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@Saryuparin

A big zero,no corners and no edges

jharia jharkhand Katılım Ocak 2012
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वाह 👌👌
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

ये आँखें…मानों सृष्टि के किसी अत्यंत धैर्यवान क्षण में गढ़ी गई हों। जैसे समय स्वयं थम गया हो, और बनाने वाला भी अपनी ही रचना में डूबकर कुछ पल के लिए विस्मित रह गया हो। इनमें एक अजीब-सी खामोशी है, पर वो खामोशी शून्य नहीं, बल्कि अनगिनत अनकहे एहसासों से भरी हुई है। जब इन्हें देखता हूँ, तो लगता है जैसे कोई गहरा समंदर अपनी समूची गहराइयों के साथ पलकों में सिमट आया हो और मैं बस किनारे पर खड़ा, हर लहर के अर्थ को समझने की नाकाम कोशिश करता रह जाता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ इन्हें बनाने वाला भी शायद इन्हें छोड़ने से पहले एक बार ठहर कर, बेहद मोह में डूबकर, खुद से यही कह बैठा होगा..“अब इससे अधिक सुंदरता संभव नहीं…” 💜 ©® राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️ (एक लड़का जो हर कहानी में खुद को ढूंढता है)

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ये बड़ी गम्भीर समस्या है।बाजारवाद रूपी राक्षस ने सभी संबंधों को चकनाचूर कर दिया है,जिसके पास ज्यादा पैसा है वह सिरमौर है,जिसके पास नहीं है वह गहरे नाले में गिरा हुआ है।
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

ध्यान से देखिए तो पता चलेगा कि समाज किस मोड़ पर पहुँच गया है। हर तरफ़ एक अजीब सा दोगलापन और असमंजस फैला हुआ है। राजनीति, जो कभी समाज की राह दिखाने का माध्यम होती थी, अब केवल दोगलापन और स्वार्थ की कहानी बनकर रह गई है। नेताओं के शब्द सिर्फ़ दिखावा हैं, उनके वादे खाली हवा की तरह हैं। उन्हें पकड़ो तो हाथ से फिसलते रहते हैं, और उनके पीछे खड़ी जनता बस चुपचाप देखती रहती है। लोग अब जात-पात के नाम पर लड़ते हैं, अपनी पहचान को हथियार बना लेते हैं। ये पहचानें, जो कभी हमारी जड़ों और इतिहास की गूँज थीं, अब केवल दीवारें बन गई हैं हमें बाँटने वाली, हमें अलग करने वाली। धर्म का भी यही हाल है। करुणा और अहिंसा की बातें सिर्फ़ किताबों में बची हैं। असलियत में धर्म आज व्यापार बन गया है जहाँ सिर्फ़ शब्दों से नहीं, बल्कि फायदे और स्वार्थ से लोगों की आस्था मापी जाती है। शिक्षा जो कभी प्रकाश का स्रोत थी, अब गटर में बहती पानी की तरह गिरी हुई है। ज्ञान के आदान-प्रदान की जगह अब दिखावे और अंक की दौड़ ने ले ली है। जो लोग असल में काबिल हैं, उनकी आवाज़ दब जाती है, और जो अपने भीतर क्षमता नहीं रखते, उन्हें जीवनरक्षक की कुर्सी पर बिठा दिया जाता है जैसे कि केवल पद और सत्ता ही सब कुछ हैं। और सबसे दर्दनाक ये कि मानव संबंध अब युद्धक्षेत्र बन गए हैं। महिलाएँ पुरुषों से लड़ रही हैं, पुरुष महिलाओं से टकरा रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के शत्रु बनते जा रहे हैं। प्रेम, सहानुभूति, सहयोग ये भाव सिर्फ़ यादों में रह गए हैं। हर रिश्ता अब प्रतियोगिता, हर संवाद अब बहस और हर नजर अब शक की नजर बन चुकी है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या हम कभी इस अंधकार से बाहर निकल पाएँगे? क्या हम अपने भीतर की अच्छाई और संवेदनशीलता को फिर से पहचान पाएँगे? या हम सिर्फ़ इस गहरे कलंक और भ्रम में उलझते रहेंगे, और अपने ही हाथों अपने समाज को बिखेरते रहेंगे? शायद यही समय है कि हम अपने भीतर झाँकें, अपने विचारों को साफ़ करें, और छोटे-छोटे बदलावों से अपने आस-पास की दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश करें। लेकिन सच कहूँ, दिल पर भारीपन है। ये भारीपन उस एहसास का है कि हमारे समाज की असल लड़ाई अब केवल बाहर की नहीं, भीतर की है। हर व्यक्ति को अपनी समझ, अपनी संवेदनाएँ और अपने विवेक की रक्षा खुद करनी होगी। आज की ये दयनीय तस्वीर देखकर मन में सिर्फ़ यही ख्याल आता है कि हमें धीरे-धीरे, संयमित ढंग से, अपने कर्म और अपने विचार से दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाना होगा। और शायद यही एकमात्र रास्ता है जो दिखावे और दोगलापन की परतों को धीरे-धीरे हटा सके, और फिर से इंसानियत और संवेदनशीलता को जगा सके। मैं ये सब लिखकर भी अपने आप से सवाल करता हूँ क्या मैं अकेले इस बदलते समय में कुछ कर पाऊँगा? शायद नहीं। लेकिन अगर हर एक मनुष्य अपने भीतर की छोटी-छोटी अच्छाइयों को जगा दे, तो ये भी एक शुरुआत होगी। यही सोचकर मैं कल की उम्मीद में आज के दुःख को सहता हूँ।🌸 राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️

