राहुल देव Rahul Dev

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@RahulDev718370

पत्रकार। भारत की सच्ची आध्यात्मिक-सांस्कृतिक-धार्मिक चेतना, सद्भाव, बहुलतावाद, लोकतांत्रिकता तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन के लिए समर्पित। Journalist.

Katılım Nisan 2025
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राहुल देव Rahul Dev
What a woman. Salute 🫡
The Husky@Mr_Husky1

In her final semester at Harvard, Amanda Nguyen was raped. She did everything survivors are told to do. Then she discovered that the physical evidence collected from her own body would be destroyed in 6 months — unless she filed paperwork to stop it. And then filed it again. Every 6 months. Forever. She was 22 years old. She decided to change federal law instead. 🌟 Amanda had interned at NASA. She had big plans. The kind of future that takes years of hard work to build was finally within reach. Then everything shattered. She went to the hospital. She reported the assault to police. She endured the forensic exam. She made the careful decision to file her rape kit anonymously — worried that an open case could affect security clearance applications for her dream careers. That's when the system revealed how broken it truly was. Because she was anonymous, Massachusetts law gave her only 6 months before her rape kit — physical evidence collected from her own body — would be permanently destroyed. Not the 15 years the state allowed for pressing charges. Six months. No official process to extend it. No clear instructions. No one to guide her. She had to figure it out herself, every 6 months, forcing herself to relive the worst experience of her life just to preserve her right to eventually seek justice. She started researching rape kit laws in all 50 states. What she found was staggering. Some states kept kits for years. Others destroyed them in as little as 30 days. Some states charged survivors for the cost of their own kit collection. Others never notified survivors what happened to their evidence. No consistency. No standard. *"Justice should not depend on geography,"* she said. But it did. In November 2014, Amanda founded Rise — a nonprofit dedicated to changing that reality. Everyone who worked with Rise was a volunteer. They fundraised through crowdfunding. Their goal was rewriting federal law. She met with lawmakers across Washington. Staffers told her it wasn't a priority. Some questioned her story. She kept going. She learned that the most powerful thing she could do was stop being abstract — to walk into a room, look a senator in the eyes, and say: *this happened to me. I am sitting in front of you.* Together with Senator Jeanne Shaheen, she drafted the Sexual Assault Survivors' Rights Act — proposing that survivors should never be charged for their rape kit collection, should receive testing results, and must be notified at least 60 days before their evidence was scheduled for destruction. In February 2016, the bill was introduced. It passed the Senate unanimously. It passed the House unanimously. Not a single vote against. On October 7, 2016, President Obama signed the Sexual Assault Survivors' Rights Act into federal law. Amanda Nguyen was 24 years old. Rise continued working state by state. To date, Rise has helped pass 33 laws across the United States, covering protections for over 84 million rape survivors. A movement started in spare time, with no budget and only volunteers, became one of the most effective civil rights campaigns of its generation. And Amanda never stopped reaching for the stars — literally. In 2024, Blue Origin announced she would be the first Vietnamese woman to fly to space. The young woman who had once feared that fighting for justice would cost her a future in space proved the two didn't have to be a choice. She was nominated for the Nobel Peace Prize. Named a Time Woman of the Year. She wrote a memoir called *Saving Five.* But perhaps the most remarkable thing about Amanda Nguyen's story is not any single achievement. It is the fact that she turned the most painful moment of her life into something that made the world more just for millions of people who will never know her name. She was a college student who needed the system to work. When it didn't, she rebuilt it herself. **At 24 years old.

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ADAM
ADAM@AdameMedia·
“There is no superior race. There is no ‘chosen people of God’. It is neither the United States nor Israel. The ‘chosen people of God’ is all of humanity.” — President of Colombia, Gustavo Petro
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Yogendra Yadav
Yogendra Yadav@_YogendraYadav·
किताब पर @TheTribhuvan जी की इस टिप्पणी को पढ़कर महसूस हुआ कि किसी ने इस किताब का असली उद्देश्य समझा है, इसके मर्म तक पहुँचने की कोशिश की है। प्रशंसा-आलोचना, सहमति असहमति अपनी जगह हैं (वैसे उनकी प्रशंसा में एक पुराने दोस्त की उदारता के प्रति सचेत रहिएगा!), लेकिन सबसे बड़ी बात है यह समझना कि यह किताब क्या कर रही है। “विचार करने की नई भाषा” गढ़ने की इस कोशिश को आपने नोटिस किया, इससे ज़्यादा कोई लेखक क्या माँग सकता है? आभार!
