Md. Suleman । محمد سلیمان

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Indian🇮🇳 || Muslim || Bihari || Urdu || Cricket || RP not endorsement. तुम ज़मीन पर जुल्म लिखो। आसमान पर इंकलाब लिखा जाएगा।

Bihar, India Katılım Ekim 2015
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Mr. Democratic
Mr. Democratic@MrDemocratic_·
दे दो केवल पाँच ग्राम रक्खो अपनी धरती तमाम ममता बनर्जी मासूम नहीं है, जब तक उनके पास सत्ता थी, उनकी जबान पर INDIA अलायन्स का नाम भी नहीं आता था, राहुल गांधी को वो ‘पप्पू’ बताती थी। कांग्रेस चाहती थी कि 2024 में TMC और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाए लेकिन ममता कांग्रेस को 2-4 सीट देने के लिए भी राजी नहीं हुई, यही हालत विधानसभा चुनाव में थी, ममता बंगाल में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी के लिए भी सीट नहीं छोड़ सकी, भले ही उनका प्रत्याशी बहरामपुर सीट पर तीसरे नंबर पर रहा जिसकी वजह से अधीर रंजन चौधरी चुनाव हार गए। लोकसभा चुनाव में भी ममता ने पूरी कोशिश की कि किसी तरह अधीर रंजन चौधरी को हरा दें। कांग्रेस ने भी हर सीट पर अपने उम्मीदवार खड़े किए जिसका नुकसान TMC को भी हुआ, TMC चुनाव हार गई, TMC और BJP के मत में कांग्रेस को प्राप्त मत के बराबर ही अंतर था। तो ये बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि ममता इनोसेंट हैं, ममता आज वही काट रही हैं जो उन्होंने बोया है। ये कांग्रेस और राहुल गांधी का बड़प्पन है कि ममता के हारने के बाद वो ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं, ममता बनर्जी ये भी डिज़र्व नहीं करती थी।
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Saurabh
Saurabh@sauravyadav1133·
एक राज्य के मुख्यमंत्री के लिए चित्रा त्रिपाठी की भाषा देखिए उनसे नफ़रत देखिए… सत्ता की चाटुकारिता तो हर दौर में रही है लेकिन ये नफ़रत पहली बार देखने को मिल रही है
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Ajit Anjum
Ajit Anjum@ajitanjum·
ये होती है एक -एक वोट की अहमियत. तमिलनाडु में DMK के मंत्री सिर्फ एक वोट से हार गए . राजस्थान में ऐसे ही एक वोट से कांग्रेस के सीपी जोशी हारे थे . बंगाल में 27 लाख लोगों को वोट नहीं दिया गया . तार्किक विसंगति के नाम पर 27 लाख लोग मताधिकार से वंचित रह गए और ये सब सुप्रीम कोर्ट की आंखों के नीचे हुआ .
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Mohd Ansar
Mohd Ansar@iMohdAnsar·
1937 में असम के पहले चुनाव में मुसलमान एक मजबूत राजनीतिक ताकत थे। मोहम्मद सादुल्लाह की लीडरशिप में असम की पहली चुनी हुई सरकार बनी। यानी शुरुआत में मुसलमान सिर्फ वोटर नहीं थे, बल्कि पावर स्ट्रक्चर का हिस्सा थे। तो फिर यह representation कहां चला गया?? आजादी के बाद मुस्लिम राजनीतिक भागीदारी पूरी तरह कांग्रेस के जरिए तय होने लगी। 1950 से लेकर 1970 के आखिर तक मुसलमान लगातार विधानसभा में चुने जाते रहे। लेकिन क्या उनके पास असली फैसले लेने की ताकत थी? नहीं। सारे फैसले कांग्रेस ही करती थी। फिर आया असम आंदोलन, और उसके बाद एक नई पार्टी उभरी — All India United Democratic Front। पहली बार मुस्लिम प्रतिनिधित्व कांग्रेस के बाहर गया। 2006 के चुनाव में AIUDF ने 10 सीटें जीतीं। 2011 में 18, 2016 में 13 और 2021 में 16 सीटें मिलीं। लेकिन यह प्रतिनिधित्व सरकार चलाने तक नहीं पहुंचा। यह एक साफ उदाहरण है कि elected होना और असली सत्ता में होना, ये दो अलग चीजें हैं। 