।
उन्होंने पानी से भरा एक पात्र लिया और उसमें नमक घोल दिया।
फिर बोले —
“इसे कल देखना।”
अगले दिन उन्होंने पूछा —
“नमक कहाँ है?”
श्वेतकेतु बोला —
“दिखाई नहीं दे रहा।”
ऋषि बोले —
“ऊपर से पानी चखो।”
वह नमकीन था।
“बीच से चखो।”
वह भी नमकीन था।
“नीचे से चखो।”
वह भी नमकीन था।
तब उद्दालक ऋषि बोले —
“नमक दिखाई नहीं दे रहा…
लेकिन पूरे पानी में व्याप्त है।
ठीक वैसे ही आत्मा दिखाई नहीं देती…
लेकिन वह पूरे अस्तित्व में फैली हुई है।”
फिर उन्होंने श्वेतकेतु की आँखों में देखते हुए कहा —
“तत्वमसि।”
अर्थात —
“तुम वही हो।”
श्वेतकेतु शांत हो गया।
उसने पहली बार महसूस किया कि वह सिर्फ शरीर नहीं है…
सिर्फ मन नहीं है…
सिर्फ विचार नहीं है।
उसके भीतर कुछ और भी है —
एक शांत साक्षी।
धीरे-धीरे वह अपने विचारों को देखने लगा।
उसे समझ आने लगा —
विचार आते हैं और चले जाते हैं।
भावनाएँ बदलती रहती हैं।
शरीर भी हर दिन बदल रहा है।
लेकिन एक चीज़ हमेशा स्थिर रहती है —
देखने वाली चेतना।
यही आत्मा है।
उसी दिन से श्वेतकेतु बदलने लगा।
अब वह कम बोलता था।
अधिक सुनता था।
पहले वह ज्ञान दिखाना चाहता था…
अब सत्य को जीना चाहता था।
उसे समझ आ गया कि असली ज्ञान किताबों से नहीं आता।
वह अनुभव से आता है।
मौन से आता है।
स्वयं को जानने से आता है।
समय बीतता गया।
अब जो भी आश्रम में आता,
श्वेतकेतु उसे बड़े सरल शब्दों में एक ही बात समझाता —
“जिस शांति को तुम बाहर खोज रहे हो…
वह तुम्हारे भीतर ही बैठी है।”
और यही उपनिषदों का सबसे गहरा संदेश है —
“तत्वमसि”
“तुम वही हो।”😃🎎🍀🌺🦋🌺🙏 — feeling grateful in India.
@Ra8657 बाबाजी खाली ज्ञान ही देते रहोगे क्या
आपने गरीब हिन्दू बच्चों के लिए कोई
स्कूल खोला है गरीब हिन्दुओं के लिए
कोई रोजगार की व्यवस्था की हो
कोई अस्पताल खोला हो तो बताएं
गरीब हिन्दू लड़कियों की शादी की
व्यवस्था की हो तो बताएं
बाबाजी भूखे भजन ना होत गोपाला
इसका ध्यान रखें
जैसे-जैसे *गुरुदेव* के प्रति आपकी *निष्ठा और प्रीति* बढ़ेगी, *सुमिरन-ध्यान* में आनंद आने लगेगा ; प्रीति का रस प्रगट होता जायेगा ; चित्त की चंचलता मिटेगी, मनोराज मिटते जायेंगे। मन्त्र जाप से अध्यात्मिक तरंगे उत्त्पन्न होती हैं। इससे चित्त में आनंद और शांति व्याप्त हो जाती है।
परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त होने लगेगी। गुरुदेव ध्यान में सपने में आकर दर्शन देंगे या और किसी माध्यम से आप को मार्गदर्शन मिलेगा। बुध्दि विवेकवती हो जायेगी, मन में अंतर्यामी परमात्मा की प्रेरणा मिलती है, तो व्यावहारिक ज्ञान में सही गलत का निर्णय करने में सूझ-बूझ आती है।
नाम का, धन - पद का अहंकार गलने लगता है। मन और बुध्दि निर्मल होती है। बुध्दि में शुद्ध प्रकाश और प्रेरणा प्राप्त होगी कि क्या करना है, कब और कैसे करना है? गुरु मन्त्र का जप करने से नीरसता दूर होगी और आस्था बढ़ेगी। बुध्दि शुद्ध हो जायेगी। रोग व बीमारिया आयेंगी औऱ समूल नष्ट हो जायेंगी। रोग प्रतिकार की शक्ति बढ़ती जायेगी।
