आजाद परिंदा 💪💪🏞️🏞️🌅🌄🌄🌄🏜️🏜️
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राजकुमार भाटी पर हमले बंद करिए, जाति की अंधी गली के ज़हरीले अंधेरों से बाहर आइए! समाजवादी पार्टी के प्रखर और बेलौस नेता राजकुमार भाटी के प्रसंग को केवल एक बयान, एक कहावत, एक वायरल क्लिप या एक राजनीतिक विवाद की तरह पढ़ना हमारी बौद्धिक अकर्मण्यता है। यह प्रसंग दरअसल भारतीय समाज की उस भीतरी अँधेरी सुरंग को खोलता है, जिसमें सदियों से जाति, अपमान, व्यंग्य, श्रेणी-घमंड, सामाजिक हिंसा और सामूहिक कुंठाएँ एक साथ जमा पड़ी हैं। भाटी के एक भाषण की छोटी-सी क्लिप वायरल होने के बाद उन पर एफ़आईआर दर्ज़ हुई, उन्होंने माफ़ी भी मांगी और विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया। मैं बार-बार भाटी को सफ़ाई देते हुए सुन रहा हूँ कि उनके बारह मिनट के भाषण में से केवल सात सेकंड की क्लिप काटकर चलाई गई। सबसे पहले एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। किसी भी जाति, समुदाय या स्त्री के लिए अपमानजनक भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती। प्रगतिशीलता का अर्थ यह नहीं कि एक सामाजिक अन्याय के जवाब में दूसरा अपमान वैध हो जाए। मनुष्य की गरिमा अविभाज्य है। वह ब्राह्मण की भी है, दलित की भी है, पिछड़े की भी है, स्त्री की भी है, मुसलमान की भी है, आदिवासी की भी है। जो समाज एक मनुष्य की गरिमा को बचाते-बचाते दूसरे मनुष्य की गरिमा को कुचल देता है, वह अंततः न्याय नहीं, बदले की ख़राब सभ्यता बना रहा होता है। लेकिन इसी के साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम इस विवाद को एकतरफा नैतिक उन्माद में न बदल दें। राजकुमार भाटी उन गिने-चुने राजनीतिक प्रवक्ताओं में हैं, जो प्रायः तर्क, मर्यादा, भाषा-संयम और विचार की क्रमबद्धता के साथ बोलते हैं। आज के टीवी-युग में, जहाँ बहुत से प्रवक्ता शब्दों को ईंट-पत्थर की तरह फेंकते हैं, जहाँ सत्ता पक्ष के पक्ष एक तो टीवी ऐंकर ख़ुद होती हैं, दूसरा एक सत्ता पक्ष का प्रभावशाली प्रवक्ता होता है, तीसरा उनके पक्ष में तटस्थ विश्लेषक होता है, वहाँ चारों तरफ से हो रहे हमलों के बीच बिना विचलित हुए भाटी जैसे व्यक्ति संयमित होकर बोलना, तर्क रखना और लाख गुस्सा दिलाने पर भी अच्छी भाषा बोलना, उनक परिपक्वता को दर्शाता है। मैंने उन्हें ऐसी कितनी ही टीवी डिबेट्स में देखा है, जहाँ एंकर मानो अभी-अभी किसी मनोचिकित्सालय से निकलकर कार्यक्रम का आयोजन करने को विवश हों। भाटी के सार्वजनिक भाषण की शैली भी सामान्यतः बहस की संस्कृति को मज़बूत करती है। ऐसे व्यक्ति को एक लोक-कहावत के संदर्भ के आधार पर स्थायी अपराधी बना देना विचार-विमर्श नहीं, भीड़-न्याय है। कंगारू कोर्ट लगा लेना है। भारत का जातीय समाज कहावतों, मुहावरों और लोक-व्यंग्यों से भरा पड़ा है। कोई जाति नहीं बची, जिसे दूसरी जाति ने कभी तिरस्कारपूर्ण भाषा में न पुकारा हो। गाँवों, कस्बों और शहरों के घरेलू नक्शे तक जाति-सूचक