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@ashtiwari06

गोताख़ोर समय के आगे याचक होकर जाना कैसा ?

Lucknow, India Katılım Ağustos 2011
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देहाती@ashtiwari06·
आवाज सुनिये 💕
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Dr. Gurmeet Bhatia
Dr. Gurmeet Bhatia@GurmeetBha53034·
कहानी...किशोर कुमार की कुछ ऐसे हुआ करते थे किशोर कुमार
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रत्नेश राय सांकृत 🇮🇳
शाकाहारी होना भी एक विडंबना हो जाएगा आने वाले समय में आज गोरखपुर जिले के बगल के एक कस्बे में रात्रि के समय भोजन की तलाश में कम से कम 10 जगह गया। और लगभग प्रत्येक जगह नॉनवेज ही था। ना खाने वाले समझ सकते हैं मनोदशा को, थक हार कर mother dairy का एक दूध और एक पैकेट ब्रेड से काम चलाना पड़ा है। महाराज जी के जिले में शाकाहारी खाने की इतनी किल्लत होगी, सोच नहीं सकता था 😅😅
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Inara🍁
Inara🍁@happily_alive11·
On one week break,please suggest a nice book :)
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देहाती@ashtiwari06·
@GYANDUTT आप तीरे - तीरे नर्मदा की बात कर रहे हैं !
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
सन 1977 में वेगड़ जी ने नर्मदा यात्रा की — तब बरगी बाँध नहीं था। नर्मदा से निकटता और आत्मीयता दोनों रही होगी तब। अब तो वेगड़ जी भी नहीं रहे। बरगी बाँध बना — हज़ारों एकड़ जंगल डूबे, गाँव डूबे, लोग उजड़े। नर्मदा का स्वभाव बदला। जो oral history थी — बुज़ुर्गों की स्मृति में, उनकी भाषा में — वह भी धीरे-धीरे डूब गई। अब न वे लोग हैं, न वे किनारे, न वह नर्मदा। नक्शे में देखता हूँ तो बरगी का जलभराव ड्रेगन जैसा दिखता है — कहीं मोटा, कहीं पतला, कहीं पतली-पतली पूँछ जैसा। प्रेमसागर अभी उसी पूँछ के पास हैं। आगे पूरा ड्रेगन होगा। पर दंड यात्री बेखबर निकलता जायेगा। किसी बुज़ुर्ग के पास नहीं बैठेगा — "बाबा, आपके बचपन में नर्मदा माई कैसी रही होंगी?" यह प्रश्न नहीं पूछेगा। बरगी का नाम नहीं लेगा कभी। नर्मदा के बदलाव से अनजान — प्रेमसागर की देह परिक्रमा कर रही है, नर्मदा अनजानी रहती है। बरगी का ड्रेगन बुलायेगा भी नहीं। और लोग भी उसकी बात नहीं करेंगे। यह विस्मृति भी तो एक त्रासदी है। नर्मदे हर! #NarmadaDandParikrama
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देहाती
देहाती@ashtiwari06·
@IOCL_UP I have booked a 5 kg LPG cylinder but have not received delivery yet. I have the booking screenshot as proof. Whenever I call the agency, they say the cylinder is not in stock, and when it arrives, I will have to collect it myself as they will not provide home delivery.
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Anshu Dubey
Anshu Dubey@AnshuDubey27·
@ashtiwari06 @prabhatranjann @Shrimaan @saket71 जब लिखना होगा स्वयं सूझ जाएगा। प्रतिभा से लेखन स्वयं के लिये या विशेष प्रेरणा के कारण होता है। अन्य के लिये लिखना, या तो व्यवसाय होता है या अहंकार की पुष्टि, वो लेखन कहाँ होता है!