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan

योगेंद्र यादव : ‘गणराज्य का स्वधर्म’ और स्वधर्म का गणराज्य इन दिनों हिन्दी में जो किताबें सिर्फ़ विचार नहीं देतीं, विचार करने की नयी भाषा भी देती हैं, उनमें योगेंद्र यादव की ‘गणराज्य का स्वधर्म’ निस्संदेह सबसे उल्लेखनीय किताबों में है। मैं इसे पढ़ने में बहुत विलंब कर गया। यह 23 जनवरी 2026 को सेतु प्रकाशन समूह से आई थी। हिन्दी में 333 पृष्ठों की इस पुस्तक का असली आकार उसके पृष्ठों में नहीं, उसकी बौद्धिक आकांक्षाओं में निहित है। यह चुनावी जोड़-घटाओ, आन्दोलन की रिपोर्टाज या किसानों-सरकार के तात्कालिक सरोकारों की किताब भर नहीं है; यह भारतीय गणराज्य की आत्मा के बारे में एक बेचैन, जिम्मेदार और वैचारिक प्रश्न उठाती है और वह है : हमारे गणराज्य का स्वधर्म क्या है? किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह “भारत” पर बोलने के लिए किसी उधार की बौद्धिक पीठ पर नहीं बैठती। यादव इस खोज को भारतवर्ष, हिन्दुस्तान और इंडिया के त्रिवेणी-संगम तक ले जाते हैं, जहाँ से गणराज्य के स्वधर्म के चार सूत्र निकलते हैं। रास्ते में वे एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा वाले राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं, उसे यूरोपीय राष्ट्र-राज्य की नक़ल की तरह देखते हैं और साथ ही सेकुलर राजनीति के पाखण्ड, भारतीय संस्कृति के नाम पर चलती दुकानदारी और आधुनिकता के नाम पर मानसिक गुलामी पर भी चोट करते हैं। कश्मीर, असम और मणिपुर जैसे पड़ाव इस किताब को सिर्फ़ दार्शनिक विमर्श नहीं रहने देते; वे इसे जीवित भारत के बेचैन भूगोल से जोड़ते हैं। योगेंद्र यादव की वैचारिक विश्वसनीयता का एक स्रोत उनका जीवन-पथ भी है।वे जेएनयू और पंजाब विश्वविद्यालय के विद्यार्थी-शिक्षक रहे, 1993 से 2013 तक सीएसडीएस, दिल्ली में शोधकार्य और लोकनीति कार्यक्रम के संस्थापक-निदेशक रहे, चुनाव विश्लेषण को नई प्रतिष्ठा दी, आम आदमी पार्टी के सह-संस्थापक बने, फिर स्वराज अभियान और स्वराज इंडिया से जुड़े, सीएए-विरोध और किसान आन्दोलन में सक्रिय रहे और हिन्दी-अंगरेज़ी दोनों में नियमित लेखन किया। यानी यह किताब किसी पुस्तकालयी उदासी से नहीं, विचार, आन्दोलन और आत्ममन्थन की त्रयी की संयुक्त भट्ठी से निकली है। लेकिन मेरे साथ उनका एक परिचय मेरे पुराने शहर श्रीगंगानगर से भी है, जहाँ तरुण जीवन में ही उन्होंने पूरे इलाक़े में एक बेहतरीन डिबेटर की छवि बना ली थी और उनके मंच पर आने के बाद प्रतिभाशाली से भी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ दूसरे और तीसरे स्थान की ही उम्मीद किया करते थे। इस पुस्तक का सबसे चमकदार बौद्धिक हस्तक्षेप शायद यह है कि यह गणराज्य और गणतंत्र के बीच फ़र्क़ को गंभीरता से पुनर्स्थापित करती है। योगेंद्र यादव ने हाल के एक लेख में लिखा कि “गणतंत्र” रिपब्लिक के उस संकीर्ण, नकारात्मक अर्थ तक सीमित रह सकता है, जिसमें केवल वंशानुगत शासक का अभाव है; जबकि “गणराज्य” हमें रिपब्लिक के गहरे, सकारात्मक, नैतिक अर्थ तक ले जाता है, जहाँ जनता केवल सत्ता का स्रोत नहीं, सत्ता पर निगरानी रखने वाली नैतिक समुदाय भी है। यही वह क्षण है जहाँ किताब एक भाषिक बहस से आगे बढ़कर लोकतंत्र की आत्मा पर बहस बन जाती है। भाषा और उसके भीतर की आत्मा को पकड़ने के कारण ही हम जब देखते हैं कि गणतंत्र बनाम रिपब्लिक वाली उनकी बात गहरी है। जैसे लोकतंत्र को समझते हुए हमारा सामना एक और उलझन से होता है। आख़िर प्रजातंत्र और लोकतंत्र में क्या अंतर है? ये समानार्थी हैं या कुछ अंतर है? अंगरेज़ी में इसके लिए सिर्फ़ "डेमोक्रेसी" है, जबकि हिन्दी में वह लोकतंत्र भी है और प्रजातंत्र भी। प्रजातंत्र यानी उस तरह का लोकतंत्र, जो इंग्लैंड में है और लोकतंत्र, वह जो अमेरिका या भारत में है। यानी जहाँ राजा अभी भी मौजूद है, वहाँ प्रजा भी मौजूद है! या जहाँ प्रजा का बोध है,वहाँ राजा-रानी भी हैं! यादव का इस पुस्तक में महत्त्वपूर्ण काम यह है कि वे संविधान के मूल्यों को नारे की तरह नहीं, सभ्यतागत आधारों के साथ जोड़कर देखते हैं। उन्होंने इस स्वधर्म को एक “अम्ब्रेला कॉन्सेप्ट” कहा है, जो संवैधानिक मूल्यों के लिए सांस्कृतिक आधार देता है। जैसे सेक्युलरिज़्म के लिए मैत्री, समाजवाद या समता के लिए करुणा और रहम, लोकतंत्र के लिए विनयबोध और संघवाद के लिए देशाचार-लोकाचार आदि या फिर कस्टमरी लॉज़ जैसी धारणाएँ। यही