आप सुख-दुःख, लाभ- हानि, यश-अपयश का भी उपयोग कर के सुख-दुःख को स्टेप बना लेते है।आपको दोनों का भोगी नहीं, योगी बनना है। ईश्वर के रास्ते उन्नत होते होते समभाव में स्थापित हो जाना है।
गुरु मन्त्र के जप से सभी जन्मो के पाप नाश होंगे..ज प = ‘ज’ का मतलब जन्म मरण का नाश और ‘प’ का मतलब पाप का नाश : इसी का नाम जप है।
घटाकाश में प्रकाश के प्रगट होने से व्यापक परमात्मा के एकत्व का दैवी ज्ञान प्रगट होता है …दिव्य प्रेरणा प्रगट होने लगती है।
आत्मा ब्रह्म है , जैसे घड़े का आकाश महा आकाश से जुड़ा है ,एक ही है ,भिन्न नहीं है …ऐसे ही आप का आत्मा उस परमात्मा से जुड़ा हुआ है,यह ज्ञान होगा..आत्मा ब्रह्म है।
कलियुग मे हरि का नाम ही फल प्रदान करनेवाला है..मन्त्र जाप से भय – निर्भयता में , घृणा – प्रेम में और काम राम में बदलने लगता है..जैसे दुर्भाव से द्वेष , घृणा और अशांति पैदा होती है , वैसे ही मन्त्र से आनंद, माधुर्य , उत्साह और शांति प्रगट होती है.. तो शोक नाश होता है..धारणा शक्ति बढती है, क्षमा शक्ति बढती है, शौर्य शक्ति बढती है….मन्त्र जप से वीर्य और तेज बढ़ता है।मन्त्र जाप से इतनी शक्तियां विकसित होती है किआगे घटित होने वाली घटनाओं की आहट पहले ही पता चल जाती है.। आपके पास आनेवाले लोगो को भी शांति का अनुभव होगा।
प्रायः हमारे गुरुदेव कहा करते थे
"यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे" अर्थार्थ
हमें समझाता है कि जो-जो इस ब्रह्माण्ड में है वही सब हमारे शरीर में भी है।
त्रिवेणी संगम का अर्थ क्या होता है?
'त्रिवेणी संगम' शब्द संस्कृत से आया है, जहाँ 'त्रि' का अर्थ है तीन, 'वेणी' का अर्थ है संगम, और 'संगम' का अर्थ है मिलन, जो इन तीन नदियों के मिलन बिंदु का प्रतीक है। यह स्थान अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है और हिंदू तीर्थयात्राओं के लिए एक प्रमुख स्थल है।
आज्ञा चक्र पर ध्यान करना जरूरी क्यों?
आज्ञा चक्र हमारे मस्तक पर दोनों भृकुटियों के मध्य में स्थित है। यह हमारी प्राणिक प्रणाली का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह चक्र बुद्धि और स्पष्टता का केंद्र है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत और विशुद्ध चक्र के बाद आज्ञा चक्र छठा चक्र है। आज्ञा चक्र दो पंखुड़ियों वाला कमल पुष्प है जो दर्शाता है कि इस स्तर पर आध्यात्मिक विकास होने पर साधक के लिए केवल दो "आत्मा" और "परमात्मा" ही रह जाते हैं। ऐसा साधक बौद्धिक रुप से संपन्न, तीक्ष्ण बुद्धि और संवेदनशील होते हुए शांत और मौन रहता है और इसलिए उसको बौद्धिक सिद्ध कहा जाता है। संसार की विविध परिस्थितियों से साधक विचलित नहीं होता।
आज्ञा चक्र के जागृत होने पर नाड़ी तंत्र पूर्णरूप से जाग्रत, स्वस्थ एवं सशक्त हो जाता है और साधक को सर्वोच्च चेतना और समाधि का अनुभव होता है। हमारे नाड़ी तंत्र की 3 प्रमुख नाड़ियां- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना, मूलाधार से अलग-अलग ऊर्ध्व में प्रवाहित होकर इस स्थान पर संगम को प्राप्त करती हैं। इन विशिष्ट नाड़ियों के विषय में योग ग्रंथों में कहा गया है:-
