सुभाष प्रजापत नेवरी

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@Subhash_Newari

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झुञ्झुनू Katılım Aralık 2011
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सुभाष प्रजापत नेवरी
राम राम कहने से ताजगी का एहसास होता है।🌷 राम राम कहने से बिगड़े काम बनते हैं🌷 राम राम कहने से घर की सुख संपदा बढ़ती हैं🌷 राम राम कहने से मानसिक बल मिलता है 🚩 राम राम कहने से मोक्ष एवं मुक्ति मिलती है 🚩 ‌ राम राम कहने से हर सपने साकार होते हैं।🌷 🙏#जय_श्रीराम 🚩 ‌🙏
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Jhunjhunun, India 🇮🇳 हिन्दी
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Raghav Chadha
Raghav Chadha@raghav_chadha·
बड़े-बड़े Food Brands ग्राहकों को खुलेआम धोखा दे रहे हैं 🚨 चीनी से भरे Juice 🥤 के packet पर Fresh Fruits की तस्वीरें दिखाते हैं, और पीछे छोटे अक्षरों में लिख देते हैं: “pictures are for marketing purposes only.” ❓ कब तक चलेगा ये खेल? 🏛️ आज संसद में मैंने सरकार से misleading branding और false advertisement पर कार्रवाई की माँग की।
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🐪राजस्थान वाळा⚔️🇮🇳
साहित्य अकादमी दिल्ली से राजस्थानी भाषा मे उत्कृष्ट लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने वाले भरत ओला ,रामस्वरूप किसान ,देवीलाल सहारण, राजूराम बिजारणियां आदि भी सामंती या चारण है क्या ? राजस्थानी भाषा का अध्ययन करो ,भाई 🙏 #Make_Rajasthani_Rajbhasha
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic

★ क्यों राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा नहीं मिलना चाहिए? आज राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की मांग तेज़ हो रही है। लेकिन यह मांग अक्सर उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को समझे बिना की जा रही है—और यही सबसे बड़ा खतरा है। भारत में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक संरचना और सत्ता के वितरण से गहराई से जुड़ी होती है। जैसा कि समाजशास्त्री Pierre Bourdieu ने स्पष्ट किया था, भाषा भी एक प्रकार की “symbolic power” होती है—जो यह तय करती है कि किसका ज्ञान वैध माना जाएगा और किसकी आवाज़ हाशिए पर रहेगी। भारतीय संदर्भ में यह संबंध और भी जटिल है, जहाँ भाषा, जाति और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। राजस्थानी के साथ समस्या केवल उसकी मान्यता की नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक चरित्र की भी है। ऐतिहासिक रूप से राजस्थानी साहित्य का बड़ा हिस्सा चारणों और दरबारी कवियों द्वारा रचा गया, जिसमें शासकों—राजा-रजवाड़ों और ठाकुरों—की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा, वीर-गाथाएँ और सामंतवादी मूल्यों का महिमामंडन प्रमुख रहा है। इस साहित्य में यथार्थ से अधिक कल्पना, और समाज की समानता से अधिक सत्ता की चापलूसी दिखाई देती है। ऐसा साहित्य जब भाषा के साथ संस्थागत रूप से प्रमोट होता है, तो वह केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं रहता—बल्कि एक विचारधारा का विस्तार बन जाता है। परिणामस्वरूप: समाज में सामंतवादी मानसिकता को नई वैधता मिलती है जातिगत