ill Logiqal

1.6K posts

ill Logiqal banner
ill Logiqal

ill Logiqal

@ill_logiq

Cricket | Politics | Satire | Humor | Observations from the illogical side of logic.

Universe Katılım Haziran 2025
0 Takip Edilen99.1K Takipçiler
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
126
Vijay Mallya
Vijay Mallya@TheVijayMallya·
RCB RCB….Congratulations Double back to back IPL Champions. Namma dodda Simhagulu roared loudly and made us all very proud. Very well done you beauties.
English
815
4.8K
43.9K
439.1K
ill Logiqal retweetledi
President Vladimir Putin Parody
🇫🇷 French opposition leader Jordan Bardella has emerged as another vocal critic of Trump’s approach to Europe. Bardella argued that European nations should reconsider purchases of American F-35s and instead invest in France’s Rafale fighter jets, saying that if Europe seeks France’s nuclear protection, it should reduce its dependence on U.S. military equipment. His remarks come amid concerns over Trump’s moves to reduce the American military presence in Europe. The debate over Europe's strategic autonomy is clearly gaining momentum. 🔥
President Vladimir Putin Parody tweet mediaPresident Vladimir Putin Parody tweet media
English
0
2
2
268
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
180
Vipnesh Mathur
Vipnesh Mathur@MathurVipnesh·
ये आग बुझनी नहीं चाहिए इन कोचिंग माफियाओं की दुकान बंद होने का समय आ गया है। ये सभी अमीर बच्चों को ही वेलकम करते हैं ग़रीब को तो भटकने भी नहीं देते । ग़रीब तो बेचारा इनके फंदे में फंस जाता है ।
Anjana Om Kashyap@anjanaomkashyap

मासूम बच्चे और उनके माता-पिता की गाढ़ी मेहनत की कमाई का पैसा लूटने वाले कुछ कोचिंग सेंटर के सेलिब्रिटी टीचर्स आज भाड़े के वीडियो बना बनाकर ज्ञान दे रहे हैं। सार्वजनिक रूप से महिलाओं को गाली देने वाले, उनकी नक़ल उतारने वाले ये छिछले यूट्यूबर बच्चों की कड़ी मेहनत पर अपनी दुकान सजाते हैं। असल हीरो बच्चे हैं, ये माँ बाप की मेहनत की कमाई के लुटेरे कितना भी कूदें, देशभर के बच्चों को live जोड़कर हमने पेपर लीक के पिड़ित बच्चों को आवाज़ दी तो इनके स्टारडम को बड़ा धक्का लगा है! शिक्षा को धंधा बनाने वालों को दर्द हो तो अच्छा है।वैसे कोचिंग माफिया के खिलाफ मेरा विडियो वायरल करने के लिए धन्यवाद! मेरे शो पर सभी panelist ने बोला कि कोचिंग माफिया पर नकेल कसी जाए।

