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𝗨𝗻𝗶𝘁𝗲. 𝗗𝗶𝘀𝗰𝘂𝘀𝘀. 𝗥𝗲𝘀𝗼𝗹𝘃𝗲. हम जनता की आवाज़ हैं, जो नागरिक के अधिकारों जैसे वास्तविक मुद्दों पर संवाद और बदलाव लाने के लिए समर्पित है।🌐

INDIA Katılım Nisan 2022
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पुरुष के लिए स्त्री पहेली रही है। स्त्री के लिए पुरुष पहेली है..!❣️🤯👇 स्त्री सोच ही नहीं पाती कि तुम किसलिए चांद पर जा रहे हो? घर काफी नहीं? वही तो यशोधरा ने बुद्ध से पूछा, जब वे लौटकर आए, कि जो तुमने वहां पाया वह यहां नहीं मिल सकता था? ऐसा जंगल भागने की क्या पड़ी थी? यह घर क्या बुरा था? अगर शांत ही होना था तो जितनी सुविधा यहां थी, इतनी वहां जंगल में तो नहीं थी। तुमने कहा होता, हम तुम्हें बाधा न देते। हम तुम्हें एकांत में छोड़ देते। हम सारी सुविधा कर देते कि तुम्हें जरा भी बाधा न पड़े। लेकिन बुद्ध को अगर यशोधरा ऐसा इंतजाम कर देती कि जरा भी बाधा न पड़े--यशोधरा अपनी छाया भी न डालती बुद्ध पर--तो भी बुद्ध बंधे-बंधे अनुभव करते। क्योंकि वे अनजाने तार यशोधरा के चारों तरफ फैलते जाते, और भी ज्यादा फैल जाते। वह छाया की तरह चारों तरफ अपना जाल बुन देती। घबड़ाकर भाग गए। जो भी कभी भागा है जंगल की तरफ, प्रेम से घबड़ाकर भागा है। और क्या घबड़ाहट है? कहीं प्रेम बांध न ले। कहीं प्रेम आसक्ति न बन जाए। कहीं प्रेम राग न हो जाए। स्त्रियों को जंगल की तरफ भागते नहीं देखा गया। क्योंकि स्त्री को समझ में ही नहीं आता, भागना कहां है? डूबना है। डूबना यहीं हो सकता है। और स्त्री ने बहुत चिंता नहीं की परमात्मा की जो आकाश में है, उसने तो उसी परमात्मा की चिंता की जो निकट और पास है। स्त्री को रस नहीं मालूम होता कि चीन में क्या हो रहा है? उसका रस होता है, पड़ोसी के घर में क्या हो रहा है? पास। तुम्हें कई दफा लगता भी है--पति को--कि ये भी क्या फिजूल की बातों में पड़ी है कि पड़ोसी की पत्नी किसी के साथ चली गयी, कि पड़ोसी के घर बच्चा पैदा हुआ, कि पड़ोसी नयी कार खरीद लाया--ये भी क्या फिजूल की बातें हैं? वियतनाम है, इजराइल है, बड़े सवाल दुनिया के सामने हैं। तू नासमझ! पड़ोसी के घर बच्चा हुआ, यह भी कोई बात है? लाखों लोग मर रहे हैं युद्ध में। इस एक बच्चे के होने से क्या होता है? स्त्री को समझ में नहीं आता कि पड़ोसी के घर बच्चा पैदा होता है, इतनी बड़ी घटना घटती है--एक नया जीवन अवतीर्ण हुआ; कि पड़ोसी की पत्नी किसी के साथ चली गयी--एक नए प्रेम का आविर्भाव हुआ; तुम्हें इसका कुछ रस ही नहीं है! इजराइल से लेना-देना क्या है? इजराइल से फासला इतना है कि स्त्री के मन पर उसका कोई अंकुरण नहीं होता, कोई छाप नहीं पड़ती। दूरी इतनी है। स्त्री परमात्मा जो बहुत दूर है आकाश में उसमें उत्सुक नहीं है। परमात्मा जो बहुत पास है, बेटे में है, पति में है, परिवार में है, पड़ोसी में है, उसमें उसका रस है। क्योंकि दूर जाने में उसकी आकांक्षा नहीं है। यहीं डूब जाना है। #womeninmaledominatedfields
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बडी उम्र की कुँवारी लड़कियाँ घर बैठी हैं अगर अभी भी माँ-बाप नहीं जागे तो स्थितियाँ और विस्फोटक हो सकती हैं। समाज आज बच्चों के विवाह को लेकर इतना सजग हो गया है कि आपस में रिश्ते ही नहीं हो पा रहे हैं। समाज में आज 27-28-32 उम्र तक की बहुत सी कुँवारी लडकियाँ घर बैठी हैं क्योंकि इनके सपने हैसियत से भी बहुत ज्यादा हैं, इस प्रकार के कई उदाहरण हैं। ऐसे लोगों के कारण समाज की छवि बहुत खराब हो रही है। सबसे बडा मानव सुख, सुखी वैवाहिक जीवन होता है। पैसा भी आवश्यक है, लेकिन कुछ हद तक पैसे की वजह से अच्छे रिश्ते ठुकराना गलत है। पहली प्राथमिकता सुखी संसार व अच्छा घर-परिवार होना चाहिये। ज्यादा धन के चक्कर में अच्छे रिश्तों को नजर-अंदाज करना गलत है, संपति खरीदी जा सकती है लेकिन गुण नहीं। मेरा मानना है कि घर-परिवार और लडका अच्छा देखें लेकिन ज्यादा के चक्कर में अच्छे रिश्ते हाथ से नहीं जाने दें। सुखी वैवाहिक जीवन जियें। 