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@ashishbccsl

Delhi Katılım Aralık 2023
405 Takip Edilen396 Takipçiler
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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है अभिषेक बनर्जी सबसे ताकतवर मुख्यमंत्रियों में से एक रहीं ममता बनर्जी के भतीजे हैं और पश्चिम बंगाल में बहुत बड़ा पावर सेंटर कुछ दिन पहले तक हुआ करते थे। ममता की सत्ता गई और लोग अब पता नहीं किन-किन बातों का बदला लेने पर उतारू हो गए हैं। आज उनके खिलाफ चोर चोर के नारे लगाए गए हैं। उन पर पत्थर और अंडे फेके गए हैं। मारा पीटा गया है। हेलमेट पहनकर जैसे तैसे अभिषेक ने खुद को बचाया है। राजनीति में आपके चाहे जितने मतभेद रहे हों लेकिन लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार को चाहिए कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इस मामले में दोषी लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो। अन्यथा इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। अगर कोई आरोप हैं, किसी को कोई शिकायत है तो उसके लिए कानूनी रास्ता अख्तियार किया जा सकता है। हिंसा को गलत ही कहा जाएगा।
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Nirmal Pareek
Nirmal Pareek@nirmal_pareek93·
साथियों कारवां लगातार बढ़ रहा है, आपने अभी तक सब्सक्राइब नहीं किया है तो कर लें, इससे हमारी ऊर्जा और ज्यादा बढ़ेगी! YouTube चैनल का लिंक ये रहा - @thelitmusnews?si=8M0z9Ra7yjPGI4VL" target="_blank" rel="nofollow noopener">youtube.com/@thelitmusnews#YouTube #Rajasthan
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ब्राह्मण साहब 🚩🐯
DCP साहब का नया बयान आया की आरोपी घायल अवस्था में पकड़े गए हैं जिस प्रदेश में एक अपराध पर इनकाउंटर हो जाता है उस प्रदेश में मासूम ब्राह्मण बच्चे के साथ हैवानियत जिसकी कोई शब्द नहीं उस तरीके से क्रूरता की जाती है और वो अपराधी घायल अवस्था में पकड़े जाते हैं जिसकी सजा मौत भी कम है उसका इनकाउंटर भी नहीं हो रहा है जिस अपराध ने पूरे मानवता को शर्मसार किया हो नहीं देना न्याय तो कहे सरकार नहीं देंगे - वो मासूम ब्राह्मण था और ब्राह्मणों की जान कीमत कहां है ? #गोपाल_के_हत्यारों_को_फांसी_दो
ब्राह्मण साहब 🚩🐯 tweet media
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Nirmal Pareek
Nirmal Pareek@nirmal_pareek93·
"नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे, मारवाड़ी भाषा के अत्याचार को नहीं सहेंगे" आज बाड़ी, धौलपुर में स्कूली बच्चों ने पोस्टरों के साथ विरोध-प्रदर्शन किया, पूर्वी राजस्थान में यह आंदोलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है! अभी भी समय है जिम्मेदारों को ठोस निर्णय लेकर और बातचीत के जरिए इसका समाधान ढूंढना चाहिए, लोगों को विश्वास में लेना चाहिए! #Rajasthan
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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
डरावना दृश्य सीकर का है घर के बाहर तसल्ली से बैठे लोगों पर अचानक लाठी-डंडों से हमला होता है। संभलने का मौका तक नहीं मिलता। गजब कानून व्यवस्था चल रही है। @PoliceRajasthan @SikarPolice
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À.
