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@kagazkephoool

हम ग़म-ज़दा हैं लाएँ कहाँ से ख़ुशी के गीत 🎭 Cinema | Art | Literature | Politics

India Katılım Aralık 2017
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गुलमोहर@kagazkephoool·
"मैं हूँ वसंत में सुखद अकेलापन" (वीरेन डंगवाल)
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गुलमोहर@kagazkephoool·
पुरानी मंज़िलों का शौक़ तो किस को है बाक़ी अब नई हैं मंजिलें हैं सब के दिल में जिन के अरमाँ बना लेना नई मंज़िल न था मुश्किल मगर ऐ दिल नए रस्ते बनाने में अभी कुछ दिन लगेंगे (जावेद अख़्तर)
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गुलमोहर@kagazkephoool·
आख़िर! कब तुम्हारी याद नहीं आई मगर इस चीख़ते-बिलखते मौसम में नहीं कह सका प्रिय! तुम्हारे नेह में व्याकुल मन की बात। (तुम्हारी याद/पंकज प्रखर)
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गुलमोहर@kagazkephoool·
Women's fear of violent men and men's fear of fearless women. (Eduardo Galeano)
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किसी किताब में दिल की झाड़ियों के बारे पढ़ा था। कुछ लोगों के भीतर झाड़ियाँ उगने लगती हैं और उनका दिल धीरे-धीरे दुनिया से डरकर झाड़ियों में दुबक जाता है, वहीं छिपा रहता है। निर्मल वर्मा (एक चिथड़ा सुख)
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तुममें कहीं कुछ है कि तुम्हें उगता सूरज, मेमने, गिलहरियाँ, कभी-कभी का मौसम जंगली फूल-पत्तियाँ, टहनियाँ - भली लगती हैं आओ उस कुछ को हम दोनों प्यार करें एक दूसरे के उसी विगलित मन को स्वीकर करें। (रघुवीर सहाय, 1954)
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कभी-कभी कहीं दूर छोड़कर अपने को लौट आता हूँ परायों के पास, पराए की तरह सोचता हूँ— यह कैसा आस-पास जिसमें सभी दूर दूर। (कुँवर नारायण)
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ये तो सख़्त चीज़ें हैं जो टूट जातीं ठक्क से ! काँच का गिलास टूट जाता है  पानी नहीं टूटता टूट जाती फूलों की माला; फूल की सुगंध नहीं टूटती तुमने क्या सोचा - मेरा दिल तोड़ना इतना आसान काम है ? (बाबुषा कोहली)
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मुझे औरत की अँगुलियों के बारे में पता है ये अंगुलियाँ समुद्र की लहरों से निकलकर आती हैं और एक थके-माँदे पस्त आदमी को हरे-भरे गाते दरख़्त में बदल देती हैं (चंद्रकांत देवताले)
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आहिस्ता- आहिस्ता समय गुज़र गया है शेष रह गया है उसका वजन। ( कुमार अम्बुज )
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एक बार उससे ही प्रेम से पूछ लेते उसकी उदासियों का कारण वो पूछने भर से अपनी तमाम उदासियों के खोल से बाहर निकल सकती थी ! तुमसे लिपट रो सकती थी ! स्त्रियाँ जटिल हो जाती हैं क्योंकि तुम सरल नहीं हो पाते ! (चन्द्रा फुलार)
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तुम मिल ही जाओगी वसंत में किसी रोज तो कहूँगा- तुम मुझे अपने घर ले चलो अब मैं प्रेम में रहना चाहता हूँ। (पंकज मिश्रा)
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मैं बगैर धुन के केवल इतना जानती हूँ कि तुम गर उदासी में संगीत सुन पा रहे हो, तो ख़ैर है वर्ना उदासी से संगीत और इंतजार से कल्पनाएं निकल जाए तो आदमी क्षण भर में मर सकता है (अनुपमा कृति)
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सालों बाद कोई तुम्हें चूमकर पूछेगा कि कैसा लगा अतीत के सारे स्पर्श उतर आएँगे देह में और वे दिन भी तुम कहते–कहते रुक जाओगी स्पर्श के सुख कितने क्षणिक और दुख कितने दीर्घजीवी होतें हैं। (अमर दलपुरा)
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I am nothing to anyone, and that is my greatest freedom. (Franz Kafka)
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I tell myself I am searching for something. But more and more, it feels like I am wandering, waiting for something to happen to me, something that will change everything, something that my whole life has been leading up to. (Khaled Hosseini)
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रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग रोग-शोक हँसी-ख़ुशी योग और वियोग देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो? बोलो, बोलो, पहले जैसी हो! (ज्ञानेंद्रपति)
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सबसे सहज है कह देना किसी से कि तुमने मुझे समझा ही नहीं त्रासदियां महानायकों के जीवन में ही नहीं हमारे आपके जीवन में भी हैं बस उन पर लिखे नहीं जाते महाकाव्य! (सुधांशू फ़िरदौस)
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परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले (मीर तक़ी मीर)
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गुनाह होता तो- बोझ कम हो जाता नेकी होती तो- भूल भी जाती लेकिन ये तो एक तजुर्बा है; इसे कहां छोड़ आऊं मैं! - नजमा (बाज़ार, 1982)
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