Aditya Chaudhary

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@hrypr

Public Relations l Digital and Social Media l Journalism

Chandigarh 🔁 Perth Katılım Aralık 2015
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Anjana Om Kashyap
Anjana Om Kashyap@anjanaomkashyap·
मासूम बच्चे और उनके माता-पिता की गाढ़ी मेहनत की कमाई का पैसा लूटने वाले कुछ कोचिंग सेंटर के सेलिब्रिटी टीचर्स आज भाड़े के वीडियो बना बनाकर ज्ञान दे रहे हैं। सार्वजनिक रूप से महिलाओं को गाली देने वाले, उनकी नक़ल उतारने वाले ये छिछले यूट्यूबर बच्चों की कड़ी मेहनत पर अपनी दुकान सजाते हैं। असल हीरो बच्चे हैं, ये माँ बाप की मेहनत की कमाई के लुटेरे कितना भी कूदें, देशभर के बच्चों को live जोड़कर हमने पेपर लीक के पिड़ित बच्चों को आवाज़ दी तो इनके स्टारडम को बड़ा धक्का लगा है! शिक्षा को धंधा बनाने वालों को दर्द हो तो अच्छा है।वैसे कोचिंग माफिया के खिलाफ मेरा विडियो वायरल करने के लिए धन्यवाद! मेरे शो पर सभी panelist ने बोला कि कोचिंग माफिया पर नकेल कसी जाए।
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vineet kumar
vineet kumar@vineetdelhi·
अंग्रेजी के एक संपादक का साधारण-मामूली दिखने का मतलबः 01 मिनट 34 सेकेण्ड तक ये शख़्स सौरभ द्विवेदी के सामने एक्सप्रेस हिन्दी की स्क्रीन पर इसी मुद्रा में खड़े रहते हैं. आधी बाजू की शर्ट पहने, दोनों हाथ आगे झुकाकर बांधे हुए. बिना किसी पहचान के यदि आप इस तस्वीर को अपने दोस्तों-रिंश्तेदारों के बीच साझा करके पूछेंगे कि इन्हें देखकर आपके दिमाग़ में क्या आता है ? संभवतः उनका जवाब होगा- साबजी ! आपने मुझे बुलाया ? इस बीच सौरभ द्विवेदी की देह भाषा, भाव-भंगिमा बदलती रहती है. हाथ कभी कमर पर जाता है तो कभी कभी हवा में लहराता है. द्विवेदी बोलने और लिखने के स्तर पर भले ही हिन्दी की सधी और कई बार अतिविनम्र शब्दावली का प्रयोग करते हों किन्तु उनकी देह-भाषा जब तब “गेस्ट इन द न्यूज़रूम” या फिर सभा-संगोष्ठियों की अति-गुरुर में सनी छलक जाती है. इसमें द्विवेदी का बहुत ज़्यादा दोष नहीं है, दरअसल हम-आप जिस हिन्दी पट्टी से आते हैं, वहां एक सफल व्यक्ति की ये भाषा उसकी सुरक्षा कवच बनकर एक परत के तौर पर नख-शिख तक चढ़ जाती है. द्विवेदी, द लल्लनटॉप से एक्सप्रेस हिन्दी में आने के बाद अपने भीतर बहुत कुछ बदल रहे हैं, भले ही वो प्रयोगात्मक ही क्यों न हो. मुझे पूरी उम्मीद है कि वो वक़्त के साथ अति-गुरुर से सनी ये देह-भाषा भी बदलेंगे. ख़ैर, आपमें से जो लोग द इंडियन एक्सप्रेस में संदीप द्विवेदी की स्पोर्ट्स रिपोर्ट पढ़ते आए हैं और चेहरे से नहीं जानते-पहचानते होंगे, वो आश्चर्य से भर जाएंगे कि ये शालीनता की इस हद तक स्क्रीन पर नज़र आते हैं कि आम आदमी की भीड़ के बीच का एक आदमी लगें. आप न तो इनके चश्मे की फ्रेम की ब्रांड खोजते हैं, न शर्ट की स्टाईल यूनिक लगती है, न चेहरे पर एक्सप्रेस समूह के स्पोर्ट्स एडिटर होने का गुरुर झलकता है और न ही संपादक होने का वो रौब जो आमतौर पर सभा-संगोष्ठियों में हिन्दी संपादकों में दिखना क्या, दूर से ही चू ऑब्लिक टपक रहा होता है. 