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Pushpraj sharma
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Pushpraj sharma
@RealpushprajX
🇮🇳🇮🇳Nation first, everything else later | truth seeker | political analytics | social activist | cricket analytics
India Katılım Kasım 2021
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क्या सिर्फ पापड़ी ना मिलने पर कोई पूरी दुकान जला सकता है?
बाराबंकी में कुछ लोग गोलगप्पे खाने के बाद फ्री पापड़ी मांग रहे थे।
दुकानदार ने मना किया और बात बढ़ गई।
रात के समय गुस्से में कुछ युवकों ने दुकान में पेट्रोल डालकर आग लगा दी और पूरी घटना CCTV में कैद हो गई।
आज इंसान छोटी-छोटी बातों पर इतना गुस्सा क्यों करने लगा है?
गुस्सा अगर कंट्रोल में ना हो तो एक छोटी बात भी बड़ी तबाही बन जाती है।
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इस खौलती गर्मी में बाहर का कुछ खाने वाला हैं भी तो ये सब..!
दुकानदार से पूछा कितना रु किलो हैं उसने कहा 30kg हमने कहा 1kg दे दो,
उसने पूछा की अभी खाना हैं की लेकर जाना हैं हमने कहा पैक कर दो गनतंव्य स्थल पर जा के खा लेंगे,
दुकानदार-भैया एक 1kg अकेले नहीं खा सकेंगे, हमने कहाँ जयेगा तो बहुत लोग मिल जायेंगे खाने वाले ,
दुकानदार - 1kg से ज़्यादा हैं 40रु दे देना भैया!
कुछ भी हो यहाँ खरीदना बहुत सुखद होता हैं. .!

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🚨Big Story 🚨
Salim Wastik aka Salim Khan.
Case Story
1995 में 13 साल के बच्चे संदीप बंसल के अपहरण और हत्या का दोषी.
उस समय सलिम खान कोई आम आदमी नहीं था.
वह एक स्कूल में martial arts trainer के तौर पर काम करता था,
यानी बच्चों के बीच भरोसे वाली पहचान रखता था.
इसी भरोसे का फायदा उठाकर उसने अपने साथियों के साथ मिलकर बच्चे का अपहरण किया…
और फिर उसकी हत्या कर दी.
गिरफ्तारी हुई, कोर्ट ने सज़ा सुनाई…
लेकिन 1999 में पैरोल पर बाहर आया और फिर कभी वापस नहीं लौटा.
यहीं से शुरू हुई 26 साल की फरारी.
नाम बदला, पहचान बदली…
और बन गया “Salim Wastik”
एक YouTuber, एक self-proclaimed activist.
सोशल मीडिया पर लोग उसे follow करने लगे,
उसकी बातें सुनने लगे…
किसी को अंदाज़ा नहीं था कि असल में ये कौन है.
फरवरी 2026 में उस पर जानलेवा हमला हुआ,
10 से ज्यादा बार चाकू मारा गया…
वो खबरों में आया और कहानी यहीं से पलट गई.
पुलिस ने पुराने रिकॉर्ड खंगाले,
फोटो और fingerprint match किए…
और सच सामने आ गया.
👉 Salim Wastik = 26 साल से फरार Salim Khan
अब गिरफ्तार हो चुका है,
और वापस जेल भेज दिया गया है
जहां वो अपनी उम्रकैद पूरी करेगा.
भरोसे का चेहरा बनकर 26 साल जी लिया…
लेकिन कानून से ज़्यादा दिन कोई नहीं भागता.


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मम्मी कितने दिन से मुझे मटका लाने को बोल रही थी।
मै भी आज नहीं कल कह कर टाल देती थी पर अब गर्मी ज्यादा होने लगी तो मैं मटका ले आई।
अब हम मटके का पानी ही पी रहे हैं।
हमारे घर में कोई फ्रिज का पानी नहीं पीता।
फ्रिज का पानी पीने से गैस , कब्ज , एसिडिटी की तकलीफ हो सकती है।
दिल की धड़कन घट , या बढ़ सकती है।
फेफड़ों पर असर पड़ता है और गला खराब हो सकता है। जबकि
मटके का पानी विटामिन बी और सी का समृद्ध स्त्रोत होता है, जो शरीर की इम्युनिटी बढ़ाता है।
साथ ही दिमाग को ठंडा रखता है और पाचनतंत्र के लिए फायदेमंद होता है।
मटके का पानी कैल्शियम , आयरन की कमी दूर करने में सक्षम होता है।
तो दोस्तो !
आप बताइए , क्या आप भी मटके का पानी पीते हैं या फ्रिज में से प्लास्टिक की बोतल निकाल कर पानी पीते रहते हैं!?
आपको मटके का पानी कैसा लगता है , कमेंट करके बताइए!


