कभी-कभी शायद सदी में एक बार एक व्यक्ति ऐसा उत्पन्न हो जाता है जिसकी कामना की अपेक्षा उसका विवेक अधिक क्रियाशील होता है। ऐसा व्यक्ति संसार में तहलका मचा देता है, किन्तु सुखी नहीं हो पाता..
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अज्ञेय
सभी लोग लगे हैं काम में
चले गए.. मैं हूँ आराम में
हमाम में.. याद करूँगा तुम्हें
शाम में.. सब होंगे अपने
धन-धाम में.. मैं बैठा रहूँगा
अन्तिम विराम में..
नीरस निष्काम में
तमाम में..
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दूधनाथ सिंह
जब सावन बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..!
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इब्न-ए-इंशा