बिन्दु इस किताब को आज की बहसों में अद्वितीय बनाता है। वे न तो संविधान को पूजा-पाठ की वस्तु बनाते और बताते हैं, न उसे मात्र विधिक दस्तावेज़ के रूप में देखते हैं; वह उसके नीचे बहती नैतिक नदी की खोज करते हुए आगे बढ़ते हैं। किताब का सेकुलर विमर्श विशेष रूप से उल्लेखनीय है। योगेंद्र भारतीय धर्मनिरपेक्षता को यूरोप की चर्च-राज्य समस्या की नकल नहीं मानते, अपितु मैत्री, सुलह-ए-कुल और सर्वधर्म समभाव की दीर्घ परंपरा से जोड़ते हैं। वे यह भी तर्क देते हैं कि “धर्मनिरपेक्षता” की तुलना में संविधान के हिन्दी पाठ का “पंथ-निरपेक्षता” शब्द भारतीय संदर्भ में अधिक उपयुक्त बैठता है। हालांकि मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ। जाने हिन्दी के विद्वानों ने नाहक़ ही धर्म की जगह पंथ को क्यों ला बिठाया, जबकि धर्म सिर्फ़ धर्म का ही बोध नहीं करवाता, वह पंथ जैसे कितने ही शब्दों का बोध अपने भीतर लिए रहता है। ख़ैर, यह बहस किताब को उस पुराने, थके हुए सेक्युलर बनाम कम्युनल द्वंद्व से बाहर निकालती है, जिसमें न तो भारतीय सभ्यता की बहुलता बचती है, न आधुनिक लोकतंत्र की गरिमा। समता पर यादव का विवेचन भी बहुत उपयोगी है और वह भारतीयतावादी है। वे मानते हैं कि आधुनिक अर्थों में समानता और समाजवाद के विचार यूरोप और बोल्शेविक क्रांति के रास्ते भारत आए, पर यह मान लेना भूल होगी कि समता भारतीय मानस के लिए सर्वथा विदेशी है। वे हर रोज़ ही कहीं न कहीं लिखते हैं और मैं उनकी तरह के कितने ही लोगों को हर रोज़ ही पढ़ता रहता हूँ। शायद उन्होंने कुछ ही दिन पहले नेशनल हेराल्ड या किसी अख़बार में इसी पुस्तक के विषयों से जुड़ा एक लेख लिखा था, जिसमें वे बौद्ध विचार, सूफ़ी-भक्ति परंपरा और राष्ट्रीय आन्दोलन की उन धाराओं की ओर इशारा करते हैं, जिन्होंने जाति-आधारित विषमता को चुनौती दी और करुणा को केवल दया नहीं, संरचनात्मक अन्याय के विरुद्ध सक्रिय नैतिक आग्रह में बदला। यही बात इस किताब को समाजवादी भी बनाती है और भारतीयतावादी भी यानी बिना किसी खोखले स्वदेशी गर्व के। योगेंद्र यादव की पुस्तक भारतीयतावाद पर उस दृष्टि से बहुत परे है, जो अधजल गगरी छलकत जाय जैसी होती है या "सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दं अर्धो घटो घोषमुपैति नूनं । विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वं मूधास्तु जल्पन्ति गुणैर्विहीनाः। हम देख भी रहे हैं कि आजकल भारतीयतावाद की खाली मटकियों से कैसे जल का कलकल निनाद करवाया जा रहा है। मेरे लिए इस किताब की सबसे बड़ी साहित्यिक-राजनीतिक उपलब्धि यह है कि यह प्रतिरोध की भाषा को नकार, भय और शर्म के अँधेरे से निकालकर एक सकारात्मक, स्वाधीन और आत्मविश्वासी भाषा देना चाहती है। योगेंद्र यादव ने हाल में लिखा कि गणराज्य के रक्षकों की भाषा अक्सर भय, शर्म और निराशा से भरी रहती है, जबकि विनाशकारी शक्तियाँ “न्यू इंडिया”, “आत्मनिर्भरता”, “राष्ट्रीय एकता” जैसी सकारात्मक शब्दावली पर कब्ज़ा कर लेती हैं। ‘गणराज्य का स्वधर्म’ इसी कब्ज़े को तोड़ने की कोशिश है। यह हमें बताती है कि भारतीयता की लड़ाई भारत-विरोधी होकर नहीं लड़ी जा सकती; राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और विरासत को साम्प्रदायिक ताक़तों के हवाले छोड़ देना भी एक ऐतिहासिक भूल है। इसलिए मैं कहूँगा कि यह किताब इन दिनों की सिर्फ़ एक अच्छी किताब नहीं, एक ज़रूरी किताब है। यह पाठक को तैयार जवाब नहीं देती; वह उसके भीतर वह बेचैनी जगाती है, जो किसी जीवित लोकतंत्र के लिए ऑक्सीजन का काम करती है। आज जब विवेकहीन और मनुष्यताविरोधी एकरूपता को राष्ट्रवाद, शोर को जनमत और सांस्कृतिक प्रभुत्व को सभ्यता कहने की आदत बढ़ती जा रही है, तब ‘गणराज्य का स्वधर्म’ हमें याद दिलाती है कि भारत का सच्चा स्वभाव वर्चस्व नहीं, बहुलता; नफ़रत नहीं, मैत्री; दया नहीं, करुणा; अहंकार नहीं, विनय; और केंद्रीकरण नहीं, साझी प्रभुता है। ऐसी किताबें बार-बार नहीं आतीं। जब आती हैं, तो वे समीक्षा से अधिक संवाद की हकदार होती हैं। योगेंद्र जी को इतनी पुस्तक के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ। @_YogendraYadav

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Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
