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Durgaprasad Agrawal
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Durgaprasad Agrawal
@dpagrawal
मैं एक शिक्षक, लेखक, स्तम्भकार और अनुवादक हूं.
Jaipur India Katılım Nisan 2009
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नेहरू और इंदिरा ने जो-जो किया था, वही करना है?
तो घोषित कर दो कि भारत राष्ट्रमित्र अडानी को सौंपे गए सारे संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करता है।
घोषित कर दो कि भारत 1991 में अपनाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का त्याग करता है।
घोषित कर दो कि आज से भारत की अर्थव्यस्था, समाजवादी नीतियों की ओर झुकी हुई मिश्रित अर्थव्यवस्था होगी।
हो पाएगा आपसे? रहने दीजिए, नहीं हो पाएगा। लच्छन ठीक नहीं है। आपमें न तो वो हिम्मत है, न उतनी सलाहियत।
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संकट के समय या आसन्न संकट से बचने के लिए देश का नेतृत्व नागरिकों से सहयोग माँगता आया है
भारत में इसका लंबा इतिहास रहा है
दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के नाम याद आते हैं जिन्होंने जनता से ऐसी ही अपील की थी
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी।
दोनों ने ही राष्ट्रीय संकट के समय देशवासियों के स्वाभिमान और एकजुटता को जगाया।
1960 के दशक में भीषण अकाल और युद्ध के बीच, शास्त्री जी ने 'अन्न की कमी' से निपटने के लिए लोगों से हफ्ते में एक समय व्रत रखने की अपील की थी।
उन्होंने जनता से कहा कि यदि हम हफ्ते में एक समय का भोजन त्याग दें, तो देश के भंडार में अनाज बचेगा और हमें दूसरे देशों के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
उन्होंने 'जय जवान, जय किसान' का नारा देकर देश को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई।
इस अपील को सार्वजनिक करने से पहले शास्त्री जी ने खुद अपने परिवार के साथ मिलकर एक दिन का व्रत रखा था।
जब उन्हें विश्वास हो गया कि उनका परिवार भूखा रह सकता है, तभी उन्होंने देशवासियों से 'शास्त्री व्रत' रखने का आग्रह किया।
उनके इस आह्वान का देश पर इतना गहरा असर हुआ कि लाखों लोगों ने व्रत रखना शुरू कर दिया।
साथ ही कई होटलों और रेस्तरां ने भी सोमवार की शाम को अपना काम बंद कर व्रत रखा था।
वहीं, 1971 के युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने शरणार्थियों के बोझ और रक्षा खर्च के लिए जनता से दान की अपील की।
उन्होंने स्वयं के आभूषण दान कर मिसाल पेश की।
उन्होंने नागरिकों से कम खर्च करने, बिजली बचाने और विलासिता की वस्तुओं के त्याग की भी अपील की थी ताकि संसाधनों का उपयोग सेना के लिए किया जा सके।
इससे प्रेरित होकर पूरे देश ने 'राष्ट्रीय रक्षा कोष' में बढ़-चढ़कर योगदान दिया।
ग़रीब से लेकर धन्नासेठों सभी ने बढ़-चढ़ कर दान दिया
राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर पूरी जनता सरकार के पीछे खड़ी हो गई।
इस जन समर्थन से सरकार को कड़े फैसले लेने का नैतिक साहस मिला।
शास्त्री जी की 'व्रत' की अपील की तरह ही, इंदिरा गांधी की 'दान' की अपील को भी भारतीय इतिहास में 'साझा बलिदान' के एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जाता है


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@Aamitabh2 अमिर ख़ान की एक फ़िल्म थी ना...क्या शीर्षक था उसका ? कुछ थ्री जैसा था...
