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Abhi Deep
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Abhi Deep
@abhi_deep18
सरस्वती नमस्तुभ्यं, वरदे कामरूपिणी । विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥ ॥Student॥
मध्य प्रदेश, भारत🇮🇳 Katılım Kasım 2018
267 Takip Edilen463 Takipçiler
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In my opinion UPSC wants such candidates who are ‘Mentally Tough’, ‘Emotionally Balanced’ and capable of doing better in any situation or circumstance.
#CSE
English
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Well done, Arjun. ❤️
Proud of the way you’ve carried yourself through this season, always believing in your ability, staying patient, working hard quietly, and remaining positive despite having to wait for your opportunity till the very last match.
Cricket tests patience as much as skill, and you handled both beautifully today.
Keep your feet on the ground, and continue being in love with the game like you always have.
Love you always.👏

English
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🔸रामायण के जीवन सूत्र🔸
ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं जब अंदर से चीख निकलती है।
कोई हमारा भरोसा तोड़ देता है, कोई हमारे अधिकार छीन लेता है, कोई हमारी अच्छाई को हमारी कमजोरी समझ लेता है…
और हम सोचते हैं- “अब बस, अब मैं सबको दिखाऊँगा। अब मैं चुप नहीं रहूँगा…।”
यहीं पर हमारा असली इम्तिहान शुरू होता है।
रामायण हमें यही सिखाती है —
▪️ग़ुस्सा करो, लेकिन अपनी मर्यादा मत खोओ।
▪️दुख सहो, पर अपने संस्कार मत छोड़ो।
▪️न्याय माँगो, पर अपनी आत्मा को चोट मत पहुँचाओ।
जब सीता माता का हरण हुआ— वह सिर्फ़ एक पत्नी का बिछड़ जाना नहीं था, वह अन्याय था, धर्म पर चोट थी।
राम अगर चाहते, तो वे दुनिया जला देते। उनके पास ताकत थी, शक्ति थी, क्रोध था पर उन्होंने आवेश में गलत रास्ता नहीं चुना।
उन्होंने ग़ुस्से को बदले में नहीं, धर्म के मार्ग में लगाया।
तैयारी की, योजना बनाई, सही साथ चुना, सही कदम उठाए और न्याय भी पाया पर अपनी पहचान खोए बिना।
हनुमान जी भी क्रोधित हुए।
लेकिन उनका ग़ुस्सा बदला नहीं था, वह सत्य की घोषणा था।
उन्होंने लंका जलाई — पर किसी व्यक्तिगत अहंकार के कारण नहीं,
उन्होंने लंका जलाई क्योंकि वहाँ अधर्म, अन्याय और अहंकार जलाने लायक था।
इसलिए ये समझिए कि ग़ुस्सा बुरा नहीं है, ग़ुस्से की दिशा गलत होना बुरा है।
भरत के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ।
वे राजा बन सकते थे, सिंहासन उनके पैरों में था। लेकिन क्या उन्होंने ग़ुस्से, लालच या स्वार्थ में बहकर सत्ता पकड़ ली?
नहीं।
वे रोए, टूटे, आहत हुए लेकिन उन्होंने चरित्र नहीं छोड़ा।
उन्होंने कहा-राज नहीं चाहिए, भाई चाहिए और उन्होंने खड़ाऊँ उठा ली।
आज हम सोचें…
हमसे थोड़ा सम्मान कोई छीन लेता है तो हम रिश्ते तोड़ देते हैं,
भरत सिंहासन छोड़ सकते हैं, तो हम “अहंकार” क्यों नहीं छोड़ सकते?
सीता माता पर तो जीवन का सबसे बड़ा संकट आया।
वो कैद हुईं, अपमान सहा, अकेलापन झेला।
लेकिन उन्होंने अपनी शालीनता नहीं खोई, अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।
ये सिखाता है कि “स्थिति चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, अपने मूल्य मत खोओ।”
अब अपनी ज़िंदगी पर नज़र डालिए—
कभी बच्चा बात नहीं सुनता, ग़ुस्सा आता है।
कभी माता-पिता हमारी भावनाएँ नहीं समझते, दिल दुखता है।
कभी जीवनसाथी गलत समझ लेता है, शब्द तलवार बन जाते हैं।
कभी ऑफिस में लोग छोटा दिखाने की कोशिश करते हैं।
हमारा दिमाग कहता है —
“अभी जवाब दो, अभी लौटा दो, अभी चोट पहुँचाओ…”
लेकिन रामायण कान पकड़कर रोकती है और कहती है कि “ग़ुस्सा करो पर खुद को मत खोओ।”
क्योंकि जो ग़ुस्से में खुद हार जाता है, वो लड़ाई जीतकर भी जिंदगी हार जाता है।
इसलिए संकल्प लें कि*
हम ग़ुस्सा करेंगे पर मर्यादा के साथ।
हम आवाज़ उठाएँगे पर सम्मान के साथ।
हम न्याय माँगेंगे पर गरिमा के साथ।
हम राम का मार्ग चुनेंगे। क्योंकि जो अपने ग़ुस्से पर विजय पा लेता है, वह सिर्फ़ जीतता नहीं, वह इतिहास बन जाता है।
जय श्री सीताराम 🙌

हिन्दी
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