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छोटी चिट्ठी का बड़ा सवाल
बराबरी की भाषा ऐसी भाषा है, जो सिर्फ़ बोलने का ज़रिया न हो बल्कि बराबरी का एहसास भी दे। जब हम महिलाओं के लिए अलग, बराबर और सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते, तो अनजाने में उनकी पहचान और संभावनाओं को सीमित कर देते हैं।
भाषा सोच को गढ़ती है और सोच समाज को। इसीलिए भाषा में बराबरी होना बेहद ज़रूरी है। इस सोच को गहराई से समझने के लिए यह वीडियो देखें, जो रोज़मर्रा के उदाहरणों के ज़रिये दिखाता है कि भाषा का एक छोटा-सा पक्षपात कैसे बड़ी असमानता पैदा करता है
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