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@deepchand55438

Lecturer of History

Katılım Haziran 2024
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Mayur Waghela I.N.D.I.A 🇮🇳
भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की संघी योजना में सरकार के सभी अंगों में संघी विचारधारा वालों की पैठ या भगवाकरण के साथ ही अब भारतीय सेना का भी भगवाकरण किया जा रहा है, जिसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा वाले संगठनों और अडानी जैसे कारपोरेट घरानों को सैनिक स्कूलों के संचालन के अधिकार दे दिए गए हैं। राष्ट्रीय सेना का भगवाकरण एक ऐसा अभिशाप साबित होगा, जो पीढ़ियों तक देश के लिए नासूर बनकर टीसता रहेगा। आप आसानी से कल्पना कर इसके दुष्परिणाम का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं कि जब भारत में संघी सरकार होगी, संविधान, लोकतंत्र, संसद, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं संघियों के हाथों में होंगे, देश का शासन-प्रशासन का संचालन और नियंत्रण संघी करेंगे, करोड़ों अंधभक्तों की संघी फौज घर-घर घूमेगी और सेना भी संघी मानसिकता और विचारधारा की होगी। स्पष्ट है कि तब भारत एक हिंदू राष्ट्र होगा, जहां दूसरे धर्मावलंबियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाएगा, हिंदू धर्मावलंबियों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में विशेष महत्व और वरीयता दी जाएगी, मनुस्मृति लागू किया जाएगा, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे के सिद्धांत से महरूम कर दिया जाएगा, सवर्णों को सरकार और शासन-प्रशासन में वरीयता और प्राथमिकता दी जाएगी और भारत में विभिन्नता में एकता की सांस्कृतिक विरासत खत्म कर दी जाएगी। सच तो यह है कि हिंदू राष्ट्र के नाम पर भारतीय अस्मिता, अस्तित्व, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और बहुलवादी सांस्कृतिक विरासत को मिटा दिया जाएगा। आधुनिकता, प्रगतिशीलता, गतिमानता, विवेकशीलता, तार्किकता, बौद्धिकता, वैज्ञानिकता, संवेदनशीलता, नवोन्मेष और सत्यान्वेषण तथा क्रांतिकारिता की जगह पुरातनता, पिछड़ापन, गतिहीनता, अतार्किकता, अविवेकशीलता, अवैज्ञानिकता, असंवेदनशीलता, मूर्खता, अज्ञानता, जड़ता, कूपमंडुकता, बौद्धिक दिवालियापन, मानसिक संकीर्णता और दिमागी बधियाकरण को भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान के रूप में प्रक्षेपित और प्रतिष्ठापित किया जाएगा...!! @RahulGandhi @Dr_MonikaSingh_ @garrywalia_ @sakshijoshii @Rashmi22302711 @AnumaVidisha @BhavikaOpinion @RuchiraC @maulinshah9 @Iam_MKharaud @Kumarjyoti49291 @GoIShadow @sudhirchaudhary @AMISHDEVGAN @anjanaomkashya @RubikaLiyaquat @chitraaum @RajatSharmaLive @AwasthiGyyan @PMNehru @RaGa4India @Raga3689 @Pawankhera @SupriyaShrinate
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Neha Singh Rathore
Neha Singh Rathore@nehafolksinger·
"रुपया उसी देश का गिरता है, जिस देश का पीएम गिरा हुआ हो" नरेंद्र मोदी जी की इस बात से आप कितना सहमत हैं?