"इड़ा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी।
तर्योमध्यगत नाड़ी सुषुम्नाख्या सरस्वती।।"
अर्थ:- इड़ा नाड़ी गंगा, पिंगला यमुना और सुषुम्ना सरस्वती नदी के समान है और इनके संगम स्थान को "त्रिवेणी" कहते हैं। जो साधक इस त्रिवेणी में स्नान कर लेता है, मतलब आज्ञा चक्र में अवस्थित हो जाता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस अवस्था में मन और बुद्धि का मिलन हो जाता है। योगाभ्यास और गुरू कृपा से सुषुम्ना मार्ग से होती हुई कुण्डलिनी शक्ति जब साधक के आज्ञा चक्र में प्रवेश करती है तब उसको अंतरज्योति प्रत्यक्ष होती है और अंतरनाद सुनने लगता है। इस स्तिथि को पाने के बाद साधक को ब्रह्माण्ड में प्रवेश की योग्यता या प्रभु की आज्ञा प्राप्त होती है और इसलिए उसे आज्ञा चक्र कहा गया है। तत्पश्चात नित्य साधना से जब साधक की कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार चक्र में विलीन हो जाती है तब साधक परमात्म ज्ञान को पा कर मोक्ष प्राप्त करता है।
** आज्ञाचक्र पर ध्यान करने के विशेष लाभ:-
आज्ञा चक्र के जाग्रत होने से साधक के भीतर की अनंत सुप्त शक्तियां और सिद्धियां जाग्रत हो जाती हैं।
साधक के भीतर विशेष चुंबकीय ऊर्जा का निर्माण होता है जिसके प्रभाव से उसके सभी कर्म या संस्कार नष्ट होते हैं।
साधक को अपार एकाग्रता प्राप्त होती है।
विचारों में दृढ़ता और दृष्टि में चमक आ जाती है।
साधक का ज्ञान नेत्र या दिव्य दृष्टि जागृत होती है जिससे उसको दूर दृष्टि(पूर्ण ज्ञान) के साथ त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान और भविष्य काल का ज्ञान) भी प्राप्त होती है।
गुरु बिना साधना अधूरी है
साधना केवल तकनीक नहीं — ऊर्जा का स्थानांतरण है
जब गुरु दीक्षा देता है, वह केवल मंत्र नहीं देता — वह अपनी आत्मिक ऊर्जा भी शिष्य में डालता है।
यही कारण है कि गुरु की दी हुई साधना अक्सर 10 गुना तेजी से फल देती है। ज़ब आप गुरु को ही ब्रह्म समझते हैं —
तो आपकी चेतना भी उसी ब्रह्म-तरंग से जुड़ जाती है।
गुरु और शिष्य के बीच की यह तरंग ही साधना का इंजन है।”
और जब आप साधना करते हो तो कोई भी शक्ति आप पर हावी होने से पहले आपके गुरु से टकराती है जब आप साधना करते हो तो आपके घर पर या अन्य जगह पर तो कोई आशुरी शक्ति आपके कार्य में विध्न डालती है जैसे आपका बीमार होना या फिर ऐसा कोई कार्य आना जिस वजह से आप पूजा नहीं कर पाओ या घर में लड़ाई होना मन का उच्चाटन होना इस लिए बिना गुरु के कोई कार्य ना करे
“जो गुरु से , जिज्ञासा न्हीं रखता वह अज्ञानी रह जाता है।
जो गुरु पर प्रश्न करता है, वह मार्ग से गिर जाता है।
जो गुरु के वचनों को आत्मा में बसाता है, वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है।”
जय श्री गुरुदेव 🙏
क्या है यह प्राण ऊर्जा और हमारा अध्यात्म?
