Ram Govind Chaudhari
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Ram Govind Chaudhari
@RamGovindChaud
नेता प्रतिपक्ष उत्तर प्रदेश, विधायक बांसडीह विधानसभा बलिया
Lucknow, India Katılım Eylül 2017
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@RebornManish आप बहुत अच्छा लिखते हैं
आपका मोबाइल नंबर चाहिए
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बेगैरत सत्ता के खिलाफ कैसे लड़ा जाता है, हसीना से सीखिए।
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आप जानते हैं कि बंगलादेश 1947 के बाद पाकिस्तान की कालोनी के रूप में गवर्न किया गया था।
70 में मुजीब ने चुनाव जीते, और सम्पूर्ण पाकिस्तान में बड़ी पार्टी के रूप में उभरे।
लेकिन सत्ता न मिली, मुजीब को जेल में डाल दिया गया।
इस्लामाबाद में हावी पंजाबी एलीट, दोयम दर्जे के बंगालियों को देश का मुख्तार कैसे बनने देता?
बंगालियों का दमन शुरू हुआ,
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तो भारत ने मौका देखा। युद्ध हुआ, 1971 में बंगलादेश को आजाद करवा दिया गया। नए देश मे मुजीब सत्ता में आये। पर छोटी सुबह के बाद फिर काली रात थी।
चार ही साल में सेना ने मुजीब का सपरिवार कत्ल कर सत्ता हथिया ली। दो बेटियां बची, जो पढ़ने के लिए उस वक्त परदेस में थी।
जनरल जियाउर्रहमान डिक्टेटर हुए। यह डिक्टेटरशिप हाथ बदलते हुए जनरल इरशाद तक पहुची।
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80 के दशक में इस डिक्टेटरशिप के विरुद्ध आंदोलन शुरू हुआ। कमान मुजीब की बेटी, हसीना ने संभाली।
दस साल संघर्ष चला।
अंततः मिलट्री सरकार को चुनाव कराने पड़े। लेकिन सेना ने इस बीच सरकारी पार्टी खड़ी कर ली, कमान जनरल जियाउर्रहमान की पत्नी, खालिदा जिया ने सम्हाली।
और छल प्रपंच से खालिदा जिया की पार्टी को जिता दिया गया।
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अब हसीना के सामने प्रश्न था, कि वह "चुनी हुई सरकार" को स्वीकार करे, या न करे।
चुनाव नतीजों में बेईमानी के सबूत लेकर कोर्ट जाए, तो कोर्ट भी कंप्रोमाइज्ड है। लेकिन जनता की अदालत में जायें तो कैसे?
यह सबसे दुविधा वाली अवस्था है।
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किसी औपनिवेशिक, विदेशी ताकत से लड़ने का मोटिव "स्वराज" होता है। सैनिक शासन से भी लड़ने का मोटिव "लोकतन्त्र" होता है।
पर अपने ही "लोकतन्त्र" में चुनी गई "स्वदेशी" सरकार से लड़ने का मोटिव क्या दिखेगा???
खुद की सत्ता पाना ?
मने क्या आपकी सत्ता आये तो तभी लोकतन्त्र मानोगे?? उसी मशीनरी और ईवीएम से तुम जीतो तो लोकतन्त्र पवित्र, हम जीते तो गड़बड़। यह सवाल तो पूछा जाएगा न?
आज भारत मे यही हालात है, विपक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ है।
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हसीना ने इस झिझक को तोड़ दिया।
जिस इलेक्शन पर उन्हें विश्वास नही, उसमे विपक्ष की भूमिका क्यों अपनाए। हसीना के सांसदों ने सन्सद का बहिष्कार कर दिया। सरकार के इस्तीफा देने और संसद भंग कर फेयर इलेक्शन की, एकसूत्री मांग को लेकर सड़कों पर उतर गए।
अब सन्सद के सत्रों में सिर्फ खालिदा के सांसद आते, विपक्ष नही। सरकार जो चाहे कानून बना लेती, जो चाहे कर सकती थी।
लेकिन दिक्कत ये की लोकतन्त्र में ऐसे कानूनों का इकबाल नही होता।
इस चाल से हसीना ने खालिदा सरकार को एकमुखी तानाशाह के बरअक्स खड़ा कर दिया। उनके प्रशासन और किसी डिक्टेटरशिप में कोई अंतर नही रह गया।
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हताश सरकार, एकतरफा सन्सद में अपने अधिकार बढाती गयी, दमन की नई नई पावर लेती गयी, हसीना के ट्रेप में फंसती गयी।
कुछ बरस तक ठप देश के बीच निष्प्रभावी गवरमेंट चलाई गई, लेकिन झुकना पड़ा। नये चुनाव करवाने पड़े। इस बार इलेक्शन रिग करने की हिम्मत न थी।
हसीना दो तिहाई बहुमत से जीती।
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फासिस्ट दमनकारी सरकार, जो विभाजन, नफरत, पैसा, मैनेजमेंट, खरीद बिक्री, प्रोपगंडा से सत्ता पर कब्जा करने में चूक जाए तो प्रशासनिक मशीनरी की ताकत से अपने लोग चुनवा रही है।
लेजिटमेसी के लिए, एक दो छोटे राज्यों में जनमत को मशीनों से बाहर आने की अनुमति दे देती है।
बिहार,बंगाल, यूपी, एमपी हर जगह आपको इसकी झलक साफ दिख रही है। विपक्ष दुविधा में है। कहीं कहीं मुर्गा देकर खुद बकरा खाने की कुटिल नीति से वो चकराया हुआ है।
अब वो लोकतन्त्र के नाम पर मिले जूठन स्वीकार करे, या पत्तल ही उठाकर फेंक मारे।
क्या जनता इस मूव स्वीकार करेगी?
साथ देगी??
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विपक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ता के ट्रेप में फंसा हुआ है। पर एक न एक दिन उसे इस छद्म लोकतन्त्र से लड़ना होगा।
यह लड़ाई विशुद्ध राजनैतिक है, मुकदमा, शिकायत, अपील, कोर्ट, लीगल प्रोसीजर की नही। पुख्ता सबूत से कोर्ट में भी नही जीत पाएंगे।
इस गुंडई के खिलाफ, आप बाहुबलियों की सहायता से नही जीत पाएंगे।देर सवेर सीधे जनता के बीच जाना होगा।
वोट के लिए नही,..
रेजीम की लेजिटमेसी को चैलेंज करने के लिए। जिला पंचायत, से विधानसभा, से ऊपर तक, आपको अनफेयर मीन्स से जीती गयी सत्ता को चैलेंज करना होगा।
उसमे मिले छोटे हिस्से को दुत्कारना होगा।
बकरों के बदले, मिले हुआ मुर्गा खाना छोड़ना होगा।
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क्योकि इस ट्रेप से निकलने का रास्ता सिर्फ हसीना के मॉडल में है। इस मॉडल का रास्ता जनता के बीच से गुजरता है। सड़क पर लम्बी लड़ाई के संकल्प से गुजरता है।
इसलिए कहा.. बेगैरत, और बेशर्म सत्ता के खिलाफ कैसे लड़ा जाता है,
हसीना से सीखिए।

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