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1984 में अमिताभ बच्चन चुनाव लड़ रहे थे, तो दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रसारण तक पर रोक लगा दी गई थी।
1991 में ‘चक्र’ चुनाव चिन्ह था, तो Wheel डिटर्जेंट के विज्ञापन तक बंद करा दिए गए थे।
2014 में हाथ के पंजे और हाथी की मूर्तियों तक को ढकवा दिया गया था।
तब चुनाव आयोग निष्पक्षता दिखाने के लिए सख्त फैसले लेता था, चाहे सरकार किसी की भी हो।
लेकिन आज खुले मंचों से धार्मिक नारों पर वोट मांगे जा रहे हैं, नेताओं की तस्वीरें और प्रचार हर जगह दिखाई दे रहे हैं, मीडिया का बड़ा हिस्सा लगातार महिमामंडन में लगा है… और चुनाव आयोग लगभग मूक दर्शक बना नजर आता है।
सवाल किसी एक पार्टी का नहीं है…
सवाल यह है कि क्या हमारी संवैधानिक संस्थाएँ पहले जैसी निष्पक्ष और मजबूत बची हैं?

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इतिहास याद रखेगा जब बॉलीवुड वालों की रीढ़ की हड्डी गायब हो गयी थी, तब पंजाब इंडस्ट्री वालों ने ये साबित कर दिया था कि सब लोग बिकाऊ या डरपोक नही होते !
"एक ही रहने दो शहीदों का तिरंगा झंडा"
"रोज नये झंडे में डंडा फसाने वालो"
पंजाब इंडस्ट्री के पितामह कहे जाने वाले गुरुदास मान की ये पंक्तियाँ कट्टरपंथीयों के मुंह पर तमाचा है 👇
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अगर आपका एयरलाइन और एयरपोर्ट इंडस्ट्री में एक्सपीरियंस है, तो आपको वो मिलना चाहिए, लेकिन आप कल तक धनिया बना रहे थे और आज एयरपोर्ट बना रहे हैं, तो ऐसा नहीं हो सकता!
कल तक योग कर रहे थे और आज सबसे बड़े धन्ना सेठ बन जाएंगे, ऐसा भी नहीं हो सकता.
“जब सरकार डिसाइड करे कि आप क्या बनेंगे, और बिजनेसमैन डिसाइड करे कि सरकार क्या करेगी, वहीं से ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ शुरू होता है.”
एक्सपर्टीज लेकर सरकार के पास जाना अलग बात है, लेकिन सरकार की चीजें सस्ते में लेने पहुंच जाना… वो कैपिटलिज्म नहीं, माफिया है.
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वाय ही इज माई फेवरिट!!
तमाम चुनावी हार और सांगठनिक समस्याओं के बावजूद यह शख्स मेरा फेवरिट पोलटिशियन है।
लोग कहते है कि तुम्हे इसमे दिखता क्या है??
ओके, तो आज बताता हूँ, कि मुझे राहुल में क्या नजर आता है।
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गिनीज बुक वाले अगर चेक करें, तो पाएंगे, कि मानव इतिहास के 5000 साल मे, किसी का सबसे ज्यादा अपमान, लानत- मलामत की गई, तो वह शख्स राहुल है।
जबकि वे कोई हिटलर, चंगेज या ईदी अमीन नही। उसने कोई अमानवीय, अकरणीय काम नही किया।
कमी यही कि एक खास खानदान में जन्मे है। उन्हें हटाने, हिलाने, गिराने के लिए, एक वेल फंडेड, वेल कोर्डिंनेटेड, ऑर्गनाइज्ड कैम्पेन- बरसों बरस से जारी है। और भीतर की मजबूती देखिए..
बंदा हिलता नही।
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दुनिया मे कौन है जिसके पिता, माता, बहन, के साथ दादा, दादी, परनाना और लकड़नाना तक जाकर गालियां दी गयी।
पुरखो की गंदी कहानियां बनाई। और जवाब छठी पीढ़ी के बालक से मांगा???
अनप्रिसिडेंट इन ह्यूमन हिस्ट्री!!!
लेकिन यह शख्स हंसता रहता है। पलटकर जवाब नही दिया, तल्खी नही दिखाई। किसी के लिए मुंह से एब्यूज न निकाला, बदला नही चुकाया।
मोहब्बत की दुकान की बात करता है। गाली देने वालो को गले लगाता है। धोखा देने वालो को भी शुभकामनाएं देता है। ऐसे व्यक्ति से कोई नफरत कैसे कर सकता है?
मैं तो नही।
लेकिन कारण और भी है।
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आप इमरजेंसी को क्यो याद करते हैं, क्यो??