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बहुत सही और सटीक बात कही।साधुवाद।
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

कभी-कभी मृत्यु को लेकर समाज में एक सहज-सा निष्कर्ष बना लिया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अचानक, बिना अधिक संघर्ष के चला जाए तो कहा जाता है कि उसके कर्म अच्छे थे, इसलिए उसे पीड़ा नहीं मिली। और यदि कोई लंबे समय तक बीमारी, असहायता या हर क्षण टूटते हुए विदा हो, तो मान लिया जाता है कि उसे अपने कर्मों का फल मिल रहा है। मैं इस धारणा को बहुत सतर्कता और संयम से देखता हूँ, क्योंकि जीवन और मृत्यु दोनों ही किसी गणितीय हिसाब-किताब से नहीं चलते, फिर भी ये सच है कि हमारे भीतर बैठा विवेक इन घटनाओं को अर्थ देने की कोशिश करता है। अचानक आई मृत्यु बाहर से देखने वालों के लिए “आसान” लगती है। एक झटका, एक क्षण, और सब समाप्त। पीछे रह गए लोग कहते हैं चलो उसे ज्यादा कष्ट नहीं हुआ। शायद यही सोच उन्हें अपने दुख से उबरने में थोड़ी सहायता देती है पर ये भी सच है कि ऐसी मृत्यु अपने साथ अधूरापन छोड़ जाती है। बिना अलविदा कहे, बिना आख़िरी बात पूरी किए, बिना ये बताए कि भीतर क्या चल रहा था। ये पीड़ा मरने वाले की नहीं, बल्कि जीवित बचे लोगों की होती है, जो जीवन भर उस अधूरे संवाद को ढोते रहते हैं। इसके उलट जब कोई व्यक्ति मृत्यु से पहले हर दिन, हर क्षण, भीतर से टूटता है, जब सांस लेना भी बोझ लगने लगे, जब शरीर साथ छोड़ने लगे, और मन बार-बार कहे कि अब बस तो बाहर से देखने वाले इसे “कर्मफल” का नाम दे देते हैं। शायद इसलिए क्योंकि इंसान को हर पीड़ा का कोई कारण चाहिए। बिना कारण दुख स्वीकार करना बहुत कठिन होता है। कर्मफल एक आसान व्याख्या बन जाती है जो हमें ये भरोसा दिलाती है कि दुनिया में कोई व्यवस्था है, कोई न्याय है। लेकिन उस व्यक्ति के भीतर जो चल रहा होता है, उसे कोई शब्द पूरी तरह बयान नहीं कर सकता। वो हर सुबह उठते हुए मरता है, हर रात सोते समय जानता है कि कल फिर वही संघर्ष होगा। ये केवल शारीरिक पीड़ा नहीं होती, ये मन का क्षरण होता है। अपनी ही असहायता को रोज़-रोज़ देखना, अपने ही शरीर से पराजित होना। ऐसे समय में कर्म और फल की थ्योरी बहुत छोटी पड़ जाती है। वहाँ केवल इंसान बचता है नंगा, कमजोर, और पूरी तरह सच के सामने खड़ा हुआ। मैं मानता हूँ कि जीवन में कर्मों का महत्व है, पर हर पीड़ा को दंड और हर सहज विदाई