01 मिनट 34 सेकेण्ड तक इस अंदाज़ में खड़े भारत के शानदार और गिने-चुने संपादकों में से एक संदीप द्विवेदी बेहद साधारण आदमी की तरह नज़र आते हैं, इस हद तक साधारण कि एक मामूली व्यक्ति के भीतर भी हैसियत और साधन के होने-न होने की सच्चाई से छिटककर दिमाग ग्लैमर और चकाचौंध में जाकर अटक गया हो. लेकिन एक बार जब संदीप द्विवेदी बोलना शुरु करते हैं तो आप साफ़ फर्क़ कर पाते हैं कि इस साधारणता के पीछे अपने काम के प्रति जो लगाव और उससे हासिल इत्मिनान है, वो ढब-ढांचे के उपर के झालर-मालर सजावट से कितनी मजबूत चीज़ है. इतनी मजबूत कि उसके आगे बाक़ी चीज़ें बहुत मायने ही नहीं रखती. प्रिंट हो चाहे स्क्रीन, मौज़ूद दौर की पत्रकारिता जिस “कॉस्ट्यूम जर्नलिज्म़” की तरफ तेजी से बढ़ रही है, इससे आप सहज अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हिन्दी पट्टी के निम्न-मध्यवर्ग, मध्यवर्ग के बीच से आए मीडियाकर्मियों का कितना समय, दिमाग़, ऊर्जा और संसाधन साधारण न दिखने पर खर्च होता है. पहनावे-ओढ़ावे से लेकर बीच-बीच में अंग्रेजी शब्दों और मुहावरों की वॉल-पुट्टी लगाने और जी न भरने पर इन्स्टाग्राम-फेसबुक पर अपनी जीवन-शैली को जाहिर करने की इस पूरी प्रक्रिया का मूल स्वर हुआ करता है- मुझे साधारण नहीं दिखना है. साधारण न दिखने की इस कोशिश में पत्रकारिता चाहे भले ही थर्ड क्लास की होती चली जाय, एक शानदार पेशे का भले ही बंटाधार हो जाय, कोई बात नहीं..हमें देखनेवालों का ध्यान हमारी घड़ी, जूते, बाल, एसयूवी, चॉपर पर जाकर अटक जा रही है न, वो ये देखकर चुंधिया जा रही है न, ये काफी है. अब पत्रकारिता चौकस करने के लिए चुंधियाने के लिए की जा रही है जिससे दर्शकों-पाठकों के भीतर ऐसा ही दिखने की हसरत पैदा हो. इन सबके बीच, संदीप द्विवेदी यदि अपने से पौने उम्र के कम संपादक के सामने अंग्रेजी का टोटे बैग साइड रखकर पूरे सम्मान के साथ खड़े होते हैं तो इसका मतलब है कि ऐसे व्यक्ति ने पत्रकारिता को कॉस्ट्यूम जर्नलिज़्म में नहीं बदला और उनके भीतर यह भरोसा क़ायम है कि हमारा काम जब दिख रहा है और उसमें चमक है तो मुझे चमकदार होने की ज़रूरत नहीं है. इसका मतलब है कि मेरी पूरी पहचान मेरे दिखने से नहीं, लिखने से है. जो लोग मेरा लिखा द इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ते हैं, उनके भीतर मेरी एक छवि बन चुकी होगी और वो छवि इतनी मजबूत होगी कि वो मेरी शर्ट, चश्मे, घड़ी और रौब से नहीं बदलेगी. अफ़सोस कि ये भरोसा अब पत्रकारिता के भीतर बची नहीं. शायद यही कारण है कि जहां हर दूसरे पत्रकार-मीडियाकर्मी और संपादक को साधारण नागरिक, मामूली लोगों के प्रतिनिधि के रूप में दिखना चाहिए, वो नहीं दिखते हैं तो संदीप द्विवेदी का साधारण दिखना, असाधारण लगता है.
