Rahul Dubey

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Rahul Dubey

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@RahulDu12

Journalist | Amar Ujala अनूठा, अकेला, बहादुर..!

Kannauj Katılım Mayıs 2018
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ #संकटमोचन #काशी
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
@AnilYadavmedia1 तुमसे अधिक नीच कोई नहीं है. तुम विशुद्ध जातिवादी व्यक्ति हो.
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ANIL
ANIL@AnilYadavmedia1·
रोहित सरदाना की मृत्यु क़ो पांच साल हो गए, वैसे तो भारतीय परम्परा है कि मृत्यु के बाद किसी की बुराइयों क़ो भी नजरअंदाज कर देना चाहिए, लेकिन मुझे ये कहने में कोई ऐतराज नहीं है कि रोहित सरदाना गोदी मीडिया का पहला और सबसे बड़ा नफरती एंकर था, रुबिका, अंजना, गुल्लू, तिहाड़ी तो इसके जूनियर हैँ, नफ़रत के मामले में, हालांकि देश के भाईचारे क़ो बर्बाद करने में इनका योगदान भी अतुलनीय है,
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
सुबह 9 बजे श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रधानमंत्री मोदी. @PMOIndia @narendramodi #kashi #pm
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Upmita Vajpai
Upmita Vajpai@upmita·
आज तमिलनाडु में चुनाव हुआ है। पिछले 25 दिनों में वहां से आज मेरी दसवीं और आखिरी रिपोर्ट छपी है। काशी से तमिलनाडु तक का यह सफर आसान नहीं था। भाषा सबसे बड़ी चुनौती रही—जहां तमिल के आगे बातचीत मुश्किल हो जाती है, और मुझे सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी ही आती हैं। फिर भी, कोशिश की। दूरी मायने नहीं रखती, न भाषा। कभी किसी तमिल जर्नलिस्ट साथी की मदद ली तो कभी अपने साथ सफर कर रहे टैक्सी ड्राइवर से कहा - जरा इसे ट्रांसलेट करके बता दो। अब तो आधा दर्जन तमिल शब्द और डीएमके के एंथम की पहली दो लाइन मैंने भी सीख ली है। इससे पहले मैं तमिलनाडु गई थी। एक बार जयललिता की मौत को कवर करने चेन्नई और दूसरी बार डॉ कलाम के फ्यूनरल पर रामेश्वरम। लेकिन उसे 120 महीने हो चुके हैं। जिस राज्य में आपने कभी काम नहीं किया वहां सोर्स, कॉन्टेक्ट जुटाना आसान नहीं था। लेकिन फिर भीतर के कंपन ने याद दिलाया, नहीं ही मिलेगा और लाना ही होगा। ये तब जब वहां के सियासतदान नॉर्थ और हिंदी से वास्ता रखना न चाहते हों। वहां कोई हिंदी बोलते मिल जाता था तो लगता था इस पल वाली हवा में ऑक्सीजन थोड़ा ज्यादा है। हम भाषा के इतने ही खिदमत गुजार हैं। काशी से चेन्नई और फिर तमिलनाडु के दूसरे छोर मदुरै तक चुनावी सुध समझने की कोशिश की। लगभग 300 घंटे ग्राउंड पर बिताए। कई सारे पॉलिटिकल एक्सपर्ट और राजनीति के धुरंधरों के साथ बतियाई, तब जाकर अपनी स्टोरी के लिए दो-दो चार-चार लाइनें जुटाईं। हिंदी के रीडर्स के लिए दक्षिण भारत की राजनीति की रीडेबल खबरें ढूंढना-लिखना रोज नया चांद चढ़ाने जितना ही मुश्किल था। लेकिन भीतर का जो खबरों का जिहाद है वो अब तक जिंदा है इसका अंदाजा हो चला है।  