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Deepak Shankar Jorwal
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Deepak Shankar Jorwal
@Shankarjorwal
Founder : @Hindi_Panktiyan & @Panktiprakashan | कॉलेज : IIT Kanpur | गाँव : जिंसी का पुरा, राजस्थान
Katılım Haziran 2012
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हमारे यहाँ दो व्यक्तियों से पहले शादी
धर्म की होती है
जाति की होती है
परिवारों की होती है
नीतियों की होती है
परंपराओं की होती है
उम्र की भी होती है
हमारे यहाँ की शादी
कभी भी दो प्रेमियों की नहीं होती
उनकी इच्छाओं की नहीं होती
दो जोड़ों की खुशियों की नहीं होती
उनके खुद के निर्णय की कभी नहीं होती
शायद समाज का मानना है
कि प्रेम के बंधन से ज्यादा मजबूत
सिर पर थोपा गया
जिम्मेदारी का बंधन होता है।
~ मनीष यादव

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@ANayyar16 Koi Specific reason nahi tha. It was just a natural conversation. To make sure guest easily open up ho sake, use natural flow me rahne dete h
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@Shankarjorwal Deepak, don't you think the whole conversation can be compressed to one hour instead of 2 hours ?
Any specific reason for 2 hour format ?
English

IIT कानपुर से ग्रेजुएट आकांक्षा चौधरी की कहानी किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकती है। 50 लाख रुपये सालाना की शानदार कॉर्पोरेट सैलरी और एक हाई-पेइंग जॉब होने के बावजूद, आकांक्षा ने सब कुछ छोड़ दिया।
उनकी इस यात्रा का कारण कोई एक घटना नहीं, बल्कि अंदरूनी खालीपन और बोरियत थी। आकांशा बताती हैं कि कॉर्पोरेट लाइफ में 2 साल काम करने के बाद, उनका काम उन्हें काफी 'रिपिटेटिव' (बार-बार दोहराया जाने वाला) लगने लगा था। उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि सफलता की जिस दौड़ में वे शामिल हैं, वहां कुछ नया या रोमांचक नहीं बचा है।
खुद के मन की शान्ति की खोज में, उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट पहचान को पीछे छोड़ते हुए आध्यात्मिक शांति और आत्म-खोज (self-discovery) की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने Isha Foundation (By Sadhguru) का 9 महीने का एक आध्यात्मिक प्रोग्राम ज्वाइन किया और लगभग 2 साल तक एक आश्रम में रहकर एक संन्यासी जैसी जीवनशैली अपनाई।
उनका यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि सफलता की परिभाषा सिर्फ बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि मानसिक संतुष्टि और जीवन का अर्थ ढूंढना भी है। इनका पूरा पॉडकास्ट Ground Floor YouTube चैनल पर उपलब्ध है।

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मुझे दहेज़ चाहिए
तुम लाना तीन चार ब्रीफ़केस
जिसमें भरे हो
तुम्हारे बचपन के खिलौने
बचपन के कपड़े
बचपने की यादें
मुझे तुम्हें जानना है
बहुत प्रारंभ से..
तुम लाना श्रृंगार के डिब्बे में बंद कर
अपनी स्वर्ण जैसी आभा
अपनी चांदी जैसी मुस्कुराहट
अपनी हीरे जैसी दृढ़ता..
तुम लाना अपने साथ
छोटे बड़े कई डिब्बे
जिसमें बंद हो
तुम्हारी नादानियाँ
तुम्हारी खामियां
तुम्हारा चुलबुलापन
तुम्हारा बेबाकपन
तुम्हारा अल्हड़पन..
तुम लाना एक बहुत बड़ा बक्सा
जिसमें भरी हो तुम्हारी खुशियां
साथ ही उसके समकक्ष वो पुराना बक्सा
जिसमें तुमने छुपा रखा है
अपना दुःख
अपने ख़्वाब
अपना डर
अपने सारे राज़
अब से सब के सब मेरे होगे..
मत भूलना लाना
वो सारे बंद लिफ़ाफे
जिसमें बंद है स्मृतियां
जिसे दिया है
तुम्हारे मां और बाबू जी ने
भाई-बहनों ने
सखा-सहेलियों ने
कुछ रिश्तेदारों ने..
न लाना टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन
लेकिन लाना तुम किस्से, कहानियां
और कहावतें अपने शहर की
कार,मोटरकार हम ख़ुद खरीदेंगे
तुम लाना अपने तितली वाले पंख
जिसे लगा
उड़ जाएंगे अपने सपनों के आसमान में..
मुझे दहेज़ में चाहिए,
तुम्हारा पूरा प्यार,
पूरा खालीपन,
तुम्हारे आत्मा के वसीयत का पूरा हिस्सा,
सिर्फ़ इस जन्म का साथ तो चाहिए ही है..
- सौरभ रामाधुन

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