हमारे वेदों और उपनिषदों में साफ लिखा है कि यह पूरा ब्रह्मांड और हमारा यह शरीर ईश्वर की चेतना से चल रहा है। जिसे आज की दुनिया ऊर्जा या एनर्जी कहती है, हमारे ऋषि-मुनियों ने सदियों पहले उसे ही "प्राण" कहा था। जब तक हमारे भीतर यह प्राण शक्ति शुद्ध और भरपूर रहती है, हमारा मन शांत रहता है, चेहरे पर तेज रहता है और बीमारियां हमसे कोसों दूर रहती हैं।
लेकिन जब हम बहुत ज्यादा चिंता करते हैं, मोह-माया में फंसते हैं या नकारात्मक विचार रखते हैं, तो हमारे भीतर के ये आध्यात्मिक केंद्र (चक्र) मैले हो जाते हैं। जैसे किसी बहती नदी में कचरा फंस जाए, तो पानी रुक जाता है, वैसे ही हमारे भीतर प्राण शक्ति का बहना रुक जाता है। इसी को आज की भाषा में ब्लॉकेज कहते हैं।
स्पर्श चिकित्सा: हमारी अपनी सनातनी विद्या
अब बात आती है कि इसे ठीक कैसे करें? हमारे शास्त्रों में "स्पर्श चिकित्सा" और "अंग न्यास" का वर्णन मिलता है। आपने देखा होगा, जब हमारे यहाँ कथा-पूजा होती है, तो पंडित जी हमारे माथे, दिल और नाभि पर हाथ रखवाकर मंत्र बोलते हैं। हमारे बड़े-बुजुर्ग जब सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं, तो हमें एक अजीब सी शांति मिलती है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, यह शुद्ध आध्यात्मिक विज्ञान है। उनके हाथों से निकली सकारात्मक प्राण ऊर्जा हमारे भीतर समा जाती है।
इसी प्राचीन स्पर्श चिकित्सा और प्राण विद्या को आज दुनिया "रेकी" के नाम से जानती है। नाम चाहे जो हो, पर इसकी आत्मा पूरी तरह भारतीय और आध्यात्मिक है।
चेतना की चार अवस्थाएंजाग्रत अवस्था (Waking State): यह हमारा सचेत मस्तिष्क है, जिसमें 'बीटा वेव्स' सक्रिय होती हैं।स्वप्न अवस्था (Dream State): यह कल्पनात्मक मस्तिष्क है, जिसमें 'थीटा वेव्स' चलती हैं।सुषुप्ति अवस्था (Deep Sleep): यह गहरी नींद और शांत मस्तिष्क की स्थिति है, जिसमें 'डेल्टा वेव्स' उत्पन्न होती हैं।तुरीय अवस्था (Pure Consciousness): यह शुद्ध चेतना और अद्वैत अवस्था है, जो डेल्टा से भी परे पूर्ण मौन की स्थिति है।तुरीय अवस्था क्या है?यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे शुद्ध चेतना की अवस्था है।यहाँ व्यक्ति पूर्ण आंतरिक शांति और असीम सुख का अनुभव करता है।चेतना की यात्रा: इंद्रियों से मन तक, मन से बुद्धि तक, बुद्धि से आत्मा तक, और आत्मा से ब्रह्म तक।डेल्टा वेव्स और मोंक मोड का विज्ञानगहरा ध्यान: गहरे ध्यान में मस्तिष्क डेल्टा वेव्स (0.5 - 4 Hz) उत्पन्न करता है, जो शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण विश्राम देती हैं।मोंक मोड के लाभ:आत्म-चित्त रीस्टोर होता है।रचनात्मकता बढ़ती है।संवेग शक्ति संतुलित होती है।न्यूरल नेटवर्क सिंक्रोनाइज़ होता है।न्यूरोकेमिकल संतुलन (Neurochemical Balance)मोंक मोड और ध्यान के दौरान शरीर में ये रासायनिक बदलाव होते हैं:डोपामाइन: स्थिर होता है।सेरोटोनिन: संतुलित होता है।मेलाटोनिन: बढ़ता है (बेहतर नींद और आराम के लिए)।एंडोर्फिन: प्राकृतिक सुख और आनंद का अहसास कराता है।डेल्टा वेव्स की शक्तिइसके माध्यम से चार मुख्य लाभ मिलते हैं: गहन विश्राम, मानसिक शांति, आध्यात्मिक जागृति, और शरीर का पुनर्निर्माण (Rejuvenation)।
ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः
गुरु सियाग सिद्धयोग
संजीवनी मंत्र से कुंडलिनी जागरण
निःशुल्क
दिव्य संजीवनी मंत्र के लियेः
"क्लीं कृष्ण क्लीं"
“Kling Krishna Kling”
राधा के बिना कृष्ण आधा कोई भी मंत्र बिना शक्ति के काम नहीं करता,,,
the-comforter.org
[[[स्त्यम जयते]]]
