ग़ालिब साहब

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ग़ालिब साहब

ग़ालिब साहब

@jonegalib

किताब, फिल्म, सफ़र ए इश्क,औरत, मैं कहां कहां ना गया ख़ुद को ढूंढता हुआ,

जॉनएलिया Katılım Şubat 2020
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ग़ालिब साहब
ग़ालिब साहब@jonegalib·
डिप्रेशन कोई कुदरती बीमारी नहीं है,ये आपकी जिंदगी मे मौजूद घटिया लोगो का दिया हुआ तोहफा है..
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ग़ालिब साहब
जो खुद पर काम कर रहा है, वो दुनिया से कई कदम आगे है..
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ग़ालिब साहब
जिनके सिर किताबों के आगे झुके होते हैं, लोग हमेशा उनके पीछे खड़े होते है..
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ग़ालिब साहब
अगर तुम समस्या खोजोगे तो समस्या ही मिलेगी लाले, अगर तुम संभावना खोजोगे तो हर मुश्किल में एक रास्ता दिखेगा..
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ग़ालिब साहब
कुछ लोग ईस तरह भी मेहरबान होते हैं औरत की ज़ात पर, माँ बहनों की गालिया देते हैं माँ बहनों के नाम पर..
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ग़ालिब साहब
किसी का दिया हुआ ज़ख्म आपकी ज़िंदगी खत्म नहीं करता, बल्कि आपको फौलाद से भी ज्यादा मज़बूत बना देता है..
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ग़ालिब साहब
उम्र से ऊंचाई नहीं नापी जाती, कुछ बूढ़े भी तो मुर्ख होते हैं..
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ग़ालिब साहब
ऐसा भी सिलसिला हो खुदाया की जिस्म से, मर जाए जब जमीर तो बदबू निकल पड़े..
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ग़ालिब साहब
जंग हो या जिंदगी,जीतेगा वहीं जो पूरी ताकत से जी जान लगा देगा..
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ग़ालिब साहब
शिकायत मौत से नहीं अपनों से थी,ज़रा सी आंख क्या लगी,वो तो कब्र खोदने में लग गए..
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ग़ालिब साहब
आप तबतक ही अज़ीज़ हैं जबतक लोगों के लिए मुफ़ीद हैं.
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ग़ालिब साहब
शौक सारे अमीरों के पूरे हुए, ख्वाब मेरे निगलती रही गरीबी..
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ग़ालिब साहब
देर से आया लेकिन समझ में आया है, दुनिया वाले ठीक कहते थे तेरे बारे में..
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ग़ालिब साहब
इंसान का असली कद उसकी उम्र से नहीं,बल्कि उन ज़िम्मेदारियों से मापा जाता है, जिन्हें वो बिना थके अपने कंधों पर उठाए रखता हैं..
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ग़ालिब साहब
बड़े बड़े लोग खुद को बहोत छोटा बताते है,और अपनी इन्हीं बातों से वे और बड़े हो जाते हैं..
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ग़ालिब साहब
वाकिफ है हम,ईस दुनिया के रीवाज़ों से ग़ालिब, ज़ब दिल भर जाए तो हर कोई भूला देता है..
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ग़ालिब साहब
जिंदगी जीनी है तो अपने दम पे जिओ लाले, दूसरों के कांधो पे सिर्फ जनाज़े उठाए जाते हैं..
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ग़ालिब साहब
रिश्तों की खूबसूरती महंगे तोहफों में नहीं,बल्कि मुश्किल वक्त में एक दूसरे का हाथ थामे रखने में होती हैं..
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ग़ालिब साहब
यहां रिश्ते दिल से नहीं फायदे से चलते हैं, आपकी वैल्यू,आपके दिल से नहीं, जरूरत से तय होती है,और जरूरतें बदलती रहती है..
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ग़ालिब साहब
असली आज़ादी वह है,जहाँ एक आम इंसान को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े..
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ग़ालिब साहब
दौर ऐ बातिल में,हक परसतों की बात तो रहती हैं,मगर सर नहीं रहता..
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