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भारतीय@deepchand55438·
"भारत की शिक्षा अब ज्ञान का मंदिर नहीं, बल्कि लाभ का कारखाना बन गई है। जहाँ सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं और प्राइवेट स्कूल फल-फूल रहे हैं, ताकि बहुजन का बच्चा महँगी शिक्षा से वंचित रहकर विशेषाधिकारों को चुनौती न दे सके।"
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भारतीय
भारतीय@deepchand55438·
"भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक क्रूर बाजार बन चुकी है, जहाँ ज्ञान का प्रकाश नहीं, बल्कि लाभ की लालसा और विशेषाधिकारों की रक्षा का खेल चल रहा है।"
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भारतीय
भारतीय@deepchand55438·
"हिंदुत्व छद्म-राष्ट्रवाद है। असली राष्ट्रवाद संविधान, समानता और न्याय पर टिका होता है। हिंदुत्व राष्ट्र को हिंदू और अन्य में बाँटकर राष्ट्र को ही कमजोर करता है। ठीक वैसे ही जैसे हिटलर ने जर्मनी को आर्य और यहूदियों में बाँटा था।"
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भारतीय
भारतीय@deepchand55438·
"हिंदुत्व का सबसे बड़ा झूठ यह है कि यह हिंदुओं की रक्षा का दावा करता है, जबकि वास्तव में यह जाति व्यवस्था की रक्षा करता है। यह ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बचाने के लिए ही मुस्लिम-विरोधी और ईसाई-विरोधी उन्माद फैलाता है, ताकि दलित-बहुजन कभी एकजुट न हो सकें।"
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Dr. Laxman Yadav
Dr. Laxman Yadav@DrLaxman_Yadav·
UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में “Equity Committee” का प्रावधान किया है—SC, ST के साथ OBC को भी इसमें शामिल किया गया है। यह फैसला यूँ ही नहीं आया। UGC खुद मानता है कि अब तक के “लचीले प्रावधान” कैंपसों में जातिगत अन्याय और भेदभाव को कम करने में नाकाम रहे हैं। और यह सिर्फ़ एक दावा नहीं, बल्कि आधिकारिक आँकड़ों से साबित सच्चाई है। UGC के अनुसार 2019-20 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118% से ज़्यादा बढ़ी हैं—173 से बढ़कर 378 तक। यह साफ़ बताता है कि समस्या “छिटपुट घटनाओं” की नहीं, बल्कि संरचनात्मक (structural) है। जब उत्पीड़न बढ़ रहा हो, तब सिर्फ़ जागरूकता, पोस्टर या संवेदनशीलता कार्यशालाओं से काम नहीं चलता; सख़्त, समयबद्ध और जवाबदेह प्रावधान ज़रूरी होते हैं। इसी कारण नए नियमों में 24 घंटे में समिति बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई की समयसीमा तय की गई है। अब सवाल उठाया जा रहा है कि इसमें “सामान्य वर्ग” को क्यों नहीं शामिल किया गया। यह ठीक वैसा ही सवाल है जैसे महिला उत्पीड़न रोकने के लिए बनी Women Cell में पुरुषों को क्यों नहीं शामिल किया गया। वजह साफ़ है—जातिगत उत्पीड़न का ढांचा ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से SC/ST/OBC के खिलाफ बना है। यह बहिष्कार नहीं, बल्कि उस असमान यथार्थ की स्वीकारोक्ति है जिसे सदियों तक सामान्य बना दिया गया। एक और तर्क दिया जा रहा है कि “इस नियम का दुरुपयोग होगा।” तो बताइए, ऐसा