श्री गुरूवे नमः
पग_पग_ठोकर_खाई_पर_अक्ल_कभी_ना_आई
महाभारत से क्या सीख मिलती है , अगर केवल यही लिखा जाये तो बहुत से विद्वान अपने ज्ञान को यहाँ पुरा का पुरा उडेल देगें , अगर श्रीमद्भागवत गीता की बात करेगे तो विद्वानों की बाढ आ जायेगी। पर महाभारत से मनुष्य को या ये कहिए कि आज के हिन्दू समुदाय को क्या प्रेरणा मिलती है । अगर गीता की बात करेगें तो कोई ज्ञानयोग , तो कोई कर्मयोग की बात करेगा कोई वेदो का सार यह समझायेगा पर सीधे रास्ते पर नही आयेगा। यह विडम्बना थी उस प्राचीन काल मे भी और अब वर्तमान काल मे भी पर कुछ नही बदला बदले है किरदार बस फर्क यह कि पहले यह मर्यादित था पर अब नही।
महाभारत काल के बाद बहुत से ऋषि मुनि योगी हुए उनमे से एकाध ने यह समझाने के लिए प्रयास किया परन्तु वे विफल रहे है, हमे धर्म कमर्काण्ड ज्ञान लोक, परलोक के विषय ज्ञान बहुत ही भारी मात्रा मे मिलता है पर महाभारत रामायण जैसे ग्रन्थों से सीख नही मिलती है । और हम सीखना भी नही चाहते हमे उच्च पद चाहिए बैसुमार दोलत चाहिए उसके लिए चाहे कुकर्म करे अथवा सतकर्म हम अपना पुरा जीवन अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने मे लगे रहते है। और यह भी अच्छी तरह जानते है । कि चाहे सुई के नाके से हाथी निकलना समभ्व है पर इस लोक किसी भी भौतिक वस्तु को ले जाना मरते वक्त ले जाना सम्भव नही है।
महाभारत मे क्या है और क्या सीखना चाहिए यह बहुत ही अनिवार्य है। द्रोपदी का चीर हरण एक बहुत ही शर्मनाक घटना थी ,उसी के कारण यह महाभयंकर युद्ध हुआ था। युद्ध के समय पर कौरवों पास ११ अक्षोणी सेना थी जो अधर्म के पक्ष मे थी, जिसमे उसकाल के महाविद्वान लोग भी शामिल गुरूद्रोण,देवव्रत भीष्म और कर्ण जैसे महादानी भी थे। और पाडव सेना केवल सात अक्षोणी सेना थी वो धर्म और अत्याचार के विरूद्ध थी ।पर सत्य यह था कि असत्य का साथ देने वाले ज्यादा थे।
क्या उनमे कोई उनमे विधर्मी थे नही ये सब एक ही समुदाय व एक ही परिवार के लोग थे उसी परिवार से एक अकेला दुर्योधन लोभी असभ्य व बेईमान शोषण करने वाला था बाकि सब उसका पाण्डवों के विरूद्ध समर्थन करने वाले थे। और शोषण होने वाले पांच भाई थे, जो एक थे, और उनकी एकता के कारण वे विजयी हुए थे। आज भी वही स्थिति है दुष्ट का समर्थन ज्यादा लोग करते है।, हमारी यह भूल हमे युगों युगों से पराधीन बनाती है अब अगर श्रीमद्भागवत गीता की बात करे ।वहां पर भी एक ही बात सीखने को मिलती है ।
दुष्ट , पापी, अधर्मी ,चाहे वह हमारा भाई, दादा, बाबा, मामा ,गुरू , यहा तक सगा भाई ही क्यो ना हो उसका भी अन्त कर देना चाहिए ।पर आज क्या है अगर किसी भी जाति का कोई नेता है ,चाहे वह कितना ही दुष्ट क्यो ना हो चाहे उसकी जाति वालो ने उसकी सुरत भी ना देखी हो पर आम जनता अपनी ही जाति समुदाय के व्यक्ति को ही चुनने की कौशिस करती है ।
आजकल जाति आधार पर ही सब नेता खडे है और वे अपने फायदे के लिए उचित और अनुचित कार्य ही करते रहते है एक चतुर चालाक व्यक्ति अपने पुरे समुदाय को धरने दंगे फसाद मे झोकता रहता है और खुद बडे आराम से रहता है एक सौ तीस करोड लोगो को मुठ्ठी भर लोग परेशानी डाल रहे है ।
अब महाभारत काल के अगर अब दस कृष्ण दस अर्जुन एक तो उनके साथ कुछ लाख लोग खडे हो सकते है। क्यो आज दुर्योधन शुकनियो की संख्या अधिक है यही महाराणा प्रताप वीर शिवाजी के साथ हुआ वे लड़े रहे कुछ न उनके विरोधीयो का साथ दिया और कुछ उन्हें चुपचाप मरते देखते रहे जब तक हम अपने स्वार्थ लोभ धन पद की कुंठाये नही छोड सकते तब तक ऐसा होता रहेगा।
