Sameer Vikas Gaur(समीर विकास गौड़) 🇮🇳

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Sameer Vikas Gaur(समीर विकास गौड़) 🇮🇳

@SameerVGaur

गौड़ पुरोहित! Social Activist ! सेवा हि परमो धर्म: ! राष्ट्र मेरा सर्वस्व है। राष्ट्रहित सर्वोपरि है!🚩🚩🚩 Vocal for Local

India Katılım Şubat 2015
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Swami Avdheshanand
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The same Brahman, the Supreme Reality, pervades every particle of creation. The sky, earth, fire, water and air; the trees, plants, animals, birds and human beings all are diverse expressions of that one Divine Consciousness. With this vision, the highest purpose of life is to cultivate oneness, harmony and co-existence with the whole of creation, for we all belong to the same Supreme Source. This sacred understanding inspires us to treat nature and every living being around us with reverence, compassion and love, knowing that the same Divine dwells in all. #AvdheshanandG_Quotes #motivation
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Swami Avdheshanand
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सृष्टि के कण-कण में वही एक ब्रह्म, वही परम सत्ता व्यापक रूप से प्रतिष्ठित है। आकाश, धरा, अग्नि, जल और वायु - ये पंचमहाभूत हों, अथवा वृक्ष-वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी और मनुष्य - सभी उसी ब्रह्म की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इस दृष्टि से समस्त सृष्टि के साथ एकात्मता, सह-अस्तित्व और सौहार्द्र का भाव रखना ही जीवन का श्रेष्ठ ध्येय होना चाहिए, क्योंकि हम सब उसी एक परम चेतना के अंश हैं। यही भाव हमें प्रेरित करता है कि हम प्रकृति और अपने आसपास के प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान, करुणा और आत्मीयता से व्यवहार करें; क्योंकि सबमें वही परमात्मा विद्यमान है। #AvdheshanandG_Quotes #motivation
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Swami Avdheshanand
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दृश्यं ह्यदृष्टितां नीत्वा ब्रह्माकारेण चिन्तयेत्। विद्वान् नित्यसुखे तिष्ठेद् धिया चिद्रसपूर्णया।।१४२।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के साधना-पथ में यह श्लोक दृष्टि-परिवर्तन (Shift of Vision) की उस चरम प्रक्रिया का निर्देश करता है, जिसके द्वारा साधक दृश्य-जगत् के बन्धन से मुक्त होकर शुद्ध चैतन्य में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ भगवान् आदि शंकराचार्य न केवल जगत् के मिथ्यात्व का बोध कराते हैं, अपितु यह भी बताते हैं कि उस बोध को साधना में कैसे रूपान्तरित किया जाए। प्रथम पद “दृश्यं ह्यदृष्टितां नीत्वा” - इस साधना का मूल रहस्य है। ‘दृश्य’ अर्थात् जो कुछ इन्द्रियों द्वारा अनुभव किया जाता है - रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श; शरीर, मन, विचार, भाव ये सब ‘दृश्य’ हैं। सामान्यतः मनुष्य इन दृश्यों को सत्य मानकर उनसे आसक्त हो जाता है, और यही आसक्ति बन्धन का कारण बनती है। किन्तु यहाँ उपदेश है इन दृश्यों को ‘अदृष्टि’ में ले जाओ अर्थात् उनकी स्वतंत्र सत्ता का निषेध करो। यह ‘अदृष्टि’ कोई अज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञानजन्य निषेध है - जहाँ साधक यह समझता है कि दृश्य का कोई स्वातन्त्र्य अस्तित्व नहीं है; वह केवल चैतन्य में अधिष्ठित एक आभास मात्र है। यहाँ ‘अदृष्टितां नीत्वा’ का तात्पर्य है दृश्य को इस प्रकार देखना कि वह ‘दृश्य’ के रूप में सत्य प्रतीत न हो; उसकी ‘वस्तुत्व-बुद्धि’ का लोप हो जाए। जैसे स्वप्न के जागने पर स्वप्न-दृश्य अपनी वास्तविकता खो देता है, वैसे ही ज्ञान के उदय पर यह जगत् ‘मिथ्या’ के रूप में ज्ञात होता है - न पूर्णतः असत्, न पूर्णतः सत्, अपितु केवल आभास। द्वितीय पद “ब्रह्माकारेण चिन्तयेत्” - इस निषेध के पश्चात् साधना का सकारात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है। जब दृश्य का मिथ्यात्व बोध हो जाए, तब चित्त को ‘ब्रह्माकार’ में स्थित करो अर्थात् ब्रह्म के स्वरूप में ही चिन्तन करो। यह ‘ब्रह्माकार-वृत्ति’ वह मानसिक स्थिति है, जिसमें चित्त की समस्त वृत्तियाँ एक ही तत्त्व शुद्ध, अखण्ड, निराकार चैतन्य में लीन हो जाती हैं। यहाँ साधक निरन्तर यह अनुभव करता है - “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, “अहं ब्रह्मास्मि” मैं ही वह चैतन्य हूँ, जो सबका आधार है। तृतीय पद “विद्वान् नित्यसुखे तिष्ठेत्” - इस साधना की परिणति को दर्शाता है। जब चित्त पूर्णतः ब्रह्ममय हो जाता है, तब साधक ‘नित्यसुख’ अर्थात् उस आनन्द में स्थित हो जाता है, जो न इन्द्रियों पर आश्रित है, न परिस्थितियों पर, न किसी वस्तु की प्राप्ति या अप्राप्ति पर। यह आनन्द आत्मस्वरूप है - नित्य, अविकार, अखण्ड। यह सुख किसी अनुभव का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं अस्तित्व का स्वभाव है। अन्तिम पद “धिया चिद्रसपूर्णया” - इस स्थिति की आन्तरिक अवस्था को और स्पष्ट करता है। ‘धिया’ अर्थात् बुद्धि या चित्त; ‘चिद्रसपूर्णया’ जो चैतन्य-रस से परिपूर्ण हो गई है। जब साधक की बुद्धि पूर्णतः चैतन्यमय हो जाती है, तब उसमें कोई अन्य विषय, कोई अन्य वृत्ति शेष नहीं रहती। वह ‘चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्’ - इस अनुभूति में स्थिर हो जाता है। यहाँ अद्वैत वेदान्त का एक अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्त प्रकट होता है - निषेध और अधिष्ठान का समन्वय। पहले दृश्य का निषेध (नेति-नेति), फिर ब्रह्म का अधिष्ठान (सर्वं ब्रह्म) इन दोनों के द्वारा साधक उस स्थिति तक पहुँचता है, जहाँ न निषेध की आवश्यकता रहती है, न अधिष्ठान की केवल शुद्ध चैतन्य का अखण्ड अनुभव रह जाता है। व्यवहारिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को यह शिक्षा देता है कि जब वह जगत् को देखे, तो उसकी ‘सत्ता’ को न माने, बल्कि उसे चैतन्य का आभास समझे और साथ ही अपने चित्त को ब्रह्म में स्थिर रखे जहाँ कोई द्वैत नहीं, कोई भेद नहीं। अन्ततः इस साधना के परिपाक से साधक उस अवस्था में पहुँचता है, जहाँ वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मस्वरूप में स्थित रहता है। वहाँ न संसार का बन्धन है, न मोक्ष की आकांक्षा केवल स्वप्रकाश, अखण्ड आनन्द का अनुभव है। यही "अपरोक्षानुभूति" की परिपूर्णता है - जहाँ दृश्य का लोप होकर, ब्रह्म का ही अखण्ड प्रकाश शेष रह जाता है, और साधक उसी में, उसी के रूप में, सदा-सर्वदा स्थित रहता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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Narendra Modi