एसी केबिन से बाहर निकलकर संपादक से फिर रिपोर्टर हो जाने में जो सुख है वही जर्नलिज्म का हाड़ मांस मज्जा है। इस परफॉर्मेंस प्रेशर से लबालब रही कि इन खबरों के पहले पाठक मेरी अपनी टीम होगी। जिन्हें मैं रोज बेहतर करने का ज्ञान देती हूं। डब्ल्यूएचओ ने जिस साउथ इंडियन फूड को दुनिया का सबसे हेल्दी खाना बताया है उसका मैंने इतना ज्यादा लुत्फ उठाया है कि अब कुछ महीनों तक काशी का गोदौलिया वाला डोसा खाने की जिद नहीं करूंगी।  उन सभी का शुक्रिया जो मेरे इस युद्ध के पुश्तरनाह बनें। बहुत कुछ समेटा है, यादें, शब्द, तस्वीरें, तजुरबे भी।  वणक्कम  तमिलनाडु 🙏🏻 #Tamilnadu #Groundreport
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Upmita Vajpai
Upmita Vajpai@upmita·
मुफ्त के चुनावी वादे… राजनीति की वो परंपरा है जो इन दिनों तमिलनाडु चुनावों में चर्चा के चरम पर पढ़ाई-खाने से शुरू हुई ये योजनाएं, फ्रिज-टीवी-वॉशिंग मशीन से होती हुईं लैपटॉप और कैश तक आ गईं उपमिता वाजपेयी, चेन्नई। सेंथिल मदुरै के वाडीपट्टी में अपनी दो बेटियों के साथ रहते हैं। पत्नी के खाते में 1000 रुपए आते हैं। बेटियों के पढ़ाई के लिए 1000-1000 अलग से मिलते हैं। पत्नी और बेटियां बस में मुफ्त सफर करती हैं। घर पर जो मिक्सर है वो एआईएडीएमके सरकार में मिला था। हालांकि डीएमके से मिली टीवी उनके पिताजी की मौत के पहले ही खराब हो गई थी। रजलक्ष्मी खुश हैं कि सरकार ने उनके बेटे को लैपटॉप दिया है। ये कहानी किन्हीं एक-दो परिवारों की नहीं, न ही ये किसी एक पार्टी के दिए मुफ्त तोहफों की है। ये राजनीति की वो परंपरा है जो इन दिनों तमिलनाडु चुनावों में चर्चा के चरम पर है। राज्य के पूर्व वित्तमंत्री, मदुरै से डीएमके के विधायक और उम्मीदवार पीटीआर पलानीवेल थियागराजन कहते हैं फ्रीबी के आसपास होती राजनीति दोगलापन है। जो पार्टी देती है उसे ये मदद, भलाई लगता है और दूसरे को मुफ्त रेवड़ियां। जो भी दिया जा रहा है, शिक्षा हो, बच्चों के लिए मुफ्त खाना या हेल्थ, वो या तो सुरक्षा है या फिर भविष्य के लिए इन्वेस्टमेंट। हर इन्वेस्टमेंट का फायदा मिलने में सालों लग जाते हैं। ये आपका फैसला है कि इसे आप फ्रीबी कहते हैं या नहीं। डीएमके का कहना है कि उन्होंने अपने इन वादों की फेहरिस्त को बाकायदा रिसर्च करके बनाया है। जिस टीम ने डीएमके का 2026 चुनावों का घोषणा पत्र बनाया, उसकी लीडर कनिमोझी थीं। हालांकि स्टालिन के तड़कते-भड़कते चुनावी भाषण में वादों—मुफ्त तोहफों का भरपूर जिक्र ऐसा लग रहा है मानो वो आम बजट पढ़ रहे हों। 