दिल, दरख़्त और दिल्ली।
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दिल, दरख़्त और दिल्ली।
@dildarakhtdilli
Everyday Aesthete | ©Photographs | Writing
Katılım Kasım 2022
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सिर्फ़ ईश्वर जानता था, वे प्रेम के नाक़ाबिल हैं। इसलिए बाँटने उनका अकेलापन, कभी-कभी वह भेज देता था उनके पास—एक किताब, एक बिल्ली, एक कैनवस। कभी-कभी लेकिन उनकी सब बिल्लियाँ गुम हो जातीं। सब मिल जाते अपनी जगह—कुत्ते, चिड़ियाँ, तोते—बिल्लियों का लेकिन कुछ पता न चलता। अचानक तब चुप हो जाते—शहर के सब अकेले लोग। चुप और गुमसुम। लोग उन्हें शर्मीला समझते, कभी कमअक्ल। सिर्फ़ बिल्लियाँ थीं, जिन्हें वे प्रेम करते थे। सिर्फ़ बिल्लियाँ थीं, जो उन्हें छोड़ जाती थीं। अपने इस प्रेम की लेकिन—वे भनक तक न लगने देते। उन्हें मदद की ज़रूरत है। सिर्फ़ ईश्वर जानता था।
गगन गिल ( अकेले लोग )

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दूर सड़क के किनारे लगे चिनार के दरख़्तों के पत्ते झड़ रहे हैं, उड़ रहे हैं। चरमर-चरमर की आवाज़ वातावरण में गूँज रही है और उसी सुर्ख़-पीले मुरझाये सूखे पत्तों से निकलती लपटों के बीच एक फूल खिला दिखा। वह क़फ़न में लिपटी चिनार के पेड़ों की तरफ उड़ती है। फूल हाथों में लेकर सूँघती है। वही मन्द घुटी-घुटी मुस्कान जैसी जानी-पहचानी महक। क्या नाम है इसका?
‘पतझड़ का फूल!’
( नासिरा शर्मा ‘पतझड़ का फूल’ कहानी से )


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