Dr. Kuldeep sharmma

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@kuldeepdikawa

Assistant Professor in Rajasthan College Education. जय हिन्द, जयतु संस्कृतम्

राजस्थानम्, भारत Katılım Ağustos 2014
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
परम के प्रति प्रेम भक्ति कहलाता है। परम के प्रति समर्पण ही त्याग है। परम के लिए जीना ही सेवा है। - #सप्रेम_हरिस्मरण
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@PPBhaishri सदैन्य प्रणाम। जय श्री कृष्ण! सम्यगुक्तम् समाज में सर्वविध प्रवृत्तियों के मूल में द्विविध प्रेरक शक्ति है। राम और काम शक्ति। विचारधारा की व्यापकता का आधार "राम" है। संकीर्ण विचारधारा का आधार "काम" है। बौद्धिक शक्ति से परे "काम" की शक्ति "राम" की शरणागति पर्यन्त ही बनी रहती है
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
स्वतंत्र और कल्याणकारी विचारधारा वाले लोगों की बहुतायत ही प्रबुद्ध समाज का परिचय है। - #सप्रेम_हरिस्मरण
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*पृष्ठस्य दर्शनं येन* *कारितं कातरात्मना।* *जीवन्मृतस्य तस्यान्यत्* *क्रियतां किं मनस्विना।।* (पद्मपुराण -०६/४४९) जिस कायर व्यक्ति ने अपनी पीठ दिखा दी हो (हार मान ली हो) उस मरे हुए के समान जीवित व्यक्ति का मनस्वी व्यक्ति भी कुछ सहयोग नहीं कर सकता।
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नदी दो किनारों की मर्यादा में रह कर बहती है तब जीवनदायनी है, बाढ़ में किनारों को तोड़ कर बहती है तब तबाह करती है। जीवन भी वेद धर्म और लोक धर्म की मर्यादाओं में रहे तो सुखी और समृद्ध बन सकता है । - #सप्रेम_हरिस्मरण
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Bhaishri Rameshbhai Oza
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कर्म की गति गहन है, धर्म का तत्व भी रहस्यमय है। प्रभु में विश्वास और महापुरुषों के मार्ग पर चलते रहना चाहिए । - #सप्रेम_हरिस्मरण
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*धनधान्यप्रयोगेषु* *विद्या संग्रहेषु च।* *आहारे व्यवहारे च* *त्यक्तलज्जःसुखी भवेत्।।* जो लोग धन और अनाज के लेन-देन में, विद्या प्राप्त करते समय, भोजन करते समय, तथा आपसी व्यवहार में लज्जा नही करते, वे सुखी रहते हैं।
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*आर्षं धर्मोपदेशं च* *वेदशास्त्राविरोधिना।* *यस्तर्केणानुसंधत्ते* *स धर्मं वेद नेतरः।।* (मनुस्मृति - ०२/१०६) - जो विद्वान् वेदशास्त्र-अविरोधी तर्क के द्वारा वेदोक्त धर्मोपदेश का अनुसंधान करते हैं, वे धर्म के ज्ञाता होते हैं, अन्य नहीं।
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बीज को वृक्ष मिलता नहीं, ज़मीन पानी प्रकाश से बीज की वृक्षसंभावना प्रकट हो जाती है, बीज वृक्ष बन जाता है। ज्ञान की दृष्टि से जीव को भगवान मिलते नहीं, जीव ही ब्रह्म हो जाता है। - #सप्रेम_हरिस्मरण
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*मोक्षो विषयवैरस्यं* *बन्धो वैषयिको रसः।* *एतावदेव विज्ञानं* *यथेच्छसि तथा कुरु।।* (अष्टावक्र गीता) - विषयों से उदासीन होना मोक्ष है और विषयों में रस लेना बंधन है, ऐसा जानते हुए मनुष्य की जैसी इच्छा हो वैसा आचरण करना चाहिए।
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@ShriHariMandir @PPBhaishri अभिनन्दनम्। सादर-सदैन्य-प्रणामा: । गुरुवर की प्रत्येक कथा दिव्य होती है। पर आज तक जितनी कथायें महाराष्ट्र की धरती पर हुई हैं, वे अद्भुत हैं। परमात्म-रस में आप्लावित शब्दब्रह्म अपने उच्चतम शिखर को छूता हुआ महान् आनन्द देता है। कितनी ही बार सुनो मन नहीं भरता है। 🌹🙏
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चैत्र नवरात्र के प्रारम्भ में एवं गुड़ी पाड़वा के पावन अवसर पर हिंगोली (महाराष्ट्र) में @PPBhaishriके श्रीमुख से सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का मंगल आयोजन। 📆 Mar 19-25, 2026 ⏰4pm to 7:30pm 📍 रामलीला मैदान, हिंगोली (महाराष्ट्र) 🪷 आयोजक:- श्री बलराज बाल गणेश मंडल (हिंगोली)
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"जिह्वा" का बिगड़ना "जीवन" का बिगड़ना है। (डोंगरे जी महाराज प्रवचन) रसस्वरूप परमात्मा को "रसना" से ही जीतना सम्भव है। (जयति रसम् अनया इति जिह्वा ) लौकिक रसों में आसक्त जिह्वा व्यक्ति को असंयत बनाती है, जिससे अनिच्छापूर्वक अपराध बन जाते हैं। अत: जिह्वानुशासन परम-आवश्यक है।
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सर्वेष्वृतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितेषिभिः बलस्यार्धेन कर्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा (सुश्रुत संहिता) जो पुरुष अपना हित चाहते हों उन्हें सभी ऋतुओं में प्रतिदिन अपने बल के आधे भाग से व्यायाम करना चाहिए। इसके विपरीत पूरा बल लगाकर व्यायाम करने से शरीर को हानि पहुंचती है।
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*यो दु:खितानि भूतानि* *दृष्ट्वा भवति दु:खित:।* *सुखितानि सुखी चापि* *स धर्मात्मेति गीयते।* (विक्रमार्कचरित- १३/१७२) जो व्यक्ति कष्ट में पड़े हुए प्राणियों को देखकर दु:खी होता है और सुखी व्यक्ति को देखकर प्रसन्न होता है, वह व्यक्ति धर्मात्मा उपाधि की धारण करने योग्य माना जाता है
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यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम्। । लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः श्री.भा. जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन, वन्दन, श्रवण और पूजन जीवोंके पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है, उन पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णको बार-बार नमस्कार है ॥
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बिना भक्ति के ज्ञान पंगु है। भक्ति से ज्ञान की योग्यता उत्पन्न होती है। आचरण में भक्ति-जनित ज्ञान ही क्रियान्वित होता है।
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
आधारभूता जगतस्त्वमेका         महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत-       दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥ – श्रीदुर्गासप्तशती
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यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
आध्यात्मिक अनुभूति सामान्यतया मौन रहना पसंद करती है। - #सप्रेम_हरिस्मरण
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
बिना प्रकृति के पुरुष सृष्टि का सृजन नहीं कर सकता। मातृ शक्ति धारण पोषण और रक्षण करने वाली भी बनती है। बेटी,बहन,पत्नी,माता सब रूपों में वह मंत्री भी है। विश्व की महिला शक्ति को आज अभिनंदन और वंदन। #InternationalWomensDay2026
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Shyambhai Y Thakar
Shyambhai Y Thakar@shyambhaithakar·
0607 || ShrimadBhagwat Mool Parayana || श्रीमद्भागवत मूल पारायण youtu.be/fotlV66S1hk
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