8वीं क्लास तक के बच्चों को सुबह का नाश्ता देने का वादा है, फिलहाल 5वीं तक के बच्चों को मिल रहा था। वृद्धा पेंशन को 1500 से बढ़ाकर 2000 कर दिया है। घरेलू महिला के लिए 1000 रु की मदद अब 2000 होगी और बच्चों की स्कॉलरशिप 1000 से बढ़ाकर 1500। इसके अलावा फ्रिज, टीवी, वॉशिंग मशीन जैसे सामान खरीदने के लिए 8000 रुपए का कूपन दिया जाएगा। राजनीतिक एक्सपर्ट प्रोफेसर रामू मणिवन्नन कहते हैं, अगर इतनी सहूलियतें मिलेंगी तो लोग काम नहीं करेंगे। सरकार के लिए जरूरी है कि वो पैसों का लालच न बढ़ाएं। हक अदा करें, अच्छी पढ़ाई और इलाज मुफ्त में दें। हालांकि उनका ये भी कहना है कि भाजपा बिहार जैसे गरीब राज्य में 8000 रुपए मदद बोलकर देती है और तमिलनाडु जैसे विकसित प्रदेश में उसे मुफ्तखोरी कहती है। तमिलनाडु में चुनावों में मुफ्त सामान और डीबीटी (सीधे कैश) की परंपरा द्रविड़ राजनीति से जुड़ी हुई है। पढ़ाई और खाने से शुरू हुई ये योजनाएं, फ्रिज-टीवी-वॉशिंग मशीन से होती हुईं लैपटॉप और कैश तक आ गईं। असर ये कि पिछले बजट 2025-26 में तमिलनाडु राज्य को इन सभी स्कीमों के चलते 98,857 करोड़ रुपए का खर्च उठाना पड़ा था। तमिलनाडु में पार्टियां जो स्कीम लेकर आईं, अगली पार्टी की सरकार ने उसे बंद नहीं किया, बल्कि और ज्यादा बढ़ाकर देने लगीं। 1956 में डीएमके सीएम अन्नादुरई ने तिरुनेलवेली जिले से मिड-डे मील की शुरुआत की। इसके बाद स्कूल में बच्चों की संख्या काफी बढ़ गई। 1982 में एमजीआर ने बढ़ाकर इसे प्राइमरी स्कूलों तक ले गए। 1960 में डीएमके के सीएम अन्नादुरई 1 रुपए में 3.75 किलो चावल देने वाली स्कीम लेकर आए। 1989 में करुणानिधि ने मुफ्त बिजली दी। एआईएडीएमके की सीएम जयललिता ने मुफ्त में वॉशिंग मशीन और मिक्सर-ग्राइंडर बांटे। वो अम्मा कैंटीन लेकर आईं। पार्टी ने मुफ्त एलपीजी सिलिंडर भी दिए और नमक, पानी और दवाएं भी मुफ्त दीं। 2006 में करुणानिधि ने अपने चैनल कलैगनार टीवी का नाम छपा कलर टीवी बांटा। 2011 में जयललिता ने मुफ्त भैंस देने का वादा किया था, जिसका काफी मजाक बना। हालांकि वो दूध के व्यवसाय में मदद के लिए था। जब फ्रिज-वॉशिंग मशीन का वादा किया तो ये तर्क दिया कि गरीब बिल कैसे भरेंगे। मुफ्त कलर टीवी वाले वादे के दौरान डीएमके को 96 सीटें मिली थीं। हालांकि सस्ते चीन के बने टीवी जल्दी खराब हो गए और फिर जनता नाराज होने लगी। इसका नुकसान 2011 के चुनाव में डीएमके को हुआ। 2011 में एआईएडीएमके के पंखे, मिक्सर के वादे पर 150 प्लस सीटें मिलीं। और 2021 में महिलाओं के खाते में कैश योजना के बाद डीएमके की वापसी हुई और स्टालिन को 133 सीटें मिलीं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन फ्रीबीज पर अलग-अलग केस में टिप्पणी करते हुए ये तक कहा कि ये लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं, करदाताओं का पैसा बर्बाद करते हैं और इससे स्वतंत्र चुनाव की भावना कमजोर होती है। इस बार क्या हैं चुनावी वादे डीएमके - महिलाओं को 5000 कैश, बस में मुफ्त सफर, स्कूल में नाश्ता और खाना एआईएडीएमके - हर महीने कैश, अम्मा कैंटीन, मिक्सर-ग्राइंडर, फ्रिज, बस में मुफ्त सफर में पुरुष भी टीवीके - 20 लाख तक एजुकेशन लोन, बेरोजगारों को 4000 (ग्रेजुएट को) और 2500 (डिप्लोमा वालों को) बीजेपी - कैश, प्रधानमंत्री आवास के तहत घर, मुफ्त राशन वाली स्कीम #Tamilnadu #Elections #groundreport
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Upmita Vajpai
Upmita Vajpai@upmita·
