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@sarita_dangi1 हां यह सच है,
कविताएं बोलतीं हैं,
भेद अपने और जग के
सभी के खोलतीं हैं ,
कभी चुपचाप करतीं हैं इशारा
कभी चीखती-चिल्लातीं सी हैं,
कभी समातीं हैं शान्त मन में
कभी मन को झंझकोरतीं सी हैं,
हां यह सच है,
कविताएं बोलतीं हैं,
राम प्रकाश गोस्वामी
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