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@SHasdeo
Hasdeo Aranya Bachao Sangharsh Samiti official हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, छत्तीसगढ़
Katılım Aralık 2020
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जल–जंगल–जमीन-जैव विविधता और पर्यावरण के विनाश के ख़िलाफ़ एकजुट हों,
ग्रामसभाओं के अधिकारों को कुचलकर जंगलों के विनाश के ख़िलाफ़ विशाल रैली एवं आमसभा
दिनांक 16 जनवरी 2026, बी.टी.आई ग्राउंड,अंबिकापुर (सरगुजा), समय 11 बजे से
#SaveHasdeo

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आज अंबिकापुर में सरगुजा संभाग के समस्त खनन परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासियों ने अपने जल जंगल जमीन पहाड़ और पर्यावरण को बचाने आमसभा के बाद विशाल रैली करते हुए कलेक्टर कार्यालय पहुँच कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया #SaveHasdeo

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✊ जल–जंगल–जमीन की रक्षा के लिए आज सरगुजा एकजुट है।
हज़ारों ग्रामीण और अंबिकापुर शहर के लोग खनन और विस्थापन के खिलाफ सड़कों पर उतरे।
जनता ही सरकार है!
#जल_जंगल_जमीन #SaveHasdeo #सरगुजा_एकजुटता #AmbikapurRally

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This is not just a protest—it’s a struggle for survival.
Communities from across Sarjuga came together to say NO to displacement and YES to justice.
✊ The struggle will continue until rights are secured.
#SaveEnvironment #SarjugaVasi #AmbikapurRally

English
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अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, यह उत्तर भारत का सांस लेने वाला फेफड़ा है। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा निर्णय दिया जिसने अरावली की किस्मत को खतरों से भर दिया है। अब अरावली को पहचानने का नया पैमाना सिर्फ 100 मीटर से ऊपर की ऊँचाई होगा और इस एक नियम ने अरावली के 90% हिस्से को सुरक्षा से बाहर फेंक दिया है। यानी बाकी पहाड़ियों को खनन के नाम पर खोदना लगभग वैध हो जाएगा। पुरानी तरह नए लीज़ भले न मिलें, पर “सस्टेनेबल” शब्द के बहाने जो चाहे, जैसा चाहे, खनन कर सकता है।
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आदिवासी समाज जिस जंगल-जमीन की पीढ़ियों से रक्षा करता आया है, उसे बिना ग्रामसभा सहमति के छीनना लोकतंत्र नहीं, कॉरपोरेट शासन है। SECL के नाम पर संचालन निजी कंपनी कर रही है और सरकार चुप है!
हम मांग करते हैं —
• ग्रामसभा की अनिवार्य सहमति के बिना कोई अधिग्रहण नहीं।
• अधिग्रहण रद्द कर जमीन ग्रामीणों को वापस की जाए।
• पर्यावरण, रोजगार और पुनर्वास पर स्वतंत्र जांच हो।
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आज जो पेड़ गिराए जा रहे हैं वह सिर्फ लकड़ी नहीं, हमारे बच्चों की ऑक्सीजन छीनी जा रही है।
अगर विकास का मतलब जंगल उजाड़ना है,
अगर प्रगति का मतलब जल–जंगल–ज़मीन को बेच देना है,
अगर उन्नति का मतलब आदिवासी और किसान को उजाड़ देना है
तो फिर ये विकास है किसका? जनता का या पूंजीपतियों का?
हमें याद रखना होगा पेड़ काटने वाले हाथ कभी भविष्य नहीं बनाते, भविष्य वो बनाते हैं जो धरती और प्रकृति को बचाते हैं।
आज अगर हम चुप रहे तो कल हमारे बच्चों को सांस लेने के लिए भी जंगल की फोटो खोजनी पड़ेगी।
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अंबुजा सीमेंट की पुरुँगा कोयला खदान परियोजना आदिवासियों पर विकास नहीं, विनाश थोप रही है। 2.25 मिलियन टन कोयला निकालने के नाम पर जंगल, नदी, संस्कृति और घर छीनने की साज़िश जारी है। कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए आदिवासियों का अस्तित्व कुचला जा रहा है।
1. अगर यह परियोजना विकास है, तो सबसे पहले उसी ज़मीन पर रहने वाले आदिवासियों को ही बेघर क्यों किया जा रहा है? विकास किसका? मुनाफ़े का या इंसानों का?
2. जब संविधान अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति को सर्वोच्च अधिकार देता है, तो आदिवासियों की स्पष्ट आपत्ति के बावजूद खनन कंपनियों को अनुमति किस अधिकार से दी जा रही है? लोकतंत्र कहाँ है?
3. जंगल, नदी, जलस्त्रोत और पर्यावरण नष्ट होने की कीमत पर 2.25 मिलियन टन कोयला निकाला जाएगा तो आने वाली पीढ़ियों की बर्बादी का बिल कौन भरेगा? सरकार, कंपनी या फिर वही आदिवासी जिनकी कोई गलती नहीं?
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@shivam_gandhi0 @SurgujaDist @krantiudaipur @SHasdeo @CGVOICE00777 @CG_wasi @TribalArmy @cgkhabar @cgboxnews नाम सहित बताओ कितनी एजेंसिया मॉनिटरिंग कर रही है #हसदेव में ?
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@TS_SinghDeo @SunnyGuptaINC #परसा कोयला खदान को वन स्वीकृति देते समय @INCChhattisgarh सरकार को पहाड़ी पर खतरा क्यों नहीं दिखा ? पेड़ कट रहा था तब क्यों सामने नहीं आए आप @TS_SinghDeo या आपके कार्यकर्ता वादा कर के गए थे पहली गोली मैं खाऊँगा
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आदिवासी समाज जिस जंगल - जमीन की कई पीढ़ियों से रक्षा करते आए हैं उसे अब इतनी आसानी से कैसे छोड़ देगा । संविधान कानून जरूर अनुसूचित क्षेत्रों के हितों में है लेकिन उसे लागू करने वाली सत्ता पूंजीपतियों की ग़ुलाम है । आज ये हालात छत्तीसगढ़ के सरगुजा में स्थित अमेरा कोयला खदान के विस्तार परियोजना के लिए जारी जमीन अधिग्रहण के कारण बने हैं जहाँ बिना ग्रामसभा सहमति के ही जमीन छीनी जा रही है। कोयला खदान एसईसीएल की है लेकिन इसका संचालन गुजरात की एक निजी कंपनी करती है।
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