कौन सा कानून है जिसका दुरुपयोग नहीं हुआ? RTI, श्रम कानून, महिला सुरक्षा कानून—सबके दुरुपयोग के उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन दुरुपयोग की आशंका न्याय से इनकार का आधार नहीं हो सकती। वैसे भी UGC ने अंतिम नियमों में “फ़र्ज़ी शिकायत” वाला डराने वाला प्रावधान हटा दिया है, ताकि पीड़ित चुप न हों। सच यही है कि जब बात SC/ST/OBC के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने की आती है, तभी ‘दुरुपयोग’ का शोर सबसे तेज़ हो जाता है। क्योंकि यह नियम किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को चुनौती देता है जिसने जातिगत असमानता को अब तक ‘नॉर्मल’ बना रखा था। कैंपस में समता भाषणों से नहीं, बल्कि सख़्त, जवाबदेह और लागू होने वाले नियमों से आएगी। @ugc_india
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Krishna Kant
Krishna Kant@kkjourno·
"मोदी सरकार भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी विरोधी और विज्ञान विरोधी सरकार है।" - रामचंद्र गुहा, इतिहासकार
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Er. Aashish Singh
Er. Aashish Singh@AdvAashishSingh·
📣 पोल खोल सीरीज में आपका फिर स्वागत है आज हम विस्तार से चर्चा करेंगे ब्राह्मणों के पूज्य नेता माने जाने वाले Pandit Madan Mohan Malaviya के बारे में — जिन्हें “महामना” कह कर बुलाया गया। लेकिन क्या उनका व्यक्तित्व उतना सर्वसमावेशी और जनहितकारी था, जितना प्रचारित किया गया? चलिए जानते हैं। Plz like and share 🧓 1. सामाजिक रूप से ब्राह्मणवाद के कट्टर समर्थक 🔸 मालवीय जी खुद को शुद्ध ब्राह्मण मानते थे, और सिर्फ़ अपने गोत्र/वर्ण से ही अन्न-जल ग्रहण करते थे। 🔸 उनके सामाजिक विचारों में वर्ण-व्यवस्था की स्वीकृति और संरक्षण दिखाई देता है। 🔸 उन्होंने छुआछूत तोड़ने की जगह “हरिजन सेवा” जैसे उपरी सुधारों तक खुद को सीमित रखा। 📖 रेफरेंस: Madan Mohan Malaviya: A Study, R.L. Shukla Caste and Nationalism, Anupama Rao Hindutva and the Politics of Brahmanism, Christophe Jaffrelot 🚫 2. दलितों के लिए आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विरोध 🔸 1932 में Poona Pact के दौरान, उन्होंने गांधी जी के साथ मिलकर अलग दलित निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) का विरोध किया। 🔸 दलित नेताओं ने इसे उनके अधिकारों पर हमला माना। 🔸 इस समझौते ने दलितों की स्वायत्त राजनीतिक पहचान को कमजोर किया। 📖 रेफरेंस: Dalits and the Making of Modern India, Ramnarayan S. Rawat Poona Pact: Ambedkar, Gandhi and the Battle Against Caste, Anand Teltumbde Caste, Class and Power, Andre Beteille 👩‍🦳 3. महिला अधिकारों के मामले में सुधार नहीं, सीमित सोच 🔸 मालवीय जी ने BHU की स्थापना की लेकिन उसमें लड़कियों के प्रवेश और अधिकार सीमित थे। 🔸 BHU में आज भी महिला छात्रों को पुरानी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है, जो उसी सोच की विरासत हैं। 🔸 उनकी सोच शिक्षा तक सीमित थी, नारी स्वतंत्रता और समानता तक नहीं पहुँची। 