को पुरस्कार मान लेना, शायद हमारे अहंकार की एक चाल है। हम ये मानना चाहते हैं कि हम सही जिएँगे तो अंत भी “अच्छा” होगा। ये सोच हमें नैतिक बल देती है, पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। कई बार सबसे अच्छे लोग सबसे ज्यादा टूटते हैं, और कई बार सबसे साधारण जीवन जीने वाले चुपचाप चले जाते हैं। जीवन किसी पुरस्कार वितरण समारोह की तरह नहीं है। लंबी पीड़ा वाले जीवन का एक कठोर सत्य ये भी है कि वह व्यक्ति धीरे-धीरे दुनिया से नहीं, बल्कि दुनिया उससे दूर होने लगती है। लोग मिलने कम आते हैं, बातें कम होती जाती हैं, सहानुभूति भी थक जाती है। उस समय व्यक्ति अपने कर्मों से नहीं, बल्कि अपने अकेलेपन से जूझ रहा होता है। यदि यही कर्मफल है, तो ये बहुत निर्दयी शब्द है उस स्थिति के लिए। शायद मृत्यु का ढंग कर्मों का नहीं, बल्कि जीवन की अनिश्चितता का परिणाम होता है। और जो व्यक्ति मृत्यु से पहले हर क्षण मरता है, वह कोई सज़ा नहीं भुगत रहा होता, बल्कि वह हमें जीवन का सबसे नग्न सच दिखा रहा होता है कि हम नियंत्रण में नहीं हैं, हमारा शरीर, हमारी योजनाएँ, हमारा अहंकार सब अस्थायी हैं। मैं ये भी मानता हूँ कि ऐसी पीड़ा मनुष्य को भीतर से बहुत गहरा बना देती है। जो व्यक्ति हर दिन मौत के पास बैठकर जीता है, उसके भीतर दिखावा नहीं बचता। वहाँ केवल सच बचता है, डर, स्वीकार, प्रार्थना, और कभी-कभी एक गहरी शांति। ये शांति किसी अच्छे कर्म का फल हो या न हो, पर ये जीवन की आख़िरी सीख ज़रूर होती है। इसलिए मैं न तो अचानक मृत्यु को पूरी तरह “अच्छे कर्मों” का पुरस्कार मान पाता हूँ, और न ही लंबी यातना को “बुरे कर्मों” की सज़ा। मैं बस इतना मानता हूँ कि हर विदाई का अपना अर्थ होता है, और हर पीड़ा अपने भीतर एक मौन प्रश्न लिए होती है जिसका उत्तर बाहर नहीं, हमारे भीतर कहीं छुपा होता है। शायद सबसे बड़ा कर्म यही है कि हम किसी की पीड़ा को आंकने से पहले उसे समझने की कोशिश करें। और सबसे बड़ा फल ये कि हम जीवन को चाहे जितना मिला हो, पूरी संवेदना के साथ देखें, क्योंकि अंत में मृत्यु नहीं, बल्कि हमारा दृष्टिकोण ही तय करता है कि हम इंसान थे या केवल निर्णय सुनाने वाले दर्शक। 🖤 राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️ @Raghvendra_101

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शत प्रतिशत सहमत
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