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Warm birthday wishes to BJP National President Shri Nitin Nabin Ji. A youthful and dynamic leader, he has devoted himself wholeheartedly to strengthening the organisation and empowering our Karyakartas. His innovative approach, energetic leadership and deep understanding of both organisational work and administration have earned him immense respect all across. His work reflects an unwavering commitment to the ideals of service and nation-building. Praying for his long and healthy life in continued service of the nation. @NitinNabin
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Swami Avdheshanand
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क्षमा परमात्मा का दिव्य गुण है। अतः जीवन में दयालु, सहृदय और उदार बनें; दूसरों की भूलों को बार-बार स्मरण करने के स्थान पर उन्हें क्षमा करने का अभ्यास करें। जो कुछ प्रभु ने हमें दिया है, उसका आदर करें, उसका सदुपयोग करें और प्रत्येक क्षण उनके अनन्त आशीर्वादों के प्रति कृतज्ञ बने रहें। #AvdheshanandG_Quotes #motivation
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Swami Avdheshanand
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आदर्श्यं भावरूपं च सर्वमेतच्चिदात्मकम्। सावधानतया नित्यं स्वात्मनं भावयेद्बुधः।।१४१।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के परम रहस्य का अत्यन्त सूक्ष्म एवं सर्वग्राही निरूपण इस श्लोक में किया गया है। यहाँ भगवद्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य साधक को यह बोध कराते हैं कि जो कुछ दृश्य (आदर्श्य) है और जो अदृश्य, भावात्मक या विचाररूप (भावरूप) है - वह सम्पूर्ण जगत् वस्तुतः चैतन्यस्वरूप ही है। इस सत्य का निरन्तर, सजग एवं सावधान भाव से चिन्तन करना ही ज्ञानी पुरुष का नित्य कर्तव्य है। प्रथम पद “आदर्श्यं भावरूपं च” द्वारा समस्त अनुभूत जगत् को दो वर्गों में विभाजित किया गया है - (१) आदर्श्य - जो इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष देखा या अनुभव किया जाता है; जैसे - स्थूल जगत्, शरीर, प्रकृति आदि; (२) भावरूप - जो सूक्ष्म है, जैसे विचार, भावनाएँ, संकल्प-विकल्प, स्मृतियाँ, कल्पनाएँ आदि। इस प्रकार स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर जो कुछ भी अनुभव के क्षेत्र में आता है, वह इस शिक्षण का विषय है। द्वितीय पद “सर्वमेतच्चिदात्मकम्” इस सम्पूर्ण विविधता के अन्तर्निहित एकत्व को उद्घाटित करता है। यहाँ यह प्रतिपादित किया गया है कि दृश्य और अदृश्य दोनों का वास्तविक स्वरूप चैतन्य ही है। जैसे स्वप्न में देखे गए समस्त दृश्य, पात्र और घटनाएँ स्वप्नद्रष्टा के मन से ही उत्पन्न और उसी में स्थित होते हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण जाग्रत् जगत् भी उस एक अद्वितीय चैतन्य से ही प्रकाशित और अधिष्ठित है।यह चैतन्य न केवल साक्षी है, अपितु वही सबका आधार, अस्तित्व और प्रकाशक भी है - “येन सर्वमिदं प्रकाशते”। किन्तु इस सत्य का बौद्धिक ज्ञान मात्र पर्याप्त नहीं है। श्लोक का तृतीय भाग “सावधानतया नित्यं” यह इंगित करता है कि इस तत्त्वबोध को साधक को अत्यन्त सजगता, सावधानी और निरन्तरता के साथ अपने जीवन में धारण करना चाहिए। ”सावधानता’ यहाँ केवल बाह्य सतर्कता नहीं, बल्कि आन्तरिक जागरूकता (Awareness) का बोध कराती है - जहाँ साधक प्रत्येक क्षण अपने अनुभवों को इस दृष्टि से देखता है कि उनका आधार केवल चैतन्य है, न कि कोई स्वतंत्र सत्ता। अन्तिम पद “स्वात्मनं भावयेद्बुधः” इस साधना की परिपूर्णता को प्रकट करता है। ‘बुधः’ अर्थात् विवेकी, ज्ञानी साधक अपने स्वात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करता है। यह ‘भावना’ कोई कल्पना नहीं, बल्कि स्वरूप में प्रतिष्ठा है। साधक बार-बार यह अनुभव करता है - “मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, न विचार हूँ; मैं तो वह शुद्ध, अखण्ड, साक्षी चैतन्य हूँ, जो इन सबका आधार है।” यहाँ अद्वैत वेदान्त का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त प्रकट होता है अध्यारोप-अपवाद। प्रारम्भ में जगत् को सत्य मानकर उसके आधार का अन्वेषण किया जाता है (अध्यारोप), और अंततः यह समझा जाता है कि जगत् का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह केवल चैतन्य का आभास है (अपवाद)। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने पर केवल आत्मस्वरूप का अखण्ड प्रकाश ही शेष रहता है। इस श्लोक में निदिध्यासन की पराकाष्ठा का निर्देश है - जहाँ साधक निरन्तर, अखण्ड भाव से अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है। यह स्थिति ‘स्मृति’ या ‘चिन्तन’ से आगे बढ़कर ‘स्वाभाविकता’ में परिवर्तित हो जाती है - जहाँ चैतन्य का अनुभव कोई प्रयास नहीं, बल्कि स्वभाव बन जाता है। अन्ततः, यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि सम्पूर्ण जगत् - चाहे वह दृश्य हो या अदृश्य केवल चैतन्य का ही विस्तार है। इस सत्य का निरन्तर, सजग और एकनिष्ठ चिन्तन ही साधक को उस परम अवस्था में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ वह स्वयं को समस्त भेदों से परे, शुद्ध, नित्य, अद्वैत आत्मस्वरूप के रूप में अनुभव करता है। यही "अपरोक्षानुभूति" की परिपूर्णता है कि जहाँ जानने वाला, जाने जाने वाला और जानने की प्रक्रिया तीनों का विलय होकर केवल एकमेव, स्वप्रकाश चैतन्य ही शेष रह जाता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
कार्ये हि कारणं पश्येत् पश्चाचार्यं विसर्जयेत्। कारणत्वं स्वतो नश्येदवशिष्टं भवेनमुनिः।।१३९।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के सूक्ष्मतम तत्त्व का निरूपण करते हुए यह श्लोक साधक को अनुभूति की उस चरम अवस्था की ओर इंगित करता है, जहाँ समस्त द्वैत-प्रपञ्च का लय होकर केवल ब्रह्मस्वरूप का अवशेष रह जाता है। प्रारम्भ में साधक को उपदेश दिया जाता है कि वह कार्य में कारण का दर्शन करे अर्थात् इस समस्त दृश्य जगत् (कार्य) में उसके कारणरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करे। जैसे मृत्तिका से बने घट में मृत्तिका का ही सत्यत्व है, वैसे ही इस नाम-रूपात्मक विश्व में ब्रह्म ही एकमात्र सत्य तत्त्व है यह दृढ़ बोध साधना का प्रथम चरण है। किन्तु आदि शंकराचार्य की अद्वैत-दृष्टि केवल यहाँ तक सीमित नहीं रहती। वे आगे कहते हैं - “पश्चात् कारणं विसर्जयेत्” अर्थात् जब कार्य में कारण का अभेदबोध सुदृढ़ हो जाए, तब उस कारण-कार्य की संज्ञा का भी परित्याग कर देना चाहिए। यह अत्यन्त गूढ़ संकेत है। यहाँ ‘कारण’ भी एक उपाधि है, एक कल्पना है, जो केवल ‘कार्य’ के सापेक्ष ही अर्थवान् है। जब कार्य (जगत्) का मिथ्यात्व बोध हो जाता है, तब कारण (ब्रह्म) का ‘कारणत्व’ भी स्वतः निरस्त हो जाता है। इस प्रकार, कारणत्वं स्वतो नश्येत् ब्रह्म का कारणत्व भी अपने आप लुप्त हो जाता है, क्योंकि अब उसके लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता, जिससे उसका कारणत्व सिद्ध हो। यह अवस्था ‘अवशिष्टं भवेत् मुनिः’ - जिसमें केवल शुद्ध, निरुपाधिक, अद्वय ब्रह्मस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है वही मुनि की परम स्थिति है। यहाँ अद्वैत वेदान्त का चरम सत्य उद्घाटित होता है कि ब्रह्म न तो वास्तव में कारण है, न कार्य; वह केवल स्वप्रकाश, स्वयंसिद्ध, निर्विशेष