योगेंद्र यादव : ‘गणराज्य का स्वधर्म’ और स्वधर्म का गणराज्य इन दिनों हिन्दी में जो किताबें सिर्फ़ विचार नहीं देतीं, विचार करने की नयी भाषा भी देती हैं, उनमें योगेंद्र यादव की ‘गणराज्य का स्वधर्म’ निस्संदेह सबसे उल्लेखनीय किताबों में है। मैं इसे पढ़ने में बहुत विलंब कर गया। यह 23 जनवरी 2026 को सेतु प्रकाशन समूह से आई थी। हिन्दी में 333 पृष्ठों की इस पुस्तक का असली आकार उसके पृष्ठों में नहीं, उसकी बौद्धिक आकांक्षाओं में निहित है। यह चुनावी जोड़-घटाओ, आन्दोलन की रिपोर्टाज या किसानों-सरकार के तात्कालिक सरोकारों की किताब भर नहीं है; यह भारतीय गणराज्य की आत्मा के बारे में एक बेचैन, जिम्मेदार और वैचारिक प्रश्न उठाती है और वह है : हमारे गणराज्य का स्वधर्म क्या है? किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह “भारत” पर बोलने के लिए किसी उधार की बौद्धिक पीठ पर नहीं बैठती। यादव इस खोज को भारतवर्ष, हिन्दुस्तान और इंडिया के त्रिवेणी-संगम तक ले जाते हैं, जहाँ से गणराज्य के स्वधर्म के चार सूत्र निकलते हैं। रास्ते में वे एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा वाले राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं, उसे यूरोपीय राष्ट्र-राज्य की नक़ल की तरह देखते हैं और साथ ही सेकुलर राजनीति के पाखण्ड, भारतीय संस्कृति के नाम पर चलती दुकानदारी और आधुनिकता के नाम पर मानसिक गुलामी पर भी चोट करते हैं। कश्मीर, असम और मणिपुर जैसे पड़ाव इस किताब को सिर्फ़ दार्शनिक विमर्श नहीं रहने देते; वे इसे जीवित भारत के बेचैन भूगोल से जोड़ते हैं। योगेंद्र यादव की वैचारिक विश्वसनीयता का एक स्रोत उनका जीवन-पथ भी है।वे जेएनयू और पंजाब विश्वविद्यालय के विद्यार्थी-शिक्षक रहे, 1993 से 2013 तक सीएसडीएस, दिल्ली में शोधकार्य और लोकनीति कार्यक्रम के संस्थापक-निदेशक रहे, चुनाव विश्लेषण को नई प्रतिष्ठा दी, आम आदमी पार्टी के सह-संस्थापक बने, फिर स्वराज अभियान और स्वराज इंडिया से जुड़े, सीएए-विरोध और किसान आन्दोलन में सक्रिय रहे और हिन्दी-अंगरेज़ी दोनों में नियमित लेखन किया। यानी यह किताब किसी पुस्तकालयी उदासी से नहीं, विचार, आन्दोलन और आत्ममन्थन की त्रयी की संयुक्त भट्ठी से निकली है। लेकिन मेरे साथ उनका एक परिचय मेरे पुराने शहर श्रीगंगानगर से भी है, जहाँ तरुण जीवन में ही उन्होंने पूरे इलाक़े में एक बेहतरीन डिबेटर की छवि बना ली थी और उनके मंच पर आने के बाद प्रतिभाशाली से भी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ दूसरे और तीसरे स्थान की ही उम्मीद किया करते थे। इस पुस्तक का सबसे चमकदार बौद्धिक हस्तक्षेप शायद यह है कि यह गणराज्य और गणतंत्र के बीच फ़र्क़ को गंभीरता से पुनर्स्थापित करती है। योगेंद्र यादव ने हाल के एक लेख में लिखा कि “गणतंत्र” रिपब्लिक के उस संकीर्ण, नकारात्मक अर्थ तक सीमित रह सकता है, जिसमें केवल वंशानुगत शासक का अभाव है; जबकि “गणराज्य” हमें रिपब्लिक के गहरे, सकारात्मक, नैतिक अर्थ तक ले जाता है, जहाँ जनता केवल सत्ता का स्रोत नहीं, सत्ता पर निगरानी रखने वाली नैतिक समुदाय भी है। यही वह क्षण है जहाँ किताब एक भाषिक बहस से आगे बढ़कर लोकतंत्र की आत्मा पर बहस बन जाती है। भाषा और उसके भीतर की आत्मा को पकड़ने के कारण ही हम जब देखते हैं कि गणतंत्र बनाम रिपब्लिक वाली उनकी बात गहरी है। जैसे लोकतंत्र को समझते हुए हमारा सामना एक और उलझन से होता है। आख़िर प्रजातंत्र और लोकतंत्र में क्या अंतर है? ये समानार्थी हैं या कुछ अंतर है? अंगरेज़ी में इसके लिए सिर्फ़ "डेमोक्रेसी" है, जबकि हिन्दी में वह लोकतंत्र भी है और प्रजातंत्र भी। प्रजातंत्र यानी उस तरह का लोकतंत्र, जो इंग्लैंड में है और लोकतंत्र, वह जो अमेरिका या भारत में है। यानी जहाँ राजा अभी भी मौजूद है, वहाँ प्रजा भी मौजूद है! या जहाँ प्रजा का बोध है,वहाँ राजा-रानी भी हैं! यादव का इस पुस्तक में महत्त्वपूर्ण काम यह है कि वे संविधान के मूल्यों को नारे की तरह नहीं, सभ्यतागत आधारों के साथ जोड़कर देखते हैं। उन्होंने इस स्वधर्म को एक “अम्ब्रेला कॉन्सेप्ट” कहा है, जो संवैधानिक मूल्यों के लिए सांस्कृतिक आधार देता है। जैसे सेक्युलरिज़्म के लिए मैत्री, समाजवाद या समता के लिए करुणा और रहम, लोकतंत्र के लिए विनयबोध और संघवाद के लिए देशाचार-लोकाचार आदि या फिर कस्टमरी लॉज़ जैसी धारणाएँ। यही बिन्दु इस किताब को आज की बहसों में अद्वितीय बनाता है। वे न तो संविधान को पूजा-पाठ की वस्तु बनाते और बताते हैं, न उसे मात्र विधिक दस्तावेज़ के रूप में देखते हैं; वह उसके नीचे बहती नैतिक नदी