हिन्दी
811
318
1.5K
105.9K
ill Logiqal retweetledi
amit kilhor
amit kilhor@amitkilhor·
Ma'am jab tak Alakh Sir and Divyakirti Sir jawab na de de tab tak rukengi nhi. Bring the impact players into the debate. #amitkilhor #kilhor #anjanaomkashyap
Indonesia
152
1.4K
5.3K
80.1K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
394
amit kilhor
amit kilhor@amitkilhor·
भारत की शिक्षा प्रणाली एंड पद्धति में समस्या थी, इसलिए उसको भरने के लिए कोचिंग आई । शिक्षा महंगी हो गई है, उसको सस्ता इन यूट्यूब के टीचर्स ने किया । पत्रकारिता में एक वैक्यूम बना। अब उसके लिए भी ब्लैकबोर्ड वालो को पत्रकारिता का काम करना पड़ा! छात्रों की आवाज़ नहीं है, वह मीडिया को बनना था, बट वह काम भी यूट्यूब के अध्यापकों को करना पड़ रहा है। NEET एंड सीबीएसई फियास्को को पकड़ना काम मीडिया का था, वो 18-19 साल के बच्चो को करना पड़ा । पैरासाइट वह होता है जो होस्ट का खून चूसता है, और धीरे धीरे उसे मार देता है । जब डॉक्टर पैरासाइट को निकालने आता है तो वह डॉकटर और होस्ट दोनों पे अटैक करता है।
हिन्दी
24
135
630
15.3K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
101
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
487
खुचरेंप
भाई साहब ये वाली हरकत तो तुमने एकदम लेंडी वाली कर दी। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन बदतमीजी का अधिकार किसी को नहीं है, वो भी महिला के साथ। आपकी हरकतें टीचर वाली नहीं हैं।
हिन्दी
174
563
2.2K
61.5K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
201
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
156
Abhinay Maths
Abhinay Maths@abhinaymaths·
मुझे गहरा अफसोस है कि मैंने कल के वीडियो में मीडिया पर बोला क्योंकि उन्होंने हमें 2 कौड़ी का कहा। आज सारे दिन सिर्फ वही बात होती रही। और ऐसा डर होने लगा कि इस मीडिया vs YouTube Teachers की बहस में कहीं पेपर लीक जैसा इतना बड़ा मुद्दा धुंधला न हो जाए। क्योंकि सरकारें तो यही चाहती हैं कि किन्हीं दो पक्षों को लड़ाकर खुद बच जाए। आप सबसे मेरी गुजारिश है कि अभी हमें सिस्टम ठीक करके ही सांस लेनी है। जो अति पेपर लीक की हो चुकी है, उसका अंत करने का यही सही समय है। मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि मैंने ढाई घंटे से ज्यादा पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था और सिस्टम की खामियों पर बोला था। कृपया