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Deepali Agrawal
Deepali Agrawal@DeepaliiAgrawal·
कितना अजीब है ये जानना कि आप जिस व्यक्ति से प्रेम करते हैं, उसने अपने जीवन का एक हिस्सा आपके बिना भी जीया है।
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Clare O'Neil MP
Clare O'Neil MP@ClareONeilMP·
Australia should be a country where hard work, not what you inherit, gets you ahead in life.
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खुरपेंच
खुरपेंच@khurpenchh·
गंगा एक्सप्रेसवे के उद्घाटन को पूरा एक महीना बीत गया है,अब कहीं जाके हल्का फुलका धंसा है। इतने दिन बगैर किसी रुकावट के चलता रहा इसके लिए हम ठेकेदारों और अधिकारियों को धन्यवाद देते हैं।
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Aditya Chaudhary
@RoflGandhi_ वही वाली जो सलमान ने सुल्तान में बोली थी। 😂
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Rofl Gandhi 2.0 🏹 Commentary
Ye kartvya film wale kaunsi Haryanvi bol rahe hain. Humne toh 23 districts mein na aisa accent suna na aise words. सोनीपात 😭😭
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Kiran Mazumdar-Shaw
Kiran Mazumdar-Shaw@kiranshaw·
Not true. India told me you cannot be hired as a master brewer so I started Biocon.
7 Trader@7Traderculture

In 1978 — Australia told Kiran Mazumdar Shaw one thing. "You cannot be a master brewer. Because you are a woman." She came back to India. Started Biocon in her Bangalore garage. With ₹10,000. No lab. No team. No permission from anyone. Today Biocon is India's largest biotech company. But here's what nobody has asked: Where is that garage today? Where is the first fermentation equipment she used? Where is that Australian rejection letter? Lost. Forgotten. Probably gone. This is exactly why 7 Trader exists. We are building India's first collectible theme backpacker hostel network — starting from Varanasi in 2027. Every hostel room tells one story. Through one real object. From one real person. Not behind museum glass. Inside a living space where travelers from across the world wake up next to India's greatest stories. We don't want Kiran ji's success story. We want the garage. The rejection. The beginning. Because that's what the next generation needs to see. Not the trophy. The moment before. @kiranshaw — India's first backpacker hostel preserving India's greatest legacies is asking you one question: Which object from your Bangalore garage would you want every young Indian woman to stand next to — and believe? We will preserve it. Display it. Tell its story. Forever. Follow @7Traderculture #7Trader #WomenFounders #PreserveIndia

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Manisha Kadyan
Manisha Kadyan@ManiWithTheMic·
I refuse to believe that video of the Pune Porsche father dancing with note garlands is old. Bullshit. They know they screwed up big time after bail and are scrambling hard to control the damage by spinning it as a 2023 anniversary clip. Paid influencers and media are pushing the narrative hard. They think they own justice. Public anger is fully justified.
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Aditya Chaudhary
वक्त हिसाब जरूर करता है। इनका भी होगा।
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BHK🇮🇳@BHKslams·
Thanks for the clarification, JayPee Group..
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Kirtish Bhatt
Kirtish Bhatt@Kirtishbhat·
वो भी क्या जमाना था. दूरदर्शन के समाचार वाचक समाचार पढ़ते वक़्त गले में ख़राश या खांसी आ जाने पर भी माफ़ी मांग लेते थे.
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Ajeet Bharti
Ajeet Bharti@ajeetbharti·
This is an appreciation post for @rodemics! I had bought their Wireless GO II mic five years ago. Over the years, it stopped holding charge for more than 3 hours. I checked their website and found that it has a 5-yr warranty. But I had never registered the product. Anyway, I registered the product that I had bought from a website not present in their drop down list. They asked for an invoice, serial number. My concern was registered. Next, someone from Australia asked their India counterpart to fix it. I sent the device to service centre, they took a week and concluded that it cannot be fixed. So, they offered me a gen III Wireless GO. You would ask, this was under warranty, they ought to fix. However, I know several companies outrightly reject it because it was not bought from recognised stores. They could have done so as well. So, thank you Rode Mics. I own your Wireless Go, Wireless GO III (now), Wireless Pro, Rodecaster Pro II along with some other accessories. You have been a reliable companion for my YT/X videos. I have blind faith on your hardware and software. Makes my life easy. It would have cost me 30,000 to buy a new one, but you replaced it even when you could have refused. That’s the customer service we pay for.