आस्था, इतिहास और राजनीति इस बार थिरुपरनकुंड्रम की सियासत के 3 किरदार विधानसभा चुनाव के कांधे पर बंदूक धरकर, मंदिर-दरगाह के बीच खिंची सियासत वाली एलओसी उपमिता वाजपेयी, थिरुपरनकुंड्रम (मदुरै)। मदुरै से 15 किमी दूर थिरुपरनकुंड्रम। वहां की थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी। जो वहां रहनेवालों के बचपन और बुढ़ापे की सबसे गहरी पहचान है। उसके ठीक नीचे मंदिर। ऊपर दरगाह। और विधानसभा चुनाव के कांधे पर बंदूक धरकर, इन दोनों के बीच खिंची सियासत वाली एलओसी। पहाड़ी के आंचल में मुरुगन मंदिर है और उसके शिखर पर सिकंदर बदूशा दरगाह है। 14 वीं शताब्दी की इस दरगाह को लेकर पिछले साल दिसंबर में कार्तिगई दीपम उत्सव के दौरान विवाद शुरू हो गया। पिछले महीने मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उन्होंने कार्तिकई दीपम दीपक विवाद को लेकर तमिलनाडु सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य में अपनी आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव को अहमियत दी जानी चाहिए। वहीं डीएमके प्रमुख और सीएम एम स्टालिन लगातार ये बयान दे रहे हैं कि भाजपा मदुरै को मणिपुर बनाना चाहती है। वैसे थिरुपरनकुंड्रम सीट डीएमके और एआईएडीएमके के सीधे मुकाबले वाली है। यहां जीत-हार टिकटकिसे दिया इससे तय होती है। डीएमके ने इस बार महिला प्रत्याशी कृथिका थंगपंडियान को टिकट दिया हैं। वो युवा हैं और ये उनका पहला चुनाव है। पिछली बार के विधायक वीवी राजन चेलप्पा एआईएडीएमके से चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं टीवीके से सीटीआऱ निर्मलकुमार को टिकट मिला है। पिछले चुनाव ने चेलप्पा ने सीपीआई एम नेता को 30 हजार वोट से हराया था। इलाके में 3.21 लाख मतदाता हैं जिनमें महिलाएं थोड़ी ज्यादा हैं। डीएमके के प्रचार में महिला प्रत्याशी के लिए महिला कार्यकर्ता ज्यादा हैं। वो हिंदी तो नहीं बोल पातीं लेकिन टूटी फूटी अंग्रेजी में कहती हैं कि वो डीएमके का साथ दे रही हैं। क्योंकि डीएमके उन्हें और उनकी बहन को मदद करती है। उनका इशारा उन सब घोषणाओं की ओर था जिसमें सरकार अलग-अलग योजनाओं के जरिए पैसे बांट रही है। शाम होते होते मंदिर में भीड़ बढ़ने लगती है। मदुरै के अलावा आसपास के कई जिलों यहां तक की राज्यों के लोग भी इस मंदिर में आते हैं। मंदिर के ठीक सामने फूलों की दुकान लगानेवाले मनोहर को लगता है कि हिंदुओं को पहाड़ी पर दीपम जलाने दिया जाना चाहिए था। मुसलमानों को इससे शायद कोई दिक्कत नहीं होती। याकूब मंदिर से चार गली छोड़कर रहते हैं। चार पीढ़ियों से यहीं घर है और सब्जियों का कारोबार करते हैं। वो कहते हैं पहले वो छुट्टी या जुमे पर बिरयानी लेकर दरगाह पर दोस्तों के साथ जाते थे। अब कुछ महीनों से उस पर पाबंदी है। वो कहते हैं उनके यहां के मुसलमानों को इससे कोई खास दिक्कत नहीं है। थिरुपरनकुंड्रम वो इलाका है जहां हिंदू और मुसलमानों के बीच मोहल्ले, कारोबार और रिश्तों की साझी दुनिया बसती है। दिसंबर से मार्च के बीच 4 महीनों में कैसे एक