चैतन्य है। कारण-कार्य का सम्पूर्ण व्यापार केवल अविद्या के स्तर पर है। ज्ञान के उदय से यह समस्त कल्पना विलीन हो जाती है, और जो शेष रहता है, वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म ही है। अतः इस श्लोक का मर्म यह है कि साधना की क्रमबद्ध यात्रा में पहले जगत् में ब्रह्म का दर्शन करो, और अंततः ब्रह्म को भी सभी सम्बन्धों, उपाधियों एवं कल्पनाओं से परे, अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित करो। यही अपरोक्षानुभूति की परम सिद्धि है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का भेद लुप्त होकर केवल एकमेव अद्वितीय ब्रह्म का अनुभव शेष रह जाता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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In this transient world, everything is naturally subject to change objects, events, situations, and even the nature, qualities and tendencies of people. Therefore, in adverse circumstances, remain calm, composed, and inwardly steady; for the one who accepts change with wisdom attains true peace, balance, and strength in life. #AvdheshanandG_Quotes #motivation
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Swami Avdheshanand
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कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत्। अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्ये नित्यं प्रपश्यति।।१३८।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैतवेदान्त में सत्य-असत्य के विवेक हेतु अन्वय-व्यतिरेक की पद्धति अत्यन्त प्रामाणिक और सूक्ष्म साधन मानी गई है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य इसी तत्त्वज्ञान की विधि को स्पष्ट करते हुए साधक को यह उपदेश देते हैं कि वह कारण अर्थात् ब्रह्म का बोध पहले व्यतिरेक से करे और तत्पश्चात् अन्वय से उसे सर्वत्र अनुभूत करे। “कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत्” - यहाँ ‘पुमान्’ अर्थात् साधक, प्रारम्भ में व्यतिरेक-विचार द्वारा कारण का अवलोकन करे। व्यतिरेक का अर्थ है - जो जहाँ नहीं है, वहाँ भी जो सत्ता बनी रहती है, वही सत्य है। साधक को यह देखना चाहिए कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि ये सब परिवर्तनशील हैं; जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति - तीनों अवस्थाओं में इनका आविर्भाव और तिरोभाव होता रहता है। किन्तु एक साक्षी-चैतन्य ऐसा है, जो इन सबके अभाव में भी बना रहता है। जब शरीर नहीं है (स्वप्न में), जब मन भी लीन है (सुषुप्ति में), तब भी जो ‘मैं हूँ’ का सूक्ष्म बोध शेष रहता है, वही आत्मा, वही ब्रह्म है। इस प्रकार, जो सभी उपाधियों के अभाव में भी अवशिष्ट रहता है, वही कारणतत्त्व है; नित्य, अविनाशी और स्वतःसिद्ध। इसके पश्चात् “अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्ये नित्यं प्रपश्यति” - साधक को अन्वय-विचार के द्वारा उसी कारण को कार्य में सर्वत्र देखना चाहिए। अन्वय का अर्थ है - जहाँ-जहाँ कार्य है, वहाँ-वहाँ कारण का अनिवार्यतः होना। जैसे घट में मृत्तिका है, आभूषण में स्वर्ण है, तरंग में जल है उसी प्रकार समस्त जगत् में ब्रह्म ही अन्तःस्थित है। जो भी दृश्य है, जो भी अनुभवगम्य है, वह सब उसी चैतन्य की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं, अपितु उसी का नाम-रूपात्मक विस्तार है। इस प्रकार व्यतिरेक और अन्वय दोनों दृष्टियों का समन्वय साधक को अद्वैत के परम सत्य तक पहुँचाता है। व्यतिरेक से वह जानता है कि ब्रह्म उपाधियों से परे, निरपेक्ष और स्वतन्त्र है; और अन्वय से वह देखता है कि वही ब्रह्म समस्त नाम-रूप में व्याप्त है। एक ओर ‘नेति-नेति’ द्वारा वह सबको नकारता है, दूसरी ओर ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के द्वारा सबमें उसी का दर्शन करता है। भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी की यह शिक्षण-पद्धति अत्यन्त वैज्ञानिक और अनुभवपरक है। यह केवल तर्क नहीं, अपितु साधक के प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग है। जब साधक इन दोनों प्रकार के विचारों में निपुण हो जाता है, तब उसके लिए जगत् में ब्रह्म का दर्शन सहज हो जाता है; न केवल समाधि में, अपितु जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण में। अन्ततः यह बोध दृढ़ हो जाता है कि जो कारण है, वही कार्य के रूप में प्रतीत हो रहा है; और जो कार्य है, वह कारण से भिन्न कुछ भी नहीं। भेद केवल नाम-रूप का है, तत्त्वतः सब एक ही है। अतः निष्कर्षतः व्यतिरेक से ब्रह्म की निर्लेपता का बोध होता है, और अन्वय से उसकी सर्वव्यापकता का अनुभव। इन दोनों के समन्वय से साधक अद्वैत सत्य में स्थित होकर जान लेता है कि वही एक ब्रह्म सर्वत्र, सर्वदा, सर्वरूपेण प्रकाशित है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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अनेनैव प्रकारेण वृत्तिर्ब्रह्मात्मिका भवेत्। उदेति शुद्धचित्तानां वृत्तिज्ञानं ततः परम् ।।१३७।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैतवेदान्त में आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया का सूक्ष्मतम रहस्य वृत्ति-ज्ञान में निहित है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि यथोक्त विवेक कार्य-कारण-निरसन, नाम-रूप-भेद की निवृत्ति तथा ब्रह्मैकत्व की दृढ़ भावना के द्वारा अन्तःकरण की वृत्ति स्वयं ब्रह्माकार हो जाती है, और तत्पश्चात् शुद्ध चित्त में परमज्ञान का उदय होता है। “अनेनैव प्रकारेण” अर्थात् पूर्वोक्त विवेक-प्रक्रिया के द्वारा, जिसमें साधक बार-बार यह विचार करता है कि यह समस्त जगत् केवल नाम-रूपात्मक आभास है और तत्त्वतः ब्रह्म ही है। यह निरन्तर मनन और निदिध्यासन अन्तःकरण को विषयवृत्तियों से निवृत्त कर ब्रह्मैक्य-वृत्ति में प्रतिष्ठित करता है। “वृत्तिर्ब्रह्मात्मिका भवेत्” - यहाँ ‘वृत्ति’ से अभिप्राय अन्तःकरण की ज्ञानात्मक प्रवृत्ति से है। जब मन बाह्य विषयों से हटकर आत्मतत्त्व में अवस्थित होता है, तब उसकी वृत्ति ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के अखण्ड बोध में परिणत होती है। यह ब्रह्माकार-वृत्ति है; न कोई कल्पना, न कोई विकल्प, अपितु शुद्ध चैतन्य में लीन एकरूपता की अनुभूति। जैसे स्वर्ण को पहचान लेने पर आभूषणों का भेद लुप्त हो जाता है, वैसे ही इस वृत्ति के उदय से समस्त भेद-बुद्धि का क्षय हो जाता है। भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी की दृष्टि में यह ब्रह्माकार-वृत्ति ही अविद्यानिवृत्त्युपाय है। यद्यपि ब्रह्म स्वयं नित्य, स्वप्रकाश और साक्षिरूप है, तथापि अविद्या के आवरण को हटाने के लिए अन्तःकरण में इस विशेष वृत्ति का उदय आवश्यक प्रतीत होता है। यह वृत्ति दीपक के समान है जो स्वयं प्रकाशमान होकर अज्ञान-अन्धकार को दूर कर देती है, और अन्ततः स्वयं भी लीन हो जाती है। “उदेति शुद्धचित्तानां” - यह ज्ञान केवल उन्हीं साधकों में प्रकट होता है, जिनका चित्त शुद्ध, निर्मल और एकाग्र हो चुका है। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान इन साधनचतुष्टय से युक्त चित्त ही इस ज्ञान का पात्र बनता है। अशुद्ध, विक्षिप्त या विषयासक्त मन में यह ब्रह्माकार-वृत्ति स्थिर नहीं हो सकती। “वृत्तिज्ञानं ततः परम्” - इस ब्रह्मात्मक वृत्ति के उदय से जो ज्ञान प्रकट होता है, वह सामान्य बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अपरोक्ष आत्मानुभूति है। यह ज्ञान प्रत्यक्ष के समान साक्षात् है- जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का त्रिपुट भेद लीन हो जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ साधक जानता नहीं, अपितु स्वयं ज्ञानस्वरूप हो जाता है। यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु है; यह वृत्तिज्ञान अन्ततः स्वयं का भी अतिक्रमण करता है। जैसे काँटे से काँटा निकालकर दोनों त्याग दिए जाते हैं, वैसे ही ब्रह्माकार-वृत्ति अविद्या को नष्ट कर स्वयं भी लीन हो जाती है, और केवल शुद्ध, निर्विकल्प, अखण्ड चैतन्य शेष रहता है। उपनिषद् इसी सत्य को उद्घोषित करती है - “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। यह ‘होना’ कोई परिवर्तन नहीं, अपितु अपने नित्य स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा है। अतः इस श्लोक का सार यह है कि निरन्तर विवेक और निदिध्यासन से अन्तःकरण ब्रह्माकार हो जाता है; उस शुद्ध चित्त में जो ज्ञान उदित होता है, वही परम आत्मसाक्षात्कार है। वहाँ न साधक रहता है, न साधन केवल अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप का अखण्ड प्रकाश ही शेष रहता है। यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है; वृत्ति से परे, ज्ञान से परे, केवल स्वप्रकाश, शुद्ध, नित्य ब्रह्म ही आत्मरूप से अनुभूत होता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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अथ शुद्धं भवेद् वस्तु यद् वै वाचामगोचरम्। द्रष्टव्यं मृद्घटादृष्टान्तेन पुनः पुनः आरभ्यते ।।१३६।। ("अपरोक्षानुभूति) अद्वैतवेदान्त का परम प्रयोजन उस शुद्ध वस्तु परम ब्रह्म का प्रतिपादन है, जो इन्द्रियों और वाणी के समस्त व्यापार से परे, अनिर्वचनीय, अवाङ्मनसगोचर और स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह उद्घाटित करते हैं कि वह शुद्ध तत्त्व वाणी की पहुँच से परे होते हुए भी, उपदेश-परम्परा में दृष्टान्तों के माध्यम से बारम्बार निरूपित किया जाता है, जिससे साधक की बुद्धि उस अप्रमेय सत्य की ओर प्रवृत्त हो सके। “अथ शुद्धं भवेद् वस्तु” - यहाँ ‘शुद्ध वस्तु’ से अभिप्राय उस ब्रह्म से है, जो नित्य, निर्विकार, निरुपाधिक, अखण्ड और सर्वथा स्वतन्त्र है। वह न स्थूल है, न सूक्ष्म; न कर्ता, न भोक्ता; न कारण, न कार्य अपितु केवल साक्षीस्वरूप, शुद्ध चैतन्य है। वही तत्त्व सभी उपाधियों के अतिक्रमण के पश्चात् आत्मरूप से प्रकाशित होता है। “यद् वै वाचामगोचरम्” - वह ब्रह्म वाणी का विषय नहीं है। शब्द-वृत्ति जहाँ तक जाती है, वहाँ तक केवल नाम-रूप का क्षेत्र है। शब्द सीमित हैं, और ब्रह्म असीम है; शब्द द्वैत का आश्रय लेते हैं, और ब्रह्म अद्वैत है। अतः ब्रह्म का प्रत्यक्ष निरूपण शब्दों से सम्भव नहीं। उपनिषद् भी कहती है - “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहाँ से वाणी और मन लौट आते हैं, उस ब्रह्म को वे प्राप्त नहीं कर सकते। किन्तु, यह भी सत्य है कि शब्द ही साधन हैं श्रुति के माध्यम से ही ज्ञान का उदय होता है। अतः आचार्य कहते हैं - “द्रष्टव्यं मृद्घटादृष्टान्तेन पुनः पुनः” उस शुद्ध ब्रह्मतत्त्व का बोध कराने के लिए बार-बार मृद्घट (मिट्टी-घट) आदि दृष्टान्तों का आश्रय लिया जाता है। यह शिक्षण-विधि अत्यन्त गूढ़ है। जब साधक को सीधे ब्रह्म की ओर इंगित करना कठिन होता है, तब उसे परिचित उदाहरणों के माध्यम से उस सत्य की झलक दी जाती है। मृद्घट दृष्टान्त में यह प्रतिपादित होता है कि घट नाम-रूप है, और मृत्तिका ही उसका तत्त्व है। घट का नाश हो जाए, तो भी मृत्तिका का नाश नहीं होता। इसी प्रकार जगत् नाम-रूपात्मक है, और ब्रह्म ही उसका तत्त्व है। जगत् के परिवर्तन, उत्पत्ति और विनाश से ब्रह्म अप्रभावित रहता है। इसी प्रकार स्वर्ण-आभूषण, जल-तरंग, लोह-उपकरण आदि अनेक दृष्टान्तों के द्वारा यह समझाया जाता है कि कार्य की सत्ता कारण से पृथक् नहीं है, और कारण का स्वरूप कार्य से कभी विकृत नहीं होता। भगवद्पादाचार्य आदि शङ्कराचार्य की शिक्षण-पद्धति में यह पुनरावृत्ति अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि अविद्या की दृढ़ता को केवल एक बार के उपदेश से भंग नहीं किया जा सकता। मन बार-बार नाम-रूप में ही सत्यत्व का अनुभव करता है; अतः उसे बार-बार यह स्मरण कराना पड़ता है कि जो दृश्य है, वह केवल उपाधि है; तत्त्वतः सब ब्रह्म ही है। इस प्रकार दृष्टान्तों का प्रयोजन ब्रह्म को निर्देशित करना है, न कि परिभाषित करना। वे संकेत हैं, न कि अन्तिम सत्य। जब साधक की बुद्धि परिपक्व होती है, तब वह इन दृष्टान्तों का भी अतिक्रमण कर स्वानुभव में स्थित होता है, जहाँ न शब्द हैं, न विचार केवल शुद्ध, अद्वैत चैतन्य का अविभाज्य प्रकाश है। अतः इस श्लोक का गूढ़ निष्कर्ष यह है कि ब्रह्म वाणी और मन से परे होते हुए भी, उपदेश-परम्परा में दृष्टान्तों द्वारा ही ज्ञेय बनता है। बार-बार के विवेक, मनन और निदिध्यासन से साधक उस शुद्ध वस्तु में स्थित होता है, जो स्वयं उसका ही स्वरूप है। यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है; वाणी जहाँ मौन हो जाती है, वहीं ब्रह्म का अनुभव प्रारम्भ होता है; और जहाँ अनुभव पूर्ण होता है, वहाँ केवल शुद्ध, अखण्ड, अद्वितीय चैतन्य ही शेष रहता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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कार्ये कारणताता कारणे न हि कार्यता। कारणत्वं स्वतो गच्छेत् कार्यभावे विचारतः।।१३५।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैतवेदान्त के सूक्ष्मतम तत्त्वों में कार्य-कारण-सम्बन्ध का विवेचन अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही विवेक जीव को नाम-रूपात्मक जगत् की आभासिक सत्ता से परमार्थतत्त्व ब्रह्म की ओर उन्मुख करता है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि कारण और कार्य का सम्बन्ध वस्तुतः नित्य, स्वतन्त्र और परमार्थतः सत्य नहीं, अपितु केवल अविद्योपाधि से उपपन्न एक व्यवहारिक कल्पना मात्र है। “कार्ये कारणताता” अर्थात् कार्य में ही कारणता का अध्यास होता है। जब हम किसी वस्तु जैसे घट को देखते हैं, तब उसके भीतर कारण - मृत्तिका का बोध करते हैं। यहाँ कारणता घट में आरोपित होती है, न कि कारण में कार्य का कोई वास्तविक प्रवेश होता है। “कारणे न हि कार्यता” कारण में कार्य की सत्ता नहीं होती; मृत्तिका स्वयं घटरूप नहीं हो जाती, अपितु घट केवल नाम-रूपात्मक उपाधि है, जो मृत्तिका पर आरोपित है। आदि शङ्कराचार्य की अद्वैतदृष्टि में यह प्रतिपादन अत्यन्त सूक्ष्म है; कारण कार्य से अभिन्न होते हुए भी कार्य की सत्ता से रहित है, और कार्य कारण से पृथक् प्रतीत होते हुए भी तत्त्वतः कारण के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह अध्यारोप-अपवाद