À.@Adityaverce·
Hey @grok What is this? Took a shower and found something that looked like hair on my shoulder then it moved
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ब्राह्मण साहब 🚩🐯
मामला ठंडा पड़ गया था घर वाले साफ साफ कह रहे बहुत कोशिश की गई मामला दब जाए इसलिए शायद नेशनल मीडिया तक में खबर नहीं आई वर्ना जिस मीडिया के पास चिटी के लापता हो जाने की खबर हो उस मीडिया को ऐसी क्रूरता नहीं दिखी ? हर हाल में दोषियों का एनकाउंटर होना चाहिए समाज में ऐसे क्रूर अपराधियों को जीने का कोई हक नहीं
ब्राह्मण साहब 🚩🐯 tweet media
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नवीन जयहिन्द🇮🇳
हमारे बाप जी हमारे राजा श्री धर्म प्रकाश भगवान को प्यारे हो गए है आज मंगलवार सुबह 🔟 दस बजे दाहसंस्कार होगा 🙏 🕉️ शांति गाव -भैंसरू कला सांपला रोहतक
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Nirmal Pareek
Nirmal Pareek@nirmal_pareek93·
पूर्वी राजस्थान में धीरे-धीरे "कथित राजस्थानी भाषा" का विरोध शुरू हो चुका है, भरतपुर, धोलपुर और करौली जिले में विरोध बढ़ता जा रहा है! ये वीडियो बसेड़ी,धौलपुर का है, इससे पहले भरतपुर में भी विरोध-प्रदर्शन हो चुका है! मुझे लगता है, जिम्मेदारों को पहले ही इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए, चाहे वो कोर्ट का रास्ता हो या जनता के बीच जाकर बातचीत करना हो, समाधान होना चाहिए! #Rajasthan
The Litmus@thelitmusnews

x.com/i/article/2055…

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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
आदरणीय नितिन गडकरी जी गौरव मित्तल मेरे मित्र हैं और एक जिम्मेदार बिजनेसमैन हैं। उनके साथ एक मजाकिया लेकिन परेशान करने वाली घटना हुई है। जब उनकी कार जोधपुर में थी तब उनकी कार का टोल मध्य प्रदेश के एक टोल नाके पर कट गया। गौरव के लिए एक, दो, चार टोल कटना बड़ी परेशानी की बात नहीं है क्योंकि इससे उन्हें बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। वे सक्षम व्यक्ति हैं लेकिन इससे आपका सिस्टम जरूर कठघरे में खड़ा होता है और सिस्टम से भरोसा भी उठता है। ऐसी घटनाएं आपकी छवि को भी बहुत बुरी तरह प्रभावित करने वाली हैं। गौरव के मामले की जांच जरूर करवाई जानी चाहिए और जो भी जिम्मेदार हो उसे सजा मिले। और अगर सिस्टम में कोई तकनीकी खामी है तो उसे ठीक किया जाना चाहिए। @nitin_gadkari @NHAI_Official
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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