की खोज करते हुए आगे बढ़ते हैं। किताब का सेकुलर विमर्श विशेष रूप से उल्लेखनीय है। योगेंद्र भारतीय धर्मनिरपेक्षता को यूरोप की चर्च-राज्य समस्या की नकल नहीं मानते, अपितु मैत्री, सुलह-ए-कुल और सर्वधर्म समभाव की दीर्घ परंपरा से जोड़ते हैं। वे यह भी तर्क देते हैं कि “धर्मनिरपेक्षता” की तुलना में संविधान के हिन्दी पाठ का “पंथ-निरपेक्षता” शब्द भारतीय संदर्भ में अधिक उपयुक्त बैठता है। हालांकि मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ। जाने हिन्दी के विद्वानों ने नाहक़ ही धर्म की जगह पंथ को क्यों ला बिठाया, जबकि धर्म सिर्फ़ धर्म का ही बोध नहीं करवाता, वह पंथ जैसे कितने ही शब्दों का बोध अपने भीतर लिए रहता है। ख़ैर, यह बहस किताब को उस पुराने, थके हुए सेक्युलर बनाम कम्युनल द्वंद्व से बाहर निकालती है, जिसमें न तो भारतीय सभ्यता की बहुलता बचती है, न आधुनिक लोकतंत्र की गरिमा। समता पर यादव का विवेचन भी बहुत उपयोगी है और वह भारतीयतावादी है। वे मानते हैं कि आधुनिक अर्थों में समानता और समाजवाद के विचार यूरोप और बोल्शेविक क्रांति के रास्ते भारत आए, पर यह मान लेना भूल होगी कि समता भारतीय मानस के लिए सर्वथा विदेशी है। वे हर रोज़ ही कहीं न कहीं लिखते हैं और मैं उनकी तरह के कितने ही लोगों को हर रोज़ ही पढ़ता रहता हूँ। शायद उन्होंने कुछ ही दिन पहले नेशनल हेराल्ड या किसी अख़बार में इसी पुस्तक के विषयों से जुड़ा एक लेख लिखा था, जिसमें वे बौद्ध विचार, सूफ़ी-भक्ति परंपरा और राष्ट्रीय आन्दोलन की उन धाराओं की ओर इशारा करते हैं, जिन्होंने जाति-आधारित विषमता को चुनौती दी और करुणा को केवल दया नहीं, संरचनात्मक अन्याय के विरुद्ध सक्रिय नैतिक आग्रह में बदला। यही बात इस किताब को समाजवादी भी बनाती है और भारतीयतावादी भी यानी बिना किसी खोखले स्वदेशी गर्व के। योगेंद्र यादव की पुस्तक भारतीयतावाद पर उस दृष्टि से बहुत परे है, जो अधजल गगरी छलकत जाय जैसी होती है या "सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दं अर्धो घटो घोषमुपैति नूनं । विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वं मूधास्तु जल्पन्ति गुणैर्विहीनाः। हम देख भी रहे हैं कि आजकल भारतीयतावाद की खाली मटकियों से कैसे जल का कलकल निनाद करवाया जा रहा है। मेरे लिए इस किताब की सबसे बड़ी साहित्यिक-राजनीतिक उपलब्धि यह है कि यह प्रतिरोध की भाषा को नकार, भय और शर्म के अँधेरे से निकालकर एक सकारात्मक, स्वाधीन और आत्मविश्वासी भाषा देना चाहती है। योगेंद्र यादव ने हाल में लिखा कि गणराज्य के रक्षकों की भाषा अक्सर भय, शर्म और निराशा से भरी रहती है, जबकि विनाशकारी शक्तियाँ “न्यू इंडिया”, “आत्मनिर्भरता”, “राष्ट्रीय एकता” जैसी सकारात्मक शब्दावली पर कब्ज़ा कर लेती हैं। ‘गणराज्य का स्वधर्म’ इसी कब्ज़े को तोड़ने की कोशिश है। यह हमें बताती है कि भारतीयता की लड़ाई भारत-विरोधी होकर नहीं लड़ी जा सकती; राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और विरासत को साम्प्रदायिक ताक़तों के हवाले छोड़ देना भी एक ऐतिहासिक भूल है। इसलिए मैं कहूँगा कि यह किताब इन दिनों की सिर्फ़ एक अच्छी किताब नहीं, एक ज़रूरी किताब है। यह पाठक को तैयार जवाब नहीं देती; वह उसके भीतर वह बेचैनी जगाती है, जो किसी जीवित लोकतंत्र के लिए ऑक्सीजन का काम करती है। आज जब विवेकहीन और मनुष्यताविरोधी एकरूपता को राष्ट्रवाद, शोर को जनमत और सांस्कृतिक प्रभुत्व को सभ्यता कहने की आदत बढ़ती जा रही है, तब ‘गणराज्य का स्वधर्म’ हमें याद दिलाती है कि भारत का सच्चा स्वभाव वर्चस्व नहीं, बहुलता; नफ़रत नहीं, मैत्री; दया नहीं, करुणा; अहंकार नहीं, विनय; और केंद्रीकरण नहीं, साझी प्रभुता है। ऐसी किताबें बार-बार नहीं आतीं। जब आती हैं, तो वे समीक्षा से अधिक संवाद की हकदार होती हैं। योगेंद्र जी को इतनी पुस्तक के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ। @_YogendraYadav
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खुरपेंच
खुरपेंच@khurpenchh·