भाषा से बने हैं, “वो जाटों का घर”, “वो गुर्जरों की बस्ती”, “वो राजपूतों की हवेली”, “वो ब्राह्मणों की गली”, “वो सिंधियों की दुकान।” यह भाषा केवल पहचान नहीं बताती; कई बार उसके भीतर एक अदृश्य अहंकार, दूरी और सामाजिक वर्गीकरण भी छिपा होता है। हम इतने जातिग्रस्त समाज में रहते हैं कि हमें जाति-सूचक बोलियाँ असभ्यता नहीं, सामान्य बातचीत लगती हैं। यहीं हमें इतिहास की ओर देखना पड़ेगा। जाति का ज़हर किसी एक दिन, एक बयान या एक कहावत से पैदा नहीं हुआ। यह उस दीर्घ सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है, जिसने मनुष्यों को जन्म के आधार पर ऊँचा-नीचा बांटा। मनुस्मृति जैसी ग्रंथ-परंपराओं ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की श्रेणियाँ गढ़कर समाज को स्थायी पदानुक्रम में बाँधा। इस व्यवस्था में असंख्य समुदायों को ज्ञान, संपत्ति, सम्मान और स्वतंत्रता से वंचित रखा गया। इसलिए जातियों के मानस में दबे हुए सच हैं, दबी हुई पीड़ाएँ हैं, दबी हुई प्रतिहिंसाएँ हैं। जब वे बाहर आती हैं तो सभ्य भाषा में नहीं आतीं; वे टूटे हुए इतिहास की तरह आती हैं। कभी करुण, कभी कड़वी, कभी असावधान, कभी अस्वीकार्य। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि एक कहावत ग़लत थी या नहीं। यदि वह अपमानजनक है तो निश्चित रूप से ग़लत है। प्रश्न यह है कि क्या हम केवल उस कहावत पर क्रोधित होंगे या उस पूरी सभ्यता पर भी विचार करेंगे, जिसने ऐसी कहावतों को जन्म दिया? क्या हम केवल बोलने वाले को दंडित करेंगे या उस सामाजिक संरचना को भी देखेंगे, जिसमें जाति आज भी विवाह, भोजन, राजनीति, गांव की चौपाल, शहरी सोसायटी, नौकरी, नेतृत्व और प्रतिष्ठा को नियंत्रित करती है? रामधारी सिंह दिनकर की "संस्कृति के चार अध्याय" पढ़िए। उसमें कहावतों का पूरा एक अध्याय ही है कि भारतीय समाज किस कोढ़ से ग्रस्त है। भारतीय समाज की अंदरूनी ऐतिहासिक परतें खुलती हैं। पुराने साहित्य, लोक-स्मृति और सामाजिक व्यवहार में जातियों पर एक-दूसरे के प्रति तंज, अविश्वास और अपमान के असंख्य उदाहरण मिलते हैं। यह हमारा सामूहिक सांस्कृतिक अँधेरा है। कोई भी जाति इस अँधेरे से पूरी तरह निर्दोष बाहर नहीं आती। हर समुदाय ने किसी न किसी रूप में दूसरे को छोटा किया है और किसी न किसी रूप में स्वयं छोटा किया गया है। राहुल सांकृत्यायन ने "तुम्हारी क्षय" जैसी पुस्तक लिखकर न केवल सड़ी-गली जाति-व्यवस्था पर घोर तीखा हमला किया था, समाज, धर्म, सदाचार, भगवान् और शोषक जोंको पर अपनी कलम तलवार की तरह चलाई थी। उन्होंने ठीक कहा था, जाति-पांत का क्षय होना चाहिए। यह केवल सुधारवादी नारा नहीं, आधुनिक भारत की बुनियादी शर्त है। जब तक जाति रहेगी, लोकतंत्र आधा रहेगा। जब तक जाति रहेगी, समाजवाद खोखला रहेगा। जब तक जाति रहेगी, मानवतावाद अधूरा रहेगा। और जब तक जाति रहेगी, भारतीय राष्ट्र एक जीवित नैतिक समुदाय नहीं, असंख्य टूटे हुए खाँचों का थका हुआ समूह बना रहेगा। इसलिए आज ज़रूरत राजकुमार