2021 के असम विधानसभा चुनाव में 31 मुस्लिम विधायक चुने गए — यह एक रिकॉर्ड था। लेकिन इनमें से एक भी सत्तारूढ़ गठबंधन में नहीं था, न ही कैबिनेट में, और न ही फैसले लेने की प्रक्रिया में। दशकों में पहली बार मुसलमान पूरी तरह एग्जीक्यूटिव पावर से बाहर हो गए। फिर 2023 में असम में डीलिमिटेशन हुआ। 2001 की जनगणना के आधार पर विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय की गईं। सीटों की संख्या 126 ही रही, लेकिन कई ऐसे क्षेत्रों का ढांचा बदल दिया गया जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा थी। इससे मुस्लिम बहुल सीटें लगभग 35 से घटकर 20 रह गईं। यानी अब बात सिर्फ प्रतिनिधित्व की नहीं रही, बल्कि उसके नक्शे (geography) को भी बदल दिया गया। लेकिन यहां एक जरूरी बात है — डीलिमिटेशन तकनीकी रूप से चुनाव आयोग करता है, जो एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। लेकिन असम में यह प्रक्रिया vacuum में नहीं हुई। बीजेपी ने अपने 2021 के चुनावी घोषणा पत्र में साफ तौर पर डीलिमिटेशन का वादा किया था। हिमंत बिस्वा शर्मा ने कहा था कि कम से कम 110 सीटें स्थानीय लोगों के लिए होनी चाहिए। और जब डीलिमिटेशन हुआ, तो बीजेपी के वरिष्ठ मंत्री पीयूष हज़ारिका ने खुलकर कहा कि अब 104 सीटें स्थानीय भारतीयों और हिंदुओं के लिए सुरक्षित हैं। एक और तकनीकी बात — असम के डिलिमिटेशन के लिए 2001 की जनगणना इस्तेमाल हुई, जिसमें मुसलमान 31% थे। जबकि 2011 में यह बढ़कर 34.22% हो गए थे। जबकि उसी समय जम्मू-कश्मीर के लिए 2011 की जनगणना इस्तेमाल हुई। चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इसे एक नाम दिया — “कम्युनल जेरीमेंडरिंग”। यानी मुस्लिम वोटों को इस तरह बांट दिया गया कि उनका असर कम हो जाए। इससे राजनीतिक वजन (political weight) बदल गया और प्रतिनिधित्व का नक्शा भी बदल गया। तो आज असम में असली सवाल यह नहीं है कि मुसलमान चुने जाते हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या उनके प्रतिनिधित्व को सत्ता में बदलने दिया जाता है?? और अब एक नया सवाल भी जुड़ गया है — क्या उनकी राजनीतिक ताकत को ढांचे के स्तर पर कमजोर (structurally dilute) किया जा रहा है? #ElectionResults
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Anurag Dhanda
Anurag Dhanda@anuragdhanda·
176 सीटों पर जीत का अंतर SIR में काटे गये वोटों की संख्या से कम है। मतलब साफ दिख रहा है कि पश्चिम बंगाल के नतीजे चुनावों से नहीं SIR से तय हुए हैं।
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Rehan_Idrisi
Rehan_Idrisi@MR_COOL77777·
वैसे मैं Vijay Thalapathy (actor) के खिलाफ़ नहीं हूँ, मगर सोचने वाली बात तो है। तमिलनाड की इतनी तेज़ growth के बावजूद DMK हार गई क्यों? 🤔 तमिलनाडु में M. K. Stalin की सरकार ने economy में काफी अच्छा काम किया। 2024-25 में लगभग 11% growth 2025-26 में भी करीब 10.8% growth लगातार 2 साल double-digit growth 📈 पूरे देश का average सिर्फ ~7.4% रहा तमिलनाड 5 साल का average growth भी 9% से ज्यादा economy strong थी फिर भी? हरा दिया DMK टाइम में तमिलनाडु भारत की बड़ी economy स्टेट में से बन गया GSDP करीब ₹35 लाख करोड़ तक पहुंच गया Export और industry भी काफी मजबूत रहे यानि development में कोई कमी नहीं थी। लोगों के लिए भी काम हुआ 20 लाख बच्चों को free breakfast स्कूल attendance बढ़ाने की कोशिश गरीब और middle class के लिए कई schemes फिर क्या चाहिए और था जनता को सरकार से ???