30 की उम्र के बाद विवाह नहीं होता समझौता होता है और मेडिकल स्थिति से भी देखा जाए तो उसमें बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। आज उससे भी बुरी स्थिति कुंडली मिलान के कारण हो गई है। आप सोचिए जिनके साथ कुंडली मिलती है लेकिन घर और लड़का अच्छा नहीं और जहाँ लड़के में सभी गुण हैं वहां कुण्डली नहीं मिलती और हम सब कुछ अच्छा होने के कारण भी कुण्डली की वजह से रिश्ता छोड़ देते हैं। आप सोच के देखें जिन लोगो के 36 में से 20 या फिर 36 गुण भी मिल गए फिर भी उनके जीवन में तकलीफें हो रही हैं क्योंकि हमने लडके के गुण नहीं देखे। पढे लिखे आधुनिक समाज को एक सदी और पीछे धकेल दिया ! आजकल समाज में लोग बेटी के रिश्ते के लिए (लड़के में) चौबीस टंच का सोना खरीदने जाते हैं, देखते-देखते चार पांच साल व्यतीत हो जाते है। उच्च शिक्षा या जॉब के नाम पर भी समय व्यतीत कर देते हैं। लड़के देखने का अंदाज भी समय व्यतीत का अनोखा उदाहरण हो गया है? खुद का मकान है कि नहीं? अगर है तो फर्नीचर कैसा है? घर में कमरे कितने हैं? गाडी है कि नहीं? है तो कौनसी है? रहन-सहन, खान-पान कैसा है? कितने भाई-बहन हैं? बंटवारे में माँ-बाप किनके गले पड़े हैं? बहन कितनी हैं, उनकी शादी हुई हैकि नहीं? माँ-बाप का स्वभाव कैसा है? घर वाले, नाते-रिश्तेदार आधुनिक ख्यालात के हैं कि नहीं? बच्चे का कद क्या है? रंग-रूप कैसा है? शिक्षा, कमाई, बैंक बैलेंस कितना है? लड़का-लड़की सोशल मीडिया पर एक्टिव है कि नहीं? उसके कितने दोस्त हैं? सब बातों पर पूछताछ पूरी होने के बाद भी कुछ प्रश्न पूछने में और सोशल मीडिया पर वार्तालाप करने में और समय व्यतीत हो जाता है। हालात को क्या कहें माँ-बाप की नींद ही खुलती है 30 की उम्र पर। फिर चार-पाँच साल की यह दौड़-धूप बच्चों की जवानी को बर्बाद करने के लिए काफी है। इस वजह से अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं और माँ-बाप अपने ही बच्चों के सपनों को चूर चूर-चूर कर देते हैं। एक समय था जब खानदान देखकर रिश्ते होते थे। वो लम्बे भी निभते थे। समधी-समधन में मान मनुहार थी। सुख-दु:ख में साथ था। रिश्ते-नाते की अहमियत का अहसास था। चाहे धन-माया कम थी मगर खुशियाँ घर-आँगन में झलकती थी। कभी कोई ऊँची-नीची बात हो जाती थी तो आपस में बड़े-बुजुर्ग संभाल लेते थे। तलाक शब्द रिश्तों में था ही नहीं। दाम्पत्य जीवन खट्टे-मीठे अनुभव में बीत जाया करता था। दोनों एक-दूसरे के बुढ़ापे की लाठी बनते थे और पोते-पोतियों में संस्कारों के बीज भरते थे। अब कहां हैं वो संस्कार? आँख की शर्म तो इतिहास हो गई। नौबत आ जाती है रिश्तों में समझौता करने की। लड़का-लड़की अपने समाज के नही होंगे तो भी चलेगा, ऐसी बातें भी सामने आ रही हैं। आज समाज की लडकियाँ और लड़के खुले आम दूसरी जाति की तरफ जा रहे हैं और दोष दे रहे हैं कि समाज में अच्छे लड़के या लड़कियाँ मेरे लायक नहीं हैं। कारण लडकियाँ आधुनिकता की पराकाष्ठा पार कर गई है। जब ये लड़के-लड़कियाँ मन से मैरिज करते हैं तब येकुंडली मिलान का क्या होता है ? तब तो कुंडली की कोई बात नहीं होती‌ | यही माँ बाप सब कुछ मान लेते हैं। तब कोई कुण्डली, स्टेटस, पैसा, इनकम बीच में कुछ भी नहीं आता। अगर अभी भी माँ-बाप नहीं जागेंगे तो स्थितियाँ और विस्फोटक हो जाएंगी। समाज के लोगों को समझना होगा कि लड़कियों की शादी 22-23 में हो जाये और लड़का 25-26 का हो। सब में सब गुण नहीं मिलते। घर, गाड़ी, बंगला से पहले व्यवहार तोलो। माँ बाप भी आर्थिक चकाचोंध में बह रहे है । पैसे की भागम-भाग में मीलों पीछे छूट गए हैं, रिश्ते-नातेदार। टूट रहे हैं घर परिवार। सूख रहा है प्रेम और प्यार।परिवारों का इस पीढ़ी ने ऐसा तमाशा किया है कि आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी "संस्कार"। समाज को अब जागना जरूरी है।।🙏
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इस लेख में #पुरुष और #महिला व्यक्तित्व के बीच अंतर्निहित अंतरों पर चर्चा की गई है..... विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हुए कि महिलाओं में प्रेम और क्षमा की क्षमता स्वाभाविक और सहज है... जबकि पुरुषों को क्षमा करना सीखना चाहिए। यह पुरुष अनुभवों को केंद्र में रखने की ऐतिहासिक प्रवृत्ति की आलोचना करता है, मानवता को पुरुष शब्दों में लेबल करता है जबकि महिलाओं की विशिष्ट पहचान को अनदेखा करता है। लेखक का तर्क है कि जैसे-जैसे महिलाएँ व्यवहार, पोशाक और भूमिकाओं में पुरुषों की नकल करने का प्रयास करती हैं, वे अपने अद्वितीय गुणों को खोने का जोखिम उठाती हैं, जिससे समाज में असंतुलन पैदा होता है। इस नकल को न केवल महिलाओं के लिए बल्कि व्यापक मानवीय अनुभव के लिए हानिकारक माना जाता है। लेख में जोर दिया गया है कि महिलाओं के गुणों - जैसे कि करुणा, धैर्य और पोषण - को पुरुष मानदंडों के पक्ष में दबाने के बजाय महत्व दिया जाना चाहिए और विकसित किया जाना चाहिए। निष्कर्ष इस बात पर प्रकाश डालता है कि सच्ची ताकत इन अद्वितीय स्त्रैण गुणों को पहचानने और विकसित करने में निहित है, जैसा कि कृष्ण ने व्यक्त किया था, जिन्होंने महिलाओं के भीतर विशिष्ट गुणों की पहचान की थी...