धार्मिक मसला राजनीतिक मसले में बदल गया इस पर यहां के बाशिंदे भी हैरान हैं। एम नचियप्पन, तमिलनाडु में भाजपा के मंदिर सेल के प्रमुख हैं। वो कहते हैं दीपम नहीं जलाने देकर डीएमके सरकार मुसलमानों को ये दिखाना चाहती है कि वो उनकी सुरक्षा कर रहे हैं। ऐसा करने से मुसलमान उन्हें वोट देंगे। लेकिन ऐसा नहीं होगा। बल्कि हिंदू वोटर डीएमके के खिलाफ हो गए हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ रामू मणिवन्नन कहते हैं तमिलनाडु में चुनाव में धर्म से ज्यादा पार्टी बड़ी होती है। शायद यही वजह है कि भाजपा का अयोध्या वाला मॉडल तमिलनाडु में काम नहीं आ रहा। मंदिर से दो सौ मीटर दूर एक गली के मुहाने पर बोर्ड लगा है। ये रास्ता सिकंदर दरगाह को जाता है। उस गली में पहले दो घर मुसलमानों के हैं, फिर तीन हिंदुओं के, फिर एक मुसलमान का और फिर चार हिंदुओं के। घरों और लोगों के बीच सौहार्द की ये बुनावट इलाके में सुकून का सबसे मजबूत कारण हैं। इस मंदिर में मुरुगन को बैठे हुए रूप में पूजा जाता है। मंदिर शादी में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए प्रसिद्ध है। इस बार विधानसभा चुनाव में ये मंदिर किस पार्टी की बाधाएं दूर करता है ये नतीजे बताएंगे। क्या है विवाद विवाद की जड़ एक परंपरा को लेकर है, जिसे लेकर मंदिर और दरगाह के बीच टकराव बढ़ा। मंदिर समिति पहाड़ी पर दरगाह के भीतर एक जगह दीप जलाना चाहती थी। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने परंपरा के हवाले से इसकी इजाजत दे दी। लेकिन डीएमके सरकार ने बात नहीं मानी। याचिका को चुनौती दी। धारा 144 लगा दी। भाजपा ने इसे हिंदू विरोधी कहा, लेफ्ट पार्टियों ने सांप्रदायिक तनाव का आरोप लगाया। इसी बीच एक वीडियो वायरल हुआ।उसमें दरगाह में बकरे की बलि और बिरयानी खाते लोग दिखाई दिए। बवाल हुआ तो मुसलमान पक्ष को दरगाह में बलि के लिए जाने से रोक दिया गया। यहां तक की वहां ले जाकर बिरयानी खाने से भी। हिंदू संगठन पहाड़ी का नाम बदलकर श्रीकंदर मलाई रखने की मांग की जाने लगी। #TamilnaduElections #Mandir #Madurai
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Upmita Vajpai
Upmita Vajpai@upmita·
पुडुचेरी से ग्राउंड रिपोर्ट… कौओं को दाने से लेकर टेनिस तक पुडुचेरी के सीएम की सादगी से सत्ता की कहानी थट्टनचावड़ी सीट - यहां से तय होगी पुडुचेरी की सरकार, रंगास्वामी बचाएंगे गढ़ या वैतिलिंगम करेंगे वापसी? उपमिता वाजपेयी, पुडुचेरी। पुडुचेरी के पुराने मोहल्लों से फ्रेंच कॉलोनी, व्हाईट टाउन और समुद्र को छूते शहर के आखिरी छोर तक लाउडस्पीकर से जमकर प्रचार हो रहा है। तमिल गाने उम्मीदवारों की तारीफों की धुन गा रहे हैं। इन गानों के बीच से आती पटाखों की आवाज ये बताती है कि वहां कोई बड़ा नेता मौजूद है। देश के आखिरी कोने पर बसे पुडुचेरी में चुनाव अपने आखिरी मुहाने पर है। पुडुचेरी का थट्टनचावड़ी वो सीट है जहां से एनडीए के टिकट पर सीएम एन रंगास्वामी और कांग्रेस की सीट पर पूर्व सीएम और मौजूदा सांसद वैतिलिंगम