मैंने रविंद्र सिंह भाटी को क्यों टोका? 1998 का साल था। तारीख थी 9 नवंबर। राजस्थान विश्वविद्यालय के द्वार पर छात्रों का धरना चल रहा था। चुनाव लेट हो गए थे। कुलपति का चार्ज किसी आईएएस अफसर को दे दिया गया था। नतीजे आए नहीं थे और नया सत्र शुरू हो गया था। इसके अलावा भी छात्रों की बहुत सारी समस्याएं थी। चुनाव से पहले छात्रों के धरने और प्रदर्शन सामान्य बात हैं। छात्र नेता खुद को आगे लाने के लिए धरने और प्रदर्शन करते ही हैं। समस्याएं हर साल होती हैं। उस साल कुछ ज्यादा थी। धरना प्रदर्शन में ध्यान खींचने वाली कुछ चीज सभी छात्र नेता और दूसरे लोग करते ही हैं। जैसे ही आप कुछ एक्स्ट्राऑर्डिनरी करते हैं तो सरकार, प्रशासन और आम लोगों का ध्यान उधर एकदम से चला जाता है। छात्रों के उस धरने में भी ऐसी ही कुछ प्लानिंग की गई। निशांत भारद्वाज नाम के एक छात्र को तैयार किया गया कि वह अपने ऊपर पेट्रोल डाल लेगा। उसे आग लगने से पहले ही बचा लिया जाएगा या आग लगाने के बाद बचाया जाएगा, क्या तय हुआ था, इस बारे में मैं ठीक-ठीक कुछ दावा नहीं कर सकता लेकिन बात कुछ ऐसी ही हुई थी। प्लानिंग के अनुसार निशांत भारद्वाज ने खुद के ऊपर पेट्रोल डाल लिया। आग भी लग गई। निशांत को बचाने के लिए लड़के दौड़े भी लेकिन तब तक आग फैल गई और जब आग फैल जाती है तो वह किसी के भी काबू में नहीं आती और कोई भी उसके पास में आने से डरता ही है। पेट्रोल से भड़की आग ऐसी ही होती है। वह आग नहीं जानती कि आप कोई छात्र नेता हो या नेता हो या कोई गृहिणी हो या कोई आम आदमी हो। निशांत काफी हद तक जल चुका था। थोड़ी ही देर में पुलिस और एंबुलेंस वगैरह सब आ गई। निशांत को अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे बचाने की खूब कोशिश की लेकिन अंतत: उसे बचाया नहीं जा सका। उस घटना को 28 साल बीत गए। जिनको नेता बनना था वो नेता बन गए। जिनको पढ़ लिख कर कुछ बनना था उन्होंने अपना रास्ता ले लिया। कुछ मेरे जैसे भी थे, जो जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाए होंगे। ख़ैर। मैंने आज शाम को उस जमाने के छात्रों से बात की और निशांत भारद्वाज के परिवार के बारे में जानने की कोशिश की। ईश्वर की कसम, किसी को पता नहीं है कि उसके बाद निशांत के परिवार का क्या हुआ और उसका परिवार आज किस हाल में है। लोग उस वक्त गुस्सा जताकर और श्रद्धांजलि देकर अपने-अपने घर चले गए। लेकिन किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं होती कि इंसान के जाने के बाद उसके परिवार की देखभाल कोई कर सके। रविंद्र ने भी सोच समझकर अपने ऊपर पेट्रोल डाला होगा क्योंकि पेट्रोल डालने के लिए पेट्रोल को बोतल में भरकर लाना भी पड़ता है। अचानक से आपके हाथ में पेट्रोल की बोतल नहीं आ जाती। उनका यह एक्ट बहुत खतरनाक था। रविंद्र सिंह भाटी जैसे युवा नेता लाखों में से कोई एक बन पाते हैं। हर किसी को ऐसी लोकप्रियता और सफलता भी नहीं मिल पाती। ऐसे में उनका इस तरह अपने ऊपर पेट्रोल डालना मुझे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगा। मैंने इसे गलत बताया और इसके कारण मैं आज शाम से ही आलोचना झेल रहा हूं। लंबे समय तक आलोचना झेलने के लिए तैयार हूं लेकिन इसके बावजूद में इसे गलत ही कहूंगा। मेरी आलोचना करने वालों, मुझे बिका हुआ बताने वालों से भी मैं कहना चाहता हूं कि मैं रविंद्र सिंह भाटी का शुभचिंतक हूं। यह लड़का मेरे सामने ही बड़ा हुआ है। मैं नहीं चाहता कि किसी छोटी-मोटी गलती के कारण कोई बड़ा नुकसान हो। रविंद्र के आज के एक्ट के लिए जो उनकी तारीफ कर रहे हैं, जो उनको डिफेंड कर रहे हैं, रविंद्र को उनसे दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