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Prabhat Ranjan
Prabhat Ranjan@prabhatranjann·
हिंदी के जितने क्लासिक उपन्यास हैं उनमें एक तरह की आत्मपरकता है, निजता है। प्रेमचंद के 'गोदान' के होरी में प्रेमचंद की छवि दिखाई देती है, 'शेखर एक जीवनी' के शेखर और शशि को लेकर बहुत लिखा गया है, 'गुनाहों का देवता' की सुधा और चंदर के बारे में भी हिंदी के अंदरख़ाने तरह-तरह की चर्चाएँ होती रही हैं। 'नदी के द्वीप' उपन्यास में लेखक ने उपन्यास में अपनी कहानी लिखी तो बाहर हिंदी समाज में कई कहानियाँ सुनाई जाती रहीं। यही बात मैला आँचल, परती परिकथा, आधा गाँव, रागदरबारी से लेकर पचपन खम्बे लाल दीवारें तक को लेकर रही हैं। जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आया था तो जिस वीमेंस कॉलेज के बाहर से गुजरता यह देखने की कोशिश करता कि उसकी दीवारें लाल हैं या नहीं, खम्बे कितने हैं? कहने का मतलब है कि हम उपन्यास से लेखक को, उसके परिवेश जो जोड़कर देखते और उसमें एक विशेष रोमांच का अनुभव करते थे। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि निर्मल वर्मा की आभिजात्य छवि बनाने में उनके उपन्यासों के परिवेश का भी बड़ा योगदान रहा। इसी तरह जब मैं विनोद कुमार शुक्ल जी से मिला तब तक मैं उनके सभी उपन्यास पढ़ चुका था और उनके लेखन के ज़बर्दस्त सम्मोहन में भी था। उनसे मिलने के बाद उनके पात्रों की निश्छलता का सूत्र समझ में आया, या मनोहर श्याम जोशी के साथ समय बिताकर उनका भाषा-कौशल। बहुत से नाम गिनवाए जा सकते हैं। मूल बात यह है कि लम्बे समय तक हम लेखक को उसकी रचनाओं से जोड़कर देखते रहे, लेखक के लिखे में उसकी एक न एक छवि आ ही जाती थी। असग़र वजाहत का उपन्यास 'सात आसमान' पढ़ने के बाद मैंने उनको ज्यादा समझा या 'लेकिन दरवाजा' पढ़ने के बाद पंकज बिष्ट से मिला तो तार्किकता को लेकर उनकी ज़िद से उस उपन्यास का नायक जुड़ने लगा। असल में मैं कहना यह चाहता हूँ कि इक्कीसवीं शताब्दी के उपन्यासों को पढ़ते हुए लेखक का 'आत्म' नहीं दिखाई देता है। हिंदी उपन्यासों का एक बड़ा शिफ़्ट यह दिखाई दिया कि लेखक अपने आत्म से निकलकर अधिक सार्वजनिक हो गया। वह अपना कम लिखने लगा है और विषयपरक लिखने लगा है। यह अच्छी बात है या बुरी यह नहीं कहना चाहता लेकिन यह एक बदलाव है जो दिखाई देता है।
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Anshu Dubey
Anshu Dubey@AnshuDubey27·
@prabhatranjann @ashtiwari06 उत्तम उद्गार 🙏🏻 @Shrimaan @saket71 @ashtiwari06 की शैली में लेखक के दर्शन होते हैं, यही मुझे सर्वाधिक अभिवादन योग्य लगता है!
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Prabhat Ranjan
Prabhat Ranjan@prabhatranjann·
हम हिंदी वाले बड़े कृतघ्न होते हैं. हम लेखकों को तो याद करते हैं लेकिन ऐसे विद्वानों को नहीं जिन्होंने भाषा को संवारने, कोश तैयार करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया. आज प्रसिद्ध भाषाविद हरदेव बाहरी की पुण्यतिथि है. सोचा उनके बारे में कुछ साझा किया जाए तो उनका विकीपीडिया पेज तक नहीं मिला. उनके बनाए कोश इन्टरनेट पर हर साईट पर बिक्री के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन गूगल उनकी प्रामाणिक तस्वीर तक उपलब्ध नहीं करवा पाया. शब्दों के वास्तुकार को शब्दों से याद करते हुए प्रणाम करता हूँ.