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जब कोई नेता अचानक “आत्मज्ञान” प्राप्त करता है और बीजेपी में प्रवेश करता है, तो कुछ ऐसा बयान आता है |
“मेरा तो वहाँ दम घुट रहा था… चारों तरफ भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार… जनता की कोई सुनवाई नहीं… मैं तो बस देश सेवा करना चाहता था!”
मतलब, कल तक वही पार्टी स्वर्ग थी, आज अचानक नर्क बन गई—और यह ज्ञान ठीक उसी दिन आया, जिस दिन नई पार्टी का दरवाज़ा खुला।
अब सुनिए स्वागत समारोह:
बीजेपी कहती है—“ये बहुत ही ईमानदार, कर्मठ और विकास पुरुष हैं… अब सही जगह पर आए हैं… इनका असली सम्मान अब होगा।”
यानी कल तक ये “भटके हुए” थे, आज “विकास के सिपाही” बन गए—बस पार्टी का रंग बदलते ही चरित्र भी अपग्रेड हो गया!
और उधर पुरानी पार्टी, दर्द में डूबी हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है:
“हमारी पार्टी तोड़ी जा रही है… हमारे विधायक खरीदे जा रहे हैं… और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है… ये लोकतंत्र की हत्या है!”
यानी जब तक नेता उनके साथ था, तब तक वह “समर्पित और ईमानदार” था… और जैसे ही चला गया, वह “बिका हुआ माल” बन गया।
कुल मिलाकर पूरा नाटक कुछ ऐसा है:
नेता: “मैं संत बन गया हूँ”
नई पार्टी: “हमें ही संत पहचानने की कला आती है”
पुरानी पार्टी: “संत नहीं, ये तो बिकाऊ निकला”
और बेचारी जनता ❓
वो हर बार सोचती है—“इस बार शायद सच बोल रहे होंगे…”
लेकिन सच्चाई यह है कि यहाँ विचारधारा कम, और “सुविधा” ज़्यादा चलती है। राजनीति में पार्टी बदलना अब विचारधारा का नहीं, मौके का खेल बन चुका है।

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Let’s look at it a little differently.
That train coach is like a moving world—each person carrying their own little universe.
Someone on the upper berth is immersed in a conversation that matters to them,
the man opposite is lost in his phone, enjoying his music,
and someone else is deep in a personal call of their own.
The problem begins when these private worlds spill over into shared space.
What’s really clashing here isn’t just noise—
it’s personal freedom vs shared comfort.
Some people exercise their freedom as if no one else exists.
Others quietly adjust themselves for the sake of everyone around them.
So the chaos in that coach wasn’t just about loud voices or videos—
it was about a kind of indifference echoing through the space.
And when people say, “If it bothers you, travel privately,”
they’re not offering a solution—they’re avoiding the issue.
Because the real question isn’t where you travel,
it’s how you travel as a person.
A journey isn’t just about reaching your destination—
it’s also about allowing others to reach theirs in a bit of peace.


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“मंज़िल उन्हीं को मिलती है , जो हौसलों से डरते नहीं है।’’
कुछ साथियों का इस बार X पेआउट नहीं आया है, निराश नहीं हो आप खुद के ऊपर काम करेंगे तो बिल्कुल अच्छा होगा
नोट: सब कुछ छोड़ के आप X को फुल टाइम जॉब नहीं बना सकते हैं इसलिए खासकर पढ़ने वाले साथियों से निवेदन है अपने फ्री समय के ट्वीट पर रहें।
दोनों में कौन सा अच्छा लगा फ़ोटो.? कल से फिर से खुद के स्वास्थ्य के ऊपर ध्यान देना शुरू किया ही हूं जारी रहेगा .... 🧘🤸🤝


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