दोनों चुनाव लड़ रहे हैं। इलाके की प्रमुख सड़कर पर एक लोडिंग रिक्शा पर हाथी जितना बड़ा जग का चुनाव चिह्म लेकर सबसे आगे चल रहा है। ये पुडुचेरी के सीएम एन रंगास्वामी की पार्टी एआईएनआरसी का चुनाव चिह्न है। चार पांच गाड़ियां है, साधारण मॉडल वालीं। काफिला बीच चौराहे पर रुकता है। कार्यकर्ताओं की भीड़ कार को घेर लेती है। सीएम गाड़ी से बाहर आते हैं। इलाके के उम्मीदवार से मिलते हैं। उन्हें कई किलो वजनी ताजे फूलों का हार पहनाया जाता है। उम्मीदवार साष्टांग प्रणाम करते हैं। महिलाएं मुस्कुराकर उन पर ताजे फूल फेंकती हैं। कई बार वो माइक लेकर अपने हासिल और चुनावी वादों को गिनाते हैं। पैदल संकरी गली के आखिरी छोर तक जाते हैं। इलाके के बड़े मंदिर को देखकर हाथ भी जोड़ते हैं। बमुश्किल 10-12 मिनट बाद वो दोबारा कार में आकर बैठ जाते हैं। काफिला अगले इलाके को कूच करता है। सीएम एम रंगास्वामी दिन में दो सीटों पर प्रचार के लिए जाते है। उनकी पार्टी ने 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। लगभग हर सीट पर वो प्रचार के लिए जा चुके हैं। 75 साल के सीएम खुद दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। थट्टनचावड़ी और मंगलम। थट्टाचावड़ी जहां उनकी पारंपरिक सीट है वहीं मंगलम इसलिए अहम है क्यों वहां गठबंधन के बावजूद डीएमके और कांग्रेस दोनों ने अपने सहयोगी खड़े कर दिए हैं। एक बड़े से हॉल और दो कमरों के जिस घर में सीएम रहते हैं वहां की दीवारों को पलस्तर और रंगरोगन की जरूरत है। बैचलर हैं और मां के निधन के बाद से वो अकेले ही यहां रहते हैं। जिन दो कमरों में उनका बसेरा है उनमें से एक में उनका सिंगल बेड, अलमारी रखी है। दूसरे को स्टोररूम नुमा बनाया है। जिसमें ट्रॉफी, फ्रैम से लेकर चुनाव प्रचार का तमाम सामान और बिसलेरी को बोतलें रखी हैं। घर के आंगन में एक टेनिस कोर्ट बना है। हर दिन कम से कम एक घंटा वो यहां टेनिस खेलते हैं। योपुर सुरेश उनके साथ रोज खेलने आते हैं। कहते हैं टेनिस स्पीड का गेम है। हमारे सीएम किसी 16 साल, 25 साल के प्लेयर से जमकर मुकाबला कर लेते हैं। टेनिस कोर्ट से थोड़ी ही दूर पर एक मुरुगन भगवान का मंदिर है। वो हर सुबह वहां पूजा करने के बाद ही काम पर निकलते हैं। सीएम पूजा करने के बाद कौओं को दाना-पानी देते हैं और फिर प्रसाद भी खुद बांटते हैं। इन दिनों चुनावी बयार है इसलिए जो उम्मीदवार उनसे मिलने आते हैं उन्हें इस मंदिर में विशेष पूजा करवाई जाती है। सीएम उन्हें भगवान मुरुगन के सामने रखा चुनावी घोषणा पत्र उठाकर देते हैं। उसपर कुछ फूल और नींबू रखे होते हैं। रंगास्वामी चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। दो बार कांग्रेस और दो बार अपनी बनाई ऑल इंडिया एन आर कांग्रेस से। पुडुचेरी के सबसे ज्यादा वक्त के लिए सीएम रहने का रिकॉर्ड उनके हिस्से है। पहली बार जब अपनी पार्टी से सीएम बने तो उनकी पार्टी सिर्फ 45 दिन पुरानी थी। नई पार्टी क्यों बनाई ये समझाने के लिए चुनाव लड़ने से पहले कार्यकर्ताओं को उन्होंने साढ़े तीन घंटे खड़े