उस तरफ भी थोड़ा ध्यान आकर्षित कीजिए। और रही बात कोचिंग्स की, तो नीचे दिया गया वीडियो देखिए, जो उसी वीडियो का हिस्सा है जिसमें मैंने खुद कुछ कोचिंग संस्थानों के चरित्र और कमियों पर भी खुलकर बात की है। मैंने हमेशा गलत को गलत कहा है। दूसरा यह भी जान लीजिए कि मैंने अपनी ऑफलाइन कोचिंग्स बंद किए आज 7 साल से ज्यादा हो गए हैं। और ऑनलाइन Abhinay Maths[10lakh+ users] पर इस समय जो भी कोर्स उपलब्ध हैं, वे पूरी तरह निःशुल्क हैं। हाँ, पिछले कई वर्षों में मैंने छात्रों के हक के लिए अनेक लड़ाइयाँ अदालतों में लड़ी हैं। आप सब जानते हैं कि न्याय पाने के लिए आज बहुत बड़ा आर्थिक खर्च करना पड़ता है। उसी खर्च को वहन करने के लिए मैं कहीं और प्रतिदिन कुछ घंटे काम करता हूँ। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण हमेशा छात्र रहे हैं, और आगे भी रहेंगे।YouTube पर लगातार free classes पढ़ा रहा हूँ। महीने में कई करोड़ लोग उन्हें देखते हैं और comment पढ़कर मेरी teaching का आसानी से आकलन कर सकते हैं। इसलिए मेरी आप सबसे विनम्र प्रार्थना है कि व्यक्ति, मीडिया या YouTube Teachers की बहस में उलझने के बजाय उस असली मुद्दे पर ध्यान केंद्रित रखें, जिसने लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा रखा है - पेपर लीक, भर्ती व्यवस्था की खामियाँ और युवाओं के साथ हो रहा अन्याय। लड़ाई किसी एंकर से नहीं है।लड़ाई उस व्यवस्था से है जिसे ठीक होना चाहिए।
हिन्दी
364
1.9K
5.7K
95K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
719
Anjana Om Kashyap
Anjana Om Kashyap@anjanaomkashyap·
मासूम बच्चे और उनके माता-पिता की गाढ़ी मेहनत की कमाई का पैसा लूटने वाले कुछ कोचिंग सेंटर के सेलिब्रिटी टीचर्स आज भाड़े के वीडियो बना बनाकर ज्ञान दे रहे हैं। सार्वजनिक रूप से महिलाओं को गाली देने वाले, उनकी नक़ल उतारने वाले ये छिछले यूट्यूबर बच्चों की कड़ी मेहनत पर अपनी दुकान सजाते हैं। असल हीरो बच्चे हैं, ये माँ बाप की मेहनत की कमाई के लुटेरे कितना भी कूदें, देशभर के बच्चों को live जोड़कर हमने पेपर लीक के पिड़ित बच्चों को आवाज़ दी तो इनके स्टारडम को बड़ा धक्का लगा है! शिक्षा को धंधा बनाने वालों को दर्द हो तो अच्छा है।वैसे कोचिंग माफिया के खिलाफ मेरा विडियो वायरल करने के लिए धन्यवाद! मेरे शो पर सभी panelist ने बोला कि कोचिंग माफिया पर नकेल कसी जाए।
हिन्दी
17.5K
4.2K
17K
3.3M
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!

