Dr Ajay Chaudhary
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Dr Ajay Chaudhary
@drajaychuru
President, All Rajasthan In Service Doctors Association (ARISDA) Rajasthan







छोटी-छोटी बातें कितनी नोटिस की जाती हैं इसका हम कई बार अंदाजा नहीं लगा सकते... राजस्थान के मुख्य सचिव, चिकित्सा विभाग की प्रमुख सचिव और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक एक अस्पताल की विजिट पर गए थे। तस्वीर में अस्पताल की इंचार्ज डॉक्टर अपनी कुर्सी पर बैठी हैं और उनके सामने वाली कुर्सियों पर तीनों वरिष्ठ अधिकारी बैठे हुए हैं। बस, इतना सा करके ही इन सीनियर अफसरों ने डॉक्टरों का दिल जीत लिया है। संबंधित अस्पताल के लिए ये अफसर क्या घोषणा करके आए, सरकारी डॉक्टरों को ये अफसर क्या भरोसा देखकर आए इसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा लेकिन इस छोटे से एक्ट से ही सरकारी डॉक्टरों ने खुशी और सम्मान महसूस किया है। निश्चित ही यह इनीशिएटिव मुख्य सचिव महोदय का है क्योंकि तीनों में सबसे सीनियर वे ही हैं। चूरू मेरे मित्र और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अजय चौधरी ने फेसबुक पर लिखा- आज संपूर्ण राजस्थान राज्य के सेवारत चिकित्सकों को बहूत अरसे बाद कोई शासन उनके प्रति संवेदनशील सा लगा। आदरणीय मुख्य सचिव, चिकित्सा विभाग की प्रिंसिपल सेक्रेटरी मैम और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक आज एक अस्पताल की विजिट पर गये थे। इनकी संवेदनशीलता है कि इन्होंने चिकित्सक को उसकी कुर्सी से नहीं उठाया बल्कि उसके सामने लगी कुर्सियों पर बैठे। 🙏 आप राज्य के वरिष्ठतम जनों का एक सामान्य चिकित्सक के प्रति यह सम्मान। आज राज्य के चिकिसको का दिल जीत लिया आपने ! अब सोचिए जरा। जो सीनियर अफसर या नेता किसी के दफ्तर में जाते हैं तो उन्हें संबंधित अधिकारी की कुर्सी पर बैठकर ऐसा क्या आनंद आता है कि वह सामने वाली कुर्सी पर नहीं बैठना चाहते? असल में जब आप किसी को उसकी कुर्सी से उठाकर उसकी कुर्सी पर बैठ रहे होते हैं तो आप उसका मान मर्दन कर रहे होते हैं। ऐसी घटनाएं आए दिन पब्लिक डोमेन में आती रहती हैं और किसी की कुर्सी पर बेवजह बैठने वालों की आलोचना भी होती है लेकिन इसके बावजूद पता नहीं यह क्या मानसिकता है कि आप जाकर उसकी कुर्सी पर ही बैठेंगे। तभी बड़े अफसर या बड़े नेता माने जाएंगे। मैं तो कहता हूं, जब मुख्य सचिव महोदय ने इतनी संवेदनशीलता दिखाई ही है तो क्यों नहीं वे एक स्थाई आदेश ही जारी कर दें कि जो भी सीनियर अफसर कहीं भी विजिट पर जाएगा तो वह संबंधित विभाग के अधिकारी के सामने वाली कुर्सी पर ही बैठेगा। उसके कुर्सी पर बैठकर उसे अपमानित नहीं करेगा। हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं। बाकी मुख्य सचिव महोदय ने अपने व्यवहार से जो संदेश दिया है, वही संदेश अगर बड़े अफसरों में चला जाए तो काफी अच्छा होगा। @svoruganti1466 @8PMnoCM @Sarkaridoctor12 @BhajanlalBjp

विधायक मुकेश भाकर और न्यायाधीश सुश्री कोमल मीणा को विवाह की हार्दिक शुभकामनाएँ। यह केवल दो युवा हृदयों का मिलन नहीं है; यह हमारे समाज की पुरानी, धूल-धूसरित अलमारियों में बंद उन कुंडियों पर एक उजला प्रहार भी है, जिनमें जाति, धर्म और कुल-गौरव के नाम पर मनुष्य की सहजता को बरसों से कैद रखा गया है। इस शादी की धूमधाम की ख़बरें और छवियाँ इसलिए सुंदर लगी, क्योंकि कभी-कभी समाज की जमी हुई बर्फ़ को पिघलाने के लिए प्रेम का सिर्फ होना काफी नहीं होता, उसका सार्वजनिक, निडर और उत्सवधर्मी होना भी ज़रूरी होता है। राजस्थान का समाज अपनी समृद्ध परंपराओं के साथ-साथ अनेक अदृश्य गांठों से भी बुना हुआ समाज है। ये गांठें रिश्तों की नहीं, पूर्वग्रहों की हैं; ये मर्यादा की नहीं, भय की हैं; ये संस्कृति की नहीं, संकीर्णता की हैं। मुकेश और कोमल ने इन गांठों को केवल छुआ नहीं, उन्हें खोलने का साहस भी दिखाया है। और यह साहस निजी होते हुए भी सार्वजनिक महत्व रखता है, क्योंकि हर ऐसी शादी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक खिड़की खोलती है, जहाँ से हवा थोड़ा मनुष्यता में भीगकर भीतर आती है। मैं एक दिन एक ज़मीनी रिपोर्टर के साथ मुकेश की माँ की बातें सुन रहा था। मुझे मेरी भी माँ याद आईं। मुझे लगा कि असली प्रज्ञा हमेशा विश्वविद्यालयों की ऊँची इमारतों में नहीं रहती; वह कई बार घर के आँगन में, चूल्हे की राख के पास, अनुभव की धीमी आँच पर पकती है। मुकेश माँ ने कितने सुलझे जवाब दिए। वे उन असंख्य तथाकथित शिक्षित लोगों से कहीं अधिक समझदार लगीं, जो डिग्रियों के बोझ तले दबे हुए भी मनुष्यता की पहली पाठशाला तक नहीं पहुँच पाते। कई बार मन में इतनी वितृष्णा होती है कि इस देश के प्रति अपार मुहब्बत दिखाने का दम भरने वाले इसी दिन भर कितना ज़हर उगलते हैं जातियों और धर्मों को लेकर। हमारे समय की एक त्रासदी यह है कि हमने शिक्षा को प्रमाणपत्र समझ लिया है और संकीर्णता को संस्कार। जबकि सच्चे संस्कार वे हैं, जो मनुष्य को बड़ा बनाते हैं, उसका हृदय खोलते हैं, उसकी दृष्टि विस्तृत करते हैं। अब समय सचमुच आ गया है कि जाति और धर्म की दीवारें विवाह के रास्ते में खड़ी प्रहरी न बनी रहें। प्रेम, सम्मान और समानता यही वे तीन दीप हैं जिनसे भविष्य का समाज रोशन होगा। हमारे मौजूदा वरिष्ठ नेताओं में बहुत सारे ऐसे हैं, जिन्होंने अपने समय में इन वर्जनाओं को तोड़ा और जाति धर्म की दीवारें लांघकर शादियाँ कीं। लेकिन जाति और धर्म की कंटीली और जड़तावादी संकीर्ण दीवारों को गिराने के लिए चेतना की लौ ज़रूरी है और मुकेश और कोमल ने इन दीपों में अपनी लौ जोड़ दी है। इसके लिए उन्हें बधाई नहीं, कृतज्ञता भी मिलनी चाहिए। @MukeshBhakar_



















