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वंदे मातरम के पूर्ण रूप को गाने सबसे पहले विरोध मुख्य रूप से मुस्लिम लीग और कुछ मुस्लिम नेताओं ने किया था।
गीत के कुछ छंदों में माँ दुर्गा और हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुति थी, जिसे वे धार्मिक रूप से संवेदनशील मानते थे।
“विरोध करने वाले और उनका तर्क”
• - मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग (1937-1947)
1937 में जब कांग्रेस ने कुछ प्रांतों में वंदे मातरम को अनिवार्य रूप से गाने का नियम बनाया, तो मुस्लिम लीग ने इसका तीव्र विरोध किया।
•- जिन्ना ने कहा कि यह गीत मूर्तिपूजा को बढ़ावा देता है, जो इस्लाम के खिलाफ है।
•- रवीन्द्रनाथ टैगोर (1937 के बाद)
टैगोर ने भी बाद में कहा कि पूरा गीत धार्मिक है और इसे राष्ट्रीय गीत नहीं बनाना चाहिए। केवल पहले दो छंद ही देशप्रेम से जुड़े हैं।
•- नेहरू समिति (1937)
जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनी, जिसने सिफारिश की कि केवल पहले दो छंद ही गाए जाएँ, क्योंकि बाकी छंदों में हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख है।
•- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद:
वे शुरू में वंदे मातरम के समर्थक थे, लेकिन बाद में मुस्लिम भावनाओं को देखते हुए केवल पहले दो छंदों को ही स्वीकार करने के पक्ष में हो गए।
यह सभी विवादों का परिणाम यह हुआ की 1937 से ही कांग्रेस ने समझौते में केवल पहले दो छंद ही गाने का फैसला किया।
1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ, तो जन गण मन को राष्ट्रीय गान बनाया गया और वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया, लेकिन केवल पहले दो छंद ही आधिकारिक माने गए।
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