📖 रेफरेंस: Women and the Hindu Right, Tanika Sarkar Gender and the Indian Nation, Partha Chatterjee The Wire – BHU और महिला विरोधी व्यवस्था, Kavita Krishnan (The Wire, 2017) ⚠️ 4. मुसलमानों और गैर-ब्राह्मणों के प्रति साम्प्रदायिक और पक्षपाती दृष्टिकोण 🔸 मालवीय जी ने 1920 के दशक में हिंदू महासभा की स्थापना में भूमिका निभाई, जो हिंदू राष्ट्र या ब्राह्मण राष्ट्रीय की मांग करता था। 🔸 उन्होंने "शुद्धि आंदोलन" का समर्थन किया, जो मुसलमानों को वापस हिंदू धर्म में लाने की मुहिम थी। 🔸 इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा और सांप्रदायिक तनाव को बल मिला। 📖 रेफरेंस: The Hindu Mahasabha and the Politics of Religious Nationalism, Christophe Jaffrelot India’s Struggle for Independence, Bipan Chandra Shuddhi Movement and Communalism, Gail Omvedt 🏛️ 5. संविधान निर्माण और सामाजिक न्याय से दूरी 🔸 मालवीय जी संविधान सभा के सदस्य नहीं थे और न ही संविधान निर्माण में उनकी कोई भूमिका थी। 🔸 उन्होंने कभी दलित-पिछड़ा वर्गों के लिए न्याय आधारित संरचना की माँग नहीं की। 🔸 उनके विचार भारत की बहुजातीय/बहुसांस्कृतिक वास्तविकता से मेल नहीं खाते थे। 📖 रेफरेंस: The Making of the Indian Constitution, Granville Austin Social Justice and the Constitution of India, P.S. Krishnan Caste in Indian Politics, Rajni Kothari ⛔ 6. स्वतंत्रता आंदोलन के उग्र पक्ष से दूरी 🔸 वो गांधी जी के करीब रहे, लेकिन भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों की खुलकर आलोचना की। 🔸 वो केवल संवैधानिक सुधारों और शांतिपूर्ण आंदोलनों के पक्षधर थे। 🔸 ब्रिटिश राज के कई कानूनों और नीतियों को उन्होंने समर्थन दिया या चुप्पी साधी। 📖 रेफरेंस: Revolutionaries and the Freedom Struggle, Sumit Sarkar The Other Side of Indian Nationalism, Arundhati Roy 🧱 7. BHU: शिक्षा या ब्राह्मण सांस्कृतिक केंद्र? 🔸 BHU की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा था, लेकिन उसकी नीति-व्यवस्था ब्राह्मण वर्चस्व की वाहक बनी। 🔸 आज भी BHU पर ऊँची जातियों और ब्राह्मण परंपराओं का दबदबा है। 🔸 BHU की बनावट और पाठ्यक्रम में विविधता और समावेश की कमी स्पष्ट है। 📖 रेफरेंस: BHU and the Politics of Knowledge, Nivedita Menon Hindu University and Brahmin Hegemony, Kancha Ilaiah The Wire – BHU में जातिवाद का बोलबाला, Sushil Kumar (The Wire, 2020) 📌 निष्कर्ष: Pandit Madan Mohan Malaviya को "महामना" कह कर पूजना वैसा ही है जैसे किसी अंग्रेज अफसर को "स्वराज का सच्चा सिपाही" कहना। ब्राह्मण परंपरा के कट्टर समर्थक 🧓 दलितों,पिछड़ों के राजनीतिक अधिकारों के विरोधी 🚫 महिलाओं के अधिकारों पर सीमित दृष्टिकोण 👩‍🦳 संविधान, सामाजिक न्याय और क्रांति से दूरी ⛔ सभी लोग कमेंट मै अपने विचार दें!
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Ravi Parmar
Ravi Parmar@raviparmarIN·