वह रे अंध समर्थकों... आज रविंद्र सिंह भाटी ने बाड़मेर में खुद पर पेट्रोल उड़ेल लिया। कानून की भाषा में तो इसे आत्महत्या का प्रयास कहा जाता है लेकिन व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो यह एक खतरनाक खेल है। राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान पेट्रोल उड़ेलने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि अगला आदमी सच में आत्मदाह करना ही चाहता है। इस बहाने से वह सिर्फ लोगों और सरकार को संदेश देना चाहता है। लेकिन ऐसे मौकों पर कई बार छोटी सी गलती हो जाती है और वह बहुत-बहुत भारी पड़ जाती है। पेट्रोल को फक़त एक चिंगारी ही बहुत होती है। उसके बाद क्या? उसके बाद किसी के हाथ में कुछ नहीं होता। और यह बेहद कड़वा सच है। वीडियो देखकर हमें तो बहुत खराब लगा और लिख दी अपनी बात। अब रविंद्र सिंह भाटी के समर्थकों के जो कमेंट आ रहे हैं, वो गजब के हैं। हम पत्रकारों को बिका हुआ बताया जा रहा है। तो भाई पहले यह बताओ कि खरीदा किसने? और इससे पहले जब रविंद्र के बाकी प्रदर्शनों, चुनावों में रविंद्र की तारीफ़ की तब क्या आपने खरीदा था? रविन्द्र सिंह भाटी को चाहिए कि वे अपने इन महान समर्थकों को काबू में रखें और समझाकर रखें। बात-बात में किसी को यूं बिका हुआ बोलकर वे आपका ही नुकसान कर रहे हैं। आपका करियर अभी बहुत पड़ा है। इन महान आत्माओं के हाथों इसे बर्बाद होने से बचाएं। हम सही को सही कहेंगे और गलत को गलत कहेंगे हमेशा @RavindraBhati__
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राजू वाल्मीकि चौहान@RajuValmikiN

गुर्जर समाज की महिला ने @rajkumarbhatisp को कहा, अपनी मां से पूछ लियो की कितने खसम थे ? अपनी लुगाई से भी पूछ लियो कितने खसम ? कभी चौड़ा हुआ हाड़ रहा हो कि मेरी लुगाई मेरे लिय करवाचौथ का व्रत रख रही हो

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डुंगरी बांध बनवा ले यदि बांध का पानी इतना अच्छा लगता हो तो 😂😂
🏹 Arjun Mehar | अर्जुन महर ☭@Arjun_Mehar

यह बांध इसलिए बना था कि पानी सबको मिले, न कि कोई उसे रोककर अपनी दादागिरी दिखाए.! यह बांध किसी एक समाज की जागीर नहीं है.! आज अगर बांध के निर्माण के 25-30 वर्षों बाद कोई एक समाज इस बाँध का पानी रोककर बैठा है तो यह सीधा-सीधा अन्याय है..! अब इतने वर्षों बाद न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बाद जब इस बांध के पानी को नहरों में खोलने की क़वायद हो रही है तो इस बांध के पानी को नहरों में खोला जाना चाहिए..! साथ इस इस बांध के निर्माण के दौरान जिनकी जमीन गई और जो विस्थापित हुए; उनके लिए भी योजना बननी चाहिए ताकि उन्हें भी सम्मानपूर्वक और नियमित पानी