देशहित और जनहित में किए काम की वजह से हमारे ऊपर आज FIR हुई , आप सब जो मुझे पर्सनली नहीं जानते, सबने आज मेरा बहुत साथ दिया , मुझे कई लोगों के मैसेजेस आए , कई लोगों ने फंड देने की बात कही , कई वकील भाइयों और बहनों ने लीगल हेल्प करने के बात कही , आप सभी लोगों का हृदय की गहराई से बहुत बहुत धन्यवाद , आज मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हमने आप लोगों को कमाया है , हमें किसी प्रकार के फंड की जरूरत नहीं है, जो काम हम कर रहे हैं वो कोई भी एक मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन से कर सकता है, हमारी FSSAI और उनके अधिकारियों से कहना चाहते हैं कि हम किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही के लिए तैयार हैं , आप लोगों ने पिछले कई वर्षों में इतनी गलतियां की हैं ,आज देश में बढ़ते कैंसर , डायबिटीज, हार्ट अटैक जैसी बीमारियों के लिए आप लोग जिम्मेदार हैं , आप लोगों ने FIR में ये कहीं नहीं लिखा कि आरोप गलत हैं, आप लोगों को चिंता इस बात की है कि डॉक्यूमेंट्स कैसे लीक हो गए , अगर आप लोगों में दम है तो पब्लिक के सामने आकर बताइए कि आरोप गलत हैं, वरना अगले कुछ दिनों में हम स्टेट फूड डिपार्टमेंट और FSSAI की पोल खोलते रहेंगे और मुकदमा लड़ते रहेंगे।जय हिंद जय भारत । BEST OF LUCK FSSAI
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Down To Earth
Down To Earth@down2earthindia·
A new study by the Centre for Financial Accountability (CFA) has found that the number of Indian billionaires has grown by 77 per cent between 2019 and 2025 and their wealth has grown 227 per cent. 👉Moreover, the wealth of the five richest families in the country rose by 400 per cent in these six years, claimed the study 👉Today India is witnessing inequality at levels that are comparable to colonial times, says the study downtoearth.org.in/governance/bet…
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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
आज राज्यसभा में सांसद प्रोफेसर मनोज कुमार झा ने राही मासूम रज़ा साहब को याद करते हुए दरअसल सिर्फ़ एक लेखक का नहीं, भारत की साझा आत्मा का पक्ष लिया। रज़ा उन विरले रचनाकारों में हैं, जिनकी स्मृति केवल पुस्तकालयों में नहीं, जनता की बोलचाल, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना में जीवित है। इसलिए उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी करने की माँग महज़ औपचारिक सम्मान नहीं, भारतीय गणराज्य की नैतिक जिम्मेदारी है। राही मासूम रज़ा का कद इसलिए असाधारण है क्योंकि उनके ज़ेहन में कई भारत एक साथ रहते थे। आधा गाँव में उन्होंने विभाजन, गाँव, मुसलमान जीवन, जातीय ताने-बाने और टूटती हुई साझी संस्कृति का ऐसा महाकाव्यात्मक वृत्तांत रचा, जो हिंदी साहित्य में अद्वितीय है। टोपी शुक्ला में उन्होंने दोस्ती, सांप्रदायिकता, पहचान और समाज के भीतर पनपते ज़हर को जिस बेधक ढंग से पकड़ा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनकी अन्य कृतियाँ भी इसी तरह उस भारत की खोज करती हैं जो सत्ता के नारों से नहीं, मनुष्य की पीड़ा, स्मृति और रिश्तों से बनता है। प्रो. झा ने जब इन कृतियों के बारे में कथानक की संवेदना के साथ बताया तो वह अद्भुत था। और फिर महाभारत है। विडंबना देखिए! एक “मुसलमान” लेखक ने भारत के सबसे विराट सांस्कृतिक आख्यान को ऐसी भाषा, ऐसी गरिमा और ऐसी आत्मीयता दी कि वह करोड़ों लोगों की स्मृति का हिस्सा बन गया। “मैं समय हूँ” जैसी आरंभिक ध्वनि के साथ जिस महाभारत ने घर-घर प्रवेश किया, उसके शब्द-संसार के पीछे राही मासूम रज़ा की बौद्धिक चमक थी। यह अपने आप में उस संकीर्ण सोच का उत्तर है जो भारतीय संस्कृति को किसी एक खांचे में बंद करना चाहती है। दरअसल राही मासूम रज़ा मुसलमान कम और इस देश की धमनियों में बजते ख़ून की ऊष्मा अधिक थे। प्रोफेसर झा का यह कहना बहुत सही है कि उनके सम्मान में डाक टिकट जारी होना चाहिए; क्योंकि पहला, वे हिन्दी-उर्दू के बीच सेतु हैं। दूसरा, उनका साहित्य भारतीय समाज की जटिल सच्चाइयों का ईमानदार दस्तावेज़ है। तीसरा, उन्होंने सांप्रदायिक विभाजन के विरुद्ध मनुष्य और सह-अस्तित्व की भाषा दी। चौथा, महाभारत के माध्यम से उन्होंने भारतीय सभ्यता की साझा विरासत को जन-जन तक पहुँचाया। पाँचवाँ, राही को सम्मानित करना गंगा-जमुनी तहज़ीब को सम्मानित करना होगा। छठा, यह नई पीढ़ी को बताएगा कि भारत की असली पहचान बहुलता, भाषा-संपदा और साझा संस्कृति में है। राही मासूम रज़ा पर डाक टिकट जारी करना किसी लेखक को याद करना भर नहीं होगा; यह भारत को उसके अधिक उदार, अधिक मानवीय और अधिक सच्चे रूप में याद करना होगा। मुझे ही नहीं, किसी को भी उनका यह सूक्त वाक्य मोह सकता है कि “मुसलमान लड़कों के दिलों में दाढ़ियों और हिंदू लड़कों के दिलों में चोटियाँ उगने लगीं। यह लड़के फ़िज़िक्स पढ़ते हैं और कॉपी पर ओ३म् या बिस्मिल्लाह लिखे बिना सवाल का जवाब नहीं लिखते। अब कोई केवल शरीफ़ नहीं रह गया है। हर शरीफ़ के साथ एक दुमछल्ला लगा हुआ है। हिन्दू शरीफ़ मुसलमान शरीफ़, उर्दू शरीफ़, हिंदी शरीफ़ और बिहार शरीफ़! दूर-दूर तक शरीफ़ों का एक जंगल फैला हुआ है!” @manojkjhadu