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खूबसूरत राजकुमारियां चुनने से पहले पढ़ें।👇 #कामकाजी 🕵️ महिला चुनते समय, आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि वह घर का प्रबंधन नहीं कर सकती है।👰 अगर आप एक गृहिणी चुनते हैं जो आपकी देखभाल कर सकती है और घर का प्रबंधन कर सकती है, तो आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि वह शायद कमा नहीं सकती है। एक आज्ञाकारी महिला को चुनने का मतलब है यह पहचानना कि वह अपने जीवन के लिए आप पर निर्भर रहेगी। अगर आप एक मजबूत महिला के साथ रहने का फैसला करते हैं, तो आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि उसकी अपनी राय है। एक खूबसूरत महिला को चुनने से अक्सर ज़्यादा खर्च होता है। अगर आप एक सफल महिला को चुनते हैं, तो समझें कि उसकी अपनी जीवनशैली, लक्ष्य और महत्वाकांक्षाएँ हैं। परफेक्ट जैसी कोई चीज़ नहीं होती; हर किसी के पास अपने अनूठे गुण होते हैं जो उसे खास बनाते हैं!
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🏵️🏵️ आक्रामक स्त्री आकर्षक नहीं होती..🏵️🏵️ अगर कोई स्त्री तुम्हारे पीछे पड़ जाए और प्रेम का निवेदन करने लगे, तो तुम भागने से डरोगे...... क्योंकि वह स्त्री पुरुष जैसा व्यवहार कर रही है, वह स्त्री नहीं है, स्त्री होना एक राग है। वह सिर्फ प्रतीक्षा करता है। तुम प्रोत्साहित करते हो, लेकिन आक्रमण नहीं करते। वह तुम्हें बुलाता है, लेकिन चिल्लाता नहीं। उसे बुलाना भी एक बड़ा मौन है, वह तुम्हें सब तरफ से घेर लेता है, लेकिन तुम्हें पता भी नहीं चलता। उसकी जंजीरें बड़ी सूक्ष्म हैं, वे दिखाई भी नहीं पड़तीं, बड़े पतले धागों से, सूक्ष्म धागों से बांधते हैं, लेकिन उनके बंधन कहीं दिखाई नहीं पड़ते। स्त्री उसे दबाए रखती है, लोग सोचते हैं कि पुरुषों ने स्त्रियों को दासी बना रखा है। नहीं, स्त्री दासी बनने की कला है, लेकिन तुम्हें पता नहीं, उसकी कला बहुत महत्वपूर्ण है। और लाओत्से उसी कला का उद्घाटन कर रहा है। पुरुष स्त्री को दासी नहीं बनाता। जब भी कोई स्त्री दुनिया के किसी भी कोने में किसी पुरुष के प्रेम में पड़ती है, तो उसे तत्काल दासी बना देता है, क्योंकि यह एक गहरा मूल्यांकन है। वह जीवन के रहस्य को समझता है। स्त्री उसे नीचे रखती है, चरणों में रखती है। और तुमने देखा है कि जब भी कोई स्त्री उसे तुम्हारे चरणों में रखती है, तो अचानक तुम्हारे सिर पर ताज की तरह बैठ जाती है। चरणों में रखती है, बहुत गहरे तक पहुँचती है, बहुत ऊपर तक पहुँचती है, चौबीस घंटे तुम उसमें प्रतिबिम्बित होने लगते हो। अपने को अपने चरणों में छोड़ देती है, तुम्हारी छाया बन जाती है। और तुम्हें पता भी नहीं चलता कि छाया तुम्हें चलाने लगती है, तुम छाया के इशारे से चलने लगते हो। स्त्री कभी कहती भी नहीं कि वह ऐसा करती है, पर वह उसे पाना चाहती है। वह कभी नहीं कहती कि यह वही है, पर वह वैसा करना चाहती है। लाओवा कह रहा है कि उसकी शक्ति बड़ी है। और उसकी शक्ति क्या है? क्योंकि वह दासी है। शक्ति यह है कि वह छाया बन गई है। बड़े-बड़े शक्तिशाली पुरुष प्रेम में पड़ जाते हैं, और बिलकुल शून्य हो जाते हैं, और अनजाने में ही उसके प्रेम में बहुत आसानी से चले जाते है।।।।। #तृप्त
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दुनिया में एकमात्र संबंध ऐसा है जिसमे न जाति देखी जाती है न धर्म, न अमीर न गरीब, न ऊंच न नीच.. और वो संबंध है - "अवैध संबंध" बुरी लगने को बात बुरी लग सकती है.. पर मेरा कहना शत प्रतिशत सत्य है... जिन जातियों के हाथ का छुआ पानी नही पीना चाहते उन जातियों की सुंदर कन्याएं अगर सोने के लिए मिलें तो हाथ का छुआ पानी तो दूर,पैर के तलवे भी चाट लेंगे लड़की के..... जिस धर्म के लोगों से बेपनाह नफरत हो,बंद कमरे में उस धर्म की लड़की के चरणों में बिछ जायेंगे....... जाति पांति,धर्म अधर्म, छुआछूत ये सब तो समाज में दिखाने और रौब गांठने की चीजें हैं... ... भीतर से सब कितने दोगली मानसिकता के हैं ये तो हम जानते ही हैं.......
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जीवन के अनुभव ...🌱💞 जीवन के अनुभव लेख में मेरे निजी अनुभव लिख रहा हूं किन्तु मेरे अधिकतर लेख किसी एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहते यद्यपि एक सत्य ये भी है कि कहीं न कहीं किसी प्रकार हम सब कुछ ज्यादा कम मिला जुला कर देखें तो सभी लोगों के जीवन समान परिवेश से हो कर समान चुनौतियों और संघर्षों से ही गुजरता है तो ये लेख शायद आप भी अनुभव करेंगे कि..,.. कोई भी पुरुष कितना भी कठोर हृदय वाला हो या ये कहें कि उसे किसी बात से फर्क नही पड़ता हालांकि पुरुषों को बचपन से ही इस माहौल में ढाला जाता है कि वो जीवन की अधिकतर परेशानियों को तो अपने खेलने का साधन बना लेता है, फिर भी कभी कभी वो भी थक चुका होता है और जीवन की भागदौड़ में थके हुए पुरुष को अपना सिर रखने के लिए आवश्यकता होती है एक शख्स की जिसके कंधे पर सिर रख कर वो खुद को अतिआनंदित महसूस करता है और सारे कष्ट और परेशानियों को भुला देता है किंतु पुरुष का दुर्भाग्य है कि अक्सर पुरुष को सिर रखने के लिए वो कंधा नसीब नहीं होता। पुरुष की खास बात ये भी है कि ये कितना भी टूट चुका होगा थक कर हार चुका होगा तो भी ये हर किसी के कंधे पर सिर नही रखता उसके लिए वही इंसान चाहिए जो उसके हृदय में निवास करता है, अगर वो नही तो फिर कोई नही वो खुद अपने आप को समझा कर फिर उठेगा पर हर किसी के कंधे से नही लगेगा। यदि आप इस लेख को पढ़ते वक्त महसूस करते हैं कि आपके कंधे की किसी को जरूरत है तो इस के लिए कभी पीछे मत हटना क्योंकि ये सहारा किसी के जीवन के रथ को फिर से सही रास्ते पर ला सकता है और मैं ये सलाह इस लिए दे रहा हूं क्योंकि मुझसे मेरे जैसे (अकेले) लोग देखे नहीं जाते। उसको एक कंधा तक नसीब नहीं हुआ रोने के लिए, वो जो सब की हंसी को खुद से पहले रखा करता था...
