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Dev Panchal (ऋषि)
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Dev Panchal (ऋषि)
@devkotavasi
मैं तो वैरागी हूं ना सम्मान का मोह है ना अपमान का भय , 🚩हर हर महादेव 🚩
Kota, India Katılım Temmuz 2018
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@AarunKosli अरे कॉपी पेस्टियों मानव नाम का बॉलर पूरी LSG में है ही नहीं टूचिए बस कॉपी पेस्ट करने में लगे है
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राजस्थान रॉयल्स जब बैटिंग करने आई तो LSG की तरफ़ से पहला ओवर आकाश लेकर आए , पहले ही ओवर में 23 रन कूट दिए ,,
जिसे देख कर आकाश का साथी खिलाड़ी मानव कहता है कि 23 रन कियूँ दिए ओवर में ??
आकाश चुप रहा है …
फिर मानव ओवर लेकर आता है , उसे ऐसा कूटा कि उसके ओवर में 27 रन मार दिए ,,
दोनों के ओवर्स कूटने के बाद मयंक यादव गुस्से में आया कि अब बॉलिंग में करूँगा , कम से कम इनके जैसे तो नहीं कूटा जाऊँगा , कौन एक ओवर में 23 और 27 रन देता है ,,
फिर ओवर डाला मयंक यादव ने ,,
फिर क्या था ,,,
4 , 6 , 6 , 1 , 6, 6 = 29 कूट दिए ,,, 😂🤣😂🤣
मयंक यादव अभी सदमे में है 😀😁😃