की पद्धति का अनुपम उदाहरण है, जहाँ पहले कार्य-कारण का स्वीकार कर शिष्य की बुद्धि को स्थिर किया जाता है, और तत्पश्चात् विचार द्वारा उस सम्बन्ध का अपवाद कर दिया जाता है। “कारणत्वं स्वतो गच्छेत् कार्यभावे विचारतः” - जब सूक्ष्म विवेक द्वारा कार्य की स्वतंत्र सत्ता का अभाव ज्ञात होता है, तब कारण का ‘कारणत्व’ भी स्वतः ही लय को प्राप्त हो जाता है। कारण केवल कार्य की अपेक्षा से कारण है; यदि कार्य ही मिथ्या सिद्ध हो गया, तो कारण का कारणत्व भी निरर्थक हो जाता है। इस प्रकार कारण भी अपने कारणत्व-धर्म से रहित होकर शुद्ध ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ अद्वैत का परम रहस्य उद्घाटित होता है न कार्यं न कारणं, केवलं ब्रह्मैव सत्यं। कार्य-कारण-प्रपञ्च केवल अविद्याजन्य दृष्टि में है; ज्ञानोदय होने पर यह सम्पूर्ण द्वैत-व्यवहार लीन हो जाता है, जैसे जागरण में स्वप्न का सम्पूर्ण व्यापार विलीन हो जाता है। उपनिषदों का यही प्रतिपाद्य है - “सदेव सोम्य इदं अग्र आसीत्” (छान्दोग्योपनिषद्) यह सम्पूर्ण जगत् प्रारम्भ में केवल सत् (ब्रह्म) ही था। अतः जो कुछ कार्यरूप में दृश्य है, वह केवल नाम-रूप का विस्तार है; तत्त्वतः वह कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कार्य-कारण का यह समस्त सम्बन्ध केवल अविद्योपाधि-कल्पित है। जब विवेक से कार्य का अभाव ज्ञात होता है, तब कारण का कारणत्व भी निवृत्त हो जाता है, और शुद्ध, निर्विशेष, अद्वितीय ब्रह्म ही शेष रहता है; जो न कर्ता है, न कारण, न कार्य अपितु केवल साक्षीस्वरूप, निरुपाधिक, नित्य चैतन्य है। यही अद्वैत वेदान्त का परम निर्णय है - “ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।” #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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निमेषार्द्धं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्ममयीं विना। यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः सनकाद्याः शुकादयः।।१३४।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में ब्रह्मनिष्ठा की चरम अवस्था का दिव्य चित्र प्रस्तुत करते हैं। यहाँ वे उन सिद्ध महापुरुषों की स्थिति का वर्णन करते हैं, जिनके लिए ब्रह्म-वृत्ति कोई साधन मात्र नहीं रह जाती, अपितु उनका स्वाभाविक, अखण्ड और नित्य अनुभव बन जाती है। “निमेषार्द्धं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्ममयीं विना” अर्थात् वे महात्मा एक निमेष के आधे क्षण के लिए भी ब्रह्ममयी वृत्ति से रहित नहीं होते। यह कथन साधना की पराकाष्ठा का संकेत है। यहाँ ब्रह्म-वृत्ति क्षणिक चिन्तन या अभ्यासजन्य स्थिति नहीं, बल्कि अखण्ड आत्मनिष्ठा का रूप ले चुकी है। जैसे दीपक का प्रकाश स्वाभाविक रूप से प्रकाशित रहता है, वैसे ही इन महापुरुषों की चेतना निरन्तर ब्रह्मस्वरूप में ही स्थित रहती है। यह स्थिति निदिध्यासन के परिपाक का फल है, जहाँ “अहं ब्रह्मास्मि” का बोध इतना दृढ़ हो जाता है कि अन्य कोई वृत्ति उसके स्थान पर उदित नहीं हो पाती। यहाँ मन का स्वरूप ही रूपान्तरित हो जाता है - वह अब विषयों की ओर प्रवृत्त होने वाला चञ्चल उपकरण नहीं, बल्कि ब्रह्मस्वरूप का ही प्रतिबिम्ब बन जाता है। यह वही अवस्था है, जिसे अद्वैत में अखण्डाकार-वृत्ति की पूर्णता कहा जाता है। “यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः” - भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस स्थिति की तुलना ब्रह्मा आदि देवताओं से करते हैं, जो सृष्टि के उच्चतम स्तर पर स्थित होकर भी ब्रह्मतत्त्व में ही प्रतिष्ठित हैं। यहाँ यह संकेत है कि ब्रह्मनिष्ठा केवल मानव साधकों तक सीमित नहीं, बल्कि दिव्य चेतना के उच्चतम स्तरों तक व्याप्त है। “सनकाद्याः शुकादयः” - विशेषतः सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार- ये सनकादि ऋषि और श्रीशुकदेव जैसे महात्मा इस ब्रह्मनिष्ठा के मूर्त उदाहरण हैं। ये वे महापुरुष हैं, जिन्होंने बाल्यावस्था से ही संसार-वासनाओं का परित्याग कर, निरन्तर आत्मस्वरूप में स्थित होकर जीवन व्यतीत किया। उनके लिए ब्रह्म-वृत्ति कोई अभ्यास नहीं, बल्कि सहज अवस्था थी। दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक जीवन्मुक्ति की परिपूर्ण अवस्था का निरूपण करता है। यहाँ साधक और साध्य का भेद लुप्त हो जाता है; ब्रह्म-वृत्ति और ब्रह्मस्वरूप में कोई भिन्नता नहीं रहती। यह वही स्थिति है, जहाँ वृत्ति भी अन्ततः लीन होकर केवल स्वरूपावस्थान रह जाती है। उपनिषद् भी इसी अवस्था का वर्णन करती हैं- “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। अतः उसकी चेतना में कोई अन्तराल नहीं, कोई विच्छेद नहीं; वह निरन्तर उसी सत्य में स्थित रहता है। इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि साधना का लक्ष्य केवल क्षणिक समाधि या अनुभव नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी ब्रह्मनिष्ठा है, जहाँ साधक का सम्पूर्ण जीवन उसी सत्य में प्रतिष्ठित हो जाए। जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तब साधक का प्रत्येक क्षण, प्रत्येक श्वास, प्रत्येक अनुभव सब ब्रह्मस्वरूप की ही अभिव्यक्ति बन जाते हैं। अतः भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को यह प्रेरणा देते हैं कि वह ब्रह्म-वृत्ति का इतना गहन अभ्यास करे कि वह क्षणिक प्रयास से उठकर, सहज और अखण्ड स्थिति बन जाए। यही अद्वैत वेदान्त की चरम साधना है- जहाँ ब्रह्म केवल जाना नहीं जाता, बल्कि निरन्तर जिया जाता है। निष्कर्षतः जो महापुरुष एक क्षण के लिए भी ब्रह्म-वृत्ति से विचलित नहीं होते, वही वास्तविक सिद्ध, मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ हैं। उनका जीवन ही वेदान्त का सजीव प्रमाण है - अखण्ड, अनवरत और दिव्य ब्रह्मानुभूति का। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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कुशला ब्रह्मनामकरणे वृत्तिहीनाः। तेऽप्यज्ञानितमा नूनं पुनरायान्ति यान्ति च ।।१३३।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के प्रखर भाष्यकार भगवत्पाद भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु गम्भीर भ्रान्ति का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे उन लोगों की ओर संकेत करते हैं, जो ब्रह्मतत्त्व के विषय में वाचाल, तर्ककुशल और नाम-रूप के स्तर पर प्रवीण तो होते हैं, किन्तु जिनमें ब्रह्म-वृत्ति का वास्तविक उदय नहीं हुआ है। इस प्रकार वे ज्ञान और ज्ञानाभास के मध्य के भेद को अत्यन्त स्पष्ट कर देते हैं। “कुशला ब्रह्मनामकरणे” अर्थात् जो लोग ब्रह्म के नामों, परिभाषाओं, तत्त्वचर्चाओं और शास्त्रीय पदावली में अत्यन्त दक्ष हैं। वे वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों का सुन्दर निरूपण कर सकते हैं, भाषण दे सकते हैं, शास्त्रों का उद्धरण कर सकते हैं; किन्तु यह कुशलता केवल वाणी और बुद्धि तक सीमित है। यह शब्दज्ञान है, न कि स्वानुभव। “वृत्तिहीनाः” ऐसे साधक ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं। अर्थात् उनके अन्तःकरण में वह अखण्डाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है, जो “अहं ब्रह्मास्मि” इस सत्य को जीवित अनुभव के रूप में प्रकट करती है। उन्होंने ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर पर ग्रहण किया है, उसे आत्मनिष्ठ अनुभूति में रूपान्तरित नहीं किया। इसीलिए उनका ज्ञान परिवर्तनकारी नहीं बन पाता; वह उनके जीवन, व्यवहार और अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करता। दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति श्रवण और मनन के स्तर पर ही रुक जाने का द्योतक है। जब तक निदिध्यासन द्वारा उस ज्ञान को अन्तःकरण में दृढ़ नहीं किया जाता, तब तक वह अविद्या-नाशक नहीं बनता। जैसे केवल औषधि का नाम जान लेने से रोग दूर नहीं होता, वैसे ही केवल ब्रह्म का नाम और स्वरूप जान लेने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। “तेऽपि अज्ञानितमाः नूनम्” - भगवद्पादाचार्य यहाँ अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से विद्वान् प्रतीत होते हैं, वस्तुतः अज्ञानियों में भी अत्यन्त अज्ञानी हैं। यह कथन कठोर प्रतीत हो सकता है, किन्तु इसका उद्देश्य साधक को जागरूक करना है; क्योंकि यहाँ अज्ञान केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप के प्रति अपरिचय है। “पुनरायान्ति यान्ति च” अर्थात् ऐसे साधक पुनः-पुनः जन्म-मरण के चक्र में आते-जाते रहते हैं। कारण यह है कि उनके भीतर देहाभिमान, कर्तृत्व-भोक्तृत्व और वासनाएँ अभी भी विद्यमान हैं। जब तक ये संस्कार नष्ट नहीं होते, तब तक संसरचक्र से मुक्ति सम्भव नहीं है। शास्त्रज्ञान, यदि वह अनुभूति में परिणत न हो, तो इस बन्धन को नहीं काट सकता। उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है। वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से अपनाता है। अतः केवल वाणी की कुशलता या तर्क की तीक्ष्णता आत्मज्ञान का प्रमाण नहीं है। इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि अद्वैत वेदान्त केवल बौद्धिक दर्शन नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अनुभूति है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति का उदय होकर वह साधक के अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह वृत्ति उदित होकर स्थिर हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। अतः भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को सावधान करते हैं कि वह केवल शब्दों में न उलझे, केवल तर्क और चर्चा में संतुष्ट न हो, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारे- उसे जीए, उसे अनुभव करे, और उसी में स्थित हो जाए। यही वेदान्त का वास्तविक उद्देश्य है। निष्कर्षतः, जो केवल ब्रह्म के नामों और तत्त्वों का उच्चारण करते हैं, किन्तु ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं, वे अभी भी अज्ञान के अधीन हैं और संसार-चक्र में बँधे रहते हैं। केवल वही साधक मुक्त होता है, जो ज्ञान को अनुभव में रूपान्तरित कर, ब्रह्मस्वरूप में अचल स्थित हो जाता है। यही इस श्लोक का सार और अद्वैत वेदान्त का परम उपदेश है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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-- "स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक की प्रथम वर्षगाँठ" -- हरिद्वार के पुण्यभूमि कनखल स्थित श्री हरिहर आश्रम में मानव सेवा, करुणा, लोकमंगल एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को समर्पित एक और प्रेरणादायी अध्याय पूर्ण हुआ है। श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा की परम पावन आचार्यपीठ (गुरुगद्दी) में विराजमान श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के दिव्य संकल्प, करुणामय दृष्टि एवं प्रेरणास्पद मार्गदर्शन में “ऐंसीएन्ट हेरिटेज फाउंडेशन” के अंतर्गत संचालित “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” ने मानवता की निस्वार्थ सेवा का अपना प्रथम गौरवपूर्ण वर्ष पूर्ण कर लिया है। यह केवल एक चिकित्सालय की वर्षगाँठ नहीं, अपितु सेवा,संवेदना, समर्पण और आध्यात्मिक करुणा के उस दिव्य आदर्श का उत्सव है, जिसमें सनातन संस्कृति का शाश्वत वाक्य; “नर सेवा ही नारायण सेवा” प्रत्यक्ष रूप से साकार होता दिखाई देता है। भारतीय सन्त परम्परा सदैव से केवल आत्मोद्धार तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के दुःखी, पीड़ित, असहाय और रोगग्रस्त जनों की सेवा को भी ईश्वराराधना का ही स्वरूप मानती आई है। “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” इसी दिव्य दृष्टि का जीवन्त एवं प्रेरणादायी प्रतिरूप बनकर उभरा है। “पूज्य आचार्यश्री जी” के पावन सान्निध्य एवं लोककल्याणकारी संकल्प से आरम्भ हुई यह पॉलीक्लिनिक अल्प समय में ही जनविश्वास, करुणा और सेवा का एक सशक्त केन्द्र बन चुकी है। यहाँ स्वास्थ्य सेवा केवल उपचार का माध्यम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, आत्मीयता और संस्कारित जीवनदृष्टि का विस्तार है। समाज के प्रत्येक वर्ग तक सुलभ, समर्पित एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने का जो उद्देश्य इस संस्थान के मूल में निहित है, वह निरंतर सार्थक रूप में फलीभूत हो रहा है। इसी सेवा-भावना के अंतर्गत विश्वप्रसिद्ध Medanta The Medicity “मेदान्ता अस्पताल गुरुग्राम” के सौजन्य से प्रतिमाह नियमित रूप से दो दिवसीय “निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर” आयोजित किए जाते हैं, जिनमें हरिद्वार एवं कनखल क्षेत्र के सन्त-महात्मा, साधक, श्रद्धालु एवं स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में लाभान्वित होते रहे हैं। इन स्वास्थ्य शिविरों में विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, नेत्र रोग तथा सामान्य स्वास्थ्य सम्बन्धी विविध समस्याओं की गहन जाँच कर रोगियों को उचित चिकित्सकीय परामर्श प्रदान किया जाता है। साथ ही आवश्यक निःशुल्क औषधियों का वितरण भी सेवा और सद्भाव की भावना से किया जाता है। अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से युक्त इस पॉलीक्लिनिक में आयोजित “निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर” में ई.सी.जी. (ECG), पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (P.F.T.), एक्स-रे, ब्लड शुगर, रक्तचाप, हीमोग्लोबिन सहित अनेक महत्वपूर्ण जाँचें नियमित रूप से सम्पन्न की जाती हैं। चिकित्सा की आधुनिक व्यवस्थाओं और भारतीय आध्यात्मिक जीवन मूल्यों का यह सुन्दर समन्वय इस संस्थान को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल उपचार ही नहीं, बल्कि आत्मीयता, विश्वास और मानवीय सहानुभूति का भी अनुभव करता है। इसके अतिरिक्त “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” में निःशुल्क दन्त चिकित्सा सेवाएँ भी अत्यंत समर्पण एवं आधुनिक सुविधाओं के साथ प्रदान की जा रही हैं। यहाँ सामान्य दन्त परीक्षण से लेकर "रूट केनाल उपचार" (Root Canal Treatment) तथा दाँतों के इम्प्लांट जैसी उन्नत दन्त चिकित्सा प्रक्रियाएँ भी निःशुल्क अत्यंत सेवा-भाव से सम्पन्न की जाती हैं। इस हेतु अत्यधिक प्रशिक्षित एवं अनुभवी दन्त चिकित्सकों की एक समर्पित टीम निरन्तर सेवाएँ प्रदान कर रही है, जो रोगियों को आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के साथ आत्मीयता एवं संवेदनशील व्यवहार का अनुभव भी कराती है। यह सेवा विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है, जो आर्थिक अभाव अथवा संसाधनों की कमी के कारण गुणवत्तापूर्ण दन्त चिकित्सा से वंचित रह जाते हैं। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” की सेवाएँ केवल रोग-निवारण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज में स्वास्थ्य-जागरूकता, सेवा-संस्कार और मानवीय मूल्यों के जागरण का भी एक प्रभावशाली माध्यम बनती जा रही हैं। आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण शारीरिक एवं मानसिक समस्याएँ निरंतर बढ़ रही हैं, ऐसे समय में यह संस्थान चिकित्सा और अध्यात्म के समन्वित दृष्टिकोण के माध्यम से समाज को नई दिशा प्रदान कर रहा है ! #AvdheshanandG_Quotes #स्वामी_अवधेशानन्द_पॉलीक्लीनिक #swamiavdheshanandpolyclinic #पॉलीक्लीनिक_प्रथम_वर्षगाँठ #hariharashramkankhal
