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रुद्र ✍️
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रुद्र ✍️
@hello_dhruv_
MBBS 🩺, टॉक्सिक, अल्हड़, शायर, घुमक्कड़, और आवारा हूं। कभी-कभी कहानियां भी लिखता हूं । ✨
नर्क की आग से शब्द चुराते हुए। Katılım Temmuz 2025
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इस सुनहरी रात में, जब खिड़की के बाहर चाँद अपनी रेशमी रौशनी को धरती पर धीरे-धीरे बिखेर रहा है और सारी दुनिया जैसे अपने सपनों की चादर ओढ़कर सो चुकी है, मेरी कलम अब भी जाग रही है। वह किसी किताब के लिए नहीं लिख रही, किसी कहानी के लिए नहीं लिख रही, वह सिर्फ तुम्हारे लिए लिख रही है। ऐसा लगता है जैसे मेरे हाथ में पकड़ी ये साधारण सी कलम आज स्याही से नहीं, तुम्हारी यादों से भरी हुई है।
मैं जब भी कोई शब्द लिखता हूँ, ऐसा महसूस होता है मानों उन शब्दों के बीच कहीं तुम्हारी उँगलियाँ छिपी हुई हैं। हर वाक्य में तुम्हारी आहट है, हर विराम में तुम्हारी खामोशी, हर पंक्ति में तुम्हारी मुस्कान और सच कहूँ, आज रात मैं तुम्हें लिख नहीं रहा, मैं तुम्हें महसूस कर रहा हूँ।
कितना विचित्र है ना, कोई इंसान सामने न हो, फिर भी उसकी उपस्थिति चारों ओर फैली हुई लगे। जैसे तुम इस कमरे में नहीं हो, फिर भी इस कमरे की हर चीज़ तुम्हारी बात कर रही है। मेरी मेज़ पर रखी डायरी, आधी भरी हुई चाय की प्याली, खिड़की पर टिके परदे, यहाँ तक कि दीवार पर पड़ती चाँदनी भी जैसे तुम्हारा नाम जानती हो।
आज मेरी कलम जब कागज़ पर चलती है तो ऐसा लगता है जैसे वह शब्दों में तुम्हें छू रही हो। तुम्हारे माथे पर बिखरी हुई लटों को सहेज रही हो। तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट को महसूस कर रही हो। तुम्हारी आँखों में उतरकर वहाँ छिपे उन अनगिनत अनकहे भावों को पढ़ रही हो जिन्हें शायद तुमने कभी किसी से नहीं कहा।
तुम्हें पता है, प्रेम हमेशा बड़े-बड़े इज़हारों में नहीं मिलता। कभी-कभी वह किसी शांत रात में एक अकेले आदमी की डायरी के पन्नों पर उतर आता है। वह उन शब्दों में बस जाता है जिन्हें कोई पढ़े या न पढ़े, पर लिखने वाला उन्हें लिखकर थोड़ा और जीवित हो जाता है।
आज मैं तुम्हें किसी उपमा में नहीं बाँधना चाहता। तुम चाँद हो, सितारा हो, फूल हो, नदी हो, ऐसी बातें दुनिया बहुत करती है। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि जब तुम्हारा ख़याल आता है तो मन के भीतर फैला हुआ सारा शोर धीरे-धीरे शांत होने लगता है। जैसे किसी बेचैन झील पर अचानक हवा रुक जाए और पानी अपने भीतर आसमान को समेट ले।
तुम्हारी याद मेरे लिए किसी उत्सव जैसी नहीं है जो कुछ घंटों के लिए आए और चला जाए। वह तो किसी मंदिर में जलते हुए उस अखंड दीपक की तरह है जो बिना शोर किए, बिना किसी प्रदर्शन के लगातार प्रकाश देता रहता है। मैं अपने दिनों की थकान, अपनी बेचैनियाँ, अपने अधूरेपन, अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ सब उसी दीपक के सामने रख देता हूँ।
इस रात की सुनहरी नीरवता में मुझे ऐसा लगता है जैसे ब्रह्मांड की सारी दूरियाँ समाप्त हो गई हों, जैसे समय ने चलना बंद कर दिया हो, जैसे मैं और तुम किसी ऐसी जगह बैठ गए हों जहाँ शब्दों की आवश्यकता ही नहीं रह गई। वहाँ सिर्फ एहसास हैं, सिर्फ धड़कनों की भाषा है, सिर्फ वह मौन है जिसमें प्रेम अपने सबसे शुद्ध रूप में जन्म लेता है।
मेरी कलम अभी भी चल रही है। वह शायद जानती है कि तुम्हारे बारे में लिखते हुए कोई अंत नहीं होता। प्रेम का कोई अंतिम वाक्य नहीं होता। वह तो हर पूर्ण विराम के बाद एक नया पृष्ठ खोल देता है।
और इसीलिए, इस रात के अंतिम पहर में, जब चाँद अपनी रौशनी समेटने की तैयारी कर रहा है, मैं अपनी डायरी में तुम्हारे लिए बस इतना लिखना चाहता हूँ....
कि अगर कभी मेरे शब्दों को छुओ, तो तुम्हें उनमें मेरी उँगलियों की गर्मी नहीं, मेरा हृदय धड़कता हुआ मिलेगा। अगर कभी मेरी लिखी हुई पंक्तियों को पढ़ो, तो उनमें अक्षर नहीं, तुम्हारे लिए रखी गई अनगिनत प्रार्थनाएँ मिलेंगी।
और अगर कभी इस सुनहरी रात जैसी किसी शांत घड़ी में मेरी याद आए, तो ये समझ लेना कि कहीं कोई इंसान अपनी मेज़ पर झुका हुआ, आधी रात के सन्नाटे में, अब भी तुम्हें शब्दों में छूते हुए महसूस कर रहा है इतनी कोमलता से, जैसे कोई भक्त अपने आराध्य के चरणों पर फूल रखता है, इतनी श्रद्धा से, जैसे कोई नदी समुद्र से मिलते समय अपने समूचे अस्तित्व को समर्पित कर देती है, और इतनी मोहब्बत से कि उसके पास कहने को बहुत कुछ हो, फिर भी वह अंत में सिर्फ तुम्हारा नाम लिखकर चुप हो जाए। ❣️😌
©® राघवेन्द्र चतुर्वेदी ❣️
(एक लड़का जो हर कहानी में खुद को ढूंढता है)

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