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💔..कहानी थोड़ा रोचक तथ्य पर आधारित है..💔 पति पत्नी के बीच अच्छा संभोग इस बात का सूचक है की दोनो के रिश्ते काफी गहरे हैं,.. लेकिन क्या एक शादी सिर्फ संभोग के रिश्ते पर ही टिके रहती है ? अगर ऐसा है तो एक कॉल गर्ल के सबसे ज्यादा रिलेशनशिप होते लोग उसके साथ खुश होते।। आलोक (एक लड़का) और मैं (कोई लड़की) दोनो को कॉलेज के टाइम से जानते थे, पर हमारे बीच दोस्ती नही थी हम दोनो क्लासमेट थे कॉलेज खत्म होते होते मेरे घर एक रिश्ता आया, मर्यादा में रह कर के मैने मां को बोल दिया की आप को लड़का और परिवार सही लग रहा है तो आगे बात कीजिए जब मैं लड़के वाले से मिलने गई तो मैंने आलोक को देखा और पता चला यही लड़का है जिससे शादी फिक्स होनी होनी है कुछ समय बाद हमारी शादी हुई, क्यों की हम दोनो क्लास mate थे तो घुलने मिलने में ज्यादा समय नही लगा एक नए शादी शुदा जोड़े के लिए सबसे कीमती पल उनके समागम का होता है, क्यों की ये ऐसी चीज है जो दोनो ही आधी जिंदगी जीने के बाद प्राप्त करते हैं और ये है भी दुनिया का सबसे सुखद एहसास लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, हमारे बीच भी दूरियां बढ़ती गई, जिसका सबसे बड़ा कारण मेरी सास मां थी, उन्हें लगता था की मैं एक डायन हूं और उनका बेटा अभी भी छोटा बच्चा नादान है और सम्भोग के लालच में मै उससे कोई काम ना करा लूं इस लिए वो हमारे निजी पलो में भी दखलअंदाजी करती और इस के कारण हमारी दूरी बढ़ती गई, जब मेरा मन होता तो आलोक मना कर देते और जब आलोक का मन होता तो मेरा मन नहीं होता काफी समय ऐसे चलने के बाद हम दोनो ने एक दिन बैठ के बात की, जिसका निष्कर्ष ये निकला की मां की दखल अंदाजी इन सब का कारण है आलोक ने बोला मां को छोड़ nhi सकता और तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊंगा इस लिए बीच का समाधान निकालो समाधान के तौर पर ये निकला की मुझे जो काम करना है वो मैं मां से पूछ के करूं, वो हां करे या ना करें पूछो जरूर तकरीबन 2 3 महीने में उनके व्यवहार में बदलाव आया फिर मैने उनसे खुल के बात की, की मैं और आलोक अभी तक एक दूसरे को समझ नही पाएं हैं उसका कारण क्या है मुझे नहीं पता पर अगर ज्यादा दिन ऐसे रहा तो ये रिश्ता सिर्फ नाम की शादी मात्र रह जायेगा इस बात से उन्हें अपनी गलती का एहसाह हो गया और उन्होंने हमारी निजी जिंदगी में दखलंदाजी करना बंद कर दिया और उधर हमारे और आलोक के बीच भी दिन निर्धारित हुए, की किस दिन हमे संबंध बनाना है, उस दिन किसी का मन रहे या ना रहे करना है धीरे धीरे हमारे रिश्ते भी सुधर गए पर हमारी तरह आज की हर लड़की ऐसी नही है, शादी में सिर्फ संभोग ही जरूरी नहीं है मन का मिलना sbse ज्यादा जरूरी है अगर ऐसी स्थिति आज की किसी लड़की के साथ हुई होती तो वो सीधा घर छोड़ के भागती लोगों को लगता है अरेंज मैरेज में ज्यादा दिक्कत नही आती है लेकिन सच ये है की शादी लव मैरिज हो या अरेंज असली दिक्कत तब आती है जब आप को पूरे परिवार को झेलना पड़ता है और यही झेलना आप को आप के परिवार के साथ और मजबूती से झेलता है किसी भी परिस्थिति में, हमे परिस्थिति से भागना कोई अच्छा उपाय नही है। #LoveandDeepspace
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🏵️ यह एक सुंदर घटना है......!!!!🏵️ जब #मीरा वृंदावन के सबसे प्रतिष्ठित मंदिर में पहुंचीं, तो उन्हें द्वार पर रोक दिया गया क्योंकि महिलाओं का प्रवेश वर्जित था; मुख्य पुजारी का मानना था कि ब्रह्मचारी को महिलाओं को नहीं देखना चाहिए। मीरा, एक महिला होने के नाते, इस प्रतिबंध के अधीन थीं। हालांकि, जब मीरा अपने पीछे भक्तों की भीड़ के साथ, आनंद और शराब के नशे में धुत होकर, एकतारा बजाते हुए नृत्य करती हुई आईं, तो द्वारपाल हैरान रह गए। परमानंद के उस क्षण में, वे अपना कर्तव्य भूल गए और उन्हें मंदिर में प्रवेश करने दिया। अंदर, पुजारी चौंक गए। उन्होंने वर्षों से किसी महिला को नहीं देखा था, और यहाँ मीरा कृष्ण के सामने नृत्य कर रही थीं, जिससे उनका प्रसाद का थाल गिर गया। वह इस बात से बहुत हैरान थे कि एक महिला इस निषिद्ध स्थान में प्रवेश कर गई थी। एक पल के लिए सोचें: द्वारपाल भी भावनाओं में बह गए, जबकि पुजारी बेखबर रहे। सबसे विद्वान होने के नाते पुजारी से सचेत रहने की उम्मीद की जाती थी, फिर भी वह सबसे अंधा था। द्वारपाल दिव्य अनुभव में खो गए, जबकि पुजारी नहीं खो सका। जब उसे अंततः एहसास हुआ और उसने उससे सामना किया, तो उसने कहा, "हे स्त्री! क्या तुम नहीं समझती कि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है?" मीरा ने उत्तर दिया, "मैंने