कभी-कभी आदमी एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हो जाता है जहाँ उसे लगता है कि सड़ांध सिर्फ किसी एक जगह नहीं है, बल्कि हवा में घुल चुकी है। समाज की हालत भी कुछ वैसी ही हो चुकी है। ऊपर से देखने पर सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है। सभ्यता, संस्कार, रिश्ते, व्यवस्था, नियम, लेकिन ज़रा भीतर झाँक कर देखिए तो लगता है जैसे किसी पुराने बंद कमरे में सालों से खिड़की नहीं खुली हो। वहाँ हवा नहीं चलती, सिर्फ सड़ांध ठहरी रहती है। सच कहूँ तो इस समाज में सबसे बड़ी समस्या ये है कि यहाँ हर आदमी खुद को ईमानदार मानता है और दूसरे को बेईमान। हर कोई दूसरों की गलतियों का हिसाब रखने में लगा है, लेकिन अपनी कमियों को देखकर जैसे आँखें बंद कर लेता है। यही वजह है कि ऊपर से नीचे तक एक अजीब सा पाखंड फैला हुआ है। जो मंचों पर खड़े होकर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, वही अपने निजी जीवन में सबसे पहले उस नैतिकता को कुचलते दिखाई देते हैं। व्यवस्था की हालत भी इससे अलग नहीं है। जिस सिस्टम से उम्मीद की जाती है कि वह न्याय देगा, वही अक्सर ताकतवर के सामने झुक जाता है। नियम किताबों में रहते हैं और फैसले ताकत और पहचान देखकर होते हैं। जो ईमानदार है वह धीरे-धीरे किनारे कर दिया जाता है, और जो चालाक है वह आगे बढ़ता जाता है। कई बार लगता है कि यह व्यवस्था सड़ी हुई इसलिए नहीं है कि इसमें कुछ लोग खराब हैं, बल्कि इसलिए कि यहाँ खराब होना ही सफल होने की पहली शर्त बन गया है। लेकिन सबसे कड़वा सच तब सामने आता है जब आदमी अपने ही लोगों की तरफ देखता है। जिनसे उम्मीद होती है कि वे साथ देंगे, वही कई बार सबसे पहले पीठ में छुरा घोंपते दिखाई देते हैं। परिवार, रिश्तेदार, दोस्त ये सब शब्द सुनने में बहुत मधुर लगते हैं, लेकिन व्यवहार में अक्सर इनका अर्थ बदल जाता है। बहुत से रिश्ते सिर्फ तब तक मजबूत रहते हैं जब तक उनसे कोई फायदा जुड़ा रहता है। जैसे ही परिस्थिति बदलती है, वही लोग धीरे-धीरे दूर खिसकने लगते हैं। यह भी एक सच्चाई है कि इस समाज में लोग किसी की मदद करने से ज्यादा उसकी असफलता का इंतजार करते हैं। सामने मुस्कुराते हैं, पीठ पीछे आलोचना करते हैं। कोई थोड़ा आगे बढ़ जाए तो उसे गिराने के तरीके खोजे जाते हैं, और अगर कोई संघर्ष कर रहा हो, तो उसके दुख को समझने के बजाय उसे उसकी ही कमजोरी का प्रमाण बना दिया जाता है। पड़ोसी, परिचित, जान-पहचान के लोग इन सबके साथ भी अक्सर एक अजीब सा दिखावा चलता है। बातचीत में मिठास होती है, लेकिन मन में दूरी। लोग एक-दूसरे के जीवन में झाँकने के लिए उत्सुक रहते हैं, लेकिन किसी के दर्द को सच में समझने की कोशिश बहुत कम करते हैं। किसी की परेशानी भी कई बार चर्चा का विषय बन जाती है, समाधान का नहीं। धीरे-धीरे आदमी ये समझने लगता है कि इस पूरे ढाँचे में सड़ांध सिर्फ संस्थाओं में नहीं है, बल्कि मानसिकता में है। जब सोच ही स्वार्थ से भरी हो, तो रिश्ते भी स्वार्थी हो जाते हैं और व्यवस्था भी। लोग सच से ज्यादा सुविधा को चुनते हैं। सही होने से ज्यादा सुरक्षित रहना उन्हें जरूरी लगता है। और शायद यही वजह है कि कई बार आदमी को लगता है कि भरोसा नाम की चीज़ बहुत दुर्लभ हो गई है। हर कोई किसी न किसी भूमिका में अभिनय कर रहा है। कोई आदर्श का, कोई दोस्ती का, कोई रिश्तेदारी का। लेकिन जैसे ही परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, उन भूमिकाओं के पीछे का असली चेहरा सामने आने लगता है। फिर भी एक बात समझनी पड़ती है कि इस सड़े हुए माहौल में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पूरी तरह सड़े नहीं होते। वे कम होते हैं, बहुत कम। अक्सर भीड़ में दबे हुए, चुपचाप अपना काम करते हुए। उन्हीं की वजह से शायद ये दुनिया पूरी तरह अंधेरी नहीं हो पाती। लेकिन जो आदमी ये सब देख चुका होता है, वह भोला नहीं रह पाता। उसके भीतर एक दूरी पैदा हो जाती है। वह लोगों से मिलता है, बात करता है, रिश्ते निभाता है, लेकिन भीतर कहीं एक कोना ऐसा रह जाता है जहाँ वह जानता है कि भरोसा बहुत सोच-समझकर ही करना चाहिए। क्योंकि इस समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहाँ अच्छाई की बातें बहुत होती हैं, लेकिन अच्छाई को जीने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। और जब ये बात समझ में आती है, तब आदमी को पहली बार एहसास होता है कि सड़ांध सिर्फ बाहर नहीं है, बल्कि उस पूरे माहौल में फैली हुई है जिसमें हम सब साँस ले रहे हैं। 💔 राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️