हमारी इन्हें कुठाओं की वजह से हम एक देश का हिस्सा बन गये पर हमारी आते वही रही धृणा निंदा और वर्षा के कारण कभी आने वाली पिढी केवल किताबों मे ही हमे पढे कि हम थे यहाँ पर थे कभी मै लिखना तो बहुत चाहता पर मुझे पता सत्य का साथ कोई नही देता यहाँ पर पोस्ट कॉपी करके अपने नाम से डालने वाले बहुत है गुरूजी गुरूजी करने वाले बहुत है पर गुरू समझने वाले तो कोई नही यहाँ पाखण्ड और वेशभुषा नही पर साधु को समझने वाले बहुत कम है
**ॐ अन्तर्हितात्मने नमः**
**Om Antarhitatmane Namah**
**अर्थ**: उस परमात्मा को नमन जो सबके भीतर छिपा हुआ है, जो अन्तर्यामी आत्मा है।
सनातन धर्म का सबसे गूढ़ रहस्य इसी एक नाम में समाया है — **ईश्वर कहीं दूर नहीं, तुम्हारे भीतर ही छिपा बैठा है**। ‘अन्तर्हित’ = भीतर छिपा हुआ + ‘आत्मा’ = सबका सार। जो दिखता नहीं, पर सबको चलाता वही है।
---
1. ‘अन्तर्हितात्मा’ का वैदिक आधार**
**A. उपनिषदों की घोषणा**
> **"अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्"** — कठोपनिषद 1.2.20
> अर्थ: वह आत्मा अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है। हर जीव के हृदय-रूपी गुफा में छिपा बैठा है।
> **"ईशावास्यमिदं सर्वं"** — ईशावास्य उपनिषद
> यह सारा जगत ईश्वर से व्याप्त है। बाहर भी, भीतर भी।
**B. भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का वचन**
> **"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"** — गीता 18.61
> हे अर्जुन, ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
> **"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो"** — गीता 15.15
> मैं ही सबके हृदय में बैठा हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है।
**C. विष्णु सहस्रनाम में स्थान**
विष्णु सहस्रनाम के 1000 नामों में एक नाम है — **अन्तर्हितात्मा**। भगवान का वह रूप जो योगियों के ध्यान में, भक्तों के प्रेम में और ज्ञानी के अनुभव में प्रकट होता है, पर सामान्य आँखों से छिपा रहता है।
अन्तर्हितात्मा को समझने के 4 दृष्टांत**
| दृष्टांत | छिपा हुआ तत्व | जीवन का पाठ |
| --- | --- | --- |
| **दूध में घी** | घी दूध में है पर दिखता नहीं। मथने पर प्रकट होता है। | साधना = मंथन। बिना अभ्यास, ईश्वर अनुभव नहीं होता। |
| **लकड़ी में अग्नि** | आग हर लकड़ी में है पर रगड़ने पर ही चमकती है। | गुरु-मंत्र की रगड़ से भीतर का ब्रह्म जागता है। |
| **तिल में तेल** | तेल तिल में व्याप्त है पर पेरने पर निकलता है। | कष्ट, तप = कोल्हू। दुख में ही भीतर की शक्ति निकलती है। |
| **कस्तूरी मृग** | हिरण की नाभि में कस्तूरी, पर वह बाहर ढूँढता फिरता है। | आनंद बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है। भागना बंद करो, बैठो। |
---
### **3. अन्तर्हितात्मा के 3 रूप — कैसे प्रकट होता है?**
**1. साक्षी रूप**:
वह कुछ करता नहीं, सिर्फ देखता है। तुम क्रोध करो, प्रेम करो, रोओ — वह चुपचाप देखता है। गीता 13.23: **"उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः"**। इसी साक्षी को जानना = मुक्ति।
**2. प्रेरक रूप**:
जब तुम दुविधा में हो और भीतर से आवाज आए "ये सही है" — वही अन्तर्यामी है। सत्य का, धर्म का संकेत वही देता है। उसे ही ‘Conscience’ कहते हैं।
**3. फलदाता रूप**:
कर्म तुम करते हो, फल वही भीतर से देता है। इसलिए कहा — **"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"**। फल की डोर उसके हाथ में है क्योंकि वह अन्तर्हित है।
पौराणिक प्रसंग : प्रह्लाद और अन्तर्हितात्मा**
हिरण्यकश्यप ने पूछा, "कहाँ है तेरा भगवान?"