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Red flag men
Ansh, Kabir, Shubh, Rishi, Rishabh, Vedant, Himanshu, Ashutosh, Ritik, Abhishek, Dhruv, Kartik, Sidharth, Vicky, Rahul, Rohan, Amir, Prateek, Kunal, Aryan, Harshit, Aahan, Ashish, Rohit, Aakash, Raj, Sandeep, Aditya, Sameer, Mohit, Harsh, Yash, Nishant, Manish, Aman, Shubham, Karan, Gaurav, Anirudh, Jay, Akshay, Yuvraj, Tarun, Lakshay, Ishaan, Varun, Saurabh, Jai, and Ritesh.
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@Khalbaali जिस राज्य में "बिलाथ - बिलाथ पर पाणी और कोस - कोस पर वाणी" बदलती हो उस राज्य पर आप एक ही क्षेत्र की क्षेत्रीय बोली को संपूर्ण राजस्थानी बता कर कैसे थोप सकते है माय लॉर्ड ?
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'राजस्थानी' को स्वतंत्र भाषा का दर्जा देने की मांग असल में पूरे प्रदेश पर मारवाड़ के एक विशिष्ट वर्ग की दरबारी भाषा थोपने की एक विशिष्ट वर्गीय और एकतरफा कोशिश है। जब हम मारवाड़ी के ऐतिहासिक आधार को देखते हैं, तो इसकी तथाकथित मूल 'मुड़िया लिपि' भी कभी मारवाड़ के सर्वसमाज की थी ही नहीं; वह तो केवल महाजनों के गुप्त बही-खातों तक सीमित एक व्यावसायिक कोड मात्र थी। विडंबना देखिए, आज राजस्थानी के नाम पर जिस मारवाड़ी भाषा को आगे बढ़ाया जा रहा है, वह महाजनों की मुड़िया भी नहीं, बल्कि विंध्य क्षेत्र से राजस्थान गए राठौड़ सामंतों की दरबारी भाषा 'डिंगल' है। डिंगल मूलतः सामंतकाल में कवियों द्वारा सामंतों के महिमामंडन के लिए गढ़ी गई एक कृत्रिम और दरबारी साहित्यिक भाषा थी। आज उसी सामंती विरासत को 'राजस्थानी' का जामा पहनाकर पूरे प्रदेश की जनभाषाओं पर थोपा जा रहा है, ताकि एक विशेष वर्ग का भाषाई और सांस्कृतिक वर्चस्व बना रहे।
आज संपूर्ण राजस्थान ही नहीं बल्कि मारवाड़ का भी आम किसान, मजदूर और वंचित समाज को भी जिस भाषा को जीता है, वह इस सामंतों की दरबारी मारवाड़ी से बिल्कुल अलग है। ऐसे में ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती और बागड़ी बोलने वाला बहुसंख्यक समाज एक ऐसी भाषा को अपनी 'मातृभाषा' के रूप में कैसे स्वीकार कर ले, जिससे उसका कोई ऐतिहासिक या व्यावहारिक जुड़ाव ही नहीं है?
इस तथाकथित भाषा आंदोलन को हवा देने के पीछे एक विशेष वर्ग का बहुत बड़ा निहित स्वार्थ छुपा है। चूंकि इस डिंगल-मारवाड़ी साहित्य और इतिहास पर एक विशेष वर्ग की पीढ़ियों से मजबूत पकड़ रही है, इसलिए भाषा को मान्यता मिलते ही इस पूरे तंत्र पर उनका एकछत्र राज हो जाएगा। दर्जा मिलने के बाद जब राजस्थानी अकादमियों का गठन होगा, भाषा साहित्य के बोर्ड बनेंगे, और विश्वविद्यालयों व स्कूलों में भाषा के टीचर, व्याख्याता और प्रोफेसरों की भर्तियां निकलेंगी—तो इस पीढ़ीगत पकड़ और प्रभाव के कारण इस विशेष वर्ग के लोग ही हर जगह मलाई बटोरेंगे। यह आंदोलन आम राजस्थानी के स्वाभिमान का नहीं, बल्कि सरकारी नौकरियों, अकादमिक पदों और भाषा के नाम पर मिलने वाले फंड पर एकतरफा कब्जा जमाने का एक सुव्यवस्थित ब्लूप्रिंट है।
यदि इसे दर्जा मिला, तो इसके घातक प्रभाव क्या होंगे?
1. क्षेत्रीय विविधता का अंत: राजस्थान की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी सांस्कृतिक और भाषाई विविधता है। मारवाड़ी के इस भाषाई एकाधिकार से बाकी क्षेत्रों की समृद्ध बोलियों का वजूद हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगा।
2. रोजगार और शिक्षा में भारी असमानता: सरकारी नौकरियों, आरएएस जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं और स्कूली शिक्षा में जब इस 'मानक मारवाड़ी' को अनिवार्य किया जाएगा, तो एक खास बेल्ट और वर्ग के युवाओं को स्वाभाविक रूप से बढ़त मिल जाएगी। इसके परिणामस्वरूप ढूंढाड़, मेवाड़, हाड़ौती और वागड़ का आम युवा प्रतियोगिता से बाहर होकर पिछड़ जाएगा, जिससे राज्य में एक नया और गहरा क्षेत्रीय विभाजन पैदा होगा।
3. वर्चस्व और तुष्टिकरण की राजनीति: यह जमीनी जुड़ाव या जन-आंदोलन नहीं है, बल्कि कुछ विशिष्ट साहित्यकारों और प्रभावी लोगों द्वारा अपनी राजनीतिक और सामाजिक रोटियां सेकने का जरिया है, ताकि व्यवस्था में उनका वर्चस्व और एकाधिकार हमेशा के लिए सुरक्षित रहे जिससे नौकरी से लेकर साहित्य के नाम पर हर जगह एकतरफा कब्जा रहे।
भाषा समाज को जोड़ने के लिए होती है, आंतरिक खाई पैदा करने के लिए नहीं। बिना व्यापक आंतरिक सहमति और बिना सर्वसमाज को विश्वास में लिए इस तरह का भाषाई एजेंडा थोपना राजस्थान की सामाजिक समरसता, युवाओं के भविष्य और आपसी भाईचारे को पूरी तरह बिगाड़ देगा और प्रजमंडल दौर की तरह सर्वसमाज को राजनीतिक सामंती वर्चस्व से लड़ने की जरूरत पड़ जाएगी।
नोट: ये नेता और कोचिंगो के कहानीकार टीचर तो मोहरे मात्र है जिन्हें आगे किया हुआ है, इनके कोचिंग और नेताओं की फंडिंग कहां से होती है वहीं से ये भाषाई आंदोलन - साजिश चली आ रही है, पूरा जाल बुना हुआ है जो एक दूसरे का सहारा बनते हैं और आजादी के कमजोर हुए वर्चस्व को वापस इसी प्रकार से हासिल करने की कोशिश है
यहां रोजगार - शिक्षा में वर्चस्व के साथ भाषा के नाम पर समाज के एक तबके को भावुक कर अपने साथ मिलाने की कोशिश भी है, अब जो भी इस भाषा की लड़ाई में भावुकता की जगह तार्किकता से बात करेगा उन्हें जातिवादी, राजस्थान विरोधी बताकर उनके खिलाफ सामाजिक - राजनीतिक साजिश भी रची जाएगी।
@Khalbaali

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@vishaldeshpande @dhaikilokatweet Bhai mai 15 saal se re raha hu mjaa ata hai yaha rahne me
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@devkotavasi @dhaikilokatweet KD ratio high hai waha ka, not good vibes
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@RR_for_LIFE KKR vs DC hai last league match RR vs MI second last he
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@komal323232 @AarunKosli @grok बहुत पुराना मामला है जब सीमा भारत आई थी तो उससे (मिथलेश) से पत्रकारों ने सवाल किया था उसके जवाब में उसने बोला " क्या है सचिन में लप्पू सा तो सचिन है "
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Dev Panchal (ऋषि) retweetledi

@AarunKosli @grok Gemini edit फोटो है मान्यवर गलत अफवाह फैलाने से पहले रिसर्च कर लिया करो फोटो को अच्छे से देख लिया करो

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