भाटी को अपमानित कराने की नहीं, उनसे संवाद करने की है। यदि उन्होंने कोई ग़लत या अपमानजनक कहावत उद्धृत की तो उसकी आलोचना होनी चाहिए; पर आलोचना का अर्थ व्यक्तित्व का बार-बार हनन नहीं होता। उन्होंने इतनी नफ़ासद और मन की गहराई से माफ़ी मांग ली। लेकिन उनसे माफी मंगवाकर, हाथ जुड़वाकर, अपमानित कराकर किस नैतिक विजय का अनुभव किया जा रहा है? यह दृश्य मुझे एक सभ्य समाज का नहीं, एक भयभीत समाज का दृश्य लगता है, जहाँ हर समुदाय अपनी पीड़ा को न्याय में नहीं, दंड में बदल देना चाहता है। और जो लोग ब्राह्मण-आहत अस्मिता के नाम पर आज उग्र हैं, वे अपने ही इतिहास की आलोचनात्मक परंपरा से भी परिचित हों। स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज में फैले पाखंड, अज्ञान, कर्मकांड और पतन की कठोर आलोचना की थी। उन्होंने उन पुरोहितवादी और ब्राह्मणवादी प्रवृत्तियों पर तीखे प्रहार किए थे, जिन्हें वे समाज की बौद्धिक गिरावट का कारण मानते थे। यदि आलोचना से इतना ही भय है तो फिर सुधार-परंपरा को भी कठघरे में खड़ा करना पड़ेगा। दयानंद ने तो ब्राह्णणों को "पोप" यानी पाखंडी कहा था और वे ख़ुद एक ब्राह्मण थे। ब्राह्मणवाद पर सबसे अधिक आक्रामक हमले करने वालों में ख़ुद ब्राह्मण ही रहे हैं। दरअसल, हमारे भीतर एक अँधेरी सीढ़ी है, जिसके नीचे जाति का अजगर कुंडली मारे बैठा है। हम ऊपर लोकतंत्र की रोशनी में भाषण देते हैं, संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हैं, हम पढृ लिखकर पहले से अधिक चालाक और शातिर हो गए हैं, समानता की दुहाई देते हैं; लेकिन घर लौटते ही वही जाति पूछते हैं, वही खानदान, वही कुल, वही गोत्र, वही ऊँच-नीच। यह दोहरा जीवन ही हमारी राष्ट्रीय आत्मा का संकट है। अब समय आ गया है कि हम कहें, हिंदुस्तानी ही एक जाति है। उससे भी आगे बढ़कर कहें, मनुष्य ही एक जाति है। जन्म कोई योग्यता नहीं, वंश कोई नैतिक प्रमाणपत्र नहीं और जाति कोई सभ्यता नहीं। जाति एक अंधी गली है। इसमें जितना आगे जाएंगे, उतना अँधेरा बढ़ेगा। बाहर निकलना होगा। तर्क से, करुणा से, आत्मालोचना से और उस साहस से जो अपने समुदाय की ग़लती भी देख सके और दूसरे समुदाय की पीड़ा भी समझ सके। कुल मिलाकर, राजकुमार भाटी पर हमला बंद कीजिए। बात कहावत से बड़ी है। बीमारी समाज की है। इलाज भी समाज को ही करना होगा। @rajkumarbhatisp

युवा कांग्रेस चुनाव में बम्पर 24.5 लाख वोटिंग पार अनिल की रगड़ाई सब पर भारी पड़ती नजर आ रही है सूत्र बताते है की अनिल और अभिषेक में कड़ा मुकाबला है आगामी 6 दिन की वोटिंग बहुत कारगार साबित होगी ये चुनाव ओवरकॉन्फ़िडेंस का बिल्कुल नहीं है 👍🙏


हनुमानगढ़ के 16 वर्षीय गरीब बालक के साथ क्रूरतम वारदात करने वाले हैवानों के खिलाफ़ तब जाकर तो बड़ी धाराओं पर विचार हुआ जब भाजपा नेता राजेन्द्र राठौड़ जी ने SP को कॉल किये। लेकिन ताज्जुब कि वो दुर्दांत अपराधी पुलिस की गिरफ्त में भी कॉन्फिडेंट से दिखे। देखते हैं आगे क्या कड़ी कार्यवाही होती है।