सोचा था कि कृष्ण के अलावा कोई पुरुष नहीं है। तो, तुम भी पुरुष हो? मैं कृष्ण को एकमात्र पुरुष के रूप में देखती हूँ, और बाकी सभी उनके प्रिय हैं; हम सभी उनकी संगति में नृत्य कर रहे हैं। क्या तुम भी एक प्रतियोगी हो?" पुजारी के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे। उसने कभी ऐसा प्रश्न नहीं देखा था। विद्वान अपने पारंपरिक उत्तरों से बंधे होते हैं, लेकिन मीरा का दृष्टिकोण अद्वितीय था। उसने जोर देकर कहा कि केवल कृष्ण हैं, और बाकी सभी उनके प्रिय हैं। इस क्षण का सार सामाजिक मानदंडों से परे मीरा द्वारा कृष्ण के साथ महसूस किए गए गहन संबंध को दर्शाता है। #जय_श्री_कृष्ण #मीरा
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तुम किसी व्यक्ति से प्रेम कर सकते हो इसलिए कि वह तुम्हारा भाग्य पूरा करता है। यह प्रेम नहीं है..💞 बस एक सौदा है। तुम किसी व्यक्ति से अभाव पूरा कर सकते हो क्योंकि तुम प्रेम करते हो। तब काम छाया का अनुसरण करता है, प्रेम के अंग की तरह। तब वह सुंदर है; तब वह संसार का नहीं है। तब कोई पहले से प्रविष्ट नहीं हुआ है। और यदि तुम किसी व्यक्ति से बहुत गहरे में दूर चले जाते हो, तो उत्सव धीरे-धीरे कम हो जाता है। आत्मीयता इतनी पूर्ण हो जाती है कि मुक्ति की कोई आवश्यकता नहीं रहती। प्रेम स्वयं में पर्याप्त है। जब वह घड़ी आती है, तब प्रार्थना की संभावना तुम पर आ जाती है। ऐसा नहीं है कि उसे छोड़ दिया गया है। ऐसा नहीं है कि उसका दमन दबा दिया गया था, नहीं। वह बस फंस जाता है। जब दो प्रेमी प्रेम में इतने आभूषण होते हैं कि प्रेम पर्याप्त है। और मुक्ति बिलकुल गिर जाती है। तब दो प्रेमी समग्र एकीकरण में होते हैं। क्योंकि उदार, विभाजित। अंग्रेजी का शब्द 'सेक्स' उस मूल से आता है, जिसका अर्थ है, भेद। प्रेम जोड़ता है; भेद करता है। लैंगिक भेद का मूल कारण है। जब आप किसी व्यक्ति के साथ, किसी महिला या पुरुष के साथ एक महिला को पूरा करते हैं, तो आपको लगता है कि सेक्स आपको जोड़ता है। गति भ्रमित है, इकाइयों में से एक है, और फिर एक बड़ा विवेक अचानक है। यही कारण है कि हर काम कार्रवाई के बाद एक हताशा, एक निराशा। व्यक्ति अनुभव करता है कि वह प्रिय से दूर है। एक अंतर बनाता है। और जब प्यार और भी गहरा हो जाता है, तो और अधिक जोड़ना तब मुक्ति की आवश्यकता नहीं होती है। आप ऐसी चीज में रहते हैं कि आपकी आंतरिक ऊर्जा बिना किसी कमी के हो सके..
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महिलाओं को पुरुषों की अनकही बातें सुननी चाहिए.. दुनिया से लड़कर, असफलताओं के बावजूद हिम्मत जुटाकर घर लौटने पर उन्हें गले लगाना चाहिए। पास बैठकर, उनका हाथ थामकर कहना चाहिए, आप सबसे अच्छे आदमी हैं जिन्हें मैंने न केवल प्यार किया है बल्कि भगवान की तरह सम्मान भी दिया है... मैंने हमेशा अपने कंधे आपके लिए तैयार रखे हैं; यह आपका अधिकार है। आप अपना सिर आराम से रख सकते हैं और अपना दर्द मेरे साथ साझा कर सकते हैं। मैं आपके साथ हूँ! सर, मैं आपसे बहुत और अंतहीन प्यार करती हूँ। मुझे खुशी है कि हमने हर दुख को एक साथ साझा किया है। यह प्यार कायम रहे, यह बंधन बना रहे..!! #LoveandDeepspace #GoodPartner
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🥀प्यार और खाना🥀 प्यार और खाना एक दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए, जब आप किसी से प्यार करते हैं, तो आप उसे खाने के लिए घर पर बुलाते हैं। क्योंकि खाना बांटे बिना प्यार को कैसे समझा जा सकता है? जो लोग आपसे सच्चा प्यार करते हैं, वे आपके लिए खाना बनाते हैं। जब कोई महिला अपने प्रेमी के लिए खाना बनाती है, तो यह सिर्फ खाने की बात नहीं होती; इसमें स्नेह होता है। रेस्टोरेंट में बने खाने में वह गर्मजोशी नहीं हो सकती। शरीर तो संतुष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा खाली रहती है। जब एक माँ अपने बेटे के लिए खाना बनाती है, तो खाना भले ही सादा हो, लेकिन उसका स्वाद अलग होता है—यह प्यार का खाना होता है। कोई और कितना भी बढ़िया खाना बनाए, अगर वह सच्चे इरादे के बिना बनाया गया है, तो वह संतोषजनक नहीं होगा। भले ही वह खाया जाए, लेकिन वह आत्मा को पोषण नहीं देगा। हमारी संस्कृति में, हमने बहुत पहले ही पहचान लिया था कि प्यार भोजन का स्वाभाविक हिस्सा है। इसलिए, जहाँ प्यार न हो, वहाँ खाना स्वीकार नहीं करना चाहिए। अगर आपकी पत्नी खाना बनाते समय नाराज़ है, तो वह खाना न खाएँ। इसी तरह, अगर आप गुस्से में खाना बनाते हैं, तो उसे न परोसें, क्योंकि क्रोध में बनाया गया भोजन विषाक्त हो जाता है। हो सकता है कि इसका असर तुरंत न हो, लेकिन