
राहुल देव Rahul Dev
1.5K posts

राहुल देव Rahul Dev
@RahulDev718370
पत्रकार। भारत की सच्ची आध्यात्मिक-सांस्कृतिक-धार्मिक चेतना, सद्भाव, बहुलतावाद, लोकतांत्रिकता तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन के लिए समर्पित। Journalist.


योगेंद्र यादव : ‘गणराज्य का स्वधर्म’ और स्वधर्म का गणराज्य इन दिनों हिन्दी में जो किताबें सिर्फ़ विचार नहीं देतीं, विचार करने की नयी भाषा भी देती हैं, उनमें योगेंद्र यादव की ‘गणराज्य का स्वधर्म’ निस्संदेह सबसे उल्लेखनीय किताबों में है। मैं इसे पढ़ने में बहुत विलंब कर गया। यह 23 जनवरी 2026 को सेतु प्रकाशन समूह से आई थी। हिन्दी में 333 पृष्ठों की इस पुस्तक का असली आकार उसके पृष्ठों में नहीं, उसकी बौद्धिक आकांक्षाओं में निहित है। यह चुनावी जोड़-घटाओ, आन्दोलन की रिपोर्टाज या किसानों-सरकार के तात्कालिक सरोकारों की किताब भर नहीं है; यह भारतीय गणराज्य की आत्मा के बारे में एक बेचैन, जिम्मेदार और वैचारिक प्रश्न उठाती है और वह है : हमारे गणराज्य का स्वधर्म क्या है? किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह “भारत” पर बोलने के लिए किसी उधार की बौद्धिक पीठ पर नहीं बैठती। यादव इस खोज को भारतवर्ष, हिन्दुस्तान और इंडिया के त्रिवेणी-संगम तक ले जाते हैं, जहाँ से गणराज्य के स्वधर्म के चार सूत्र निकलते हैं। रास्ते में वे एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा वाले राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं, उसे यूरोपीय राष्ट्र-राज्य की नक़ल की तरह देखते हैं और साथ ही सेकुलर राजनीति के पाखण्ड, भारतीय संस्कृति के नाम पर चलती दुकानदारी और आधुनिकता के नाम पर मानसिक गुलामी पर भी चोट करते हैं। कश्मीर, असम और मणिपुर जैसे पड़ाव इस किताब को सिर्फ़ दार्शनिक विमर्श नहीं रहने देते; वे इसे जीवित भारत के बेचैन भूगोल से जोड़ते हैं। योगेंद्र यादव की वैचारिक विश्वसनीयता का एक स्रोत उनका जीवन-पथ भी है।वे जेएनयू और पंजाब विश्वविद्यालय के विद्यार्थी-शिक्षक रहे, 1993 से 2013 तक सीएसडीएस, दिल्ली में शोधकार्य और लोकनीति कार्यक्रम के संस्थापक-निदेशक रहे, चुनाव विश्लेषण को नई प्रतिष्ठा दी, आम आदमी पार्टी के सह-संस्थापक बने, फिर स्वराज अभियान और स्वराज इंडिया से जुड़े, सीएए-विरोध और किसान आन्दोलन में सक्रिय रहे और हिन्दी-अंगरेज़ी दोनों में नियमित लेखन किया। यानी यह किताब किसी पुस्तकालयी उदासी से नहीं, विचार, आन्दोलन और आत्ममन्थन की त्रयी की संयुक्त भट्ठी से निकली है। लेकिन मेरे साथ उनका एक परिचय मेरे पुराने शहर श्रीगंगानगर से भी है, जहाँ तरुण जीवन में ही उन्होंने पूरे इलाक़े में एक बेहतरीन डिबेटर की छवि बना ली थी और उनके मंच पर आने के बाद प्रतिभाशाली से भी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ दूसरे और तीसरे स्थान की ही उम्मीद किया करते थे। इस पुस्तक का सबसे चमकदार बौद्धिक हस्तक्षेप शायद यह है कि यह गणराज्य और गणतंत्र के बीच फ़र्क़ को गंभीरता से पुनर्स्थापित करती है। योगेंद्र यादव ने हाल के एक लेख में लिखा कि “गणतंत्र” रिपब्लिक के उस संकीर्ण, नकारात्मक अर्थ तक सीमित रह सकता है, जिसमें केवल वंशानुगत शासक का अभाव है; जबकि “गणराज्य” हमें रिपब्लिक के गहरे, सकारात्मक, नैतिक अर्थ तक ले जाता है, जहाँ जनता केवल सत्ता का स्रोत नहीं, सत्ता पर निगरानी रखने वाली नैतिक समुदाय भी है। यही वह क्षण है जहाँ किताब एक भाषिक बहस से आगे बढ़कर लोकतंत्र की आत्मा पर बहस बन जाती है। भाषा और उसके भीतर की आत्मा को पकड़ने के कारण ही हम जब देखते हैं कि गणतंत्र बनाम रिपब्लिक वाली उनकी बात गहरी