मूर्ति का निर्माण हो सकता है, मृत्तिका का नहीं। उसी मिट्टी से अच्छी प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है, बुरी भी, पर जहाँ मिट्टी ही न हो, वहाँ कितने ही प्रचार से, कितनी भी शिक्षा से, कितने भी जाज्वल्यमान बलिदान से मूर्ति नहीं बन सकती।
शेखर एक जीवनी — १
जीवन संग्राम कितना विकट है। वैसे इसे संग्राम कहना ही भ्रम है। संग्राम की उमंग, उत्तेजना, वीरता और जय-ध्वनि यहां कहां! यह संग्राम नहीं, ढेलम-ढेल, धक्का-पेल है।
प्रेमचंद / कहानी 'दीक्षा' से
उसी एकान्त में घर दो
कि जिस में सभी आवें-मैं न आऊँ।
नहीं मैं छू भी सकूं जिसको
मुझे ही जो छुए, घेरे, समो ले।
क्योंकि जो मुझसे छुआ जा सका
मेरे स्पर्श से चटका ।
अज्ञेय
खुबसूरत कागज सुन्दर तो होता ही है, लेकिन यदि वह कोरा हुआ और उसमें कोई मर्मवचन लिखे हुए न रहे तो सौन्दर्य में रहस्य ही क्या रहा? सौन्दर्य में रहस्य न हो तो वह एक खूबसूरत चौखटा है।
मुक्तिबोध / एक साहित्यिक की डायरी
शब्दों में भरे जा सकते हैं गहन-गहन अर्थ लेकिन
अर्थों में कैसे सिमट सकेगी—
अनुभूति?
फिर एक शाम
तुम्हारी हथेली पर क्या बचेगा
अधसुलगा एक सिगरेट और
अनसुलझे कई सवाल!
~ अपूर्वा श्रीवास्तव