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येषां वृत्तिः समावृद्धा, अन्या च सा पुनरारम्भः। ते वै सद्ब्रह्मतां प्राप्ता, नेतरे शब्दवादिनः ।।१३२।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त की साधना में यह श्लोक अत्यन्त सूक्ष्म और निर्णायक सत्य का उद्घाटन करता है। यहाँ भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य उस अवस्था का निरूपण करते हैं, जहाँ ब्रह्म-वृत्ति केवल क्षणिक चिन्तन न रहकर, साधक के अन्तःकरण में परिपक्व, सुदृढ़ और अखण्ड रूप से प्रतिष्ठित हो जाती है। “येषां वृत्तिः समावृद्धा” - जिन साधकों में यह ब्रह्म-वृत्ति सम्यक् रूप से विकसित और परिपुष्ट हो गई है, अर्थात् जिनका अन्तःकरण निरन्तर “अहं ब्रह्मास्मि” इस अखण्ड बोध में स्थित रहता है, उनकी वृत्ति अब साधारण मानसिक प्रक्रिया नहीं रह जाती। वह अखण्डाकार-वृत्ति के रूप में अविद्या का पूर्ण निवारण कर, आत्मस्वरूप के प्रकाश को स्थायी बना देती है। यहाँ “समावृद्धा” का अर्थ है न केवल उत्पन्न होना, बल्कि परिपक्व होकर सहज स्वभाव बन जाना। “अन्या च सा पुनरारम्भः” - ऐसे साधकों के लिए अन्य वृत्तियों का पुनरारम्भ नहीं होता। अर्थात् संसार-विषयक संकल्प-विकल्प, देहाभिमान, राग-द्वेष, कर्तृत्व-भोक्तृत्व की वृत्तियाँ अब पुनः उदित नहीं होतीं। यदि बाह्य रूप से वे प्रकट भी हों, तो वे केवल व्यवहारिक स्तर तक सीमित रहती हैं; वे साधक के आत्मबोध को स्पर्श नहीं कर पातीं। यह वही अवस्था है जहाँ वासनाक्षय और मनोनाश का चरम परिणाम प्रकट होता है। दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति निदिध्यासन के परिपाक का फल है। श्रवण और मनन से उत्पन्न ज्ञान, जब बारम्बार चिन्तन और आत्मनिष्ठा से दृढ़ होता है, तब वह वृत्ति स्थायी होकर अन्य सभी वृत्तियों का लय कर देती है। यह स्थिति जीवन्मुक्ति का सूचक है - जहाँ साधक संसार में रहते हुए भी उससे असंग रहता है। “ते वै सद्ब्रह्मतां प्राप्ताः” - ऐसे साधक ही वास्तव में “सद्ब्रह्मतां” प्राप्त होते हैं अर्थात् वे ब्रह्मस्वरूप में ही स्थित हो जाते हैं। यहाँ “प्राप्ति” का अर्थ किसी नये तत्त्व की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने नित्य स्वरूप का आविर्भाव है। वे जानते हैं कि वे कभी बन्धन में थे ही नहीं; केवल अज्ञान के कारण ऐसा प्रतीत होता था। अब वह भ्रान्ति निवृत्त हो चुकी है। “नेतरे शब्दवादिनः” - इसके विपरीत, जो केवल शास्त्रों के शब्दों में ही उलझे रहते हैं, जो केवल तर्क-वितर्क और वाक्चातुर्य में ही तुष्ट होते हैं, वे इस सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते। “शब्दवादिनः” वे हैं जो ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर तक सीमित रखते हैं, परन्तु उसे आत्मानुभूति में रूपान्तरित नहीं करते। उनके लिए वेदान्त केवल विचार है, अनुभव नहीं। उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं - “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न केवल बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है; वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपनी सम्पूर्ण सत्ता से अपनाता है। अतः शास्त्र का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि साधक को उस ज्ञान में स्थित करना है। इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि आत्मज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अस्तित्वगत परिवर्तन है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति परिपक्व होकर अन्य सभी वृत्तियों का अतिक्रमण नहीं कर लेती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह परिपक्वता प्राप्त हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाता है - निरन्तर, सहज और अखण्ड रूप से। निष्कर्षत: भगवद्पादाचार्य यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चा वेदान्त वही है, जो जीवन में उतरे, जो वृत्ति को रूपान्तरित करे, और जो साधक को ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित कर दे। केवल शब्दों का ज्ञान पर्याप्त नहीं; अनुभव की परिपक्वता ही वास्तविक सिद्धि है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम साधना और परम फल है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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Narendra Modi
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Pleased to receive Russia’s Foreign Minister Sergei Lavrov. Thanked him for an update on the progress on various facets of our Special & Privileged Strategic Partnership. We also exchanged views on various regional and global issues, including situation in Ukraine and West Asia. Reiterated our consistent support for efforts aimed at peaceful resolution of conflicts. @mfa_russia
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, ‘पद्म विभूषण’ श्रद्धेय स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव जी के सुपुत्र एवं उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष श्रीमती अपर्णा यादव जी के पति श्री प्रतीक यादव जी के आकस्मिक निधन का समाचार अत्यंत दुःखद, हृदयविदारक एवं स्तब्ध कर देने वाला है। असमय किसी प्रिय आत्मीय का इस प्रकार संसार से विदा होना परिवार, समाज एवं शुभचिंतकों के लिए अत्यंत पीड़ादायक होता है। जीवन की क्षणभंगुरता हमें पुनः यह स्मरण कराती है कि यह संसार परिवर्तनशील है, किन्तु आत्मा शाश्वत, अविनाशी और अमर है। श्रीमद्भगवद्गीता का यह दिव्य संदेश ऐसे ही कठिन क्षणों में धैर्य, साहस और आध्यात्मिक संबल प्रदान करता है। इस गहन शोक की बेला में मेरी हार्दिक संवेदनाएँ समस्त शोकाकुल परिवार, आत्मीयजनों एवं शुभचिंतकों के साथ हैं। भगवान् मृत्युंजय महादेव से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने स्वरूप में समाहित करें तथा परिवार को यह असहनीय दुःख सहन करने की शक्ति, धैर्य एवं संबल प्रदान करें। भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि। ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ #PrateekYadav
