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From UT of Jammu Kashmir

Jammu, Jammu & Kashmir, India Katılım Nisan 2020
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Dr.Suneer Misri
Dr.Suneer Misri@suneermisri·
Zafarul Islam Khan has been slammed by the National Minorities Commission for his hateful comments. Hate speech wale ne report kaise banayi. #ZafarIslamKiJhootiReport
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MALHOTRA
MALHOTRA@Malhotr53204216·
ज़फरुल इस्लाम खान को उनकी घृणित टिप्पणियों के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा फटकार लगाई गई है। हेट स्पीच देने वाले ने रिपोर्ट कैसे बनाई? #ZafarIslamKiJhootiReport
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रानी लक्ष्मीबाई ने पढ़ाई के साथ-साथ घुड़सवारी, निशानेबाजी और तलवारबाजी आदि युद्ध कौशलों का प्रशिक्षण लिया। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहकर बुलाते थे| #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रानी लक्ष्मीबाई की माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था | #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रानी लक्ष्मीबाई का जन्‍म 19 नवम्‍बर, 1835 को काशी (वाराणसी) में जिला सतारा के एक महाराष्ट्रीयन करहेड ब्राह्मण परिवार में हुआ था। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रामचन्‍द्र राव देशमुख ने बड़ी सावधानी से अमर वीरांगना रानी को उठाया और सुनसान जगह पर चिता तैयार कर उन्‍हें अंतिम विदाई दी। 23 वर्ष की आयु में इस महाशक्ति ने देश के लिये अपना बलिदान दे दिया। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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18 जून, 1858 को ग्वालियर के फूल बाग क्षेत्र के पास कोट का सराय में ह्यूरोज के साथ लड़ाई के दौरान रानी ने अपना सर्वोच्‍च बलिदान दिया। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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अंग्रेजों की यह तानाशाही रानी लक्ष्‍मीबाई को स्‍वीकार नहीं था। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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झाँसी की सेना में महिलाएँ भी गोला-बारूद ले जा रही थीं और सैनिकों को भोजन दे रही थीं। रानी लक्ष्मीबाई स्‍वयं शहर की रक्षा का निरीक्षण कर रही थीं। तात्या टोपे की अध्यक्षता में 20000 सेना लक्ष्मीबाई के लिए भेजा गया था। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रानी का बलिदान ''सरदार अब मेरा बचना असंभव है। म्लेच्‍छ मेरे शरीर को स्‍पर्श न कर सकें, तुम्‍हें इसका प्रबंध करना है। मेरे गिरते ही तुम मेरे निर्जीव शरीर को एकांत में ले जाकर जला देना। यह दायित्‍व तुम्‍हारा है” #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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यमुना तट पर पहुँचते ही अंग्रेजी सेना ने रानी को घेर लिया। बंदी बनाने का प्रयास किया, पर उन्‍होंने हिम्‍मत से काम लिया और अंग्रेजी अधिकारी लेफ्टिनेंट वॉकर को वहीं मार डाला। यहाँ से वह आगे बढ़ीं। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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सर ह्यूज रोज की अगुवाई में अंग्रेज सैनिकों ने 23 मार्च, 1858 को झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने आत्म-समर्पण नहीं करने का फैसला किया। तत्‍कालीन समय लगभग दो सप्‍ताह तक युद्ध चला। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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क्रांतिकारियों से मिल जाने का समाचार सुनते ही अंग्रेजों ने रानी पर आक्रमण कर दिया, लेकिन रानी और क्रांतिकारी जमकर प्रतिकार करते हुए युद्ध लड़े, परिणामस्‍वरूप अंग्रेजों को झाँसी किला छोड़कर भागना पड़ा। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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मेरठ से शुरू हो चुके 1857 संग्राम की चिंगारी झाँसी पहुँची। धीरे-धीरे यह राज्‍य क्रां‍तिकारियों का प्रमुख केन्‍द्र बन गया। रानी को यह जानकारी मिली कि क्रांतिकारी अंग्रेजों का विरोध कर हैं, यह उनके लिये सुनहरा पल था और वह भी क्रांतिकारियों के साथ हो लीं। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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अंग्रेजों की यह तानाशाही रानी लक्ष्‍मीबाई को स्‍वीकार नहीं था। उन्‍होंने अपनी सुरक्षा को मजबूत किया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया। महिलाओं को भी सैन्य प्रशिक्षण दिया गया| झलकारी बाई, को अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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अंग्रेजों के विरुद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 में अंग्रेजी सेनानायकों के दांत खट्टे करने वाली ऐसी वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई थी | #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इसमें सहयोग दिया। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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रानी लक्ष्मीबाई के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर–हर महादेव के उद्घोष से झाँसी की रणभूमि गूँज उठी। #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर शत्रु दल का संहार किया | #लक्ष्मीबाई_बलिदान_दिवस
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