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धार्मिक राजनीति है ,राजनैतिक धर्म समाप्त हो गया है
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

स्वघोषित धर्मरक्षकों की ये अजीब और खतरनाक प्रजाति आज समाज को इस तरह घेरे हुए है जैसे धर्म कोई उनकी निजी संपत्ति हो। ये स्वयं को उस धर्म का ठेकेदार समझ बैठे हैं जिसकी जड़ें इनके जन्म से हजारों वर्ष पहले भी थीं और इनके अस्तित्व के मिट जाने के बाद भी रहेंगी। धर्म ने इन्हें नहीं रचा, बल्कि इन्होंने अपने स्वार्थ, अहंकार और सत्ता-लालसा के अनुसार धर्म की एक विकृत परछाईं गढ़ ली है, और उसी को ईश्वर का आदेश बताकर समाज पर थोपना चाहते हैं। दरअसल इन लोगों की सबसे बड़ी भूल यही है कि इन्होंने ईश्वर को अपने अधीन समझ लिया है। इन्हें लगता है कि ईश्वर इनके शब्दों से बोलेगा, इनके इशारों पर चलेगा और इनके क्रोध से ही प्रसन्न या अप्रसन्न होगा। जिस ईश्वर की कल्पना करुणा, विवेक, सत्य और सहअस्तित्व से की गई थी, उसे इन्होंने भय, हिंसा और दंड का प्रतीक बना दिया है। धर्म इनके लिए साधना नहीं, सत्ता है; आत्मशुद्धि नहीं, भीड़ पर नियंत्रण का औजार है। विडंबना देखिए कि यदि कोई व्यक्ति इनके पाखंड, इनके दोहरे चरित्र और इनके स्वार्थी खेल पर उंगली रख दे, तो यही लोग और इनकी पाखंडी सेना एक स्वर में उसे धर्मद्रोही घोषित कर देती है। सवाल पूछना अपराध बना दिया गया है, विवेक को विद्रोह कहा जाने लगा है और सोचने-समझने वाले व्यक्ति को समाज के लिए खतरा बताया जाता है। ये भूल जाते हैं कि धर्म कभी प्रश्नों से डरता नहीं, डरता है तो केवल झूठ और अहंकार। इतिहास इसका साक्षी है कि हर युग में कुछ लोग स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित करते रहे हैं। हर युग के शासकों और ठेकेदारों को यही अभिमान था कि वे शाश्वत हैं, कि उनका शासन, उनकी विचारधारा और उनका वर्चस्व कभी समाप्त नहीं होगा। वे स्वयंभू कहलाए, उन्होंने असहमति को कुचला, सत्य को दबाया और धर्म का उपयोग तलवार की तरह किया। लेकिन अंत में समय ने सबका भ्रम तोड़ा है। कोई भी सत्ता, कोई भी पाखंड, कोई भी झूठ प्रकृति के नियमों से बड़ा नहीं हुआ है। प्रकृति न नारे सुनती है, न भीड़ से डरती है और न ही किसी के धार्मिक प्रमाणपत्र मांगती है। वह केवल संतुलन जानती है। जो व्यक्ति, समूह या व्यवस्था इस संतुलन को बिगाड़ती है, उसका हिसाब देर-सवेर होता ही है। ये हिसाब तुरंत नहीं आता, इसलिए अहंकार को लगता है कि वह अजेय है। पर जब आता है, तो इतिहास के पन्नों में केवल एक चेतावनी बनकर रह जाता है। कड़वा सच यही है कि धर्म को सबसे अधिक नुकसान उसके कथित रक्षकों ने ही पहुंचाया है। जिन्होंने उसे बाजार बना दिया, सत्ता का सीढ़ी बना दिया और ईश्वर को अपने स्वार्थ का मुखौटा। सच्चा धर्म न तो शोर मचाता है, न धमकी देता है, न ही किसी को डराकर मान्यता चाहता है। वह तो मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाता है, उसे विनम्र करता है, उसे प्रश्न करना सिखाता है और अन्याय के सामने खड़े होने का साहस देता है। आज आवश्यकता धर्म के ठेकेदारों से डरने की नहीं, बल्कि अपने विवेक को जीवित रखने की है। क्योंकि जब समाज विवेक खो देता है, तब पाखंड सबसे ऊँचे मंच पर बैठ जाता है। और जब विवेक जागता है, तब सबसे मजबूत दिखने वाली झूठी संरचनाएँ भी रेत की तरह ढह जाती हैं। यही सत्य है, यही इतिहास का सबक है और यही वह कड़वा सच है जिसे चाहे जितना दबाया जाए, मिटाया नहीं जा सकता। 🔥 राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️ @Raghvendra_101