ऊँच-नीच और भेदभाव को सांस्कृतिक समर्थन मिलता है “वीरता” और “सम्मान” के नाम पर असमानता को सामान्य बना दिया जाता है यह वही प्रक्रिया है जिसमें साहित्य के माध्यम से एक ऐसा कल्पना-लोक गढ़ा जाता है, जहाँ ऐतिहासिक शासक “नायक” बन जाते हैं और आम जन का संघर्ष अदृश्य हो जाता है—मानो वे किसी काल्पनिक गाथा के पात्र हों, न कि वास्तविक समाज के हिस्से। इसलिए यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक प्रभाव का है जो उसके साथ जुड़ा हुआ है। यदि किसी भाषा की मुख्यधारा का साहित्य लगातार सामंतवाद, अतिशयोक्ति और सामाजिक असमानता को ही पोषित करता रहा है, तो उसे संस्थागत मान्यता देना अनजाने में उन्हीं मूल्यों को पुनर्जीवित करना हो सकता है। अतः यह आवश्यक है कि हम भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समझ के साथ निर्णय लें। जब तक राजस्थानी साहित्य में व्यापक रूप से समतावादी, यथार्थवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं होता, तब तक उसे भाषा का दर्ज़ा देने की मांग पर पुनर्विचार होना चाहिए। वैसे भी राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यधिक घटिया क़िस्म का हैं। जो व्यक्ति राजस्थानी साहित्य में रुचि लेने लग जाता हैं, वो शेष संसार से कट जाता हैं और एक कल्पना लोक में जीने लग जाता हैं। राजस्थानी साहित्य अत्यधिक अतिशयोक्तिवादी और सामंतवादी हैं। राजस्थानी साहित्य पढ़ने वाले को राजपूत Harry Potter के हीरो लगने लग जाते हैं। पूरे राजस्थानी साहित्य का एक नमूना इस प्रकार हैं जैसे : “पहलां सूरज अरदास करी, रण में लीयो नाम, धरती माथां तिलक धर्यो, बोल्या जीतूं आजो काम। जियो जियो ठाकुर लाखा, गजब कर्यो शौर्य काम, मकोड़ो रो माथो काप्यो, आबू बह्यो लहू तमाम। इतरो देख सब चकित रह्या, बाज्या ढोल-नगाड़ा नाम, नानकड़ो रण जीत गयो, बण गयो वीरां में धाम। कविया लिख्या गाथा ऐ री, बढ़्यो शौर्य रो नाम, मकोड़ां सूं रण जीत लियो, थांरो अमर रह्यो काम। नाम रो डंको गूंज उठ्यो, चारूं दिसा अर धाम, लाखा रा जस गावत फिरे, गूंज्यो थारो नाम। फेर उठी रण री हुंकार, हाथां ली तीखी तलवार, लाखा फेर कमाल कर्यो, लायो पाड़ तितर रो बाल। थांरो बढ़्यो सम्मान, देख्यो सगळो संसार, इण महा रण में फेर, थारो गूंज्यो जयकार।”

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ocean jain
ocean jain@ocjain4·
गजबे कौम है 😂😂😂 कश्मीर ने 48 करोड़ का चंदा इकट्ठा किया.... ईरान को भेजने के नाम पर.... अब भारत मे ईरानी दूतावास ने बताया है कि हमे एक्को रुपया नही दिए मायायो... अब एक टीम गठित की गई जिसने चंदा लिया है उसकी गाड़ी पलटाई जाएगी! 😂😂😂
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🐪राजस्थान वाळा⚔️🇮🇳
एक भाषा क्षेत्र या राज्य की होती है ना की किसी धर्म या जाति की ! जो राजस्थानी भाषा को सामंती भाषा कहते है वो रिप्लाई दे ! • तेजा गायन ,तेजाजी -कर्माबाई के भजन किस भाषा मे है ? • घर मे ब्याव सावे पर होने वाले गीत,गाळ,मायरा किस भाषा मे लिखित है #Make_Rajasthani_Rajbhasha
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Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic

★ क्यों राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा नहीं मिलना चाहिए? आज राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की मांग तेज़ हो रही है। लेकिन यह मांग अक्सर उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को समझे बिना की जा रही है—और यही सबसे बड़ा खतरा है। भारत में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक संरचना और सत्ता के वितरण से गहराई से जुड़ी होती है। जैसा कि समाजशास्त्री Pierre Bourdieu ने स्पष्ट किया था, भाषा भी एक प्रकार की “symbolic power” होती है—जो यह तय करती है कि किसका ज्ञान वैध माना जाएगा और किसकी आवाज़ हाशिए पर रहेगी। भारतीय संदर्भ में यह संबंध और भी जटिल है, जहाँ भाषा, जाति और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। राजस्थानी के साथ समस्या केवल उसकी मान्यता की नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक चरित्र की भी है। ऐतिहासिक रूप से राजस्थानी साहित्य का बड़ा हिस्सा चारणों और दरबारी कवियों द्वारा रचा गया, जिसमें शासकों—राजा-रजवाड़ों और ठाकुरों—की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा, वीर-गाथाएँ और सामंतवादी मूल्यों का महिमामंडन प्रमुख रहा है। इस साहित्य में यथार्थ से अधिक कल्पना, और समाज की समानता से अधिक सत्ता की चापलूसी दिखाई देती है। ऐसा साहित्य जब भाषा के साथ संस्थागत रूप से प्रमोट होता है, तो वह केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं रहता—बल्कि एक विचारधारा का विस्तार बन जाता है। परिणामस्वरूप: समाज में सामंतवादी मानसिकता को नई वैधता मिलती है जातिगत ऊँच-नीच और भेदभाव को सांस्कृतिक समर्थन मिलता है “वीरता” और “सम्मान” के नाम पर असमानता को सामान्य बना दिया जाता है यह वही प्रक्रिया है जिसमें साहित्य के माध्यम से एक ऐसा कल्पना-लोक गढ़ा जाता है, जहाँ ऐतिहासिक शासक “नायक” बन जाते हैं और आम जन का संघर्ष अदृश्य हो जाता है—मानो वे किसी काल्पनिक गाथा के पात्र हों, न कि वास्तविक समाज के हिस्से। इसलिए यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक प्रभाव का है जो उसके साथ जुड़ा हुआ है। यदि किसी भाषा की मुख्यधारा का साहित्य लगातार सामंतवाद, अतिशयोक्ति और सामाजिक असमानता को ही पोषित करता रहा है, तो उसे संस्थागत मान्यता देना अनजाने में उन्हीं मूल्यों को पुनर्जीवित करना हो सकता है। अतः यह आवश्यक है कि हम भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समझ के साथ निर्णय लें। जब तक राजस्थानी साहित्य में व्यापक रूप से समतावादी, यथार्थवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं होता, तब तक उसे भाषा का दर्ज़ा देने की मांग पर पुनर्विचार होना चाहिए। वैसे भी राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यधिक घटिया क़िस्म का हैं। जो व्यक्ति राजस्थानी साहित्य में रुचि लेने लग जाता हैं, वो शेष संसार से कट जाता हैं और एक कल्पना लोक में जीने लग जाता हैं। राजस्थानी साहित्य अत्यधिक अतिशयोक्तिवादी और सामंतवादी हैं। राजस्थानी साहित्य पढ़ने वाले को राजपूत Harry Potter के हीरो लगने लग जाते हैं। पूरे राजस्थानी साहित्य का एक नमूना इस प्रकार हैं जैसे : “पहलां सूरज अरदास करी, रण में लीयो नाम, धरती माथां तिलक धर्यो, बोल्या जीतूं आजो काम। जियो जियो ठाकुर लाखा, गजब कर्यो शौर्य काम, मकोड़ो रो माथो काप्यो, आबू बह्यो लहू तमाम। इतरो देख सब चकित रह्या, बाज्या ढोल-नगाड़ा नाम, नानकड़ो रण जीत गयो, बण गयो वीरां में धाम। कविया लिख्या गाथा ऐ री, बढ़्यो शौर्य रो नाम, मकोड़ां सूं रण जीत लियो, थांरो अमर रह्यो काम। नाम रो डंको गूंज उठ्यो, चारूं दिसा अर धाम, लाखा रा जस गावत फिरे, गूंज्यो थारो नाम। फेर उठी रण री हुंकार, हाथां ली तीखी तलवार, लाखा फेर कमाल कर्यो, लायो पाड़ तितर रो बाल। थांरो बढ़्यो सम्मान, देख्यो सगळो संसार, इण महा रण में फेर, थारो गूंज्यो जयकार।”