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Dilip Mandal
Dilip Mandal@Profdilipmandal·
शुभ समाचार. दिल्ली के खानदानी रईसों की दारूबाजी के सबसे बड़े अड्डे जिमखाना क्लब की 27 एकड़ जमीन को सरकार रक्षा जरूरतों के लिए ले रही है. ये जमीन 5 जून तक ले ली जाएगी. हालांकि ये लोग बहुत पावरफुल हैं. आसानी से छोड़ेंगे नहीं. ये जमीन दिल्ली के रक्षा प्रतिष्ठानों पास है और वहां दारू क्लब का होना सुरक्षा के लिए खतरा भी है. इस क्लब की मेंबरशिप के लिए 37 साल की वेटिंग लिस्ट थी और वेटिंग फीस 7.5 लाख रु. थी. राहुल गांधी 2006 में इसके मेंबर बने थे. यानी बाईपास रास्ते से मेंबर बनते थे.
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Aditya Chaudhary
Aditya Chaudhary@hrypr·
@Profdilipmandal मुझे नहीं लगता यह बंद हो पाएगा। 😊
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Dilip Mandal
Dilip Mandal@Profdilipmandal·
दिल्ली जिमखाना क्लब बंद हो रहा है. लुटियन के खानदानी रईसों में वो हाहाकार मचेगा कि दुनिया देखेगी. नए रईस इसमें घुस भी नहीं सकते. वेटिंग लिस्ट 37 साल है. वेटिंग की फीस 7.5 लाख रु है. कोई सोच नहीं सकता था कि सरकार इसे हाथ लगाएगी. 27 एकड़ में फैला है. ये रक्षा के लिए संवेदनशील इलाके में था. लेकिन पहले की सरकारों को हिम्मत नहीं पड़ी. राहुल गांधी 2006 में खुद इसके मेंबर बन गए तो मनमोहन सरकार इसे क्या ही बंद करती.
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Anand Ranganathan
Anand Ranganathan@ARanganathan72·
29,000 have died in our one house since we began in 1952. We give them a special ticket of St. Peter. It's so beautiful to see people die with so much joy. - Mother Teresa Mother Teresa is the single-most successful emotional con-job of the 20th century. - Christopher Hitchens
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Kirtish Bhatt
Kirtish Bhatt@Kirtishbhat·
रुको जरा, सबर करो. वो अंडा याद है? इंस्टाग्राम पर 2019 में किसी ने 'जस्ट अन एग' नाम से प्रोफाइल बनाया और एक अंडे का फोटो पोस्ट किया. उद्देश्य ये कि किसी पोस्ट का 18 मिलियन का रिकॉर्ड तोड़ना था और लोगों ने बगैर सोचे किसी की खब्त पर अपने वो लाइक्स लुटाए कि देखते ही देखते कुछ दिन में अंडे ने रिकॉर्ड तोड़ दिया. आज उस प्रोफाइल पर 4.5 मिलियन फॉलोअर्स हैं और उस अंडे की फोटो पर 60.4 मिलियन लाइक्स हैं. और पूरे प्रोफाइल पर बस 3 अंडे की फोटो हैं. तो कहने का मतलब ये कि इंस्टाग्राम का यूज़र और एल्गोरिदम अलग ही लेवल पर फंक्शन करता है. वहाँ दो बार टैप करके जादू देखने वाली पोस्ट्स पर भी लाखों लाइक्स होते हैं. कॉकरोच पार्टी अगर वाकई नया प्रयोग है तो स्वागत है, शुभकामनाएं हैं. बस लोगों की उम्मीदों का अंडा फूटे नहीं. 😊🙏
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