राम की राघवी 🏹

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राम की राघवी 🏹

@Raghvi06

Freelance Journalist | Spiritual Writer राम-भक्ति और वैराग्य के भावों का शब्द-संग्रह। 🙏 लिखना ही मेरी पूजा और आजीविका है।

श्री जानकीनाथ के चरणों में Katılım Şubat 2017
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राम की राघवी 🏹
🙏🏻🙏🏻
tripti 1/0@tapai02

@Raghvi06 समर्पण ही अंतिम उपाय है जब मंत्र स्वयं जपा जाय ( परा वाणी में)तब आप अपने इष्ट में स्थित होंगी

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Mania.TE🇧🇮
Mania.TE🇧🇮@Maniabaegirl·
Save this video to show your daughter when she asks how she was born 😅
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चिरई 🐦
चिरई 🐦@_Vaaridri_·
दूर - दूर तक बार बराबर, राई भर नात व्यवहार जोड़कर , जान - पहचान निकालकर किलकारी मार मारकर कोई बधाई देने से बच गया हो ,थक गया हो तो मुझसे संपर्क कर सकता है । छुट्टी के मद्देनजर आज मैं फ्री हूं तब भी बधाई नहीं दूंगी । चाहे कोई मुझे जंगली कहे ... 🙂
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tripti 1/0
tripti 1/0@tapai02·
A child named....... She was named tripti by her family doctor for she fell ill before namkaran ceremony 😄
tripti 1/0 tweet media
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राम की राघवी 🏹
@_Vaaridri_ जीजा देवर फूफा प्रत्याशी भी लिखा जाना चाहिए भाभी ही क्यों 😂😂😂
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चिरई 🐦
चिरई 🐦@_Vaaridri_·
माना कि राजनीति में किसी का समर्थक होने पर आँख पर पट्टी बंध जाती है , पर भावी प्रत्याशी को भाभी प्रत्याशी लिखने से बचें । 😐
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चिरई 🐦
चिरई 🐦@_Vaaridri_·
समालोचना होती तो कोई बात बनती , सिर्फ़ एकतरफा छिद्रांवेषण बता रहा कि डिग्रियों में विषयों के साथ अहम् ब्रह्मास्मि के भी नंबर चढ़े थे । 🙂
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Tehxi
Tehxi@yajnshri·
देहरी को पवित्र स्थान है, यदि हम इसकी पूजा नहीं करते इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा आ सकती है और लक्ष्मी का अपमान होता है। माता लक्ष्मी का प्रवेश भी इसी स्थान से होता है, इसलिए इसे साफ और सम्मानित रखना चाहिए।
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राम की राघवी 🏹
👌🏻👌🏻
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