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🐪राजस्थान वाळा⚔️🇮🇳
रामजी महाराज रै जलमोत्सव #रामनवमी री सगळा नै मोकळी शुभकामनावां 🙏 ࿗ ‼️ जै श्री राम ‼️࿗ रामजी महाराज सगळा नै निरोगा राखै 🙌🚩 #राम_नवमी #राजस्थानी #जय_श्री_राम
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🐪राजस्थान वाळा⚔️🇮🇳
#राजस्थानी भासा रा TV चैनल ' गणगौर ' री नुवीं पहल 📺 अब मुख्यमंत्री जी रा भाषण राजस्थानी भासा म देखो कार्यक्रम —'आओ जाणां ,कांई केवै मुख्यमंत्री ' "रोज सांझ रा 7:30 अर दिन उगे 11:30 बज्या,सिर्फ @GangaurTV माथै ! गणगौर TV टीम नै मोकळा रंग अर लखदाद💐 #Make_Rajasthani_Rajbhasha
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🐪राजस्थान वाळा⚔️🇮🇳
#राजस्थानी मेळें🎎 अठै आपनै मिलेला : • घर बरतावु सामान -बाजोट,माचो-खाट ,झेरना-झेरनी,पागा-निवार,बरतन आद • खेती रो सामान -जेळी,दंताळी,कसी- खुवाड़ीयों,दांतळी,खुरपी-फावड़ों आद • खावण म -भूंगड़ा,मखाणा,जलेबियां,मरची बड़ा आद ओर कांई मिले मेळा म थे बतावो ? #Make_Rajasthani_Rajbhasha
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MOHIT YADAV
MOHIT YADAV@MOHITYADAV4153·
देखणो मत भूलज्यो– 'आओ जाणां कांई केवै मुख्यमंत्री' "रोज सांझरे 7:30 बज्या और सवेरे 11:30 बज्या (रिपीट), सिर्फ गणगौर टीवी माथे।" 🙏 @GangaurTV टीम नै मोकळा रंग अर लखदाद 🙏 @grok #Make_Rajasthani_official #राजस्थानी_बिना_क्यांरो_राजस्थान #आपणो_अग्रणी_राजस्थान #Rajasthan
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टाबर री शिक्षा रो माध्यम एकमातर उण री मायड़भासा नैं है। मातृ भासा टाबर खातर अतरी गुणकारी है जितरो टाबर खातर उण री मां रो दूध। राजस्थान रा टाबरां रो हक उणां सूं क्यूं खोसो @RajCMO @CMHelpdesk @BhajanlalBjp @KumariDiya @DrPremBairwa @1stIndiaNews @RavindraBhati__ @arvindchotia
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सुभाष प्रजापत नेवरी
#रामनवमी की मोकळी मोकळी बधाईयां रामजी राजी राखैं।। रंक रुखाळा राम जी, रसना राम रटाय। रजा राम री रैयसी, रग रग राम रमाय।। #जय_श्रीराम 🙏🏻🚩
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कानून मंत्री @arjunrammeghwal जी 🙏 डोगरी,कश्मीरी,भोटी ओर पुरगी भाषाएं जिस कानून के तहत राजभाषा बनी है उसी नेम कायदे से राजस्थान में राजस्थानी को राजभाषा बणवा दो । #Make_Rajasthani_Rajbhasha @BhajanlalBjp @KumariDiya @PMOIndia @BjpMahimakumari @ombirlakota @hanumanbeniwal
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kapil bishnoi
kapil bishnoi@Kapil_Jyani_·
गर्मियों का सीज़न आ गया है…!! इस बार नए तरह के कूलर मार्केट में आए हैं… मार्बल के कूलर…!! बाक़ी वालो से सस्ते.. बाक़ी वालों से दिखने में सुंदर.. बाक़ी वालों से मज़बूत… और सालों-साल चलने वाले…!!