QME
0
0
0
113
Abhinay Maths
Abhinay Maths@abhinaymaths·
असली दिक्कत YouTube Teachers से नहीं, बल्कि उनकी आवाज़ से है। आज किसी भी परीक्षा में गड़बड़ी हो, पेपर लीक हो, रिज़ल्ट में अन्याय हो या छात्रों के साथ गलत हो, तो यही YouTube Teachers सबसे पहले छात्रों के हक़ की लड़ाई में कूद पड़ते हैं। लाखों छात्रों की आवाज़ बन जाते हैं। सरकार पर दबाव बनता है, सवाल पूछे जाते हैं और जवाब माँगे जाते हैं। शायद यही कारण है कि कुछ लोगों को शिक्षक नहीं, उनकी सक्रियता खटकती है।लोगों की आँखों की किरकिरी बन जाता है। इसलिए जो बातें सत्ता सीधे नहीं कह सकती, वही बातें कुछ चेहरे अपने मुख से कह देते हैं। ध्यान रहे कि "सरकार कहना चाहती थी, अंजना ने कह दिया"
हिन्दी
455
1.8K
5.9K
71.2K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
शिक्षकों और तथाकथित पत्रकारों के बीच नया विवाद सामने आया है। लेकिन इस बहस में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शिक्षक फीस क्यों लेते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार अपना काम कब करेंगे? शिक्षक का काम पढ़ाना है और वह पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूल में, निजी स्कूल में, कोचिंग में, YouTube पर या किसी ऐप पर—जहाँ भी मौका मिल रहा है, वह छात्रों को पढ़ा रहा है। हाँ, शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण भी है, लेकिन अधिकांश शिक्षक वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं—शिक्षा दे रहे हैं और छात्रों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब पत्रकारिता की बात करते हैं। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना, भ्रष्टाचार को उजागर करना, महंगाई पर जवाब माँगना, बेरोजगारी पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना और शिक्षा, स्वास्थ्य व प्रदूषण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना था। लेकिन आज टीवी स्क्रीन पर अक्सर कुछ और ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ती है, बेरोजगारी बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वह आक्रामकता कम दिखाई देती है जो राजनीतिक बयानबाज़ी पर दिखाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG विवाद, UGC-NET परीक्षा रद्द होना, UP Police भर्ती परीक्षा रद्द होना, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी भर्ती, क्लर्क भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं को लेकर सामने आए पेपर लीक और धांधली के आरोपों ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, समय और परिवार की जमा-पूंजी इन परीक्षाओं पर लगाते हैं। लेकिन क्या इन मुद्दों पर उतनी निरंतर और तीखी पत्रकारिता हुई, जितनी होनी चाहिए थी? इसी बीच कुछ टीवी चेहरों ने शिक्षकों को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अंजना ओम कश्यप की ऑनलाइन शिक्षकों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी ने छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी नाराज़गी पैदा की। YouTube शिक्षकों को “दो कौड़ी के” और “बड़े फ्रॉड” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इस टिप्पणी के बाद छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने लाखों युवाओं को JEE, NEET, SSC, Railway और UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराई, उन्हें अपमानित करने से पहले मीडिया ने बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर उतनी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई? CBSE छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो और भी चिंताजनक था। एक छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में हुई कथित गड़बड़ी पर सवाल उठा रहा था। उसे जवाब चाहिए था। उसे न्याय चाहिए था। लेकिन उसकी शिकायत की गंभीरता पर बात करने के बजाय दूरदर्शन के एंकर आलोक श्रीवास्तव ने लिखा—“क्या पाकिस्तानियों ने भी CBSE के एग्जाम्स दिये थे?” एक छात्र की शिकायत का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए था, न कि उसकी पहचान और नीयत पर सवाल उठाकर। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। छात्र सवाल पूछे तो उसे संदिग्ध बना दो। युवा बेरोजगारी पर बोले तो उसे राजनीतिक बता दो। नागरिक व्यवस्था की गलती बताए तो उसकी देशभक्ति पर सवाल उठा दो। लेकिन सत्ता से सवाल मत पूछो। यही वजह है कि आज लोग पत्रकार और प्रचारक के बीच का फर्क पूछने लगे हैं। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी छात्र, शिक्षक या आम नागरिक को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। एक शिक्षक अगर 499 रुपये लेकर किसी गरीब बच्चे को पढ़ा रहा है, तो वह समाज में कुछ जोड़ रहा है। लेकिन अगर पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दे, तो वह लोकतंत्र से कुछ छीन रहा है। देश को प्रचारक नहीं चाहिए। देश को पत्रकार चाहिए। देश को शोर नहीं चाहिए। देश को सवाल चाहिए। जवाब चाहिए! हल चाहिए!
हिन्दी
0
1
3
2.7K
President Vladimir Putin Parody
Do you consider Pakistan a terrorist state? 🔘 Yes 🔘 No Write your opinion below 👇
President Vladimir Putin Parody tweet media
English
3
0
0
436
ill Logiqal retweetledi
President Vladimir Putin Parody
🇺🇸 Trump at 10:00 AM: "Fake News is Iran’s biggest asset. We win battles, they say we lost. Terrible for our country." 🇺🇸 U.S. Intelligence at 9:00 PM: 🔥 Iran’s not even close to destroyed. 🔥 China is helping rebuild missile capabilities. 🔥 Recovery was faster than expected. 🔥 Stockpiles remain largely intact. At this point, nobody has done more to fact-check Trump than U.S. intelligence itself. 🤣
English
0
4
3
955
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
Who is the boss? Credit: Wild Wisdom
English
0
0
6
672
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

