धुरंधर , शब्द संस्कृत के धुरी ( धरती , धरा, भार ) से बना है , जिसका शाब्दिक अर्थ है "धुरी को धारण करने वाला "
सरल भाषा मे , इसे श्रेष्ठ , वीर , विद्वान, निपुण इतियादी के रूप में प्रयोग किया जाता है।
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देवत्व को प्राप्त हमारे पितरों ने देवों की महिमा प्राप्त की एवं देवों के साथ यज्ञकार्य पूर्ण किए. जो तेजस्वी वस्तुएं हैं, वे सब उनके साथ मिल गई. पितर देवों के शरीर में प्रवेश कर गए हैं.
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हे मृतक की पत्नी! तुम अपने पुत्रों और घर का ध्यान करके यहां से उठो. तुम इस मरे हुए के पास क्यों सोई हो? आओ. तुम इस पुरुष से पाणिग्रहण और गर्भाधान के अनुरूप व्यवहार कर चुकी हो. तुम इसके साथ मरने का विचार छोड़ो.
- ऋग्वेद 10.18.8
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हे मनुष्यो! जो गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री आदित्यों की बहिन, दूध का निवासस्थान, अपराधरहित एवं हीनताहीन है, उस गाय का वध मत करो. यह बात मैंने बुद्धिमान् लोगों से कही थी. (१५)
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इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् । एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥ (४६)
बुद्धिमान् लोग इस आदित्य को ही इंद्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं. वह सुंदर पंखों और शोभन गति वाला है ... vedsearch.org/rigved/1/164/46
"एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः"
हिन्दी में अनुवाद:
यह वाक्य एक ऋग्वेद श्लोक से लिया गया है और इसका अर्थ यह है कि अग्नि एक ऐसी शक्ति है जो सभी साधुओं (बुद्धिमान और पवित्र लोग) के लिए एक है, इसमें अग्नि के विभिन्न नामों यम (न्यायधीश) और मतारिश्वान (आकाश के देवता) का उल्लेख भी है।
"एक है जो सभी साधुओं के लिए एक है, वह अग्नि है। यम और मतारिश्वान उसके कई नाम हैं।"
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"एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः"
"एकं॒" (Ekam) means "one", emphasizing the unity of these different names for Agni.
"सद्विप्रा॑" (Sadviprā) means "the wise sages".
"बहु॒धा व॑दन्त्य॒" (Bahudhā Vadanty) means "who speak in many ways", highlighting the diversity of names and epithets used to describe Agni.
"अग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः" (Agnim Yamam Matariśvanam Āhuḥ) means "They call Agni Yama, Matariśvan", listing two additional names for the fire deity.
Overall, this verse highlights the multifaceted nature of Agni as a deity in Hindu mythology, emphasizing his importance and power through multiple epithets and names.
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म॒हो अर्णः॒ सर॑स्वती॒ प्र चे॑तयति के॒तुना॑ । धियो॒ विश्वा॒ वि रा॑जति ॥ (१२)
सरस्वती नदी ने प्रवाहित होकर विशाल जलराशि उत्पन्न की है. साथ ही यज्ञ करने वाले लोगों में उन्होंने ज्ञान भी जगाया है. (१२) vedsearch.org/rigved/1/3/12
चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम् । य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती ॥ (११)
Saraswati gives inspiration to speak the truth and educates people with good intellect. She has accepted this yajna of ours. (11) vedsearch.org/rigved/1/3/11
चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम् । य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती ॥ (११)
सरस्वती सत्य बोलने की प्रेरणा देने वाली हैं तथा उत्तम बुद्धि वाले लोगों को शिक्षा देती हैं. वे हमारा यह यज्ञ स्वीकार कर चुकी हैं. (११) ... vedsearch.org/rigved/1/3/11
बुद्धिमान् लोग इस आदित्य को ही इंद्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं. वह सुंदर पंखों और शोभन गति वाला है.
एक होने पर भी ये विद्वानों द्वारा अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं.
vedsearch.org/rigved/1/164/46
यो अ॒ग्निः क्र॑व्य॒वाह॑नः पि॒तॄन्यक्ष॑दृता॒वृधः॑ । प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ ॥
जो अग्नि श्राद्ध की सामग्री को पितरों तक ढोने वाले, यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं देवपितरो का यज्ञ करने वाले हैं, मैं उन्हीं के पास होम की सामग्री ले जाता हूं.
vedsearch.org/rigved/10/16/11
Manu and other Rishi's have defined dharmic limits in the form of seven acts -
theft,
adultery with the wife of a Guru,
killing a brahmin,
killing an embryo,
drinking alcohol,
lying and low acts.
Whoever does not follow these limits is immoral.
vedsearch.org/atharved/5/1/6@KanchiMatham
मनु आदि ऋषियों ने
चोरी,
गुरुपत्नीगमन,
ब्रह्महत्या,
भ्रूणहत्या,
मद्यपान,
मिथ्याभाषण एवं पापकर्म
— इन सात कामों के रूप में धार्मिक, मर्यादा निश्चित की है.
जो इस मर्यादा को नहीं मानता, वह पापी है.
vedsearch.org/atharved/5/1/6@sattology
The holding power of both our hands with the same form is not the same.
Cows originating from the same mother do not give equal milk.
The valour of the twin brothers is not the same.
Two people born in one family do not donate equally.
vedsearch.org/rigved/10/117/9