अंततः यह प्रकट होगा। जब आप खाने के लिए बैठते हैं, अगर आप क्रोधित हैं, तो भोजन करना बंद कर दें। जब आप प्रेम से भरे होते हैं, तभी आप भोजन से बहने वाले प्रेम को अवशोषित कर सकते हैं। प्रेम प्रेम के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। प्रेम की ऊर्जा अपने आप अंदर चली जाती है। अगर आप क्रोध में खाते हैं, तो भोजन तो खत्म हो जाएगा, लेकिन प्रेम की ऊर्जा आपके अंदर प्रवेश नहीं करेगी। क्रोध में बनाया गया भोजन विषाक्त हो जाएगा। इसलिए हमने कई नियम बनाए: क्रोध में खाना नहीं, क्रोध में खाना नहीं बनाना, यह जानना कि भोजन किसके हाथ से आना चाहिए और भोजन कब बनाना चाहिए। हमारी संस्कृति में, महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान चार दिनों तक खाना पकाने से प्रतिबंधित किया जाता था। भविष्य में, इस पर वैज्ञानिक रूप से पुनर्विचार किया जा सकता है। मासिक धर्म के दौरान, हार्मोनल परिवर्तन उनमें स्नेह की कमी कर सकते हैं, जिससे भोजन बनाना अनुपयुक्त हो जाता है, जो तब विषाक्त हो सकता है। इस पर प्रयोग किए गए हैं। इंग्लैंड की एक प्रयोगशाला में उन्होंने पाया कि अगर किसी महिला को मासिक धर्म के दौरान बहुत ज़्यादा दर्द होता है और वह गुलाब को पकड़ती है, तो वह दोगुनी तेज़ी से मुरझा जाता है। जब वह मासिक धर्म में नहीं होती है, तो फूल को मुरझाने में बहुत ज़्यादा समय लगता है। यह दर्शाता है कि फूल भी भावनात्मक ऊर्जाओं पर प्रतिक्रिया करते हैं। इसलिए, यही बात भोजन पर भी लागू होती है। हम सिर्फ़ शरीर नहीं हैं; हम आत्मा भी हैं। इसलिए, शारीरिक पोषण की तरह ही आध्यात्मिक पोषण भी होता है। यही कारण है कि प्रेम के लिए इतनी गहरी लालसा होती है। कोई भूख तो सह सकता है, लेकिन प्रेम की कमी नहीं। कोई गरीब हो सकता है, लेकिन प्रेम के बिना नहीं रह सकता। धन के बिना कोई जीवित रह सकता है, लेकिन प्रेम के बिना नहीं। प्रेम की यह गहरी प्यास दर्शाती है कि आत्मा किसी तरह अतृप्त है। आत्मा किसी ऐसी चीज़ की लालसा करती है जो उसे नहीं मिली है - उसे पोषण की ज़रूरत है।" #FOODANDLOVE
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🥀...सभी महिलाओं को समर्पित...🥀 शाम से,,, मुझे अपनी छाती के बाईं ओर हल्का दर्द महसूस हो रहा था। लेकिन इस तरह के दर्द अक्सर महिलाओं की दिनचर्या में शामिल हो जाते हैं। मुझे लगा कि शायद यह सिर्फ़ एक झटका है, और मैं रात के खाने की तैयारी में व्यस्त हो गई। रसोई में काम खत्म करने के बाद, मैं बिस्तर पर गई और अपने पति से इस बारे में बात की। उन्होंने मुझे कुछ दर्द निवारक दवा लेने का सुझाव दिया और मुझे बहुत प्यार से समझाया कि ज़्यादा मेहनत न करें। अचानक, देर रात, दर्द बढ़ गया, और मुझे साँस लेने में मुश्किल होने लगी। "क्या यह दिल का दौरा है?" इस विचार ने मेरे पसीने छुड़ा दिए। हे भगवान! मैंने पालक और मेथी को साफ भी नहीं किया है, और मुझे अभी मटर छीलनी है। साथ ही, फ्रिज में क्रीम का कटोरा अभी भी भरा हुआ है; मुझे आज मक्खन निकाल देना चाहिए था। अगर मैं मर गई, तो लोग कहेंगे कि फ्रिज कितना गंदा था। मैंने कपड़े भी प्रेस नहीं किए हैं। चावल खत्म हो रहे हैं; मुझे स्टॉक करने के लिए बाजार जाना चाहिए था। मेरे जाने के बाद जो लोग बारह दिन यहाँ रहेंगे, उन्हें मेरी बदइंतज़ामी की बहुत-सी कहानियाँ मिलेंगी। अब मैं सीने का दर्द भूल गई और काल्पनिक अपमान का दर्द महसूस करने लगी। नहीं भगवान! कृपया मुझे आज मत ले जाना। न तो मैं तैयार हूँ और न ही मेरा घर।” मैंने इस तरह प्रार्थना की और अंततः गहरी नींद में सो गई। सुबह मैं घर के कामों में व्यस्त हो गई। यह असली ज़िम्मेदारी है। सभी गृहणियों को समर्पित। #WomenEmpowement #LoveIsland
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जब बच्चा पैदा होता है। वह चेतना लेकर आता है..🙎मन लेकर नहीं....अब मन का विकास होगा।।।। वह चेतना लेकर आता है, सीखने की क्षमता लेकर आता है, जागरूकता लेकर आता है, आत्मा लेकर आता है। इस आत्मा के चारों ओर अब मन की दीवार खड़ी की जाएगी, जहाँ उसे सिखाया जाएगा कि वह हिंदू है, और यह दीवार पर लिखा होगा। उसे सब कुछ सिखाया जाएगा—श्रेष्ठ और निम्न, ब्राह्मण और शूद्र, वह क्या है और क्या नहीं। यह दीवार खड़ी की जाएगी। इसे ही हम सीखना कहते हैं—मन का निर्माण। बच्चा अंततः भूल जाएगा कि वह इससे अधिक है। वह समझ जाएगा कि वह बस यही है। यही उसकी पहचान बन जाएगी। ध्यान की प्रक्रिया में प्रवेश करने का अर्थ है इस पहचान को तोड़ना। क्या मैं केवल वही हूँ जो मैं जानता हूँ? क्या मैं केवल वही हूँ जो मैंने समझा या सुना है? क्या मैं केवल मेरा मन हूँ? इसके बारे में जागरूकता और समझ है।