होकर भाषण दिया था। पेशे से किसान,पढ़ाई से वकील रंगास्वामी एक्टर शिवाजी गणेशन के बूजम फैन थे। युवाओं को शिवाजी गणेशन की फिल्मों के टिकट बांटते थे। वकालत और किसानी करते वो राजनीति में आ गए। पुदुचेरी में लोग कहते हैं कि कोई भी कभी भी कहीं भी सीएम रंगास्वामी से मिल सकता है। ये उनकी सबसे सबसे बड़ी ताकत है। इस बार लोग इस ताकत को वोट में बदलते हैं या कांग्रेस डीएमके को मौका देते हैं इसका फैसला 9 अप्रेल को होगा। #Puducherry #Elections @AmarUjalaNews
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
भाषा में बदलाव करो. गलत मेसेज मत दो. जितने भी बड़े मंदिर हैं श्रीकाशी विश्वनाथ जी से लेकर महाकाल तक. कहीं भी पंडित खुद से कुछ नहीं कराते हैं, सरकार के वेतन पर यह पूजा कर्मचारी भर हैं बस. आप जैसे बड़े लोग ट्रस्ट के अफसरों से प्रोटोकॉल लगवाते हो फिर अफसर जो कहते हैं वो ये करते हैं.
खुरपेंच@khurpenchh

अमीरों को पंडित जी स्वयं पूजा करवाते हैं और भगवान नजदीक से दर्शन देते हैं, घंटों लाइन में खड़े रहने वाले श्रद्धालु पुलिस वालों और सेवादारों के गुस्से का शिकार होते हैं।

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Yashwant  Vyas
Yashwant Vyas@yv_post·
समोसे की कद्र कीजिए। #april #samosa
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
क्यों बढ़े समय??? अगर हम ये मानते हैं कि ईश्वर विश्राम करते हैं, सोते हैं, जागते हैं भोग लगाते हैं तो क्या हम उन्हें सोने को 5 घंटे भी नहीं देंगे. बिल्कुल नहीं बढ़ना चाहिए समय होना ये चाहिए कि vip, vvip दर्शन पर सख्ती से पूरी तरह से रोक लगे गर्भगृह में सभी का प्रवेश पूरी बंद हो
Ashwini Upadhyay@AshwiniUpadhyay

बच्चे, बूढ़े और जवान आज वृंदावन में सब परेशान संख्या भी बढ़ी, आस्था भी बढ़ी, लेकिन दर्शन का समय नहीं बढ़ा तिरुपति और वैष्णो देवी में प्रतिदिन 21 घंटे दर्शन हो सकता है तो मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, चारों धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग और सभी शक्तिपीठों में क्यों नहीं? @myogiadityanath

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YouTube India
YouTube India@YouTubeIndia·
what do you call this in your language? 🧊
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Shubham Shukla
Shubham Shukla@Shubhamshuklamp·
ईशान किशन बहुत तगड़ा बैट्समैन है। बस टीम गलत है आज भी शानदार अर्धशतक मारा! लेकिन टीम को तो हारना ही है।
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
जब रोहित शर्मा ने अपने 71वें शतक के बाद विराट कोहली का इंटरव्यू लिया था। 🥹💙 - विराट: "इतनी शुद्ध हिंदी बोल रहा है मेरे साथ पहली बार!" 😂😭 - रोहित: "प्लान तो हिंदी-इंग्लिश मिक्स करने का था!" 🤣 x.com/AmanKumar578_/…
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
@old_cricketer 2009 में भी सुब्रत पाठक ही टिकट पाए थे. और भाजयुमो उपाध्यक्ष नहीं अध्यक्ष बने थे.