है। जैसे लोकतंत्र को समझते हुए हमारा सामना एक और उलझन से होता है। आख़िर प्रजातंत्र और लोकतंत्र में क्या अंतर है? ये समानार्थी हैं या कुछ अंतर है? अंगरेज़ी में इसके लिए सिर्फ़ "डेमोक्रेसी" है, जबकि हिन्दी में वह लोकतंत्र भी है और प्रजातंत्र भी। प्रजातंत्र यानी उस तरह का लोकतंत्र, जो इंग्लैंड में है और लोकतंत्र, वह जो अमेरिका या भारत में है। यानी जहाँ राजा अभी भी मौजूद है, वहाँ प्रजा भी मौजूद है! या जहाँ प्रजा का बोध है,वहाँ राजा-रानी भी हैं! यादव का इस पुस्तक में महत्त्वपूर्ण काम यह है कि वे संविधान के मूल्यों को नारे की तरह नहीं, सभ्यतागत आधारों के साथ जोड़कर देखते हैं। उन्होंने इस स्वधर्म को एक “अम्ब्रेला कॉन्सेप्ट” कहा है, जो संवैधानिक मूल्यों के लिए सांस्कृतिक आधार देता है। जैसे सेक्युलरिज़्म के लिए मैत्री, समाजवाद या समता के लिए करुणा और रहम, लोकतंत्र के लिए विनयबोध और संघवाद के लिए देशाचार-लोकाचार आदि या फिर कस्टमरी लॉज़ जैसी धारणाएँ। यही बिन्दु इस किताब को आज की बहसों में अद्वितीय बनाता है। वे न तो संविधान को पूजा-पाठ की वस्तु बनाते और बताते हैं, न उसे मात्र विधिक दस्तावेज़ के रूप में देखते हैं; वह उसके नीचे बहती नैतिक नदी की खोज करते हुए आगे बढ़ते हैं। किताब का सेकुलर विमर्श विशेष रूप से उल्लेखनीय है। योगेंद्र भारतीय धर्मनिरपेक्षता को यूरोप की चर्च-राज्य समस्या की नकल नहीं मानते, अपितु मैत्री, सुलह-ए-कुल और सर्वधर्म समभाव की दीर्घ परंपरा से जोड़ते हैं। वे यह भी तर्क देते हैं कि “धर्मनिरपेक्षता” की तुलना में संविधान के हिन्दी पाठ का “पंथ-निरपेक्षता” शब्द भारतीय संदर्भ में अधिक उपयुक्त बैठता है। हालांकि मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ। जाने हिन्दी के विद्वानों ने नाहक़ ही धर्म की जगह पंथ को क्यों ला बिठाया, जबकि धर्म सिर्फ़ धर्म का ही बोध नहीं करवाता, वह पंथ जैसे कितने ही शब्दों का बोध अपने भीतर लिए रहता है। ख़ैर, यह बहस किताब को उस पुराने, थके हुए सेक्युलर बनाम कम्युनल द्वंद्व से बाहर निकालती है, जिसमें न तो भारतीय सभ्यता की बहुलता बचती है, न आधुनिक लोकतंत्र की गरिमा। समता पर यादव का विवेचन भी बहुत उपयोगी है और वह भारतीयतावादी है। वे मानते हैं कि आधुनिक अर्थों में समानता और समाजवाद के विचार यूरोप और बोल्शेविक क्रांति के रास्ते भारत आए, पर यह मान लेना भूल होगी कि समता भारतीय मानस के लिए सर्वथा विदेशी है। वे हर रोज़ ही कहीं न कहीं लिखते हैं और मैं उनकी तरह के कितने ही लोगों को हर रोज़ ही पढ़ता रहता हूँ। शायद उन्होंने कुछ ही दिन पहले नेशनल हेराल्ड या किसी अख़बार में इसी पुस्तक के विषयों से जुड़ा एक लेख लिखा था, जिसमें वे बौद्ध विचार, सूफ़ी-भक्ति परंपरा और राष्ट्रीय आन्दोलन की उन धाराओं की ओर इशारा करते हैं, जिन्होंने जाति-आधारित विषमता को चुनौती दी और करुणा को केवल दया नहीं, संरचनात्मक अन्याय के विरुद्ध सक्रिय नैतिक आग्रह में बदला। यही बात इस किताब को समाजवादी भी बनाती है और भारतीयतावादी भी यानी बिना किसी खोखले स्वदेशी गर्व के। योगेंद्र यादव की पुस्तक भारतीयतावाद पर उस दृष्टि से बहुत परे है, जो अधजल गगरी छलकत जाय जैसी होती है या "सम्पूर्णकुम्भो न करोति शब्दं अर्धो घटो घोषमुपैति नूनं । विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वं मूधास्तु जल्पन्ति गुणैर्विहीनाः। हम देख भी रहे हैं कि आजकल भारतीयतावाद की खाली मटकियों से कैसे जल का कलकल निनाद करवाया जा रहा है। मेरे लिए इस किताब की सबसे बड़ी साहित्यिक-राजनीतिक उपलब्धि यह है कि यह प्रतिरोध की भाषा को नकार, भय और शर्म के अँधेरे से निकालकर