मिले.! उनका अधिकार किसी एहसान का मोहताज नहीं है..! साथ में इस पूरे मामलें के दौरान निभाये जा रहे भाईचारे को अच्छे से देख लो ताकि आगे भी तुम चारे की तरह इस्तेमाल होते रहो.! जब इन्हें ज़रूरत होती है तो तुम्हारे कंधों पर भाईचारे रूपी राजनीति की बंदूक रख दी जाती है और जब तुम्हारे हक की बात आयी तो ये सब या तो खामोश हो गए है या विरोधी हो गए है.! सबसे ज्यादा शर्मनाक है नेताओं की चुप्पी.! निर्वाचित प्रतिनिधि हों या बड़े-बड़े मंचों पर भाषण देने वाले चेहरे — जब समाज को गालियां दी जा रही हैं, जब समाज को चुनौती दी जा रही है, जब सम्मानित लोगों को अपमानित किया जा रहा है, जब अधिकार छीने जा रहे हैं, तब सब मौन हैं.! याद रखिए, अन्याय के समय की खामोशी भी अपराध होती है.! अन्याय के समय जो चुप रहता है, वह भी अन्याय का हिस्सा बन जाता है.! मैं इन नेताओं से पूछना चाहता हूँ कि क्या कुर्सी बचाना या कुर्सी पाना; समाज बचाने से ज्यादा जरूरी हो गया है.? तुम नेता लोग राजनीतिक रूप से इस्तेमाल हो सकते हो लेकिन आम जनता इस्तेमाल होने के लिए नहीं है बल्कि हक लेने और हिसाब मांगने के लिए भी तैयार है.! साथ में यह भी बात है कि सार्वजनिक संसाधन पर किसी एक समाज का कब्ज़ा लोकतंत्र नहीं बल्कि दादागिरी है.! यदि यही दादागिरी चंबल और बनास जैसी नदियों पर पर बने बांध के डूब क्षेत्र के लोग कर दे तो आधा राजस्थान प्यासा मर जाएगा; इसलिए पानी रोकने की ज़िद्द का त्याग करना चाहिए ताकि सबको पानी मिले.! अब वक्त है कि बांध का पानी नहरों में खुले और जिनकी जमीन गई, उनके लिए विशेष योजना बने..!

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Durag Singh Rajpurohit 🇮🇳
सर आपके लंबे संरक्षण पोस्ट में राजकुमार भाटी के बचाव की कमजोरियाँ साफ हैं। एडिटेड क्लिप वाली दलील आधी सच्ची हो सकती है, लेकिन पूरी क्लिप में भी दोहा दोहराया गया और हंसी हुई , सफाई नहीं बचती। और हां मनुवाद vs ब्राह्मण का फर्क आपका चतुर तर्क लगता है। आम ब्राह्मण इसे अपनी जाति पर हमला ही मानेंगे। भले ही आप भाटी जी को पाक साफ़ घोषित कर दो सर , भाटी जी की माफी FIR के बाद आई , दिल से नहीं, डैमेज कंट्रोल लगती है। चाहे कोई भी संदर्भ हो, पूरी जाति को वेश्या से बदतर बताना सामूहिक अपमान है, अस्वीकार्य है। आपकी इस निःशुल्क वकालत का हम विरोध करते है। #RajkumarBhati #CastePolitics
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan

राजकुमार भाटी पर हमले बंद करिए, जाति की अंधी गली के ज़हरीले अंधेरों से बाहर आइए! समाजवादी पार्टी के प्रखर और बेलौस नेता राजकुमार भाटी के प्रसंग को केवल एक बयान, एक कहावत, एक वायरल क्लिप या एक राजनीतिक विवाद की तरह पढ़ना हमारी बौद्धिक अकर्मण्यता है। यह प्रसंग दरअसल भारतीय समाज की उस भीतरी अँधेरी सुरंग को खोलता है, जिसमें सदियों से जाति, अपमान, व्यंग्य, श्रेणी-घमंड, सामाजिक हिंसा और सामूहिक कुंठाएँ एक साथ जमा पड़ी हैं। भाटी के एक भाषण की छोटी-सी क्लिप वायरल होने