Amit

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@Radical_Amit

I'm my ancestor's wildest dream.

New Delhi, India Katılım Temmuz 2021
772 Takip Edilen788 Takipçiler
Amit
Amit@Radical_Amit·
I think Kangana Ranaut went after Saurav Das because he looks like a young Hrithik Roshan.
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Rajesh Sahu
Rajesh Sahu@askrajeshsahu·
इस व्यक्ति ने जंतर-मंतर जा रहे दो लड़कों को सरेआम पीटा। पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। थेथरई देखिए, अब इंटरव्यू दे रहा और कह रहा कि उन लड़कों ने भगवान को गाली दी। जबकि उस वीडियो में बच्चे खुद ही डरे और सहमे नजर आए थे।
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Subhajit Naskar
Subhajit Naskar@subhajit_n·
Opposition has already a lost a golden opportunity by maintaining strategic silence during UGC Equity Regulations, they have a chance now to stand by Women,SC, ST & OBCs by unequivocally condemning the anti reservation conspiracy and propaganda.
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Amit
Amit@Radical_Amit·
Usme se 15% aap log unko de do jo aarakshan se vanchit reh gaye hain. Hame koi dikkat nahin hai
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Amit
Amit@Radical_Amit·
अभी कुछ और इस्तीफ़े होने बाकी हैं। किसी भी आंदोलन को समझने की सबसे आसान और सबसे ग़लत विधि यह है कि उसे उसकी मांगों से समझा जाए। मांगें हमेशा दिखाई देती हैं, लेकिन आंदोलन की वास्तविक शक्ति उन बातों में छिपी होती है जो लोग पहली बार समझने लगते हैं। जंतर मंतर पर सबसे महत्वपूर्ण घटना यह थी कि हजारों युवाओं ने पहली बार अपने जीवन की निजी परेशानियों को एक-दूसरे की कहानी में पहचान लिया। अब तक उन्हें बताया जाता था कि अगर चयन नहीं हुआ, तो मेहनत कम थी। नौकरी नहीं मिली, तो योग्यता कम थी। भविष्य अंधेरे में है, तो योजना ठीक नहीं थी। यानी हर असफलता का मालिक व्यक्ति था और हर सफलता का मालिक व्यवस्था। लेकिन जंतर मंतर ने इस कथा को उलट दिया। व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह करोड़ों लोगों को यह विश्वास दिला देती है कि उनकी समस्याएं अलग-अलग हैं। जैसे ही लोग समझ लेते हैं कि उनकी तकलीफ़ों की जड़ एक ही है, व्यवस्था की सबसे मज़बूत दीवार में भी दरार पड़ जाती है। इसीलिए हर सत्ता चाहती है कि छात्र सिर्फ़ छात्र रहे, किसान सिर्फ़ किसान रहे, मज़दूर सिर्फ़ मज़दूर रहे और बेरोज़गार सिर्फ़ बेरोज़गार रहे। अगर ये सब एक-दूसरे को पहचानने लगें, तो संघर्ष समाज का संघर्ष बन जाता है। जंतर मंतर ने इसी संभावना की झलक दिखाई। यहां पहली बार बड़ी संख्या में युवाओं ने महसूस किया कि वे एक ही संकट के अलग-अलग चेहरे हैं। हर व्यवस्था अपने अस्तित्व के लिए प्रतिस्पर्धा को ज़रूरी मानती है। लेकिन प्रतिस्पर्धा का एक अनचाहा परिणाम भी होता है। जब लाखों लोग एक साथ हारने लगते हैं, तो पूछना शुरू कर देते हैं कि जीत आखिर किसकी हो रही है। इसी सवाल से हर सत्ता डरती है। ~Manoj Abhigyan
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Amit
Amit@Radical_Amit·
यह भ्रम है कि आंदोलन की जीत और हार का फैसला उसी दिन हो जाता है, जिस दिन धरना खत्म होता है। जंतर मंतर के आंदोलन को भी इसी कसौटी पर समझना चाहिए। यदि इसे पेपर लीक विवाद मान लिया जाए, तो यह कुछ दिनों की खबर है। लेकिन यदि इसे उस दौर का संकेत माना जाए, जहां युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा दरकने लगा है, तब इसका अर्थ बिल्कुल बदल जाता है। किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा होता है। जिस दिन लोग यह मानना छोड़ देते हैं कि संस्थाएं निष्पक्ष हैं, उसी दिन व्यवस्था भीतर से खोखली होने लगती है। यही कारण है कि जंतर मंतर का प्रभाव केवल वहां मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहेगा। वे लाखों युवा भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जो वहां नहीं पहुंचे, लेकिन जिन्होंने पहली बार यह महसूस किया कि उनकी बेचैनी अकेली नहीं है। इतिहास में ऐसे क्षण बार-बार नहीं आते। कभी-कभी कोई छोटा-सा संघर्ष पूरे युग की दिशा बदल देता है, क्योंकि वह लोगों को यह सिखा देता है कि व्यवस्था अटल नहीं होती। जो संस्थाएं हमेशा अजेय दिखाई देती हैं, वे भी जनता के विश्वास पर ही खड़ी होती हैं और जब विश्वास खिसकना शुरू होता है, तब परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी होती है, भले ही सत्ता को इसका एहसास बहुत देर से हो। ~Manoj Abhigyan
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Amit@Radical_Amit·
जंतर मंतर के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि व्यवस्था क्या करेगी? व्यवस्था आंदोलनों से तब डरती है जब आंदोलन लोगों के सोचने का तरीका बदल देते हैं। इसीलिए सत्ता का प्रयास आंदोलन को हराना नहीं, उसकी स्मृति को मिटाना होता है। उसे किसी एक घटना, किसी एक नेता, किसी एक मांग या किसी एक संगठन तक सीमित कर देना होता है, ताकि लोग उस बड़े सवाल तक कभी पहुंच ही न सकें जिसने आंदोलन को जन्म दिया था। जंतर मंतर के साथ भी यही कोशिश होगी। कुछ लोग कहेंगे कि यह परीक्षा सुधार का आंदोलन था... कुछ कहेंगे कि यह छात्रों का गुस्सा था... कुछ इसे विपक्ष और सत्ता की लड़ाई बनाकर पेश करेंगे। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न गायब कर दिया जाएगा कि आखिर क्यों हर कुछ महीनों में देश का कोई न कोई वर्ग सड़क पर दिखाई देता है? यह भ्रम है कि आंदोलन की जीत और हार का फैसला उसी दिन हो जाता है, जिस दिन धरना खत्म होता है। जंतर मंतर के आंदोलन को भी इसी कसौटी पर समझना चाहिए। यदि इसे पेपर लीक विवाद मान लिया जाए, तो यह कुछ दिनों की खबर है। लेकिन यदि इसे उस दौर का संकेत माना जाए, जहां युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा दरकने लगा है, तब इसका अर्थ बिल्कुल बदल जाता है। किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा होता है। जिस दिन लोग यह मानना छोड़ देते हैं कि संस्थाएं निष्पक्ष हैं, उसी दिन व्यवस्था भीतर से खोखली होने लगती है। यही कारण है कि जंतर मंतर का प्रभाव केवल वहां मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहेगा। वे लाखों युवा भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जो वहां नहीं पहुंचे, लेकिन जिन्होंने पहली बार यह महसूस किया कि उनकी बेचैनी अकेली नहीं है। इतिहास में ऐसे क्षण बार-बार नहीं आते। कभी-कभी कोई छोटा-सा संघर्ष पूरे युग की दिशा बदल देता है, क्योंकि वह लोगों को यह सिखा देता है कि व्यवस्था अटल नहीं होती। जो संस्थाएं हमेशा अजेय दिखाई देती हैं, वे भी जनता के विश्वास पर ही खड़ी होती हैं और जब विश्वास खिसकना शुरू होता है, तब परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी होती है, भले ही सत्ता को इसका एहसास बहुत देर से हो। ~Manoj Abhigyan
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Amit
Amit@Radical_Amit·
Maine pahle hi bola tha har anti-modi, anti-BJP wala krantikari nahi hai. Iske liye anti-modi patrkarita audience paane ka ek badhiya jariya hai. वैसे @Abhinavpinch, Tumne dhang se padhayi nahin kari, isliye bata raha hun. Political reservation sirf 10 ke liye tha. Dr Ambedkar ne political reservation ko 10 saal ke liye bola tha. Samjhe?
Abhinav Pandey@Abhinavpinch