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वो स्त्री, जो सचमुच तुमसे प्यार करती है, तुमको छोड़कर जाने का फैसला एक पल में नहीं करती।।। महीनों वो खुद को समझाती है और जिस दिन वो तुम्हारे बिना खुद को सम्हालना और समझाना सीख जाती है, ठीक उसी पल वो तुमको छोड़कर सिर्फ़ ख़ुद की हो जाती है। तुमको उस दिन से डरना चाहिए जिस दिन स्त्री प्रेम और स्वाभिमान में से स्वाभिमान को चुनती है।। क्योंकि उसी दिन स्त्री तुमसे मिले प्रेम को हीरे की तरह दिल में रख लेती है औऱ सारी दुनिया के लिए दिल के दरवाज़े सदा के लिए बंद कर लेती है। ये उसका अंतिम फैसला होता है तुमको छोड़ कर जाने का। स्त्री सहज विद्रोही नहीं होती, विद्रोह करने से पहले वो बार-बार तुमको एहसास कराती है कि " अब पहले जैसा प्रेम महसूस नहीं हो रहा है, प्रेम को कुछ वक्त दिया करो तुम उसे और उसकी बातों को लापरवाही से टाल देते हो , और एक दिन वो तमाम यादें और प्रेम समेट कर तुमसे दूर चली जाती है। एक बार प्रेम तज कर और प्रेम समेट कर जा चुकी स्त्री कभी पहली सी नहीं रह जाती। तुम्हारे जिस प्रेम ने उसे कोमल और संतुलित बनाया था , तुम्हारा वही प्रेम उसे जीवन भर के लिए कठोर और निष्ठुर बना देता है। तुम लापरवाही में कभी जान ही नहीं पाते कि मरते दम तक वो स्त्री दुबारा वैसी कभी नहीं बन पाती, जैसी वो तुमसे मिलने से पहले थी। अपनी मौज में चलते तुम कभी जान ही नहीं पाते कि - "तुम एक हरी-भरी , खिली औऱ खिलखिलाती स्त्री की हत्या कर चुके हो...... #REFORM_UPSSSC #PMModiBirthday #modibirthday #Modiji
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ये जीवन है..!!!😔 तुम सुन्दर नहीं हो, सिर्फ तुम्हारी उम्र सुन्दर है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कैसे दिखते हैं और आपकी त्वचा कैसी है, क्योंकि उम्र के साथ सब कुछ बदल जाएगा........ अंत में आपको एक सहारा देने वाले हाथ की जरूरत होती है, न कि एक संपूर्ण शरीर और सुंदर चेहरे की..... हर कोई अपने तरीके से सुंदर है। आप मोटे, पतले, छोटे, बदसूरत, काले, गोरे नहीं हैं। आप आप हैं और यही बढ़िया है। किसी को भी उसके अस्थायी रूप से आंकने की कोशिश न करें....!! ❤️
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मर्द का अमीर होना और औरत का खूबसूरत होना जरूरी है,, क्योंकि मर्द को बदसूरत औरत नहीं चाहिए और औरत को गरीब आदमी नहीं चाहिए।।
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1990 के लड़कों की लव स्टोरीज़. अगर पढ़ लिया तो आज रोने लगोगे अपनी सारी प्रेमिकाओं को याद करोगे मेरी आशिकी भी ये क्या रंग लाई, वफ़ा मैंने की तूने की बेवफाई,, आशिकी फ़िल्म के गाने चित्रहार की शान में चार चांद लगाने के बाद ये अब कैसेट के रूप में भी आ चुके थे। अजीब कशिश थी दो नये चेहरों में, आम चेहरों का सितारा बन जाना। ये वो दौर था जब थियेटर केवल बड़े शहरों में होते थे, कस्बों में तो वीडियो पार्लर ही चला करते थे। उस साल हमने कुमार शानू अनुराधा पोडवाल को आकाश छूते देखा था। वो दौर ऐसा था जब नाक और होंठो के बीच मे रोएं उगने शुरू हो गए थे। नाक और होंठ के बीच उंगली लगाकर शीशा निहारते हुए ये महसूस करते थे कि जब पूरी मूंछें आ जाएंगी तो हम कैसे दिखेंगे। ये अलग बात रही कि उस जमाने के हम लड़के अधिकतर क्लीन शेव ही दिखे थे। यही वो दौर था जब सलमान खान, आमिर खान, अजय देवगन और राहुल रॉय जैसे सितारों का उदय हो रहा था। बड़ी अजीब बात थी जहां हम एक तरफ cos थीटा sin थीटा पढ़ रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कुमार शानू के गाने सुनकर झूम भी रहे थे। विज्ञान के ओम(ohm) का नियम तो कभी याद न हुआ, पर बागी फ़िल्म का “एक चंचल शोख हसीना और कैसा लगता है अच्छा लगता है प्यार का सपना सच्चा लगता है” जैसे गाने का एक एक बोल याद हो आया था। उन्हीं दिनों एक अजीब बीमारी ने जन्म लिया था। वो था एक छुपाई हुई कॉपी में गाने लिखने का शौक। वो कॉपी एक प्रेम सम्बन्ध की तरह बहुत छिपाकर रखी जाती रही। वो घरवालों के हाथ आने का मतलब जूता पलीती के होने की एक हज़ार प्रतिशत सम्भावना के होने को दर्शाती थी। ये भी बड़ा दिलचस्प था कि चाचा चौधरी और बिल्लू पिंकी के कॉमिक जाल से निकलकर नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव और भोकाल की मौत के कुँए वाली बाइक राइडिंग में पहुंच गए थे। आइये आगे बढ़ते हैं, मूंछ के रोयें आने के साथ साथ दिल में प्रेम ने भी दस्तक देना शुरू कर दिया था और इसका मुख्य कारण रहा उस वक़्त की फिल्में, चित्रहार और उन फिल्मों के गाने। जहाँ एक तरफ तम्मा तम्मा लोगे, थिरका