के बाद उन पर एफ़आईआर दर्ज़ हुई, उन्होंने माफ़ी भी मांगी और विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया। मैं बार-बार भाटी को सफ़ाई देते हुए सुन रहा हूँ कि उनके बारह मिनट के भाषण में से केवल सात सेकंड की क्लिप काटकर चलाई गई। सबसे पहले एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। किसी भी जाति, समुदाय या स्त्री के लिए अपमानजनक भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती। प्रगतिशीलता का अर्थ यह नहीं कि एक सामाजिक अन्याय के जवाब में दूसरा अपमान वैध हो जाए। मनुष्य की गरिमा अविभाज्य है। वह ब्राह्मण की भी है, दलित की भी है, पिछड़े की भी है, स्त्री की भी है, मुसलमान की भी है, आदिवासी की भी है। जो समाज एक मनुष्य की गरिमा को बचाते-बचाते दूसरे मनुष्य की गरिमा को कुचल देता है, वह अंततः न्याय नहीं, बदले की ख़राब सभ्यता बना रहा होता है। लेकिन इसी के साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम इस विवाद को एकतरफा नैतिक उन्माद में न बदल दें। राजकुमार भाटी उन गिने-चुने राजनीतिक प्रवक्ताओं में हैं, जो प्रायः तर्क, मर्यादा, भाषा-संयम और विचार की क्रमबद्धता के साथ बोलते हैं। आज के टीवी-युग में, जहाँ बहुत से प्रवक्ता शब्दों को ईंट-पत्थर की तरह फेंकते हैं, जहाँ सत्ता पक्ष के पक्ष एक तो टीवी ऐंकर ख़ुद होती हैं, दूसरा एक सत्ता पक्ष का प्रभावशाली प्रवक्ता होता है, तीसरा उनके पक्ष में तटस्थ विश्लेषक होता है, वहाँ चारों तरफ से हो रहे हमलों के बीच बिना विचलित हुए भाटी जैसे व्यक्ति संयमित होकर बोलना, तर्क रखना और लाख गुस्सा दिलाने पर भी अच्छी भाषा बोलना, उनक परिपक्वता को दर्शाता है। मैंने उन्हें ऐसी कितनी ही टीवी डिबेट्स में देखा है, जहाँ एंकर मानो अभी-अभी किसी मनोचिकित्सालय से निकलकर कार्यक्रम का आयोजन करने को विवश हों। भाटी के सार्वजनिक भाषण की शैली भी सामान्यतः बहस की संस्कृति को मज़बूत करती है। ऐसे व्यक्ति को एक लोक-कहावत के संदर्भ के आधार पर स्थायी अपराधी बना देना विचार-विमर्श नहीं, भीड़-न्याय है। कंगारू कोर्ट लगा लेना है। भारत का जातीय समाज कहावतों, मुहावरों और लोक-व्यंग्यों से भरा पड़ा है। कोई जाति नहीं बची, जिसे दूसरी जाति ने कभी तिरस्कारपूर्ण भाषा में न पुकारा हो। गाँवों, कस्बों और शहरों के घरेलू नक्शे तक जाति-सूचक भाषा से बने हैं, “वो जाटों का घर”, “वो गुर्जरों की बस्ती”, “वो राजपूतों की हवेली”, “वो ब्राह्मणों की गली”, “वो सिंधियों की दुकान।” यह भाषा केवल पहचान नहीं बताती; कई बार उसके भीतर एक अदृश्य अहंकार, दूरी और सामाजिक वर्गीकरण भी छिपा होता है। हम इतने जातिग्रस्त समाज में रहते हैं कि हमें जाति-सूचक बोलियाँ असभ्यता नहीं, सामान्य बातचीत लगती हैं। यहीं हमें इतिहास की ओर देखना पड़ेगा। जाति का ज़हर किसी एक दिन, एक बयान या एक कहावत से पैदा नहीं हुआ। यह उस दीर्घ सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है, जिसने मनुष्यों को जन्म के आधार पर