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Exx Cricketer
Exx Cricketer@old_cricketer·
चित्र सुब्रत पाठक का है। मेरे शहर कन्नौज के पठकाने मोहल्ले का मूल निवासी है और इनका परिवार कन्नौज के सबसे बड़े और सबसे पुराने रईसों में से एक है। मुझसे कुछ दो तीन साल छोटा ही है। 2002 03 के आसपास इसे भाजपा नेता बनने की इच्छा हुई।। उस समय कन्नौज भाजपा मृतप्राय थी। ये भाजपा में पहले से था। मेरे एक चचेरे भाई का दोस्त था, एक का पढ़ाई के समय इसका रूममेट और सामान्य शिष्टाचार व्यवहार तो है ही हमारा कार्ड वाला, परिचित भी था। इसने अपनी पहली जनसभा भोलानाथ धर्मशाला में की, जहां मुझे मिलाकर मात्र हम बीस लोग थे। फिर नगरकोट मंदिर वगैरा में खूब भाषणबाजी करने लगा। मेरे एक स्वर्गीय बड़े भाई इसके भाषण भी लिखते थे जो पौने सात फिट लंबे थे। पैसा थे, खूब खर्च किया। कन्नौज विधानसभा अनु. जाति आरक्षित है। 2009 के लोकचुनावों में शायद टिकट मिली या नहीं, इतनी ध्यान नहीं पर भाजपा हारी थी। 2012 विधानसभा चुनावों तक नाम बना लिया था। 2014 लोकसभा चुनावों में पदेन मुख्यमंत्री अखिलेश की पत्नी डिंपल से मात्र 25 हजार वोटों से हारा। तीन विधानसभा में जीता था, एक में लगभग बराबर था। छिबरामऊ से हारा था। कन्नौज में पदेन मुख्यमंत्री को इतनी नजदीकी टक्कर देने का इसे कोई लाभ नहीं मिला जबकि अमेठी से स्मृति ईरानी उन राहुल गांधी से 50 हजार वोट से हारकर भी मंत्री बन गई जो कभी अखिलेश जैसे मुख्यमंत्री नहीं रहे। मुझे दिल से खराब लगा था सुब्रत की टक्कर स्मृति से बड़ी थी । जान का खतरा था। बात यहीं खत्म नहीं हुई। 2015 में सुब्रत पर जानलेवा हमला हुआ। मस्जिदों से इसे निपटाने के आदेश हर किसी ने लाउड स्पीकर पर सुने। लाखन तिराहे से इसका निकलना बंद हो गया। फिर ये जेल भी भेजा गया। वन्दे मातरम भी साथ था जो बाद में नगर पालिका अध्यक्ष बना । और भी कई थे। इस बीच इनकी माता जी नगरपालिका चेयरमैन भी रहीं भाजपा से। 2017 में भाजपा सरकार आने के बाद सुब्रत को भाजयुमो का प्रदेश उपाध्यक्ष बना के लॉलीपॉप दिया गया। 2019 में सुब्रत ने अखिलेश को हराया, स्मृति ने राहुल को सुब्रत को फिर कुछ न मिला, स्मृति फिर मंत्री बनीं। 24 में दोनों ही हारे। पहले मुझे लगता था कि सुब्रत के साथ नाइंसाफी हुई। लड़का , वो भी भाजपा के लिए तन मन धन देने वाला। पैसे खर्च करने वाला, जेल जाने वाला। पढ़ा लिखा।। इसे सपा के गढ़ में सपा के मुखिया को सपा शासन में लगभग हरा देने और फिर फिर वाकई में हरा देने पर कुछ क्यों न मिला, ये हमेशा सोचता रहता था। फिर मैंने कल रात मधु पूर्णिमा किश्वर का पोस्ट पढ़ा। आंखों की धुंध छंट गई।
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
@old_cricketer मधु पूर्णिमा किश्वर ने सुब्रत पाठक को लेकर क्या लिखा????
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Rahul Dubey
Rahul Dubey@RahulDu12·
नव संवत्सर (विक्रम संवत-2083) के पुण्य अवसर पर आज श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, श्री अयोध्या धाम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 'श्रीराम यंत्र' की प्रतिष्ठापना की.
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