धमाकेदार स्ट्राइक रेट से 600 से ज़्यादा रन, सबसे ज़्यादा छक्के, वो भी सिर्फ़ 15 मैचों में, अद्भुत। तुम्हारी उम्र को लेकर दुनिया भर के बेवकूफ़ों में बहस होती रहेगी मगर क्या उनको नहीं पता के 15 से लेकर 45 साल तक की उम्र में किसी भी दिग्गज ने वो कारनामा नहीं किया जो तुमने महज़ 15-16 मैचों में कर दिया है? मुझे अभी एग्ज़ैक्ट नं तो नहीं पता मगर जिस तरह पिछले मैच में तुमने क्रिस गेल के रिकॉर्ड को लगभग तोड़ ही दिया था, उसे देख कर खुद ग्रेट क्रिस गेल भी मुस्कुरा रहे होंगे, तुम अमेज़िंग हो छोटे, तुम बॉस बेबी हो। बुमराह की पहली गेंद पर छक्का, स्टार्क की पहली गेंद पर छक्का, पैट कमिंस की पहली गेंद पर, बोल्ट की पहली गेंद पर, नारायण की दूसरी और कमिंस को बैक टू बैक 4,4,4,6, शायद ही कोई दिग्गज हो जो तुम्हारे सामने टिका हो! ये कोई जंग नहीं है, कोई युद्ध नहीं है, 3-4 घंटे का एक गेम है जिसमें तुम डॉमिनेट कर रहे हो, आउट होने पर रोते हो, शतक पर दिल बनाते हो, मुस्कुराते हो, शर्माते हो, तुम सीख रहे हो, सीखते रहो, हो सके तो किसी के इन्फ्लुएंस में मत आना, तुम्हारी बढ़ती शोहरतें तुम्हारे कर्म से हैं, तुम्हारी बल्लेबाज़ी से हैं, किसी फेम के डिस्ट्रैक्शन में आकर अपने खेल पर असर न पड़ने देना, बुरे दिन भी आएँगे, तेंदुलकर के भी आए थे, मगर वो गॉड ऐसे ही नहीं कहे जाते, ऑपोनेंट पसीना बहाती रहेगी, तुम आग उगलते रहना, उम्मीद करता हूँ के ऐसा कोई भी रिकॉर्ड नहीं होगा जो तुमसे बचेगा, तुम सब तोड़ोगे, फिर कुछ समय बाद तुम अपने रिकॉर्ड तोड़ोगे, तुम्हें गोल्डन डक नहीं बनना है, तुमको फीनिक्स बनना है, फ़ीनिक्स, जो खुद की राख से जन्मता है। हमेशा टेबल के दूसरी तरफ़ रहना है। ढेरो बधाई, ढेरो शुभकामनायें और ढेरो शुक्रिया हमारा इतना एंटरटेनमेंट करने के लिये, तुम बॉस हो, बॉस रहना, अभी बहुत कुछ है हासिल करने को, तुमको सब मिलेगा, तुम हकदार हो सबके, कोई एक फेल्योर तुम्हारे जीवन का निर्धारण नहीं करेगा, तुम करोगे, तुम्हें करना ही होगा, ये मैदान तुम्हारा है, ये शहर, ये देश, ये दुनिया तुम्हारी है, जियो और राज करो। राजस्थान के लीग स्टेज में जीतने की प्रार्थना सिर्फ़ इसलिए करता हूँ कि तुमको एक और बार बैटिंग करता देख सकूँ, आज भी करूँगा, ताकि एक और बार तुमको मैदान पर देख सकूँ। ढेरो शुभकामनायें! -तुम्हारा एक क्रिकेट फ़ैन, जो आईपीएल में सिर्फ़ तुमको देखने के लिए टीवी ऑन करता है। @rajasthanroyals