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राहुल देव Rahul Dev
हमारे विभिन्न राष्ट्रीय प्रतीक - राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान-राष्ट्र गीत, राष्ट्रीय चिन्ह आदि कैसे चुने गए; एक-एक के चयन के पीछे कैसी बहसें-विचारधाराएँ, परिस्थितियाँ, व्यक्तित्व और परिप्रेक्ष्य सक्रिय रहे - इन बड़े सवालों पर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और चिंतक-लेखक कैसे सर्वथा मौलिक ढंग से शोध और विचार करता है यह जानने के लिए इस ज़बर्दस्त रोचक बातचीत को सुनिए। लंबी है पर अतीव सार्थक है। साधुवाद टीएम कृष्णा। @tmkrishna ‘We, The People of India' Book Launch | Conversation with Manu Pillai at... youtu.be/EZOEg16oDWQ?si… via @YouTube
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Dalai Lama
Dalai Lama@DalaiLama·
MESSAGE I wholeheartedly endorse the powerful appeal for peace made by the Holy Father, Pope Leo, during his Palm Sunday Mass. His call for the laying down of arms and the renunciation of violence resonated profoundly with me, as it speaks to the very essence of what all major religions teach. Indeed, whether we look to Christianity, Buddhism, Islam, Hinduism, Judaism or any of the world's great spiritual traditions, the message is fundamentally the same: love, compassion, tolerance, and self-discipline. Violence finds no true home in any of these teachings. History has shown us time and again that violence only begets more violence and is never a lasting foundation for peace. An enduring resolution to conflict, including the ones we see in the Middle East or between Russia and Ukraine, must be rooted in dialogue, diplomacy and mutual respect — approached with the understanding that, at the deepest level, we are all brothers and sisters. I urge for and pray that the violence and conflicts may soon come to an end. DALAI LAMA 31 March 2026
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Naveen Patnaik
Naveen Patnaik@Naveen_Odisha·
Surprised to hear the outrageous things said about Biju Babu by a BJP MP. I don’t think he knows that Prime Minister Jawaharlal Nehru had given him an office next to his in Delhi while he was still Chief Minister of #Odisha to help with strategy during the Chinese conflict and fight the Chinese. I was about 13 years old then, but I remember how furious Biju Babu was with the Chinese attack and how much he did to repel it. I think the MP needs some mental doctor’s attention. #BijuBabu
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Jawhar Sircar
Jawhar Sircar@jawharsircar·
"Across IITs nationally, 8,000 of 21,500 graduates remain unemployed" reports BBC. In other engineering colleges, especially private ones, unemployment is rampant — after so much fees, costs. Now, is the joblessness situation a bit clear to bhakts? bbc.com/news/articles/…
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Nirupama Menon Rao 🇮🇳
I am no stranger to criticism and have learnt, over time, to absorb it without losing focus. That is part of public life. What is harder to accept is the steady erosion of civility in our discourse. Disagreement is essential; derision and vituperative, personal slander is not. A confident society does not fear dialogue—it conducts it with balance, clarity, and respect. As for me, I follow the teaching of Sri Ramakrishna and his advice: “forbear, forbear, forbear.” That has guided me through my life’s journey.