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Aparna Bisht Yadav@aparnabisht7

अत्यंत दुःख के साथ सूचित किया जाता है कि “पद्म विभूषण” पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव जी के सुपुत्र एवं हम सभी के प्रिय प्रतीक यादव जी का अंतिम संस्कार कल प्रातः 11:00 बजे बैकुंठ धाम (भैंसाकुंड) में संपन्न होगा। इस दुःखद घड़ी में आप सभी की गरिमामयी उपस्थिति प्रार्थनीय है।

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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
ये हि वृत्तिं जहत्येनां ब्रह्माख्यां पावनीं पराम्। वृथैव ते तु जीवन्ति पशुभिश्च समा नराः ।।१३०।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त निर्णायक और गम्भीर पक्ष का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे “ब्रह्मवृत्ति” उस परम पावन, आत्मप्रकाशक और मुक्तिदायिनी वृत्ति के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि जो मनुष्य इस दिव्य वृत्ति का परित्याग करता है, उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। “ये हि वृत्तिं जहति” - जो साधक इस वृत्ति को त्याग देते हैं, अर्थात् जो “अहं ब्रह्मास्मि”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इस अखण्ड बोध से विमुख होकर पुनः संसार-वृत्तियों, विषयासक्ति और देहाभिमान में प्रवृत्त हो जाते हैं - वे वास्तव में अपने जीवन के परम उद्देश्य से च्युत हो जाते हैं। यहाँ त्याग का अर्थ केवल बाह्य उपेक्षा नहीं, बल्कि उस आन्तरिक उपेक्षा से है, जिसमें साधक आत्मज्ञान की दिशा में प्राप्त हुई प्रगति को स्थिर नहीं रखता। “ब्रह्माख्यां पावनीं पराम्” - यह वृत्ति “ब्रह्माख्या” है, क्योंकि यह ब्रह्मस्वरूप का ही बोध कराती है; “पावनी” है, क्योंकि यह समस्त अविद्या, वासनाओं और संस्कारों का परिमार्जन करती है; और “परा” है, क्योंकि यह साधना की पराकाष्ठा है। यही वह वृत्ति है, जो जीव को बन्धन से मुक्त कर, उसे अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित करती है। इस ब्रह्मवृत्ति का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि यही “अखण्डाकार-वृत्ति” अज्ञान का निवारण करती है। जब यह वृत्ति स्थिर होती है, तब समस्त द्वैतबोध का लय हो जाता है, और केवल ब्रह्मस्वरूप सत्य ही शेष रहता है। अतः इसका त्याग करना, वस्तुतः आत्मस्वरूप से विमुख होना है। “वृथैव ते तु जीवन्ति” - ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से जीवित प्रतीत होते हैं, किन्तु उनका जीवन आध्यात्मिक दृष्टि से निरर्थक हो जाता है। वे जीवन के परम प्रयोजन आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त किए बिना ही कालक्षेप करते हैं। उनका जीवन केवल इन्द्रिय-तृप्ति, विषय-भोग और क्षणिक सुखों की खोज में व्यतीत होता है। “पशुभिश्च समा नराः” - भगवद्पादाचार्य यहाँ एक अत्यन्त कठोर, किन्तु सत्य कथन करते हैं कि ऐसे मनुष्य पशुओं के समान हैं। यह उपमा निन्दा के लिए नहीं, बल्कि जागरण के लिए है। पशु भी केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन में ही संलग्न रहते हैं; यदि मनुष्य भी केवल इन्हीं प्रवृत्तियों में लीन रहकर अपने विवेक, आत्मचिन्तन और ब्रह्मबोध की क्षमता का उपयोग नहीं करता, तो वह अपने मानवीय गौरव को खो देता है। उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं - “इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः” यदि इस जीवन में आत्मा का ज्ञान हो जाए, तो जीवन सफल है; अन्यथा महान् हानि है। भगवद्गीता में भी कहा गया है - “आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्” ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य और पशु दोनों में समान हैं; किन्तु मनुष्य का विशिष्टत्व विवेक और आत्मबोध में है। अतः, इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि मानव जीवन अत्यन्त दुर्लभ और मूल्यवान है, और इसका परम प्रयोजन आत्मज्ञान की प्राप्ति है। ब्रह्मवृत्ति जो इस ज्ञान का साधन है का परित्याग करना, इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ गंवाना है। निष्कर्षतः भगवद्पादाचार्य साधक को यह प्रेरणा देते हैं कि वह ब्रह्मवृत्ति को दृढ़तापूर्वक धारण करे, उसका निरन्तर अभ्यास करे, और उसे अपने जीवन का केन्द्र बनाए। यही वृत्ति जीवन को पवित्र, सार्थक और मुक्तिदायी बनाती है। इसके बिना जीवन केवल बाह्य गतिविधियों का प्रवाह है, जिसमें न सत्य का बोध है, न परम आनन्द की अनुभूति। अतः, साधक को चाहिए कि वह सजग, सतर्क और दृढ़ संकल्प के साथ इस ब्रह्मवृत्ति का पालन करे; क्योंकि यही मानव जीवन की सच्ची सार्थकता और परम सिद्धि का मार्ग है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, अपितु भारत की अखण्ड आस्था, अदम्य आत्मबल और सनातन सभ्यता की अमर चेतना का दिव्य प्रतीक है। प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान् श्री सोमनाथ महादेव का यह पावन धाम सहस्राब्दियों से भक्तिभाव, तप, त्याग और राष्ट्रगौरव का आलोक बिखेरता रहा है। “सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते। लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥” अर्थात् सोमलिङ्ग के दर्शन मात्र से मनुष्य पापों से मुक्त होकर मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है और अन्ततः दिव्य गति को प्राप्त होता है। सोमनाथ मंदिर के पुनर्स्थापन के 75 वर्ष भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गौरवगाथा हैं। जिन आक्रांताओं ने भारत की सनातन चेतना को मिटाने का प्रयास किया, वे स्वयं इतिहास की धूल में विलीन हो गए; किन्तु सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है और भी अधिक तेजस्वी और भी अधिक गौरवमय। सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से पुनर्जीवित यह तीर्थ भारत के आत्मसम्मान का पुनरुदय था। आज आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में “विकास भी, विरासत भी” का मंत्र सोमनाथ, काशी विश्वनाथ धाम और भारत के अनेक तीर्थों में साकार रूप ले रहा है। यह केवल मंदिरों का पुनरुद्धार नहीं, अपितु राष्ट्र की आत्मा का पुनर्जागरण है। प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ मंदिर के शिखर पर फहराती धर्मध्वजा यह उद्घोष करती है कि भारत की कालजयी सनातन संस्कृति शाश्वत है; जो न कभी नष्ट हुई है और न कभी नष्ट होगी। यह ध्वजारोहण श्रद्धा, आस्था, स्वाभिमान और अखण्ड भारत की आत्मचेतना का प्रतीक है। सोमनाथ मंदिर का अमृत महोत्सव केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि आगामी सहस्राब्दियों के लिए भारत की प्रेरणा, संकल्प और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का महोत्सव है। सोमनाथ मंदिर का इतिहास हमें स्मरण कराता है कि जो राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है उसे संसार की कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती। #SomnathVirasatK75Varsh #सोमनाथ_स्वाभिमान_पर्व #AvdheshanandG_Quotes @narendramodi @PMOIndia
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