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Sameer
Sameer@BesuraTaansane·
Beautiful clip - Shubh Gudi Padwa 💐💕 #GudiPadwa2026
Indonesia
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राधा
राधा@Prem_Ki_Boli·
अपने बारे में नकारात्मक मत बोलो भले ही मज़ाक में ही क्यों न हो तुम्हारा शरीर मज़ाक और सच में फर्क़ नहीं जानता शब्द ऊर्जा होते हैं और वे प्रभाव डालते हैं इसीलिए इसे spelling (मंत्रोच्चार जैसा) कहा जाता है अपने बारे में बोलने का तरीका बदलो तुम अपना जीवन बदल सकते हो... ~ब्रूस ली
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Kanak Agarwal
Kanak Agarwal@KanakAg04035055·
तंग राहों से गुज़र रही है ज़िंदगी,, ख़ुद अपने ही हाथों घुट रही है ज़िंदगी.. हो इजाज़त तो इक आस का बिरवा लगा लूँ,, क्या ख़बर कब तलक़ चल रही है ज़िंदगी...!! ~कनु #छोटा_दरवाज़ा #ज़िंदगी
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देहाती
देहाती@ashtiwari06·
मिला बहुत कुछ, सब कुछ बेपेंदी का ! #अज्ञेय
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अनुराग Anurag
अनुराग Anurag@anuragrbl·
शब्द, यह सही है, सब व्यर्थ हैं पर इसीलिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ हैं। शायद केवल इतना ही : जो दर्द है वह बड़ा है, मुझसे ही सहा नहीं गया। तभी तो, जो अभी और रहा, वह कहा नहीं गया। - जो कहा नहीं गया, अज्ञेय #जन्मतिथि
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Renu
Renu@RenMishra·
तमाम जाल फेंकती है जिंदगी फाँसने को लुभाने को जब तक समझ आती है चाल मन फँस चुका होता है मुक्ति को तड़प रहा होता है #जिंदगी
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देहाती
देहाती@ashtiwari06·
यात्राएं मन का सुकून हैं ...... पहाड़ों की यात्राओं में नदियों का कल कल बहना कहीं तपती धूप तो कहीं ठंड से हल्का ठिठुरना सुदूर चोटी को एकटक देखकर फिर आगे को बढ़ना यात्राएं सिखाती हैं हमें टूट जाओ तब भी आगे ही बढ़ना...... इनको पढ़िए, यात्राएं कर रही हैं आजकल 😊
Jyoti Gupta@JyotiGupta0205

और चट्टानों से टकरा कर उफनती लहरों के सहारे हम एक दूसरे को चूमते है, हां! "हम पहाड़ों के आसपास" ऐसे ही मिलते है ।। #ज्योतिG __________ #ऋषिकेश #rishikesh #travelphotography #WritingCommunity

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Jyoti Gupta
Jyoti Gupta@JyotiGupta0205·
In every mindful stretch, the breath writes poetry within. Through gentle movement and stillness, the soul remembers its rhythm. So, Start your yoga journey with me. (Online classes available)✅ Ask details "Embrace Yoga"completed it's 1 year with all your support. Thank you🌼
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sarita trivedi 'Nirjhara
sarita trivedi 'Nirjhara@SaritaTrivediR1·
जितना कुछ छूटता जाता है उतना ही पीछे छोड़ जाता है लोग छूटते हैं तो छोड़ जाते है ढ़ेरों स्मृतियां और बहुत से सबक लहरें पीछे हटती है तो छोड जाती है सीप शंख और रेत थमती है हवा तो थम जाते है बादल भी सूरज डूबता है तो छोड़ जाता है कजलाई रात तारों के साथ झरते फूल छोड़ जाते है व्यापक जीवन दर्शन कुछ न बचे...ऐसा कभी हो नही सकता । हमेशा छूटती चीजें छोड़ जाती है नये अनुभव ... नयी नज़र नया नज़रिया...❤️ ...st
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