प्रेम बिरहाड़े, एक प्रतिभाशाली दलित युवक, जिन्होंने हाल ही में University of Sussex (UK) से स्नातक किया, उन्हें Heathrow Airport, London पर मिलने वाली नौकरी का अवसर गंवाना पड़ा। कारण? पुणे के Modern College of Arts, Science & Commerce ने उनके दस्तावेज़ों का सत्यापन करने से इंकार कर दिया। कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. निवेदिता गजानन एकबोटे ने प्रेम से उनकी जाति पूछी और इसके बाद कॉलेज ने सत्यापन रोक दिया। सोचिए, एक युवा जिसने नंदुरबार जैसे गरीब आदिवासी जिले से निकलकर विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त की — उसे भी जातिवाद ने नहीं छोड़ा। जब प्रेम पढ़ाई के लिए यूके गए थे, तब इसी कॉलेज ने उनके दस्तावेज़ों की पुष्टि की थी, लेकिन जैसे ही नौकरी का मौका आया, जातिगत भेदभाव आड़े आ गया। यह सिर्फ प्रेम की कहानी नहीं है — यह उस हर दलित छात्र की कहानी है जो मेहनत, संघर्ष और योग्यता के बावजूद व्यवस्था के जातिवादी रवैये का शिकार बनता है। भारत में जाति सिर्फ गांवों या मंदिरों तक सीमित नहीं, यह संस्थानों, कॉलेजों और नौकरियों तक गहराई से फैली है। अब समय आ गया है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो और उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव पर लगाम लगे। #CasteDiscrimination
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Krishna Kant
Krishna Kant@kkjourno·
इनकी भाषा देखो। ये इस देश के प्रधानमंत्री हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बागडोर इनके हाथ में है। हिंदुओं की हजारों साल की संस्कृति, संस्कार, भाषा, धर्म और तर्कशास्त्र का बोझ भी इन्हीं के नाजुक कंधों पर है। लेकिन भाषा एकदम टपोरी टाइप, सड़कछाप, दो कौड़ी के लुच्चों वाली। कौन लिखता है इनके लिए? इतना घटिया लेखक कहां मिला इनको? या फिर ये खुद ही इतने बड़े ज्ञानी हैं कि अभद्र भाषा ही इनका गहना है? इस भाषा के साथ ये सपना दिखाते हैं कि हम विश्वगुरु बनेंगे! बाकी तथ्य में उतनी ही सच्चाई है जितना सच बोलने के लिए ये कुख्यात हैं।
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MadhurYadav
MadhurYadav@MadhurYadav214·
तुम्हारे नज़र में आजादी क्या है और देशद्रोह का क्या मतलब है ? देश गर्त में जा रहा है देशद्रोही,गद्दार लोग देश प्रेमियों को देशद्रोही करार दे रहे हैं - "लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर माद्री काकोटी (मेड्युसा) पर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज वज़ह : उक्त प्रोफेसर ने अपने X अकाउंट पर बस यही तो लिखा था - " अगर धर्म पूछकर गोली मारना आतंकवाद है,तो फिर धर्म पूछकर मॉबलिंचिंग करना,धर्म पूछकर नौकरी से निकाल देना,धर्म पूछकर मकान किराए पर न देना, धर्म पर घर न देना,धर्म पूछकर घर पर बुल्डोज़र चलाना, धर्म पूछकर डिलिवरी बॉय से पार्सल न लेना,धर्म पूछकर इलाज करने से मना कर देना आदि भी आतंकवाद है , असली आतंकियों को पहचानो। फिर क्या था,हो गई असली की पहचान और शिनाख्त के बाद गाज गिर गई प्रोफेसर माद्री काकोटी पर !" वह एक प्रोफेसर है उनके प्रश्न यदि चुभ रहे है तो उनका चुभना भी स्वाभाविक है। मगर आजादी कहाँ घर स्कूल विश्वविद्यालय ? अब एक शिक्षक से बेहतर किसे समझ ? धर्म / जाति के शोषण में कितना अंतर ?