#प्रेसकॉन्फ्रेंस बाबा साहेब अम्बेडर ने 10 साल के लिए आरक्षण के लिए कहा था लेकिन आज के नेताओं ने उनका अपमान कर दिया है, 60 साल से लागू है.

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Amit
Amit@Radical_Amit·
Which is worse? 1. A woman can't become a Good Housewife. Or 2. A woman who CAN become a Good Housewife but nobody wants marry her.
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Abhijeet Dipke
Abhijeet Dipke@abhijeet_dipke·
Since we’re analysing Gen Z language…
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Roshan Rai
Roshan Rai@RoshanKrRaii·
Rahul Gandhi in Lok Sabha : Amit Shah ordered firing on Students, this is why he is absent today, doesn’t have the guts to face the people. All BJP MPs started jumping like Popcorns, more rattled than even when Modi is targeted. Now you know where “Tote ki Jaan” is.
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Sajjan Bhadouriya
Sajjan Bhadouriya@SajjanBhad818·
क्षत्रिय युवा ध्यान दें। “आरक्षण हटाओ” जैसे आंदोलनों में क्षत्रिय समाज को अपना कंधा देने से पहले यह समझना जरूरी है कि कहीं कोई राजनीतिक ताकत अपने हित के लिए हमें मोहरा तो नहीं बना रही। आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करना न व्यावहारिक है, न यह क्षत्रिय समाज की वास्तविक प्राथमिकता होनी चाहिए। हमारी बात आरक्षण-विरोध नहीं, बल्कि EWS कोटा में वर्गीकरण बनाने तक सीमित रहना चाहिए। क्षत्रिय समाज को किसी ऐसे आंदोलन का हिस्सा नहीं बनना चाहिए जिसका अंतिम राजनीतिक लाभ किसी और को मिले और सामाजिक नुकसान हमारे हिस्से आए। मेरा ऐसे किसी आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है। आशा है, क्षत्रिय युवा भी राजनीतिक दाँव-पेंच को समझेंगे और अपने समाज को किसी के हाथ का हथियार नहीं बनने देंगे।
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