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बिल्कुल सही कहा,सभी यही चाहते हैं कि कोई उनकी कही बात से अलग ना सोचे।
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

समाज जैसे अब एक अनकहे समझौते में जी रहा है, जहाँ हर चेहरा मुस्कान ओढ़े हुए है, हर शब्द सहमति की चादर में लिपटा हुआ है। परिवार हो या सार्वजनिक जीवन, अब संबंधों की बुनियाद मतभेद पर नहीं, मात्र सहमति पर टिकी लगती है। जैसे अगर आपने सिर हिलाया तो आप अपने हैं, लेकिन ज़रा सा भी गर्दन किसी असहमति की दिशा में मुड़ी नहीं कि आप पर संदेह की परछाइयाँ पड़ने लगती हैं। आलोचना अब संवाद का हिस्सा नहीं रही, वह तो अब एक अपराध की श्रेणी में डाल दी गई है। जैसे असहमति रखने का अर्थ है दुश्मन होना, पीठ पीछे वार करना, या फिर किसी के अस्तित्व को चुनौती देना। यह अजीब विरोधाभास है कि जहाँ एक ओर हम 'स्वतंत्र अभिव्यक्ति' की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर जब कोई अपने विचार रखता है जो बहाव के विपरीत हो तो वह तुरंत प्रश्नों, कटाक्षों और गालियों का पात्र बन जाता है। आलोचना की जगह अब आक्रोश ने ले ली है। कोई अपने अनुभव, अपने सत्य या अपनी पीड़ा को भी ज़ाहिर करे तो उसे सहिष्णुता से नहीं, संदेह से देखा जाता है। बोलने से पहले अब लोगों को सोचना पड़ता है कि कौन सा शब्द किसे बुरा लग सकता है। यह भय संप्रेषण की आत्मा को ही निगल गया है। लोग अब संवाद नहीं करते, वे एक-दूसरे से सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं। हर कोई चाहता है कि उसे सुना जाए, सराहा जाए, लेकिन कोई सुनना नहीं चाहता, विशेषकर तब जब बात उनके सोच के खिलाफ हो। और ये सिर्फ बाहरी समाज की बात नहीं है, यह दरार घर की चारदीवारी में भी समाई हुई है। माता-पिता अपने बच्चों से सहमति की अपेक्षा रखते हैं, और बच्चे अपने विचारों के लिए जगह चाहते हैं, पर टकराव होते ही संवाद की बजाय चुप्पी या तकरार ही रह जाती है। भाई-बहन, दोस्त, सहकर्मी...हर संबंध अब एक बेहद नाजुक डोर पर टिका है जहाँ किसी का भी “मेरा मत थोड़ा अलग है” कहना उस डोर को तोड़ सकता है। विचारों की दुनिया में विविधता एक सौंदर्य है, पर अब वह बोझ बन गई है। हर मत, हर असहमति को व्यक्तिगत अपमान की तरह लिया जाने लगा है। आलोचना अब सुधार का उपकरण नहीं रही, वह संबंधों की दीवार में सेंध माने जाने लगी है। संयम और सहिष्णुता जैसे शब्द अब सिर्फ किताबों में रह गए हैं। संवाद अब बहस नहीं रह गया, युद्ध बन गया है। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ सहमति आपका कवच है, और असहमति आपका अपराध। क्या यह वही समाज है जहाँ 'दो विचारों के टकराव से सच्चाई निकलती है' कहा जाता था? या अब सच्चाई भी सिर्फ बहुमत से तय होगी? ✍️✍️ राघवेन्द्र चतुर्वेदी

