ख़ूरचेंप
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सिस्टम ऐसे ही चलता है,, गरीब को अपनी बातें प्रशासन तक पहुंचाने का अधिकार नहीं है,, यदि वह ऐसा करता है तो प्रशासन उसे अपने कार्य में हस्तक्षेप मानेगी,, और हां हमारे भारत में इसे लोकतंत्र कहते हैं,,!!








एक खिलाडी से सिर्री किस्म के सवाल पूछ के पत्रकारिता की थू थू कराते कुछ पत्रकार।




कब तक Telecom कपानियों की जनता से मनमानी लूट जारी रहेगी? क्यों हर टेलीकॉम कंपनी जबरदस्ती डेटा पैक थोप रही है, जबकि करोड़ों गरीब लोगों को उसकी जरूरत ही नहीं? 👉 सिर्फ कॉल करने वालों के लिए सस्ता वॉयस प्लान क्यों नहीं है? 👉 30 दिन का न्यूनतम रिचार्ज प्लान सभी कंपनियों पर लागू क्यों नहीं किया जाता? 👉 क्या सरकार जानबूझकर चुप है क्योंकि इन कंपनियों से भारी चंदा आता है? 👉 TRAI और दूरसंचार मंत्रालय आखिर कर क्या रहे हैं — क्या उन्हें नहीं दिखता कि ये “मोनोपॉली” बन चुकी है? 👉 जो लोग सिर्फ कॉल करना चाहते हैं, उनसे हर महीने 200–300 रुपए वसूलना क्या लूट नहीं है? 👉 क्या अब मोबाइल रखना भी अमीरों का हक़ बन जाएगा? जनता पूछ रही है — जब डेटा नहीं चाहिए तो डेटा के नाम पर मजबूरी क्यों? सरकार जवाब दे, ये कंपनियां नहीं — पब्लिक प्रॉब्लम बन चुकी हैं।