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Dr.Vilas Kharat
Dr.Vilas Kharat@vilas1818·
RSS आतंकवादी तथा देशद्रोही संगठन है? 27 जनवरी 1948 इस दिन#RSS संगठन के ब्राह्मणों ने #भारताका_ध्वज जलाया था इसका यह सरकारी सबूत। @aajtak @narendramodi @RahulGandhi @yadavtejashwi
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kailash
kailash@avate_kailas·
एक भिक्षु जो ध्यान में आनंद लेता है और लापरवाही में खतरा देखता है, वह आग की तरह आगे बढ़ता है और सभी बंधनों को, चाहे बड़े हों या छोटे, जला देता है। -𝓓𝓱𝓪𝓶𝓶𝓪𝓹𝓪𝓭𝓪 , 𝓒𝓱𝓪𝓹 Il. (8) Afifiatarabhikkhu Vatthu - Verse 31
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Er D P Gautam
Er D P Gautam@ErDPGautam·
#7_अगस्त_ओबीसी_अधिकार_दिवस 1882 में भारत में सर्वप्रथम विख्यात समाज सुधारक ज्योतिराव फुले ने सभी वर्गों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग हंटर आयोग के समक्ष रखी थी ! 1902 में कोल्हापुर रियासत में शाहूजी महाराज ने जातीय आधार पर पिछड़े वर्गों के लिए 50% आरक्षण देने की शुरुआत की थी ! 1908 में अंग्रेजों ने कुछ जातियों और समुदायों को प्रशासन में आरक्षण देना प्रारंभ किया ! 1909 में तत्कालीन भारत सरकार ने अधिनियम में आरक्षण का प्राविधान किया ! 1921 में मद्रास प्रेजिडेंसी में जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी कर ब्राह्मणों, मुसलमानों, एंग्लो ईसाईयों और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी ! 1932 में बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर व मोहनदानदास करम चंद गांधी की बीच हुए पूना समझौते में आरक्षण का प्राविधान किया गया ! 1935 में तत्कालीन भारत सरकार ने अधिनियम जारी कर आरक्षण का प्राविधान किया ! 1950 में आज़ाद भारत के संविधान में बाबा साहेब ने एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के लिए आरक्षण/प्रतिनिधत्व का प्राविधान किया ! 07 अगस्त 1990 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री वीपी सिंह द्वारा बीपी मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने की घोषणा की गई ! आरक्षण के पुरोद्धाओं ज्योतिराव फुले, शाहूजी महाराज, बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर और बी पी मंडल जी को करोड़ों बार नमन #7_अगस्त_ओबीसी_अधिकार_दिवस पर सभी भाइयों को हार्दिक बधाई एवं मंगल कामनाये ! जय फुले, जय शाहू, जय भीम, जय मंडल 🙏 #इं0डी0पी0गौतम #भारतीय_मूलनिवासी_संगठन
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Dr.Anita
Dr.Anita@DrAnita65600132·
बौद्ध धर्म समता, समानता, बंधुत्व और करुणा की भावना को बढ़ावा देता है।यह मानवतावाद के लिए जरूरी है और आज भी प्रासंगिक है ।इसलिए महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि “दुनिया में एक ही मार्ग है जो विश्व को बचा सकता है वह बौद्ध धर्म है।” #नमोबुद्धाय_जयभीम 💙🙏#GOODMORNINGFRIENDS
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P R Doharey
P R Doharey@ParashuramDoha5·
वरिष्ठ पत्रकार संदीप चौधरी का सरकार से बड़ा सवाल है क्या गरीब का बच्चा स्कूल न जाए उसे शिक्षा ना मिले वह बड़ा आदमी ना बने उनका बयान जरूर सुने..
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kailash
kailash@avate_kailas·
मूर्ख और अज्ञानी लोग अपने आपको लापरवाही के हवाले कर देते हैं; जबकि बुद्धिमान लोग सावधानी को बहुमूल्य रत्न के समान संजोकर रखते हैं। -𝓓𝓱𝓪𝓶𝓶𝓪𝓹𝓪𝓭𝓪, 𝓒𝓱𝓪𝓹 Il. (4) Balanakktattasangkuttha Vatthu Verses 26 and 27
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Krishna Kant
Krishna Kant@kkjourno·
"हमारी जमीनें चीन ने कब्जा कर लीं। अगर हम ये बात कहते हैं तो हमें कभी देशद्रोही कहा जाता है, कभी धमकियां दी जाती हैं।" - सोनम वांगचुक
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Dr. Laxman Yadav
Dr. Laxman Yadav@DrLaxman_Yadav·
देश के बहुसंख्यक सोये हुए बहुजनों को जगाने के लिए AI का मंकेश जगा रहा है. हम जैसे लोग जो काम पिछले दस साल से कर रहे हैं, अब उसे नई तकनीकी और रचनात्मकता के साथ बुलंद होता देख एक सुखदाश्चार्य हो रहा है. काश! .....
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