QME
0
1
1
521
Shikhar Dhawan
Shikhar Dhawan@SDhawan25·
⁠Watching Vaibhav bat today, it was hard to believe how young he is 👏 The composure, shot selection and awareness were outstanding. Well played young man 🙌
Shikhar Dhawan tweet media
English
102
1.6K
30.3K
180.1K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

धमाकेदार स्ट्राइक रेट से 600 से ज़्यादा रन, सबसे ज़्यादा छक्के, वो भी सिर्फ़ 15 मैचों में, अद्भुत। तुम्हारी उम्र को लेकर दुनिया भर के बेवकूफ़ों में बहस होती रहेगी मगर क्या उनको नहीं पता के 15 से लेकर 45 साल तक की उम्र में किसी भी दिग्गज ने वो कारनामा नहीं किया जो तुमने महज़ 15-16 मैचों में कर दिया है? मुझे अभी एग्ज़ैक्ट नं तो नहीं पता मगर जिस तरह पिछले मैच में तुमने क्रिस गेल के रिकॉर्ड को लगभग तोड़ ही दिया था, उसे देख कर खुद ग्रेट क्रिस गेल भी मुस्कुरा रहे होंगे, तुम अमेज़िंग हो छोटे, तुम बॉस बेबी हो। बुमराह की पहली गेंद पर छक्का, स्टार्क की पहली गेंद पर छक्का, पैट कमिंस की पहली गेंद पर, बोल्ट की पहली गेंद पर, नारायण की दूसरी और कमिंस को बैक टू बैक 4,4,4,6, शायद ही कोई दिग्गज हो जो तुम्हारे सामने टिका हो! ये कोई जंग नहीं है, कोई युद्ध नहीं है, 3-4 घंटे का एक गेम है जिसमें तुम डॉमिनेट कर रहे हो, आउट होने पर रोते हो, शतक पर दिल बनाते हो, मुस्कुराते हो, शर्माते हो, तुम सीख रहे हो, सीखते रहो, हो सके तो किसी के इन्फ्लुएंस में मत आना, तुम्हारी बढ़ती शोहरतें तुम्हारे कर्म से हैं, तुम्हारी बल्लेबाज़ी से हैं, किसी फेम के डिस्ट्रैक्शन में आकर अपने खेल पर असर न पड़ने देना, बुरे दिन भी आएँगे, तेंदुलकर के भी आए थे, मगर वो गॉड ऐसे ही नहीं कहे जाते, ऑपोनेंट पसीना बहाती रहेगी, तुम आग उगलते रहना, उम्मीद करता हूँ के ऐसा कोई भी रिकॉर्ड नहीं होगा जो तुमसे बचेगा, तुम सब तोड़ोगे, फिर कुछ समय बाद तुम अपने रिकॉर्ड तोड़ोगे, तुम्हें गोल्डन डक नहीं बनना है, तुमको फीनिक्स बनना है, फ़ीनिक्स, जो खुद की राख से जन्मता है। हमेशा टेबल के दूसरी तरफ़ रहना है। ढेरो बधाई, ढेरो शुभकामनायें और ढेरो शुक्रिया हमारा इतना एंटरटेनमेंट करने के लिये, तुम बॉस हो, बॉस रहना, अभी बहुत कुछ है हासिल करने को, तुमको सब मिलेगा, तुम हकदार हो सबके, कोई एक फेल्योर तुम्हारे जीवन का निर्धारण नहीं करेगा, तुम करोगे, तुम्हें करना ही होगा, ये मैदान तुम्हारा है, ये शहर, ये देश, ये दुनिया तुम्हारी है, जियो और राज करो। राजस्थान के लीग स्टेज में जीतने की प्रार्थना सिर्फ़ इसलिए करता हूँ कि तुमको एक और बार बैटिंग करता देख सकूँ, आज भी करूँगा, ताकि एक और बार तुमको मैदान पर देख सकूँ। ढेरो शुभकामनायें! -तुम्हारा एक क्रिकेट फ़ैन, जो आईपीएल में सिर्फ़ तुमको देखने के लिए टीवी ऑन करता है। @rajasthanroyals

QME
0
0
0
306
Irfan Pathan
Irfan Pathan@IrfanPathan·
The maturity of Vaibhav suryavanshi is lit 🔥
हिन्दी
75
502
14.3K
105.4K
ill Logiqal
ill Logiqal@ill_logiq·
ill Logiqal@ill_logiq