रहा था वहीं “ओ प्रिया प्रिया, क्यों भुला दिया, गाना रुला रहा था। सच कहूं तो उस वक़्त किसी से प्यार नहीं हुआ था और ये कहूँ कि हर लड़की से प्यार हो रहा था। एक तरफ जूही की मासूमियत थी तो एक तरफ नगमा का गदराया हुआ बदन था। कहीं अनु अग्रवाल की सादगी थी तो कहीं माधुरी की मधुरता थी। यही वो दौर था जब शिवा और घायल जैसी फ़िल्म देखकर मन में ढिशुम ढिशुम की ताकत महसूस करते थे वहीं दूसरी तरफ़ दिल और बागी फ़िल्म के हीरो की तरह लड़की के साथ भाग जाने को दिल भी करता था, पर जहाँ लड़कियों को भगाने की सोचते थे वहीं उनसे बात करते भी पिंडलियां भूकम्प के झटके से महसूस करने लगती थी। रिक्टर पैमाना भी 7.1 से कम नहीं रहा होगा। यही वो दौर था जब स्कूल की लड़कियों के पीछे उनकी स्कूल तक जाने का जुनून हुआ करता था। बॉयज़ स्कूल में पढ़ने के कारण ये उत्कंठा और भी चरम पर पहुंच चुकी थी। ये स्कूली लड़कियों का पीछा करना भी एक खतरे का सामान था यानी वही शेर था कि, “ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे इक आग का दरिया है और डूब के जाना है” तो साहिब लड़कियों की स्कूल तक पीछे करने के उस जमाने में समाज इतना बेहतर हुआ था कि कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा पूछ लेता था तुम इधर कैसे जा रहे हो? तुम्हारा स्कूल तो उधर है, माँ कसम सर फोड़ने का मन हो उठता था उसका, पर सर तो न फोड़ सके बस वो रस्ता छोड़ स्कूल के रस्ते जाना पड़ता था। सबसे बड़ा डर तो किसी जानकार द्वारा देख लिए जाने का ही होता था। उस वक़्त का दौर बुरा था हर साल दसवीं में लड़के फेल हो जाते थे और वो फेल हुए लड़के हमारे सीनियर होते थे। उन्हें किताबों के ज्ञान के अलावा दुनिया जहान का ज्ञान होता था। बड़ी अजीब बात ये भी थी कि PTI मास्टर जी के चहेते होते थे और हाथ में डंडा सबसे ज्यादा PTI महोदय के पास ही रहता था। एक तरह से वो फेल हुए लड़के PTI महोदय के गुंडे हुआ करते थे। उन्हीं में से एक आनन्द हुआ करता था। वो मेरे जैसे कई लड़कों को ये कहता फिरता था तुम जैसे आम सूरत के लड़कों को थोड़ा कॉन्फिडेंस देने के लिए ही आशिकी बनाई गई है, ताकि तुम जैसे साधारण लड़के भी ये सोचें कि तुम भी कभी हीरो बन सकते हो। फिर हँसता था बहुत, स्कूल की खेल टीम का चयन भी उसी की शह पर किया जाता रहा। ख़ैर हमें तो प्रेम की बात करनी है। आनन्द फिर आनन्द में रह गया और दसवीं में फिर से फेल हो गया। दसवीं पास करना हमारे लिए बड़ी चुनौती रहती थी। हम बॉयज़ स्कूल के लड़कों के लिए इसलिए भी ज़्यादा कि ग्यारहवीं में सहशिक्षा थी, जहाँ हमारी क्लास में लड़कियां भी होने वाली थीं....तो दो बड़े कारण रहे दसवीं को पहली बार में पास करने के एक पापा की पिटाई का डर, 1/2
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ज्यादातर स्त्रियां सुख-सुविधा और सपन्न पुरुष से विवाह करना चाहती हैं, उसके मां-बाप भी यही चाहते हैं.... पुरुष के व्यतित्व का यह एक बड़ा हिस्सा है। कौन भला किसी गरीब पुरुष से विवाह करना चाहेगी... पुरुष स्त्री के सौंदर्य में रस रखता है, और ऐसी ही स्त्री से विवाह भी करना चाहता है, फिर वह कोई साधारण व्यक्ति ही क्यों न हो। समाज की यही सच्चाई है। "ताओ उपनिषद" में "लाओत्ज़े" यह कहता है कि यह भेद मिटना चाहिए।..
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निःसंतान दम्पति... संतान को तरस रहें.... 😥 विज्ञापनों मे ऐसे अस्पताल छाए हैंं जो,,, आंगन में किलकारी गूंजाने का और नया मेहमान लाने का दावा करते हैं...... कूड़े के ढेर और पॉलीथिन मे नवजात मिल रहे हैंं...😥 सामाजिक ढांचा ऐसा है कि शादी के साल. दो साल यदि बच्चा पैदा नहीं होता तो पुरुषों की मर्दानिगी पर उंगली उठती है और स्त्री को बांझ तक का ताना सुनना पड़ता है।......😥 सलाह के तौर पर नव दम्पति को कहा जाता है कि एक बच्चा कर लो... फिर भले देर मे दूसरा करना...।🌷 फिर बाज़ार मे ऐसी दवाओं की खपत हो कहाँ रही हैंं.... और ऐसी दवाओं के दुस्प्रभाव से गर्भाशय पर असर पड़ेगा और किसी एक की गलती या नासमझी का परिणाम पूरा परिवार झेलेगा... अपने बेटे की शादी करने से पहले, लड़की को अच्छी तरह से जान समझ लें, I-Pill और unwanted 72 के मरीज को घर में लाकर अपने घर को दवाखाना ना बनाएं 😥 खुद को झूठे मुकदमों से भी बचाएं ☝️ लड़की का गर्भपात कराकर, कन्यादान करने वाले ससुरों के दामाद ही अक्सर झूठे मुकदमे में फैमिली कोर्ट में खड़े मिलते हैं या फिर अवसाद में फंदे पर झूल जाते हैं (कृपया पोस्ट पर आपत्ति जताने से पहले अपने मित्रो/सखियों की भी राय लेकर ही कमेंट करें) ✍🏻
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