एक सकारात्मक, स्वाधीन और आत्मविश्वासी भाषा देना चाहती है। योगेंद्र यादव ने हाल में लिखा कि गणराज्य के रक्षकों की भाषा अक्सर भय, शर्म और निराशा से भरी रहती है, जबकि विनाशकारी शक्तियाँ “न्यू इंडिया”, “आत्मनिर्भरता”, “राष्ट्रीय एकता” जैसी सकारात्मक शब्दावली पर कब्ज़ा कर लेती हैं। ‘गणराज्य का स्वधर्म’ इसी कब्ज़े को तोड़ने की कोशिश है। यह हमें बताती है कि भारतीयता की लड़ाई भारत-विरोधी होकर नहीं लड़ी जा सकती; राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और विरासत को साम्प्रदायिक ताक़तों के हवाले छोड़ देना भी एक ऐतिहासिक भूल है। इसलिए मैं कहूँगा कि यह किताब इन दिनों की सिर्फ़ एक अच्छी किताब नहीं, एक ज़रूरी किताब है। यह पाठक को तैयार जवाब नहीं देती; वह उसके भीतर वह बेचैनी जगाती है, जो किसी जीवित लोकतंत्र के लिए ऑक्सीजन का काम करती है। आज जब विवेकहीन और मनुष्यताविरोधी एकरूपता को राष्ट्रवाद, शोर को जनमत और सांस्कृतिक प्रभुत्व को सभ्यता कहने की आदत बढ़ती जा रही है, तब ‘गणराज्य का स्वधर्म’ हमें याद दिलाती है कि भारत का सच्चा स्वभाव वर्चस्व नहीं, बहुलता; नफ़रत नहीं, मैत्री; दया नहीं, करुणा; अहंकार नहीं, विनय; और केंद्रीकरण नहीं, साझी प्रभुता है। ऐसी किताबें बार-बार नहीं आतीं। जब आती हैं, तो वे समीक्षा से अधिक संवाद की हकदार होती हैं। योगेंद्र जी को इतनी पुस्तक के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ। @_YogendraYadav



















Aaj ka din mere liye behad khaas raha. “Ek Shaam Education Ke Naam” program mein mujhe sammanit kiya gaya, aur sabse badi baat — mujhe “Delhi ke Ravish Kumar” ke khitab se nawaza gaya। Yeh sirf ek title nahi, balki zimmedaari hai… sach dikhane ki, awaaz uthane ki, aur aap sab tak ground reality pahunchane ki। Aap sabka pyaar aur support hi meri taqat hai 🙏 #Grateful #Journalism #Delhi #IndiaFirstReports #Respect #Award #Media

I travelled to Madhubani, Bihar to report on the brutal killing of Roshan Khatoon and what I found is deeply disturbing. On 25 February 2026, during the month of Ramadan, Roshan Khatoon was tied to a pole and mercilessly beaten by more than 20 people, including men and women, while she was fasting, after she went to the village head’s house to resolve a dispute. Her family says that when she asked for water, she was instead forced to drink a mixture of alcohol and urine, an act they describe as deliberate humiliation because she was a Muslim woman. She succumbed to her injuries on 1 March. What followed raises even more serious questions. Instead of immediately ensuring medical care and justice, police allegedly took Roshan Khatoon and her husband to the Police station while she was critically injured and demanded ₹50,000 for their release. The family says they were eventually released after 5–6 hours after paying ₹4,000. Nineteen people have been named in the FIR. Yet, nearly a month later, only one arrest has been made. Her family alleges that the accused are being shielded due to political backing from BJP and JDU leaders. Meanwhile, even after weeks, the postmortem report has still not been released. A woman was lynched, humiliated in the most inhuman way, and a month later, justice remains nowhere in sight. @bihar_police #JusticeForRoshanKhatoon