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Vinod Bhojak
Vinod Bhojak@VinoBhojak·
काका अक्टूबर में "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" की पूरी टीम को संदीप ने बीकानेर के रेतीले धोरों जीप,ऊंट सफारी और देशी #राजस्थानी जीमण के साथ रात बिताने का निमन्त्रण दिया आने पहले आपको और @arvindchotia जी को सूचित कर देगे...!! @Rajsthanikaka #थार_रेगिस्तान #Bikaner
राजस्थानी काका 💪🙏@Rajsthanikaka

बीकानेर वाले @VinoBhojak जी के लाड़ले सुपुत्र संदीप भोजक की लंबी छलांग तारक महता का उल्टा चश्मा 👓 सभी का पसंदीदा है अब विनोद जी से निवेदन है वो काका को जेठालाल और बबीता जी से मिलाना पड़ेगा 😁😁 लाड़ले @arvindchotia जी की पोपट लाल और भागा से मीटिंग करवानी पड़ेगी

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kapil bishnoi
kapil bishnoi@Kapil_Jyani_·
राघव चड्ढा…!! कम्पनियाँ ग्राहकों से पैसा पूरे डेटा का लेती है… लेकिन रात के बारह बजे बचा हुआ डेटा हज़म कर लेती है… उस बचे हुए डेटा का ग्राहक ने पैसा दिया है… वो अगले दिन carry forward होना चाहिए…!!! वाक़ई Valid point उठाया है चड्ढा साहब ने…!!!
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kapil bishnoi
kapil bishnoi@Kapil_Jyani_·
कहानी का शीर्षक है…. मेहंदी के फूल…!!! बीते दौर की कहानी हैं… आप आज के हिसाब से व्याख्या कर सकते हो…!!
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#MartyrsDay #ShaheedDiwas #शहीद_दिवस जिण मिनखां री आहुतियां सु आपा सगळा आज जीवतां हा ,उण मिनखां ने आपा कियां भुल सका हा 🇮🇳 अमर शहीद राजगुरु जी ,भगत सिंह जी अर सुखदेव जी ने #बलिदान_दिवस माथै सत सत नमन 🙏💐 इंकलाब जिंदाबाद ✊ #बलिदान_दिवस_23_मार्च_1931
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Sikar Junction 🇮🇳🚉 सीकर जंक्शन (SIKR) - Updates
🔸आसान होगा सफर : महाकाल की नगरी उज्जैन के लिए सीधी रेलगाड़ी का संचालन आज से 🔸बीकानेर-काचीगुडा का श्रीगंगानगर तक विस्तार, शेखावाटी को भी जोड़ेगी ट्रेन #IndianRailways #Railnews #Railwaynews #railways
Sikar Junction 🇮🇳🚉 सीकर जंक्शन (SIKR) - Updates tweet media
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🐪राजस्थान वाळा⚔️🇮🇳
╔═══ ≈ ══🛕🚩🛕══ ≈ ═══╗ ऊंचे भाखर म थारौ देवरो रै म्हारी जगदम्बे अम्बे माँ 🔱 थानै निवण करें रै नर-नार ओ ,वारी जावु जोग माया 🙏 🎙️ पुष्पा चौधरी अर टीम जै माता जी री सा 🙌 #Make_Rajasthani_Rajbhasha @PARAMUSAorg ╚═══ ≈ ══🛕🔱🛕══ ≈ ═══╝
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