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Pratik Patel
Pratik Patel@PratikVoiceObc·
हावड़ा में TMC कार्यालय में तोड़फोड़ हुई नदिया में TMC कार्यालय में तोड़फोड़ हुई बर्दवान में TMC कार्यालय जला दिया गया सिलीगुड़ी में TMC कार्यालय जला दिया गया कोलकाता में TMC कार्यालय जला दिया गया आसनसोल में TMC कार्यालय जला दिया गया इसके ऊपर "गोदी मीडिया" का ट्वीट आया पूरे - 0
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News24
News24@news24tvchannel·
"लोकसभा के 240 BJP सांसदों में से, मोटे तौर पर हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता" ◆ LoP राहुल गांधी ने कहा #RahulGandhi #Congress | Rahul Gandhi
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Dinesh Purohit
Dinesh Purohit@Imdineshpurohit·
कर्नाटक : 2019 में JDS कांग्रेस के साथ गठबंधन में थी, अब BJP के साथ है। बिहार : 2024 में JDU कांग्रेस के साथ गठबंधन में थी, अब BJP के साथ है। महाराष्ट्र : NCP और शिवसेना 2022 में कांग्रेस के साथ थीं, अब दोनों BJP के साथ हैं। लेकिन क्या आपने कभी किसी को BJP या उन सहयोगी दलों को नैतिकता का ज्ञान देते देखा, जिन्होंने सिर्फ पार्टी नहीं बल्कि अपनी विचारधारा तक छोड़ दी? और जब कांग्रेस TVK के साथ गठबंधन करे, तब हर तरफ से ज्ञान और लेक्चर शुरू हो जाते हैं 🫡
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Awesh Tiwari
Awesh Tiwari@awesh29·
मानो न मानो मगर सच! एमके स्टालिन: कोलाथुर में 102000 वोट रद्द हुए, वे 8700 वोटों से हार गए। ममता बनर्जी: भवानीपुर में 51,000 वोट रद्द हुए, वे 15,000 वोटों से हार गईं। अरविंद केजरीवाल: नई दिल्ली में 38,000 वोट रद्द हुए, वे 4,000 वोटों से हार गए।
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Ranvijay Singh
Ranvijay Singh@ranvijaylive·
फिर से कुछ लोग लिखने लगे- चुनाव ऐसे लड़ा जाता है. ये होती है मेहनत. विपक्ष को सीखना चाहिए. इन्हें दिख नहीं रहा 👇 • चुनाव आयोग कैसे काम कर रहा • कैसे वोट काटे गए • ज्ञानू कितना निष्पक्ष है • EVM और ED, CBI, IT का क्या रोल है आप सच में इतने बेवकूफ हैं, या नाटक कर रहे?
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Ansar Imran SR
Ansar Imran SR@ansarimransr·
इंडिया गठबंधन केवल चाय बिस्किट वाली मीटिंग तक ही सीमित है असल में तो ये पार्टियां खुद में ही गुत्थमगुत्थी हो रखी है! असम में कांग्रेस की हार को जरा गहराई से देखेंगे तो पता चलेगा कि कम से कम 16 सीटें ऐसी है जहां पर हेमंत सोरेन की पार्टी JMM कांग्रेस की हार की वजह बनी है! इन सीटों पर केवल वोट काटा नहीं बल्कि झामुमो तो दो सीटों पर दूसरे नंबर पर रही है। ऐसे ही एक सीट पर टीएमसी ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराया है! बिल्कुल ऐसे ही मालदा मुर्शिदाबाद के मुस्लिम बहुल इलाकों में कई सीटें ऐसी है कांग्रेस और टीएमसी में वोट बंटा और भाजपा वहां से भी चुनाव जीत गई जहां लगभग उनकी जीत असंभव लगती है! अब बताओ काहे का इंडिया गठबंधन जो एक दूसरे की ही लंका लगाने में व्यस्त है! सोचो अगर गलती से भी ये काम ओवैसी की पार्टी कर दी होती तो अभी तक ऐसा रांडवा रोना होता कि जमीन असमान एक कर देते मगर इधर खामोशी रहेगी क्योंकि सभी कट्टर सेकुलर है न!
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Ansar Imran SR
Ansar Imran SR@ansarimransr·
जैसे पश्चिम बंगाल में लेफ्ट सत्ता से विदाई के बाद भाजपा वोटर में तब्दील हो गया अब वहीं काम केरल में भी होने वाला है! यही सीपीएम का वोटर वहां भी भाजपा को चुन लेगा मगर UDF नहीं यही सच है! लेफ्ट ही भाजपा का गेटवे बनेगा!!!
