
Nikhil Aggarwal
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Nikhil Aggarwal
@iNikhilAgg
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City Montessori school की Class 5th की सिर्फ अंग्रेजी की एक किताब 1035 रूपये की है, अब तक हिन्दू खतरे में था, अब हिन्दू के बच्चों की शिक्षा भी खतरे में आ गई है, ना पढ़ा हूं ना पढ़ने दूंगा

मेरे द्वारा संघ की आलोचना पर बहुत लोग बिफरे परे हैं, जैसे कि संघ एक परफैक्ट अवधारणा है, त्रुटि तो हो ही नहीं सकती है। जो बोला जाता है, उसमें कोई सारतत्व होगा, बस हमें पता नहीं है कि वो क्या है। मोहन भागवत का शब्दशः कथन लिखा मैंने। कोई फिलॉसफी नहीं कही गई थी। प्रश्न स्पष्ट था: “मृतकों के लिए क्या कोई आर्थिक सहयोग निधि बनाई जा सकती है?” यह नहीं पूछा कि संघ उन्हें बचाता क्यों नहीं, विरोध क्यों नहीं करता? पर मोहन जी को यह बात तीखी नहीं लगी थी। उन्हें तीखी यह बात लगी थी कि उनके लोगों के पास बंगाल में मारे गए स्वयंसेवकों का नाम और पता भी नहीं था। और यह बात मैंने आर्थिक सहयोग से पहले उन्हें सीधे बोली। मोहन जी की आयु, अनुभव और पद के सामने मैं इतना छोटा था (और हूँ) कि उनके एक कथन पर मेरा अस्तित्व मिटाया जा सकता है। वो चाहते तो कहते कि इसको निकाल बाहर करो, पर उनका बड़प्पन कि उन्होंने अपने अनुभव के प्रयोग से मुझे केवल यही कहा कि संघ ने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा है। आगे जो हुआ वह भी बता देता हूँ। मोहन जी का अगला बड़प्पन यह था कि उसी कार्यक्रम के उपरांत जब मैं वहीं भोजन कर रहा था तो उन्होंने तीन बार तीन लोगों को मेरे पास भेजा। एक ने कहा: मोहन जी ने मुझे कहा कि उस नवयुवक को मैंने कुछ कठोर वचन कह दिए। मैंने उत्तर दिया: “वो पिता तुल्य हैं। पर मुझे आप यह समझा दीजिए कि यदि संघ ने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा है तो ये दो सौ लोगों को आपने पूरे देश से, खर्चा कर के क्यों बुलवाया है? यही ठेका लेना है, क्योंकि संगठन के पास वह शक्ति है, जो समाज को नेतृत्व को दे सकता है।” झंडे के लिए मरता हुआ स्वयंसेवक ‘तेरा वैभव अमर रहे माँ’ गाते हुए गोलवलकर जी के ‘बंच ऑफ थॉट्स’ के साथ खप जाएगा। परंतु प्रश्न यह है कि जब संसाधनों से सुसज्जित संघ, जो केशव कुंज बनवा सकता है, वह उनके परिजनों को वही गीत सुना सकता है? ठीक है, आपके पास पैसे नहीं होंगे। केशव कुंज दान से बना है। आप यही कह देते कि यह व्यवस्था अजीत भारती ही बनाने का प्रयत्न करें, संघ ऐसा नहीं करता। मैं तब भी मान लेता। आपने सीधा अटैक किया क्योंकि आपको भी दायित्व का बोध है पर सार्वजनिक रूप से आप स्वीकार नहीं पाते क्योंकि मेरे पास ऐसे दर्जन भर मृतक स्वयंसेवक परिवार के इंटरव्यू हैं। मैं हर भाजपा समर्थक को, जो मुझे दिखाने के लिए मोहन जी का ‘हिन्दुओं को ठेका देने की आदत है’ वाला वीडियो चला रहे हैं, तार्किकता से शांत कर सकता हूँ। मुझे उसके लिए ‘संघ को जानने’ की आवश्यकता नहीं है। मोहन भागवत संघ नहीं हैं। संगठन को दिशा देना उनका कार्य है। संघ में दर्जनों भागवत जी आएँगे, जाएँगे। जिस दिन संघ सुधार करना त्याग देगा, नेता के शब्दों को ब्रह्मवाक्य मान कर डिफेंड कराने के लिए कुतर्क गढ़ेगा, वह समाप्त हो जाएगा। स्वयंसेवकों के साथ आपके अनुभव केवल अच्छे ही हो सकते हैं। क्या मैं ऐसे स्वयंसेवकों को नहीं जानता जो अच्छे हैं? बिलकुल हैं, कई बार लिखा-बोला भी है। बुरे भी हुए हैं। अब इसका क्या उत्तर देगा संघ कि द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित स्वयंसेवक को केशव कुंज में घुसने नहीं दिया गया? जब-जब उनके कथन राजनैतिक होंगे, अनुचित लगेंगे, आलोचना होगी। यदि इस पद पर बैठा व्यक्ति आलोचना हैंडल नहीं कर सकता, तो दुर्भाग्य है। मोहन जी के वकील आप लोग क्यों बन रहे हैं? उन्होंने आपको बोला बचाव करने? मैं अपनी औकात जानता हूँ: चैनल बंद करा दोगे, घर तुड़वा दोगे, केस लगा कर प्रताड़ित करोगे, जेल में डाल दोगे, चरित्र हनन कराओगे… या मरवा दोगे। उससे होगा क्या? क्या दुनिया में ऐसा पहले नहीं हुआ? तंत्र ने जान नहीं ली क्या? बिलकुल ली है। एक और नाम जुड़ जाएगा। मैं स्वयं को इन्सिग्निफिकेंट मानता हूँ। औकात पता है इसलिए ही निश्चिंत रहता हूँ। बाकी, मोहन जी ने मेरा खेत तो जोता नहीं, वैयक्तिक झगड़ा नहीं है। बंगाल के मृत स्वयंसेवक मेरे अपने नहीं थे, वो हिन्दू थे। हिन्दू होने के कारण, और अनभिज्ञता, अज्ञानता में संघ से आशा रखने के कारण, मैंने मोहन जी से वह पूछा। उत्तर दो कौड़ी का, अहंकार से भरा हुआ था। अनुचित था, कोई भी लॉजिक लगा लो।



Sports Minister of India Mansukh Bengan 🍆🤡





