हम मिडिल क्लास लड़के हैं...हमारी ज़िंदगी किसी ख्वाहिश की किताब नहीं होती, एक हिसाब-किताब की डायरी होती है जहाँ हर पन्ने पर जोड़-घटाव लिखा होता है, और हर अंत में “एडजस्ट कर लिया” का निष्कर्ष। बचपन में जब पहली बार कुछ माँगने का मन करता है, तब ही सिखा दिया जाता है "इतना ही काफी है।" और यही “काफी” धीरे-धीरे हमारी पूरी ज़िंदगी बन जाता है। खिलौनों से लेकर सपनों तक, सब कुछ आधा मिलता है और हम उसे पूरा मानने का अभिनय सीख जाते हैं। हम मिडिल क्लास लड़के हैं…हमें रोने की इजाज़त नहीं होती, क्योंकि घर में पहले से ही बहुत कुछ टूटा होता है पिता की कमाई, माँ की उम्मीदें, बहन की शादी की चिंता और इन सबके बीच हमें सिखाया जाता है कि “मर्द बनो” मगर कोई ये नहीं बताता कि मर्द बनने के चक्कर में इंसान कब मर जाता है। जब पिता कहते हैं “बेटा, अभी पैसे नहीं हैं बहन की शादी करनी है…” तो हम मुस्कुरा कर कहते हैं “कोई बात नहीं पापा, मैं खुद संभाल लूंगा…” उस एक वाक्य में हम अपनी पढ़ाई, अपने सपने, अपनी इच्छाएँ सब गिरवी रख देते हैं बिना किसी शोर के। ये बलिदान नहीं होता, ये आदत बना दी जाती है एडजस्टमेंट की। रिश्तेदार जब ताने मारते हैं “अब तक कुछ किया नहीं?” तो हम सिर झुका लेते हैं क्योंकि हमें जवाब देना नहीं, सहना सिखाया गया है।उनकी नज़रों में हम निकम्मे होते हैं, लेकिन उन्हें ये नहीं दिखता कि हम हर दिन अपने आत्मसम्मान की चिता पर थोड़ा-थोड़ा जलते हैं। हम मिडिल क्लास लड़के हैं…हमें प्यार भी सोच-समझकर करना पड़ता है, क्योंकि दिल टूटने से ज्यादा डर जेब खाली होने का होता है।हम किसी को पसंद तो करते हैं, मगर इज़हार से पहले ही अपने हालात का हिसाब लगा लेते हैं “क्या मैं उसे वो ज़िंदगी दे पाऊंगा जिसकी वो हकदार है?” और फिर चुपचाप अपने ही दिल को समझा देते हैं एडजस्ट कर ले। कॉलेज में जब टीचर सही जवाब देने के बाद भी जलील करता है, तो हम बहस नहीं करते, क्योंकि हमें डिग्री चाहिए, इज्ज़त नहीं। हमें सर्टिफिकेट चाहिए, स्वाभिमान नहीं। ये भी एक तरह का समझौता है, जो धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाता है। पड़ोसी जब बेरोजगारी पर ताना मारते हैं, तो हम दरवाज़ा बंद कर लेते हैं क्योंकि बाहर की आवाज़ों से ज्यादा अंदर की खामोशी हमें तोड़ती है। हर दिन खुद से लड़ते हैं, खुद को समझाते हैं “बस थोड़ा और…सब ठीक हो जाएगा…” और यही “थोड़ा और” सालों में बदल जाता है। हम मिडिल क्लास लड़के हैं…हमें सपने देखने से पहले उनकी कीमत पूछनी पड़ती है। हमारे लिए हर खुशी EMI पर आती है धीरे-धीरे, किस्तों में और कभी-कभी तो पूरी चुकाने के बाद भी अधूरी रह जाती है। सब कहते हैं संघर्ष ही जीवन है, लेकिन कोई ये नहीं बताता कि ये संघर्ष कब तक? कितनी बार खुद को तोड़कर फिर से जोड़ें हम? कितनी बार अपने हिस्से की खुशियों को “अभी नहीं” कहकर टालें? गजब का ये एडजस्टमेंट है जहाँ हम हर जगह फिट हो जाते हैं, लेकिन कहीं भी अपने नहीं हो पाते। घर में जिम्मेदारियाँ हमें बड़ा बना देती हैं, और समाज हमें छोटा महसूस कराता रहता है।हम हर जगह मौजूद होते हैं लेकिन किसी की प्राथमिकता नहीं होते। और सबसे कड़वा सच तो ये है कि एक दिन हम इतने ज्यादा एडजस्ट हो जाते हैं, कि हमें ये भी याद नहीं रहता कि असल में हम चाहते क्या थे। हम मिडिल क्लास लड़के हैं…हम शिकायत नहीं करते, क्योंकि हमें सिखाया गया है कि “शिकायत करना कमजोरी है…” लेकिन मायने में हमने शिकायत करना नहीं, महसूस करना छोड़ दिया है। हम जीते हैं… पर पूरी तरह नहीं। हम हँसते हैं… पर खुलकर नहीं। हम सपने देखते हैं… पर पूरे होने की उम्मीद के बिना। और अंत में हम वही बन जाते हैं जो हमें बचपन से सिखाया गया था, एक ऐसा इंसान जो हर दर्द, हर अपमान, हर अधूरेपन के साथ भी मुस्कुरा कर कह देता है... “कोई बात नहीं…मैं एडजस्ट कर लूंगा…” 💔 राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️

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