ऊँचा-नीचा बांटा। मनुस्मृति जैसी ग्रंथ-परंपराओं ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की श्रेणियाँ गढ़कर समाज को स्थायी पदानुक्रम में बाँधा। इस व्यवस्था में असंख्य समुदायों को ज्ञान, संपत्ति, सम्मान और स्वतंत्रता से वंचित रखा गया। इसलिए जातियों के मानस में दबे हुए सच हैं, दबी हुई पीड़ाएँ हैं, दबी हुई प्रतिहिंसाएँ हैं। जब वे बाहर आती हैं तो सभ्य भाषा में नहीं आतीं; वे टूटे हुए इतिहास की तरह आती हैं। कभी करुण, कभी कड़वी, कभी असावधान, कभी अस्वीकार्य। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि एक कहावत ग़लत थी या नहीं। यदि वह अपमानजनक है तो निश्चित रूप से ग़लत है। प्रश्न यह है कि क्या हम केवल उस कहावत पर क्रोधित होंगे या उस पूरी सभ्यता पर भी विचार करेंगे, जिसने ऐसी कहावतों को जन्म दिया? क्या हम केवल बोलने वाले को दंडित करेंगे या उस सामाजिक संरचना को भी देखेंगे, जिसमें जाति आज भी विवाह, भोजन, राजनीति, गांव की चौपाल, शहरी सोसायटी, नौकरी, नेतृत्व और प्रतिष्ठा को नियंत्रित करती है? रामधारी सिंह दिनकर की "संस्कृति के चार अध्याय" पढ़िए। उसमें कहावतों का पूरा एक अध्याय ही है कि भारतीय समाज किस कोढ़ से ग्रस्त है। भारतीय समाज की अंदरूनी ऐतिहासिक परतें खुलती हैं। पुराने साहित्य, लोक-स्मृति और सामाजिक व्यवहार में जातियों पर एक-दूसरे के प्रति तंज, अविश्वास और अपमान के असंख्य उदाहरण मिलते हैं। यह हमारा सामूहिक सांस्कृतिक अँधेरा है। कोई भी जाति इस अँधेरे से पूरी तरह निर्दोष बाहर नहीं आती। हर समुदाय ने किसी न किसी रूप में दूसरे को छोटा किया है और किसी न किसी रूप में स्वयं छोटा किया गया है। राहुल सांकृत्यायन ने "तुम्हारी क्षय" जैसी पुस्तक लिखकर न केवल सड़ी-गली जाति-व्यवस्था पर घोर तीखा हमला किया था, समाज, धर्म, सदाचार, भगवान् और शोषक जोंको पर अपनी कलम तलवार की तरह चलाई थी। उन्होंने ठीक कहा था, जाति-पांत का क्षय होना चाहिए। यह केवल सुधारवादी नारा नहीं, आधुनिक भारत की बुनियादी शर्त है। जब तक जाति रहेगी, लोकतंत्र आधा रहेगा। जब तक जाति रहेगी, समाजवाद खोखला रहेगा। जब तक जाति रहेगी, मानवतावाद अधूरा रहेगा। और जब तक जाति रहेगी, भारतीय राष्ट्र एक जीवित नैतिक समुदाय नहीं, असंख्य टूटे हुए खाँचों का थका हुआ समूह बना रहेगा। इसलिए आज ज़रूरत राजकुमार भाटी को अपमानित कराने की नहीं, उनसे संवाद करने की है। यदि उन्होंने कोई ग़लत या अपमानजनक कहावत उद्धृत की तो उसकी आलोचना होनी चाहिए; पर आलोचना का अर्थ व्यक्तित्व का बार-बार हनन नहीं होता। उन्होंने इतनी नफ़ासद और मन की गहराई से माफ़ी मांग ली। लेकिन उनसे माफी मंगवाकर, हाथ जुड़वाकर, अपमानित कराकर किस नैतिक विजय का अनुभव किया जा रहा है? यह दृश्य मुझे एक सभ्य समाज का नहीं, एक भयभीत समाज का दृश्य लगता है, जहाँ हर समुदाय अपनी पीड़ा को न्याय में नहीं, दंड में बदल देना चाहता है। और जो लोग ब्राह्मण-आहत अस्मिता के नाम पर आज उग्र हैं, वे अपने ही इतिहास की आलोचनात्मक