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𝓼𝓪𝓷𝓴𝓪𝓻
"You come here to clap for revolution at 7:00 PM and go back to exploit your domestic help at 10:00 PM. You are not my audience; you are my funding." ​Utpal Dutt once hurled these biting words at an audience, perfectly capturing his cynical view of the "champagne socialist." Later, while his play 𝘋𝘶𝘴𝘸𝘰𝘱𝘯𝘦𝘳 𝘕𝘢𝘨𝘢𝘳𝘪(City of Nightmares),a blistering critique of the incumbent government, was in production, the police arrived one evening and demanded he change the script or face the consequences. The playwright, director, and actor famously remarked,"I am an artist, not a makeup man for the police force." That man was Utpal Dutt,a figure far greater than a mere comic caricature or a villainous face in popular cinema. He was a revolutionary artist, fiercely anti-establishment, and a titan of political theatre in India. Today marks his birth anniversary. Tributes to this great scholar, actor, and activist 🙏🙏
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Narendra Nath Mishra
Narendra Nath Mishra@iamnarendranath·
ये उत्तर प्रदेश के युवा पुलिस अधिकारी ⁦@IPSMdMustaque⁩ जी हैं। ललितपुर के एसपी हैं। सर्व धर्म संभाव” की भावना को मानते हैं। अधिकारी या सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों से यही अपेक्षा होती है कि वे इसी भाव को आगे बढ़ाएँ। हर धर्म को सम्मान दे। ईद भी मनाएँ,रामनवमी भी।
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राहुल देव Rahul Dev
बहुत-बहुत बधाई, वक़ार। ईमानदारी से किए गए अच्छे काम की क़ीमत समझने वाले लोग हर जगह होते हैं भले ही कम हों। पूरा विश्वास है कि इससे और बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करोगे तुम। शुभकामनाएँ 💐
India First Reports - Waqar Ahmed@IndiaFirstRepo

Aaj ka din mere liye behad khaas raha. “Ek Shaam Education Ke Naam” program mein mujhe sammanit kiya gaya, aur sabse badi baat — mujhe “Delhi ke Ravish Kumar” ke khitab se nawaza gaya। Yeh sirf ek title nahi, balki zimmedaari hai… sach dikhane ki, awaaz uthane ki, aur aap sab tak ground reality pahunchane ki। Aap sabka pyaar aur support hi meri taqat hai 🙏 #Grateful #Journalism #Delhi #IndiaFirstReports #Respect #Award #Media

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राहुल देव Rahul Dev
ट्रंप की तानाशाही के खिलाफ देश भर में सड़कों पर उतरे जनसैलाब के दृश्य।
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राहुल देव Rahul Dev
यह हमारे महान भारतीय समाज का ज़मीनी नर्क है जिसे धर्मांधता, घृणा और व्यवस्था के भ्रष्टाचार ने संभव बनाया है।
Meer Faisal@meerfaisal001

I travelled to Madhubani, Bihar to report on the brutal killing of Roshan Khatoon and what I found is deeply disturbing. On 25 February 2026, during the month of Ramadan, Roshan Khatoon was tied to a pole and mercilessly beaten by more than 20 people, including men and women, while she was fasting, after she went to the village head’s house to resolve a dispute. Her family says that when she asked for water, she was instead forced to drink a mixture of alcohol and urine, an act they describe as deliberate humiliation because she was a Muslim woman. She succumbed to her injuries on 1 March. What followed raises even more serious questions. Instead of immediately ensuring medical care and justice, police allegedly took Roshan Khatoon and her husband to the Police station while she was critically injured and demanded ₹50,000 for their release. The family says they were eventually released after 5–6 hours after paying ₹4,000. Nineteen people have been named in the FIR. Yet, nearly a month later, only one arrest has been made. Her family alleges that the accused are being shielded due to political backing from BJP and JDU leaders. Meanwhile, even after weeks, the postmortem report has still not been released. A woman was lynched, humiliated in the most inhuman way, and a month later, justice remains nowhere in sight. @bihar_police #JusticeForRoshanKhatoon

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Rakhi Tripathi
Rakhi Tripathi@rakhitripathi·
At 6:30 am, I dropped my father, Prof VK Tripathi, at the metro station as he headed to Nuh. One should come and see this kind of determination. His only mission is unity and harmony ❤️
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Wasim Akram Tyagi
Wasim Akram Tyagi@WasimAkramTyagi·
जयपुर में ईद की नमाज़ अदा करके लौट रहे नमाज़ियों पर हिंदुओं ने फूल बरसाए थे। अब मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा हिंदुओं पर फूल बरसाए जा रहे हैं।
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