धमाकेदार स्ट्राइक रेट से 600 से ज़्यादा रन, सबसे ज़्यादा छक्के, वो भी सिर्फ़ 15 मैचों में, अद्भुत। तुम्हारी उम्र को लेकर दुनिया भर के बेवकूफ़ों में बहस होती रहेगी मगर क्या उनको नहीं पता के 15 से लेकर 45 साल तक की उम्र में किसी भी दिग्गज ने वो कारनामा नहीं किया जो तुमने महज़ 15-16 मैचों में कर दिया है? मुझे अभी एग्ज़ैक्ट नं तो नहीं पता मगर जिस तरह पिछले मैच में तुमने क्रिस गेल के रिकॉर्ड को लगभग तोड़ ही दिया था, उसे देख कर खुद ग्रेट क्रिस गेल भी मुस्कुरा रहे होंगे, तुम अमेज़िंग हो छोटे, तुम बॉस बेबी हो। बुमराह की पहली गेंद पर छक्का, स्टार्क की पहली गेंद पर छक्का, पैट कमिंस की पहली गेंद पर, बोल्ट की पहली गेंद पर, नारायण की दूसरी और कमिंस को बैक टू बैक 4,4,4,6, शायद ही कोई दिग्गज हो जो तुम्हारे सामने टिका हो! ये कोई जंग नहीं है, कोई युद्ध नहीं है, 3-4 घंटे का एक गेम है जिसमें तुम डॉमिनेट कर रहे हो, आउट होने पर रोते हो, शतक पर दिल बनाते हो, मुस्कुराते हो, शर्माते हो, तुम सीख रहे हो, सीखते रहो, हो सके तो किसी के इन्फ्लुएंस में मत आना, तुम्हारी बढ़ती शोहरतें तुम्हारे कर्म से हैं, तुम्हारी बल्लेबाज़ी से हैं, किसी फेम के डिस्ट्रैक्शन में आकर अपने खेल पर असर न पड़ने देना, बुरे दिन भी आएँगे, तेंदुलकर के भी आए थे, मगर वो गॉड ऐसे ही नहीं कहे जाते, ऑपोनेंट पसीना बहाती रहेगी, तुम आग उगलते रहना, उम्मीद करता हूँ के ऐसा कोई भी रिकॉर्ड नहीं होगा जो तुमसे बचेगा, तुम सब तोड़ोगे, फिर कुछ समय बाद तुम अपने रिकॉर्ड तोड़ोगे, तुम्हें गोल्डन डक नहीं बनना है, तुमको फीनिक्स बनना है, फ़ीनिक्स, जो खुद की राख से जन्मता है। हमेशा टेबल के दूसरी तरफ़ रहना है। ढेरो बधाई, ढेरो शुभकामनायें और ढेरो शुक्रिया हमारा इतना एंटरटेनमेंट करने के लिये, तुम बॉस हो, बॉस रहना, अभी बहुत कुछ है हासिल करने को, तुमको सब मिलेगा, तुम हकदार हो सबके, कोई एक फेल्योर तुम्हारे जीवन का निर्धारण नहीं करेगा, तुम करोगे, तुम्हें करना ही होगा, ये मैदान तुम्हारा है, ये शहर, ये देश, ये दुनिया तुम्हारी है, जियो और राज करो। राजस्थान के लीग स्टेज में जीतने की प्रार्थना सिर्फ़ इसलिए करता हूँ कि तुमको एक और बार बैटिंग करता देख सकूँ, आज भी करूँगा, ताकि एक और बार तुमको मैदान पर देख सकूँ। ढेरो शुभकामनायें! -तुम्हारा एक क्रिकेट फ़ैन, जो आईपीएल में सिर्फ़ तुमको देखने के लिए टीवी ऑन करता है। @rajasthanroyals

QME
0
1
6
1.2K
Sagar
Sagar@sagarcasm·
Police ke saamne bowlers ka murder karta hai
Sagar tweet media
Eesti
21
163
5.2K
68.2K
Mario Nawfal
Mario Nawfal@MarioNawfal·
🇷🇺 Putin is spending $26 billion trying to live forever, and the methods sound like science fiction... Remember that hot-mic moment last September when Putin told Xi humans could achieve immortality by replacing their organs? Turns out he wasn't musing. He was describing an actual Kremlin flagship project. Russia's longevity initiative includes 3D-printing living human tissue, growing transplantable organs inside genetically compatible mini-pigs, cryotherapy chambers that drop to minus 170 degrees, and a new gene therapy designed to slow cellular aging. The stated goal is full human organ replacement by 2030. It puts Putin in the same race as Silicon Valley titans like Bezos, Altman, and Thiel, who are pouring fortunes into beating aging. The difference is that in Russia, the pursuit of immortality is now an official state priority, led in part by Putin's own daughter, an endocrinologist. At 73, Putin has spent decades projecting the image of an ageless strongman. Now we're learning just how far he's willing to go to make it real. Source: Wall Street Journal
Mario Nawfal tweet mediaMario Nawfal tweet media
English
263
534
3.7K
710.4K