Chintan Buch retweetledi

बशीर बद्र की शायरी आपको हमेशा एक ख़ास एहसास में डूबी मिलेगी। उस एहसास को सीधे शब्दों में बयान करना भी मुश्किल है - सिर्फ़ उपमाओं से ही समझाया जा सकता है। सूखे फूल, पुरानी इमारत की गिरती दीवार के बीच से उगता पीपल का एक पत्ता, पहले प्यार में सकपकाया सा एक शर्मीला लड़का, पढ़ते पढ़ते सो गए हाथों में औंधी पड़ी कोई किताब।
अधिकतर महान शायरों के (कम से कम कुछ) कलाम एक तरह के over-confidence या self-importance/deprecation से गुज़रते मिलेंगे। ग़ालिब, मीर, फ़ैज़, अमृता, फ़िराक़ - शायर की शख़्सियत का हिस्सा ही है ख़ुद को दुनिया का केंद्र बनाना। और ये point of व्यू शायरी को बेहद ताक़त देता है।
लेकिन बशीर बद्र साब की शायरी अक्सर इससे दूसरी दिशा की लगती है। ‘मैं’ लगभग ग़ायब है और जहाँ है भी, बहुत हल्के से बात करता है, जैसे कहीं दूर से आवाज़ आती हो।
इसलिए ज़मीनी प्यार भी रूमानी लगता है और निजी दुख पूरी दुनिया का।
उनके जैसा ना कोई पहले था ना आगे कभी होगा। अलविदा उस्ताद!




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