इसलिए कि राहुल डेमोक्रेटिक है।
अपनी मर्जी पर भी दूसरों की इच्छा चलने देते हैं। मित्रों की सुनते मानते हैं। सामने वाले की तानाशाही को जस्टिफाई करने के लिए यह कहना सम्भव नही कि- अरे, तुम खुद भी तो तानाशाह हो।
क्या करें? तो याद दिलाओ, इमरजेंसी..
"कि अरे, तुम नही तो क्या, तुम्हारी दादी तानाशाह थी"
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नेहरू की औरतों के साथ तस्वीरे लगाते हैं, क्यो?
क्योकि स्नूपिंग करने वाले, अपनी बीवी को छोड़, दूजी महिलाओं को गंदी निगाह से ताड़ने वाले नेता के बचाव में, आप ये नही कह सकते- कि राहुल, तुम भी तो चरित्रहीन हो!!
उसके दो दशक के राजनीतिक कॅरियर में चरित्रहीनता का लेशमात्र भी आरोप नही। अब अगर तुम चरित्रहीन नही- तो तुम्हारा परनाना तो था।
ये देख फेक फ़ोटो।
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1947 से लेकर बोफोर्स तक घोटालों की लम्बी सूची दिखाते है। क्यो??
इसलिए कि 2004 से लेकर केंद्र और राज्यो की तमाम सरकारों को एक फोन लगाकर, बड़े से बड़ा काम करवाने की हैसियत राहुल की थी-
एंड डोंट माइंड- 2014 के बाद भी है।
लेकिन ठेका, रुपया, कमीशन, आय से अधिक सम्पत्ति भ्रष्टाचार का चिन्दी भर भी आरोप राहुल पर नही। तब आप 1957 और 1987 के आरोप दोहराते हो- तू नही..
तेरा बाप तो करप्ट था।
अब अलग बात की वे केस भी हवाई निकले थे।
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आप 84 के दंगे याद करते हो-क्यो?
क्योकि UPA से लेकर अब तक MP, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल जैसी सरकारे दंगामुक्त रही। झारखंड महाराष्ट्र में उसकी समर्थंक सरकारों पर भी दाग नही।
याने दंगाई संस्कृति के लोग, राहुल की सरकारों पर दंगापरस्त होने का आरोप नही लगा सकते।
तो जा- तेरा बाप तो दंगापरस्त था।
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जो अवगुण राहुल में नही, वो पुरखो में खोजे जाते हैं। और पुरखो पर इतने सारे अवगुण थोपे गए है, शायद कोई अपकर्म शायद बचा न होगा।
रिट्रोस्पेक्ट मे आप मान लें, की हर वो मानवीय, या राजनीतिक अवगुण, जिस जिसकी कोई कल्पना कर सकता है- एक भी राहुल में नही मिला।।
इनफैक्ट, बार बार नेहरू, इंदिरा, राजीव, औरंगजेब, गजनवी, गौरी, पृथ्वीराज चौहान के गीत गाने का मतलब ही यही है..
कि सामने खड़े राहुल में कोई कमी, तो उनके चैलेंजर्स भी नही खोज पा रहे।
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वो भी तब, जबकि ये लोग 12 साल से दिन रात राहुल के इर्द गिर्द आईबी, रॉ और फूल छाप कांग्रेसी घुसाकर निगरानी रखते है। पेगागस लगाकर उसके फोन तक में घुसे रहते है-
उन्हें अगर 12 साल के बाद भी कोई चारित्रिक, भ्रष्टाचार, पैसे के लेनदेन या और कोई भी लूज पॉइंट नही मिल सका। तो मान लीजिये कि ऐसे शख्स के जोड़ का मनुष्य ..
इस धरती पर तो मौजूद नही।
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ऐसे में भारतीय राजनीति के राक्षसी जंगल मे..
गन्दे दांतो, लम्बी दाढ़ी, और टकले सर वाले तमाम रक्तपिपासु दैत्यों के बीच, यदि कोई एक श्वेतवर्णी मुनि दिखाई देता है-
तो वह राहुल है। एंड दैट इज वाय
ही इज माई फेवरिट!!
❤️

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