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यह स्थिति अब इतनी आम हो गई है कि अचंभा नहीं होता है।
राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101

स्त्रियों और पुरुषों की वर्चस्व की लड़ाई में सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि जो चीज़ें सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं....रिश्ते, संस्कार, सम्मान और परिवार....वो सबसे पहले हार मान जाते हैं। ये लड़ाई कभी खुलकर नहीं लड़ी जाती, ये रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में छुपी होती है। किसी के ज़्यादा बोल देने में, किसी के चुप रह जाने में, किसी की नज़रें चुराने में, किसी के आदेश देने में। ये लड़ाई शब्दों से ज़्यादा मौन में होती है। और इस मौन में टूटती है एक बेटी की मासूमियत, एक बेटे की सरलता, एक माँ की ममता और एक पिता का आत्मविश्वास। जब कोई पुरुष यह साबित करने में लग जाता है कि वो श्रेष्ठ है, और स्त्री यह दिखाने में कि वो अब कमज़ोर नहीं है....तो दोनों के बीच का संवाद नहीं, टकराव शुरू हो जाता है। एक-दूसरे की भाषा समझने की जगह दोनों एक-दूसरे की चुप्पियों को हथियार मानने लगते हैं। और तब रिश्ते एक मैदान बन जाते हैं, जहाँ हर भावनात्मक क्षण एक युद्ध की रणनीति बन जाता है। जहाँ प्रेम भी एक चाल होती है, और क्षमा एक हार। जिस घर में कभी त्योहारों की मिठास होती थी, वहां अब तर्क और अधिकार की कसैली बहस होती है। जहाँ पहले परंपराएं एक पुल की तरह होती थीं, जो दो दिलों को जोड़ती थीं, अब वही परंपराएं सवाल बनकर खड़ी हो जाती हैं...."क्यों निभाऊं?" "क्यों झुकूं?" और इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलते, सिर्फ दूरी मिलती है। ये लड़ाई तब और भयानक हो जाती है जब बच्चे इस माहौल में बड़े होते हैं। वे रिश्तों को जिम्मेदारी नहीं, एक बोझ समझने लगते हैं। वे प्रेम में विश्वास खो बैठते हैं, क्योंकि उन्होंने देखा है कि कैसे प्रेम के नाम पर सबसे ज़्यादा चोटें दी जाती हैं। वे सम्मान को डर समझने लगते हैं, क्योंकि उन्होंने जाना है कि जो चुप रहता है, वही सबसे ज़्यादा पीड़ा में होता है। और संस्कार? वे किताबों में छप कर रह जाते हैं, क्योंकि घरों में अब संस्कारों की नहीं, 'स्वतंत्रता' की परिभाषाएं दी जाती हैं....जो अक्सर दूसरों की कीमत पर खड़ी होती हैं। परिवार, जो कभी दो आत्माओं का सुंदर मिलन हुआ करता था, अब एक सामाजिक समझौता बन गया है। जिसमें साथ रहना एक मजबूरी है, और अलग हो जाना एक जीत। उस जीत की, जिसमें कोई नहीं जीतता। सब थक जाते हैं, टूट जाते हैं, पर कोई हार मानने को तैयार नहीं होता। क्योंकि इस लड़ाई में 'मैं' सबसे ऊपर होता है....'