Rishi
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Rishi
@Ris_hi_
हमें कुछ पल के लिए दुनिया की सहानुभूति भले मिल जाए, पर अपने हिस्से का #संघर्ष हमें #खुद ही करना पड़ता है ..!!

व्हाट्सएप्प खोला सैकड़ो मैसेज थे, पूछ रहे थे कि; "कोंग्रेस के एससी मोर्चा के पदाधिकारी बहनजी से मिलने गए थे, बहनजी ने मिलने से मना कर दिया" मेने एक को मजाक में लिखा था कि; जो कोंग्रेस के पूर्व के अनुसुचित जाति मोर्चा (पूर्व का हरिजन मोर्चा) के कुछ पदाधिकारी लोग बहनजी को इस बात का धन्यवाद देने होंगे की आपने ही "हरिजन शब्द" का सबसे पहला विरोध गाँधी पर टिपण्णी करके किया था वो भी जनता पार्टी के मंच पर चढ़कर व उन्हें खरी खोटी सुनाकर, जिसके कारण हम भी अब सम्मान पा रहे है व कम से कम अनुसुचित जाति प्रकोष्ठ पदाधिकारी कहे जा रहे है, नही तो हमे "हरिजन पदाधिकारी" कहे जाते थे व उसके बाद बहनजी के कार्यालय के क्लर्क ने उन्हें भगा दिया होगा, यह कहकर की जाओ अपने मालिक को भेजो। काफी मैसेज थे कि उसपर आपने आज कुछ क्यो नही लिखा। अरे भाई। Pay back to Society के अंतर्गत एक जगह गए थे, आते हुए फेसबुक के एक मित्र से बाइक चलाते चलाते बात कर रहे , गाँवो में घूमने वाली भैंस ने एकाएक सामने आकर बैलेंस खराब करवा दिया जिससे पीछे बैठे मित्र अक्षय के हाथ लगने से जेब से मोबाइल नीचे गिरकर फोल्डर टूट गया। काम चलाऊ चल रहा रहा लेकिन इतना नही की लम्बा लेख लिख सके।। अब सही करवाकर लाये है। अब लिख देते है। देखिए 3 कैटेगरी है। 1.हरिजन 2.दलित 3.आंबेडकरवादी तो जनाब। हरिजन के निम्न गुण है; 1.सबसे बड़ा गुण यह है कि किसी पार्टी ने एससी के लिए अलग से प्रकोष्ठ बना ही क्यो रखा है? सीधा बराबरी के साथ कहो कि हम सभी एक है। इन बेचारों की हालत बिलकल ऐसी ही है जैसे अछूत को गांव से बाहर रखते थे। अब इन्हें पार्टियो में एक अलग से कौना पकड़ा रख़ा है। कि वंही रहो। मीडिया में डिबेट के समय कोंग्रेस का प्रवक्ता कोंग्रेस की तरफ से बोल रहे थे, उसी डिबेट में कोंग्रेस के ही प्रवक्ता उदितराज व्यक्तिगत हैसियत से बोल रहे थे। अरे भाई दोनो प्रवक्ता। एक ही पार्टी के। उदितराज की इतनी हैसियत नही समझी गयी कि विषय पर उसे कोंग्रेस प्रवक्ता कहकर बुलवाया जाए। इसलिए हरिजन मजबूरी है। जरूरी नही। 2.दलित किसी भी पार्टी के वो वर्ग है। जो हर किसी के सामने माईबाप कहकर खड़े हो जाते है। बस आप ही हमारे रहनुमा हो कहकर नारा लगाने लगते है। अपने शोषण को भूल जाते है। 3.अम्बेडकरवादी के गुण; "15 जनवरी 2004 को श्रीमती सोनिया गाँधी घर से निकलती है। बसपा के दफ्तर पहुचती है, बहनजी को जन्मदिन की बधाई देती है" एक महिला जो मामूली तनख्वाह वाले एक कर्मचारी के घर पैदा होकर उस मुकाम पर पहुचती है जँहा भारत की सबसे पुरानी पार्टी की मुखिया स्वयं उनके दफ्तर आकर बधाई दे और उसके बाद भी बहनजी कह देती है कि जाओ हम तुमसे गठबन्धन नही करते और; "आजतक भी कोंग्रेस चुनाव से पहले कोशिस करती है कि आओ गठबन्धन कर लो। लेकिन बहनजी कह देती है नही करना" बहनजी आज भी आवाज दे दे तो राहुल गाँधी "जी बहनजी" करके तुरंत बहनजी के घर पे मिलेंगे। उनके लिए दरवाजा भी खुलेगा क्योंकि वँहा बराबरी का मामला है। अब उसी राहुल गाँधी ने जिन्हें पार्टी का कौना अथार्त पूर्व का हरिजन मोर्चा पकड़ा रखा है, उनसे बहनजी क्यो मिलेगी? इसलिए काफी को अपने दलितपन को कभी तो छोड़ना पड़ेगा। अपनी पार्टियो को कहे कि यह एससी मोर्चा काहे बनाये हो इन्हें भंग करो। हमे बराबर का पदाधिकारियो समझो। कब छोड़ोगे? छोड़कर अम्बेडकरवादी बने।। विकास कुमार जाटव

यहां से उठाकर एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बनाने में बहुजन समाज पार्टी का भारी अहसान है ,वरना ये टेम्पो ही चला रहे होते। @oprajbhar






अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे प्राप्त जानकारी के अनुसार बहन जी ने राजेंद्र पाल गौतम के लिए है अपने दरवाजे ही नहीं खोले वैसे उनकी हैसियत बसपा के कोऑर्डिनेटर से मिलने की है।



कल बहन जी ने जो ट्वीट किया उससे कुछ सपा वाले बीएसपी पर हमला करते हुए कह रहे हैं किबहन जी आज ब्राह्मणों के बारे में बोल रही हैं लेकिन पहले "तिलक तराजू और तलवार इनको मारो.....4"का नारा दिया जाता था मैं यह बताना चाहती हूं कि सपाई लोगों का यह केवल भ्रम है