प्रह्लाद बोला, **"खंभे में भी, कण-कण में भी।"**
असुर ने खंभे पर प्रहार किया। उसी खंभे से नरसिंह प्रकट हुए।
**रहस्य**: भगवान कहीं से “आए” नहीं थे। वे खंभे में **अन्तर्हित** थे ही। भक्त के विश्वास ने परदा हटा दिया। जब तुम्हारी पुकार सच्ची हो, तो दीवार भी दरवाजा बन जाती है, क्योंकि वह हर जगह छिपा है।
मंदिर जाने की जरूरत नहीं, मंदिर बनने की जरूरत है**
अन्तर्हितात्मने नमः हमें सिखाता है कि तीर्थ यात्रा का अंतिम पड़ाव तुम्हारा हृदय है। मूर्ति पूजा इसलिए है ताकि एक दिन तुम्हें एहसास हो — **पूजने वाला और पूज्य एक ही है**।
जब मीरा ने कहा "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो", तो धन बाहर नहीं मिला था। भीतर के अन्तर्हित राम प्रकट हुए थे।
**"देहो देवालयः प्रोक्तः जीवो देवः सनातनः।
त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत्॥"**
शरीर ही देवालय है, जीव ही सनातन देव है। अज्ञान की गंदगी हटाकर ‘सोऽहम्’ भाव से उसकी पूजा करो।
**इंगला, पिंगला और सुषमना नाड़ी खुलने पर क्या होता है?**
योग और ध्यान के बहुत से मार्गों में इंगला, पिंगला और सुषमना नाड़ियों का उल्लेख मिलता है।
साधक जब अपने श्वास और चेतना को इन नाड़ियों में केंद्रित करता है, तब उसकी साँस बहुत सूक्ष्म होने लगती है।
कहा जाता है कि वायु आँखों के बीच सूक्ष्म छिद्र से होकर सुषमना नाड़ी में प्रवेश करती है, जिससे प्रकाश, आनंद और रूहानी अनुभव महसूस होने लगते हैं।
इसी कारण बहुत से साधक इन अनुभवों को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं।
लेकिन संतों ने इस मार्ग पर गहरा प्रश्न उठाया है।
संत कहते हैं —
“इंगला बिनसे, पिंगला बिनसे, बिनसे सुषमना नाड़ी ।
जब उनमून की तारी टूटे तब कहा रहे तुम्हारी ।”
अर्थात जब शरीर ही छूट जाएगा, तब यह चेतना इंगला, पिंगला और सुषमना में जाकर उस प्रकाश का अनुभव कैसे करेगी?
जब देह समाप्त होगी, तब ये नाड़ियाँ भी शरीर के साथ समाप्त हो जाएँगी।
संत इसी बात की ओर संकेत करते हैं कि यदि साधना केवल शरीर और नाड़ियों तक सीमित रह जाए, तो शरीर छूटने के बाद साधक कहाँ रहेगा?
फिर उसकी चेतना का आधार क्या होगा?
इसीलिए संत चेतना को किसी शरीर आधारित अनुभव, प्रकाश या आनंद तक सीमित नहीं मानते।
वे उस मूल “शब्द स्वरूप” की बात करते हैं जो शरीर, नाड़ियों और श्वास से भी परे बताया गया है।
संतों का प्रश्न यही है —
यदि सब कुछ शरीर के साथ समाप्त हो जाए, तो वास्तविक और अविनाशी तत्व क्या है?
**इसी भेद की गुत्थी को सुलझाने के लिए Follow