परंपरा से भी परिचित हों। स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज में फैले पाखंड, अज्ञान, कर्मकांड और पतन की कठोर आलोचना की थी। उन्होंने उन पुरोहितवादी और ब्राह्मणवादी प्रवृत्तियों पर तीखे प्रहार किए थे, जिन्हें वे समाज की बौद्धिक गिरावट का कारण मानते थे। यदि आलोचना से इतना ही भय है तो फिर सुधार-परंपरा को भी कठघरे में खड़ा करना पड़ेगा। दयानंद ने तो ब्राह्णणों को "पोप" यानी पाखंडी कहा था और वे ख़ुद एक ब्राह्मण थे। ब्राह्मणवाद पर सबसे अधिक आक्रामक हमले करने वालों में ख़ुद ब्राह्मण ही रहे हैं। दरअसल, हमारे भीतर एक अँधेरी सीढ़ी है, जिसके नीचे जाति का अजगर कुंडली मारे बैठा है। हम ऊपर लोकतंत्र की रोशनी में भाषण देते हैं, संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हैं, हम पढृ लिखकर पहले से अधिक चालाक और शातिर हो गए हैं, समानता की दुहाई देते हैं; लेकिन घर लौटते ही वही जाति पूछते हैं, वही खानदान, वही कुल, वही गोत्र, वही ऊँच-नीच। यह दोहरा जीवन ही हमारी राष्ट्रीय आत्मा का संकट है। अब समय आ गया है कि हम कहें, हिंदुस्तानी ही एक जाति है। उससे भी आगे बढ़कर कहें, मनुष्य ही एक जाति है। जन्म कोई योग्यता नहीं, वंश कोई नैतिक प्रमाणपत्र नहीं और जाति कोई सभ्यता नहीं। जाति एक अंधी गली है। इसमें जितना आगे जाएंगे, उतना अँधेरा बढ़ेगा। बाहर निकलना होगा। तर्क से, करुणा से, आत्मालोचना से और उस साहस से जो अपने समुदाय की ग़लती भी देख सके और दूसरे समुदाय की पीड़ा भी समझ सके। कुल मिलाकर, राजकुमार भाटी पर हमला बंद कीजिए। बात कहावत से बड़ी है। बीमारी समाज की है। इलाज भी समाज को ही करना होगा। @rajkumarbhatisp

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Akash Tiwari
Akash Tiwari@AkashgauravJR·
अभिषेक और अनिल के बीच टक्कर है और अनिल के लिए कुनबा लगातार बड़ा हुआ है। जिन इलाकों में वैक्यूम था वहां, काम कर लिया गया है। वहीं, अभिषेक चौधरी शुरू से ही मजबूत तरीके से मैदान में है। @AnilChopra_ @withabhinsui
राजस्थानी काका 💪🙏@Rajsthanikaka

युवा कांग्रेस चुनाव में बम्पर 24.5 लाख वोटिंग पार अनिल की रगड़ाई सब पर भारी पड़ती नजर आ रही है सूत्र बताते है की अनिल और अभिषेक में कड़ा मुकाबला है आगामी 6 दिन की वोटिंग बहुत कारगार साबित होगी ये चुनाव ओवरकॉन्फ़िडेंस का बिल्कुल नहीं है 👍🙏

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राजस्थानी वक्ता
राजस्थान में बीजेपी के एक विधायक 2028 के चुनाव में बगावत करके हनुमान बेनीवाल के समर्थन से चुनाव लड़ेंगे!
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सपा नेता राजकुमार भाटी द्वारा ब्राम्हणों पर दिए गए बयान ने साबित कर दिया है कि राजकुमार के परिवार में वेश्यावृति का बड़ा प्रभाव रहा है, राजकुमार का जन्म भी कुछ ऐसे ही मान लिया जाना चाहिए....बात खत्म..!
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आजाद परिंदा 💪💪🏞️🏞️🌅🌄🌄🌄🏜️🏜️ retweetledi