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Ashok Kumar Pandey अशोक اشوک
तमिलनाडु कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन देने का फ़ैसला किया। यानी डी एम के से पुराना गठबंधन टूट गया है। इसका असर केंद्र में INDIA गठबंधन पर क्या होगा, यह देखना होगा।
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Ranvijay Singh
Ranvijay Singh@ranvijaylive·
आप गौर कीजिएगा देश में सत्ता विरोधी लहर हमेशा वहीं होगी, जहां विपक्ष की सरकारें हैं. एंकर आपको बताएंगे लोग सरकार से परेशान थे. लेकिन… वही सत्ता विरोधी लहर BJP सरकारों के लिए नहीं होती. हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र.. कहीं कोई लहर नहीं. लगभग एक सी स्कीम, एक से फायदे जनता को दिए जाते हैं. फिर भी विपक्ष की सरकार रिपीट नहीं कर पाती. सत्ता विरोधी लहर का होना स्वाभाविक है, लेकिन BJP की सरकारों के खिलाफ ये क्यों नहीं दिखता? हरियाणा का किसान मार खाकर भी BJP को चुनता है, क्या ये संभव है?
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Ajit Anjum
Ajit Anjum@ajitanjum·
' जो अतीक का यूपी में हुआ बंगाल में वैसा ही जहांगीर का होगा ' टाइम्स नाउ के हिंदी चैनल को TMC के उम्मीदवार जहांगीर ख़ान की लाश चाहिए. जहांगीर खान की हत्या पर जश्न मनाने का मौका चाहता है ये चैनल . अगर देश में कोई कायदा कानून होता तो किसी हत्या के लिए उकसाने वाले शो चलाने वाले चैनल के खिलाफ मुकदमा होता . कोई न्यूज चैनल ऐसा कैसे लिख सकता है ? ऐसे मीडिया वाले इस देश को कहां ले जाना चाहते हैं , इसकी कल्पना की जा सकती है .
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Ansar Imran SR
Ansar Imran SR@ansarimransr·
असम में परिसीमन के खेल करने के बाद हालिया भाजपा जीत बंपर जीत में कैसे तब्दील हुयी है इसको उदहारण के साथ समझिये। असम में परिसीमन से पहले करीमगंज लोकसभा के तहत दो विधानसभा सीटें हैलाकांडी और अल्गापुर-कटलीचेरा मुस्लिम केंद्रित और मुस्लिम विधायक वाली होती थी! मगर फिर हेमंत बिस्वा सरमा के कथन के अनुसार ऐसा परिसीमन हुआ कि जिसमें अल्गापुर-कटलीचेरा को एक दम फुल मुस्लिम मैजोरिटी वाली सीट बना दिया और हैलाकांडी को परिसीमन में ऐसे काटा गया कि वहां मुसलमानों की गिनती अपने आप ही कम हो गयी। अब इसका प्रभाव 4 मई को आये चुनावी नतीजों के गणित से समझिए! अल्गापुर-कटलीचेरा विधानसभा जिसको फुल मेजोरिटी बना दिया गया है वहां से कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशी ज़ुबैर मजूमदार 145661 वोटों के हासिल करते हुए 1,05,448 मार्जिन से चुनाव जीत जाते है। मगर दूसरी तरफ जिस हैलाकांडी में हमेशा मुस्लिम विधायक चुनाव जाता था वहां इस बार भाजपा की तरफ से मिलन दास 119591 वोट हासिल करते हुए 55817 मार्जिन से चुनाव जीत जाते है। ये कमाल के लिए आप परिसीमन को धन्यवाद दे सकते है। ज्ञात रहे जिस असम में मुस्लिम 35 सीटों पर विधायक बनने की स्थिति में थे वो अब सिमट कर केवल 22 सीटों पर सीमित हो चुके है। असम के सीएम से चुनाव से पहले ही कहा था कि हमने परिसीमन में मियां को केवल 22 सीटों तक सिमित कर दिया है और इस बार के चुनावी नतीजें इस बात की गवाही दे रहे है कि मुस्लिम उन्हीं 22 सीटों पर चुनाव जीते है जिसका ज़िक्र हमेशा भाजपाई नेता करते थे। परिसीमन की ऐसी धांधली और भाजपाई जुगलबंदी के लिए हेमंत बिस्वा सरमा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता को भारत रत्न देने की वकालत की थी। बाकि जनता खुद समझदार है आखिर चुनावी राजनीति में क्या खेल चल रहा है।
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Ashok Kumar Pandey अशोक اشوک
एक बात याद रखिए कोई खत्म नहीं होता। न एक हार से बंगाल में ममता बनर्जी खत्म हो गई हैं, न तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति और न ही भारत में लेफ्ट की राजनीति। दो सीटें मिली थीं भाजपा को 1984 में। वह खत्म नहीं हुई तो बाक़ी भी ख़त्म नहीं होंगे। राजनीति में अंत की घोषणाएँ जल्दबाज़ी की पत्रकारिता हैं, इतिहास कुछ अलग सबक सिखाता है। चुनावों की जीत से जब सबक नहीं सीखे जाते तो हार होती है और सबक सीखने के मौक़े देती है।
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