हम' बहुत पीछे छूट जाता है। और यही 'मैं' सबसे बड़ा खलनायक बन जाता है। वो 'मैं' जो कहता है, "मैं क्यों झुकूं?" वो 'मैं' जो चीखता है, "मुझे बराबरी चाहिए!" उस 'मैं' को कभी यह समझ नहीं आता कि सच्ची बराबरी तब होती है, जब दोनों एक-दूसरे की आँखों में दर्द को पढ़ सकें, और एक-दूसरे के घावों पर अपनेपन की पट्टी बाँध सकें। जहाँ प्रेम में पहला कदम उठाना हार नहीं, हिम्मत होती है। जहाँ क्षमा देना झुकना नहीं, ऊँचाई होती है। पर इस लड़ाई में कोई पढ़ना नहीं चाहता। कोई समझना नहीं चाहता। सब सिर्फ सुनाना चाहते हैं, जताना चाहते हैं, जीतना चाहते हैं। और यही चाह रिश्तों की सबसे गहरी हार बन जाती है। कभी-कभी सोचता हूँ, काश ये लड़ाई कोई हार जाए। काश कोई कहे, “ठीक है, मैं हारता हूँ....अगर इस हार से हमारा रिश्ता बच जाए।” पर ऐसा होता नहीं। हम इतने अधिक व्यस्त हो गए हैं अपने अस्तित्व को सिद्ध करने में, कि उस अस्तित्व के लिए जो ज़मीन चाहिए...रिश्ते, प्रेम, विश्वास...उसी को खोते जा रहे हैं। शायद एक दिन सब कुछ लौट आए। शायद एक दिन फिर कोई माँ अपने बेटे को ये सिखाए कि मर्द रो सकते हैं, और कोई पिता अपनी बेटी से कहे कि वह कमजोर नहीं है। शायद फिर रिश्ते अधिकार की नहीं, अपनापन की ज़मीन पर बनें। पर तब तक, इस वर्चस्व की लड़ाई में न जाने कितने रिश्ते दम तोड़ते रहेंगे। न जाने कितनी शामें खाली कुर्सियों को देखती रह जाएंगी। और न जाने कितने दिल उस एक शब्द की आस में तड़पते रहेंगे....समझ। 🌺 राघवेन्द्र चतुर्वेदी ©®

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जय श्री सालासर बालाजी महाराज 🙏🙏🙏
Shree Salasar Balaji Mandir@SalasarOfficial

salasarofficial 🌄🌸🙏 salasarofficial 🌸🙏आज के दिव्य श्रृंगार दर्शन - सालासर बालाजी🙏🌸 आज 28 अप्रैल, 2026 मंगलवार - बैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी के पावन दिन पर Salasar Balaji Mandir, Salasar Dham, Rajasthan से श्री सालासर बालाजी महाराज के दिव्य Daily Shringar Darshan I बाबा का अलौकिक श्रृंगार, मंदिर में गूंजती जयकारें और भक्तों की अटूट श्रद्धा - यह दृश्य हर भक्त के मन को भक्ति से भर देता है। ✨ सालासर बालाजी महाराज से प्रार्थना है कि आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हों और जल्द ही आपको बाबा के दरबार में दर्शन का पावन बुलाया मिले। ✨ अगर आप भी सच्चे Hanuman Bhakt हैं तो कमेंट में लिखों “जय सालासर बालाजी” 🙏 #salasarbalaji #salasardham #hanumanbhakt #salasarofficial #hanumantemple salasarbalaji salasardham hanumanbhakt salasarofficial hanumantemple

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