राघवेन्द्र चतुर्वेदी@Raghvendra_101
कभी-कभी मृत्यु को लेकर समाज में एक सहज-सा निष्कर्ष बना लिया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अचानक, बिना अधिक संघर्ष के चला जाए तो कहा जाता है कि उसके कर्म अच्छे थे, इसलिए उसे पीड़ा नहीं मिली। और यदि कोई लंबे समय तक बीमारी, असहायता या हर क्षण टूटते हुए विदा हो, तो मान लिया जाता है कि उसे अपने कर्मों का फल मिल रहा है। मैं इस धारणा को बहुत सतर्कता और संयम से देखता हूँ, क्योंकि जीवन और मृत्यु दोनों ही किसी गणितीय हिसाब-किताब से नहीं चलते, फिर भी ये सच है कि हमारे भीतर बैठा विवेक इन घटनाओं को अर्थ देने की कोशिश करता है।
अचानक आई मृत्यु बाहर से देखने वालों के लिए “आसान” लगती है। एक झटका, एक क्षण, और सब समाप्त। पीछे रह गए लोग कहते हैं चलो उसे ज्यादा कष्ट नहीं हुआ। शायद यही सोच उन्हें अपने दुख से उबरने में थोड़ी सहायता देती है पर ये भी सच है कि ऐसी मृत्यु अपने साथ अधूरापन छोड़ जाती है। बिना अलविदा कहे, बिना आख़िरी बात पूरी किए, बिना ये बताए कि भीतर क्या चल रहा था। ये पीड़ा मरने वाले की नहीं, बल्कि जीवित बचे लोगों की होती है, जो जीवन भर उस अधूरे संवाद को ढोते रहते हैं।
इसके उलट जब कोई व्यक्ति मृत्यु से पहले हर दिन, हर क्षण, भीतर से टूटता है, जब सांस लेना भी बोझ लगने लगे, जब शरीर साथ छोड़ने लगे, और मन बार-बार कहे कि अब बस तो बाहर से देखने वाले इसे “कर्मफल” का नाम दे देते हैं। शायद इसलिए क्योंकि इंसान को हर पीड़ा का कोई कारण चाहिए। बिना कारण दुख स्वीकार करना बहुत कठिन होता है। कर्मफल एक आसान व्याख्या बन जाती है जो हमें ये भरोसा दिलाती है कि दुनिया में कोई व्यवस्था है, कोई न्याय है।
लेकिन उस व्यक्ति के भीतर जो चल रहा होता है, उसे कोई शब्द पूरी तरह बयान नहीं कर सकता। वो हर सुबह उठते हुए मरता है, हर रात सोते समय जानता है कि कल फिर वही संघर्ष होगा। ये केवल शारीरिक पीड़ा नहीं होती, ये मन का क्षरण होता है। अपनी ही असहायता को रोज़-रोज़ देखना, अपने ही शरीर से पराजित होना। ऐसे समय में कर्म और फल की थ्योरी बहुत छोटी पड़ जाती है। वहाँ केवल इंसान बचता है नंगा, कमजोर, और पूरी तरह सच के सामने खड़ा हुआ।
मैं मानता हूँ कि जीवन में कर्मों का महत्व है, पर हर पीड़ा को दंड और हर सहज विदाई को पुरस्कार मान लेना, शायद हमारे अहंकार की एक चाल है। हम ये मानना चाहते हैं कि हम सही जिएँगे तो अंत भी “अच्छा” होगा। ये सोच हमें नैतिक बल देती है, पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। कई बार सबसे अच्छे लोग सबसे ज्यादा टूटते हैं, और कई बार सबसे साधारण जीवन जीने वाले चुपचाप चले जाते हैं। जीवन किसी पुरस्कार वितरण समारोह की तरह नहीं है।
लंबी पीड़ा वाले जीवन का एक कठोर सत्य ये भी है कि वह व्यक्ति धीरे-धीरे दुनिया से नहीं, बल्कि दुनिया उससे दूर होने लगती है। लोग मिलने कम आते हैं, बातें कम होती जाती हैं, सहानुभूति भी थक जाती है। उस समय व्यक्ति अपने कर्मों से नहीं, बल्कि अपने अकेलेपन से जूझ रहा होता है। यदि यही कर्मफल है, तो ये बहुत निर्दयी शब्द है उस स्थिति के लिए।
शायद मृत्यु का ढंग कर्मों का नहीं, बल्कि जीवन की अनिश्चितता का परिणाम होता है। और जो व्यक्ति मृत्यु से पहले हर क्षण मरता है, वह कोई सज़ा नहीं भुगत रहा होता, बल्कि वह हमें जीवन का सबसे नग्न सच दिखा रहा होता है कि हम नियंत्रण में नहीं हैं, हमारा शरीर, हमारी योजनाएँ, हमारा अहंकार सब अस्थायी हैं।
मैं ये भी मानता हूँ कि ऐसी पीड़ा मनुष्य को भीतर से बहुत गहरा बना देती है। जो व्यक्ति हर दिन मौत के पास बैठकर जीता है, उसके भीतर दिखावा नहीं बचता। वहाँ केवल सच बचता है, डर, स्वीकार, प्रार्थना, और कभी-कभी एक गहरी शांति। ये शांति किसी अच्छे कर्म का फल हो या न हो, पर ये जीवन की आख़िरी सीख ज़रूर होती है।
इसलिए मैं न तो अचानक मृत्यु को पूरी तरह “अच्छे कर्मों” का पुरस्कार मान पाता हूँ, और न ही लंबी यातना को “बुरे कर्मों” की सज़ा। मैं बस इतना मानता हूँ कि हर विदाई का अपना अर्थ होता है, और हर पीड़ा अपने भीतर एक मौन प्रश्न लिए होती है जिसका उत्तर बाहर नहीं, हमारे भीतर कहीं छुपा होता है।
शायद सबसे बड़ा कर्म यही है कि हम किसी की पीड़ा को आंकने से पहले उसे समझने की कोशिश करें। और सबसे बड़ा फल ये कि हम जीवन को चाहे जितना मिला हो, पूरी संवेदना के साथ देखें, क्योंकि अंत में मृत्यु नहीं, बल्कि हमारा दृष्टिकोण ही तय करता है कि हम इंसान थे या केवल निर्णय सुनाने वाले दर्शक। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101