Prof. VIVEK KUMAR ( A World ranking Sociologist )

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@VivekkumarProf

Former Visiting Professor Columbia Univ, USA/Humbolt Univ Berlin, Gave Ambedkar Memorial Lecture at York Univ,UBC,SUF Cannada, Parliament of World Religions.

New Delhi, India Katılım Aralık 2014
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विश्व रैंकिंग 2025 में मेरा नाम --------- मैं JNU में नंबर 1, भारत में 11वें और एशिया में 134वें स्थान पर हूँ यह रैंकिंग मुझे समाज विज्ञानियों /वैज्ञानिकों की AD वर्ल्ड रैंकिंग 2025 द्वारा प्रदान की गयी है है. इसे साझा करते हुए गर्व महसूस हो रहा है।समाज का बहुत बहुत साभार.
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मान्यवर कांशीराम केवल एक फोटो नहीं है जिसे कोई भी दल अपने विज्ञापन के लये प्रयोग करे। मान्यवर कांशीराम एक लम्बे और गहरे विमर्श का नाम है जिसकी जड़ो में बहुजनो के 108 वर्षों के आंदोलनों का गहन अध्ययन एवं त्याग छिपा है, जिसे बस एक दिन की रस्मअदायगी से नहीं समझा जा सकता।
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मान्यवर कांशीराम को विपक्षी दल केवल फोटो या कुछ वाक्यों तक ही स्वीकार करेगा। जैसे ही वह इससे आगे बढ़ेगा उसे मान्यवर के निम्न विमर्श से टकराना पड़ेगा- वह विमर्श- "वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा" क्या कोई दल इस विमर्श को स्वीकार करेगा ?
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मेरा महात्मा जोतिबा फूले स्मृति व्याख्यान, समाजशस्त्र विभाग, सावित्रीबाई फूले विश्विद्यालय पूणे में------ Prof Vivek Kumar आखिर महात्मा फूले ने " किसान को नैतिक राष्ट् नियंत्रक क्यों कहा ? , आखिर महात्मा फूले शिक्षा का जनतंत्रीकरण क्यों चाहते थे ?
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जब दलित, दलितों के लिए बोले तो वो सवर्ण उसे कहते है पक्षपाती और जातिवादी। अगर सवर्ण (ब्राह्मण/ क्षत्रिय/ वैश्य) दलितों के लिए बोले तो वो प्रगतिशील और स्पष्टवादी। ये वयवस्था नहीं चाहिए। हमें चाहिए : जिसका मुद्दा उसकी लड़ाई/जिसकी लड़ाई उसकी अगुवाई।
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“प्रो. विवेक कुमार द्वारा ‘जुगनू’ सांस्कृतिक समूह द्वारा 1992–1995 के दौरान जेएनयू में गाए गए प्रगतिशील गीतों पर, वगीश भाई को समर्पित एक व्याख्यान।” Progressive songs sung during 1992-1995 at JNU by cultural group JUGNU: ... youtu.be/atFYFF850J8?si… via @YouTube
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@WisdomChakra @IspeakVikash जो छुपाना चाहते है उनका कोई उपाय नहीं है। परन्तु जो लोग घोषित रूप में लगातार काम कर रहे है ? लोगो ने इतनी अच्छी-अच्छी, पुस्तकें लिखी,अंतर्राष्ट्रीय मंचोे पर व्यख्यान दिए, सम्मान प्राप्त किये, विश्व रैंकिंग प्राप्त की,आदि। इससे समाज का मनोबल ऊँचा होता है, वे गौरवान्वित महसूस करते।
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Chakra of Wisdom@WisdomChakra·
कई बार ऐसा देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न, शिक्षित या प्रभावशाली बन जाता है, तो वह अपनी जातिगत पहचान को सार्वजनिक रूप से सामने नहीं लाना चाहता। इसके पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं-सामाजिक पूर्वाग्रह का डर, भेदभाव का अनुभव, कॉर्पोरेट या सामाजिक दायरे में स्वीकार्यता की चिंता, या यह इच्छा कि उसकी पहचान सिर्फ उसकी मेहनत और योग्यता से हो, जाति से नहीं। लेकिन इसका एक सामाजिक प्रभाव भी पड़ता है। जब सफल लोग अपनी जाति छुपा लेते हैं, तो समाज के भीतर रोल मॉडल कम दिखाई देते हैं। समुदाय के युवाओं को यह नहीं दिखता कि “हमारे अपने समाज से भी कोई इस स्तर तक पहुँचा है।” परिणामस्वरूप, सकारात्मक परिवर्तन और आत्मनिर्भरता की तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं बन पाती।
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याद कीजिये मुख्यधारा या सोशल मीडिया ने कभी दलित समाज के बारे में कोई सकारात्मक एवं आत्मनिर्भर उपलब्धि वाली खबर पर चर्चा की है। केवल दलितों पर अन्याय,अत्याचार,अनादर या सहानभूति-बलात्कार,हत्या,जूता फेकना,किराये पर माकन न देना,या सवर्ण ने उनके साथ खाना खा लिया-खबरे प्रकाशित होती है।
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जेएनयू वीसी के बयान को ले कर सवर्ण और पिछड़े सभी अपने आप को प्रगतिशील प्रमाणित करने की होड़ में दलितों को जाने-अनजाने में विक्टिम (victim) घोषित करने पर आमादा है। दलितों को सहानभूति दे कर उसे विक्टिम कौन प्रमाणित कर रहा है। दलितों को अपनी लड़ाई लड़ने दीजिये। Do you understand.
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JNU के समाजशास्त्र विभाग में “दृष्टिकोण का विकास: दार्शनिक और सैद्धांतिक आधार” पर एक व्याख्यान। हाल की उपस्तिथि हाउसफुल, से बहुत ख़ुशी हुई। आयोजकों को साधुवाद। A lecture to full house audience in JNU- How to develop a Perspective in Sociology?
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Sociologists attending 50th Indian Sociological Society's Conference at SRM University, Amravati, Andhra Pradesh are cordially invited to this book discussion. Thanks are due to RC-9 of Indian Sociological Society.
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